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जन आंदोलन की शिक्षा
ऐसे जन आंदोलन में हिस्सेदारी, जो जनता के किसी अन्य तबके को निशाना नहीं बनाता हो, जनतंत्र तथा एकता के मूल्यों की सबसे बड़ी शिक्षक होती है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और राजनीतिक विश्लेषक प्रभात पटनायक का विशेष आलेख
प्रभात पटनायक
05 Mar 2021
जन आंदोलन की शिक्षा

किसी गैर-विभाजनकारी जन आंदोलन में यानी ऐसे जन आंदोलन में हिस्सेदारी, जो जनता के किसी अन्य तबके को निशाना नहीं बनाता हो, जीवन की भौतिक दशा सुधारने का संघर्ष जिसका शास्त्रीय उदाहरण है, जनतंत्र तथा एकता के मूल्यों की सबसे बड़ी शिक्षक होती है। इसीलिए, राजनीतिक क्रांतियां, जो इस तरह के जन आंदोलन का सर्वोच्च रूप होती हैं, जबर्दस्त सामाजिक मंथन का मौका होती हैं, जब एक-दूसरे के प्रति जनता के रुख का भी क्रांतिकारीकरण होता है। वास्तव में यह तो क्रांति की सफलता की बुनियादी शर्त ही है और जनता, क्रांति में हिस्सा लेने की प्रक्रिया में ही, इस बुनियादी सच्चाई को सीखती है।

उपनिवेशविरोधी संघर्ष और नव-जागरण

ऐसे किसी जन आंदोलन में भागीदारी को सिखाने के पहलू से भूमिका को रेखांकित करने के लिए तो बहुत मेहनत करने की जरूरत नहीं है, पर इसका बहुत भारी महत्व है और इसे हमेशा समझा भी नहीं जाता है। हमारे देश का उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष इसका स्वत: स्पष्ट उदाहरण है। उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में हिस्सेदारी का ही नतीजा था कि उस दौर में बहुत भारी संख्या में लोग जाति तथा लिंग के पूर्वाग्रहों लांघते और यहां तक कि समाजवादी तथा कम्युनिस्ट रुख अपनाने की ओर खिंचते भी, नजर आते हैं। बेशक, भारत में इस संघर्ष की लहर फिर भी कुछ बंधी-बंधी सी रही थी, लेकिन इसके बिना भारत का आधुनिकता के रास्ते पर वह मार्च संभव ही नहीं था, जिसे हमारे संविधान में स्थापित किया गया है। यह वही संविधान है जो सभी नागरिकों की समानता का वादा करता था, जो जनतांत्रिक संस्थाएं तथा सभी के मौलिक अधिकार स्थापित करता है और जो राज्य को या शासन को, सभी धर्मों से अलग करता है।

यह एक ऐसे समाज के लिए बहुत गहरा बदलाव था, जिसकी पहचान जाति व्यवस्था के रूप में, हजारों साल पुरानी संस्थागत असमानता तथा उत्पीडऩ से होती थी। लेकिन, यह बदलाव मोहनदास करमचंद गांधी या जवाहरलाल नेहरू या बीआर आंबेडकर के कृपापूर्ण आशीर्वादों से नहीं आया था। यह तो उस उपनिवेशावाद-विरोधी आंदोलन से उत्पन्न हुआ था, जिसने विशाल संख्या में लोगों को अपने दायरे में खींचा था और एक नये भारत का वादा किया था। बेशक, जिन नेताओं को हमारे संविधान को सूत्रबद्घ करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी, उन्होंने जनता की इस आकांक्षा को अपने निर्णयों में स्वर दिया था।

आंदोलन की शिक्षा: एक ध्यान देने वाली मिसाल

प्रोफेसर अकील बिलग्रामी, जन आंदोलन से जनता के रुख में बदलाव आने की एक ठोस और बहुत ध्यान खींचने वाली मिसाल देते हैं। 1921 में बंगाल प्रांतीय लेजिस्लेटिव काउंसिल में औरतों को मताधिकार देने का विधेयक पराजित हो गया था। लेकिन, आगे चलकर खिलाफत आंदोलन ने जोर पकड़ा और इस आंदोलन में खिंच आए बहुत से मुसलमानों का रुख बदल गया। उनमें से अनेक, कांग्रेस के भीतर, चित्तरंजन दास द्वारा कायम की गयी, स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गए थे। चित्तरंजन दास, बदलाव के लिए प्रगतिशील कानून बनवाने के लिए, विधायिकाओं में प्रवेश की वकालत करते थे। वही महिला मताधिकार विधेयक, 1925 में जब बंगाल विधानसभा में पेश किया गया, स्वराजी मुसलमानों ने उसके पक्ष में वोट किया और विधेयक पारित हो गया।

इस तरह, अपेक्षाकृत थोड़े से अर्से में, उन लैंगिक पूर्वाग्रहों को छोड़ दिया गया, जो किसी भी परंपरागत समाज की आम पहचान हुआ करते हैं। और यह हुआ था एक जन आंदोलन में हिस्सेदारी के चलते, जिससे रवैये में महत्वपूर्ण बदलाव आए थे। यह आंदोलन अपने आप में, अपने बलाघात में साम्राज्यवाद विरोधी होने के बावजूद, एक असाध्य रूप से परंपरावादी उद्देश्य से प्रेरित था--खलीफा राज की पुनर्स्थापना। इसके बावजूद, इससे रवैये में इतने महत्वपूर्ण बदलाव आए थे। प्रसंगवश याद दिला दें कि अनेक शुरुआती कम्युनिस्ट, इस आंदोलन की कतारों से ही आए थे।

किसान आंदोलन पाट रहा है सांप्रदायिक विभाजन की खाई

ठीक ऐसा ही असर आज, किसान आंदोलन से पैदा हो रहा है। इस आंदोलन में शामिल हुए लोगों में अच्छी-खासी संख्या ऐसे लोगों की है, जो 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में भड़के दंगे के दौरान सांप्रदायिक उन्माद में बह गए थे। इससे, जाट हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार पडऩे से, भाजपा ने चुनाव में भारी फायदा बटोरा था। इससे पहले तक, भाजपा का इस क्षेत्र में कभी चुनावी बोलबाला नहीं हुआ था। लेकिन, सांप्रदायिक दंगों की पृष्ठभूमि में और उससे पैदा हुए समुदायों के बीच ध्रुवीकरण के बल पर, भाजपा ने न सिर्फ इस क्षेत्र में प्रवेश कर लिया बल्कि इसके बल पर 2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में संसदीय सीटों के प्रचंड बहुमत पर भी कब्जा कर लिया और इस तरह वह केंद्र में अपने बूते बहुमत हासिल करने में कामयाब हो गयी। इसके बाद के चुनावों में भाजपा की जीत, चाहे वह 2017 का विधानसभा का चुनाव हो या 2019 का संसदीय चुनाव, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिकी हुई थी।

बहरहाल, किसान आंदोलन ने इस ध्रुवीकरण का तोड़ा है और इन तीन कुख्यात कृषि कानूनों के खिलाफ मुसलमानों और हिंदू जाटों को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। सच्चाई यह है कि 2013 के दंगों के कथित उकसावेबाज ने, जो अब केंद्रीय मंत्रिमंडल का सदस्य है, किसान नेताओं के इस आह्वान को तोडऩे की कोशिश करते हुए कि, जाने-माने भाजपाइयों के साथ सामाजिक मेल-जोल नहीं रखा जाए, एक सामाजिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जब एक गांव में जबरन घुसने की कोशिश की, गांव के लोगों ने उसे गांव में घुसने से रोकने की कोशिश की। उसे घुसने से रोकने की कोशिश कर रहे कुछ लोगों की, इस मंत्री के काफिले में शामिल बदमाशों ने पिटाई भी कर दी। बाद  में उसने दावा किया कि एक प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक पार्टी के सदस्यों ने ही, उसके गांव में घुसने का विरोध किया था। लेकिन, इसका झूठ इस तथ्य से साफ हो जाता है कि गांव के लोग उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज किए जाने की मांग को लेकर, पुलिस थाने पर जमा हो गए। यह साफ है कि इस आंदोलन के चलते ही लोगों के रुख में जमीन-आसमान का बदलाव आ गया है। जाहिर है कि इस आंदोलन ने भाजपा द्वारा बुने गए पुराने मिथकों को, निरर्थक बना दिया है।

जनतांत्रिककरण और एकताकारी भूमिका

इसी तरह, जाट किसानों और दलित मजदूरों के बीच टकराव, इस क्षेत्र का स्थायी लक्षण बना रहा है और यह चीज, मजदूर-किसान एकता के रास्ते में एक बड़ी बाधा बनी रही है। इस मामले में, मालिक और उसके मजदूर के बीच के आर्थिक टकराव को, दलितों और जाट किसानों के बीच जातिगत टकराव और बढ़ाता है। यह भीतर ही भीतर सुलगता अंतर्विरोध, अब से कुछ दशक पहले, दिल्ली की सीमाओं से कुछ ही दूरी पर स्थित, कंझावाला नाम के गांव में फूट पड़ा था और उस समय इसकी ओर सारे देश का ध्यान गया था। बहरहाल, मौजूदा किसान आंदोलन ने, एकता के अभूतपूर्व प्रदर्शन में, इन दोनों समूहों को एक साथ ला खड़ा किया है। इन दोनों समूहों के सामने और वास्तव में इन तीन कृषि विधेयकों के खिलाफ संघर्ष में लगे सभी लोगों के सामने यह स्वत:स्पष्ट है कि इन कानूनों का लागू होना, भारतीय खेती आज जिस रूप में बनी हुई है, उसके लिए मौत की घंटी साबित होगा और इसकी मार इन सभी वर्गों पर पड़ेगी। इन समूहों का साथ आना, बहुत भारी महत्व की घटना है और इस विधेयकों के खिलाफ जन आंदोलन ने ही इसे संभव बनाया है।

तीसरा क्षेत्र, जिसमें परंपरागत रवैयों से उबरा जा रहा है, लैंगिक प्रश्न से संबंधित है। एक घोर पितृसत्तात्मक समाज में, किसान आंदोलन में महिलाओं के इतने असाधारण रूप से सक्रिय होने का तथ्य अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में यह ऐसी चीज है जिसकी पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। महिलाओं के बीच आए उभार ने उन्हें सार्वजनिक दायरे में ला खड़ा किया है और इसका, भविष्य में लैंगिक संबंधों के लिए बहुत भारी महत्व है।

इसके अलावा, इलाके के औद्योगिक मजदूरों और किसानों के संबंधों के मामले में भी, हमें अभूतपूर्व दर्जे की एकजुटता देखने को मिल रही है। जन आंदोलन के प्रभावों को, इस आंदोलन में सामने रखे जा रहे प्रतीकों में, इसके क्रम में दोहराए जा रहे इतिहासों में और इसके द्वारा पुनर्जीवित की जा रही संघर्ष की परंपराओं में भी देखा जा सकता है। मिसाल के तौर पर, इस आंदोलन के क्रम में 1906 के ‘पगड़ी संभाल’ आंदोलन को पुनर्जागृत किया गया है, जिसके साथ भगत सिंह के चाचा, अजीत सिंह का नाम जुड़ा हुआ है। इस तरह यह आंदोलन, भारतीय खेती के लिए मौजूदा खतरे और औपनिवेशिक दौर में खेती के सामने रहे खतरे के बीच, समानता को रेखांकित करता है।

इसलिए, किसान आंदोलन की जनतंत्रीकरणकारी और एकताकारी भूमिका, उतनी ही सुस्पष्ट है, जितनी कि महत्वपूर्ण है। उसका असर तो इतना है कि पंजाब की नशीले पदार्थों की लत की चर्चा भी सुनाई पड़ऩी बंद हो गयी है। आखिरकार, यह समस्या भी तो पंजाब के युवाओं के बीच तीखे अलगाव का ही नतीजा थी और यह अलगाव अब टूटा है। यह आंदोलन, उस विभाजकता तथा तनाशाही से ठीक उलट है, जिसे भाजपा की सरकार हमारी राजनीति में लायी है।

एकता की राजनीति बनाम विभाजन की राजनीति

और यह हमें उस विभाजन के सार पर ले आता है, जिसके एक ओर धर्मनिरपेक्ष, रोजी-रोटी के प्रश्नों पर जन आंदोलन आते हैं और दूसरी ओर उस तरह के आंदोलन आते हैं जिनके साथ भाजपा अपरिहार्य रूप से जुड़ी रही है यानी सारत: विभाजनकारी आंदोलन। जब लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी रथयात्रा शुरू की थी, बहुत से टिप्पणीकारों ने इसके सिलसिले में एक विशाल ‘जन आंदोलन’ के उत्प्रेरण की बात कही थी। लेकिन, इस तरह की प्रस्तुति में यह भुला ही दिया गया था कि ऐेसे ‘जन आंदोलनों’ जो रुख में बदलाव लाते हैं और भाजपाई किस्म के आंदोलनों के बीच, जो ऐसा बदलाव नहीं लाते हैं, जमीन-आसमान का अंतर होता है।

इस किसान आंदोलन जैसे ‘जन आंदोलन’ इसीलिए चेतना के पहले से मौजूद स्तर से ऊपर उठा पाते हैं, क्योंकि वे एक साझा लौकिक लक्ष्य के लिए जनता को एकजुट करते हैं। दूसरी ओर, उस तरह के आंदोलन, जिनके साथ मिसाल के तौर पर भाजपा जुड़ती है, अपनी चेतना के वर्तमान स्तर से ऊपर उठने के लिए जनता को एकजुट करना तो दूर रहा, समाज की पहले से मौजूद भ्रंश रेखाओं का ही इस्तेमाल करते हैं। इस तरह के आंदोलन, इन भ्रंश रेखाओं को पुख्ता करते हैं, पहले से मौजूद विभाजकता को तीखा करते हैं और वर्तमान पिछड़ी चेतना से ऊपर उठने में मदद करने के बजाए, इस पिछड़ी चेतना को ही पुख्ता करते हैं।

यह कोई संयोग ही नहीं है कि आरएसएस हमारे देश के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष से दूर ही रहा था। यह संघर्ष ही हमारे देश में एक नयी जागृति लाने का आधार बना था। किसान आंदोलन, इस जागृति का वारिस बनकर उभरा है और वह इस जागृति को आगे ले जा रहा है।

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