NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
“सबसे ख़तरनाक यह मान लेना है कि रोटी बाज़ार से मिलती है”
अगर हम इस एक पोस्टर की इबारत को पढ़ पाएं, उसका मतलब समझ पाएं तो समझिए पूरे आंदोलन का सार समझ गए।
मुकुल सरल
03 Jan 2021
“सबसे ख़तरनाक यह मान लेना है कि रोटी बाज़ार से मिलती है”

“सबसे ख़तरनाक यह मान लेना है कि रोटी बाज़ार से मिलती है”

यही पंक्तियां लिखी हैं टिकरी बॉर्डर पर। किसान आंदोलन में प्रवेश करते ही कुछ दूर चलने पर आपको एक कैंप के बाहर तमाम पोस्टरों और भगत सिंह की तस्वीर के साथ यही लाइनें लिखीं मिल जाएंगी।

अवतार सिंह पाश की कविता की पंक्तियों “सबसे ख़तरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना ” की तर्ज पर यहां जो लिखा गया है, उसका मतलब कितना गहरा है, कितना मानीख़ेज़ है, अगर आप समझ पा रहे हैं तो ये भी समझ जाएंगे कि किसान क्या हैं, उनका महत्व क्या है और उन्हें क्यों अन्नदाता कहा जाता है। और ये भी समझ जाएंगे कि आज वे क्यों आंदोलन कर रहे हैं।

मेरी समझ में इस एक पंक्ति में पूरे आंदोलन का सार छुपा है, जो बता रहा है कि रोटी बाज़ार में ज़रूर मिल सकती है, लेकिन बाज़ार से नहीं मिलती। रोटी यानी अनाज को बाज़ार से ख़रीदा ज़रूर जा सकता है, लेकिन पैदा तो वो खेत में ही होगा। उसे न कंप्यूटर से डाउनलोड किया जा सकता है, न कारखाने में बनाया जा सकता है। इसलिए रोटी तो खेत से ही मिलेगी, किसान से ही मिलेगी। और जब खेत, किसान ही नहीं रहेंगे तो फिर रोटी बाज़ार में भी नहीं मिलेगी। रोटी के कर्म और मर्म पर मेरी एक छोटी सी कविता है, जिसमें मैंने कहा है-

रोटी

हर किसी की ज़रूरत है

और हर ज़रूरत के पीछे होती है

रोटी

लेकिन

रोटी खाना और

रोटी कमाना

दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं

यही वजह है कि मालिक, मज़दूर की व्यथा समझ नहीं पाता है

क्योंकि मालिक रोटी खाता है

और मज़दूर रोटी कमाता है

...

रोटी कमाने का मर्म

सिर्फ़ रोटी उगाने वाला ही जान सकता है

इसलिए कहा जाता है कि

किसान और मज़दूर सहोदर हैं

...

बिना रोटी उगाए

या

बिना रोटी कमाए

रोटी खाना

अपराध है

(सिवाय बच्चों, बुजुर्गों और अक्षम लोगों के)

...

वाकई !, रोटी बहुत स्वादिष्ट होती है

अगर उसे सांझी मेहनत की आंच पर पकाया जाए

और मिल-बांटकर खाया जाए

काश! हमारे हुक्मरां भी इन शब्दों का अर्थ समझते। और शायद समझते भी हों...। मगर फिर भी वो किसानों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, कभी कच्छ जाते हैं, कभी बंगाल, और कभी ‘मन की बात’ लेकिन सीधे दिल्ली बॉर्डर पर बैठे किसानों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। जबकि टिकरी बॉर्डर पर उनकी सुविधा के लिए साफ-साफ हर गली, हर मोड़ पर लिखा है “किसानों के लिए...” किसानों तक जाने का रास्ता इधर से है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि सरकार किसानों तक पहुंचने का रास्ता नहीं जानती, या भूल गई है। दरअसल वो अच्छी तरह जानती है कि खेत-किसान का कितना महत्व है। तभी तो वो खेतों को कब्ज़ाना चाहती है, खेती को कब्ज़ाना चाहती है। अपने कॉरपोरेट साथियों को उपहार में देने के लिए। उन कॉरपोरेट को जो किसानों को गुलाम बनाना चाहते हैं ताकि वे उनका मनचाहा अनाज पैदा कर सकें।

लेकिन दुनिया के अनुभव बताते हैं कि खेती का कॉरपोरटी-करण सफल नहीं हुआ है, हां को-ऑपरेटिव करण (सहकारी संचालन) ज़रूर कामयाब हो सकता है। लेकिन इस दिशा में सोचने की बजाय सरकार उल्टी दिशा में सोच रही है। मैं तो सरकार और उनके मंत्रियों को राय दूंगा कि वे दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन में एक बार ज़रूर जाएं, क्योंकि वहां लंगर है तो लाइब्रेरी भी। जी हां, छोटी-बड़ी लाइब्रेरी हर मोर्चे पर है। सिंघु बार्डर तो हम आपको पहले ही घुमा लाए थे। जो न जा पाए हों वो नीचे दी गई रपट को पढ़ लें।

इसे पढ़ें- किसान आंदोलन : …तुमने हमारे पांव के छाले नहीं देखे

सिंघु बॉर्डर की ही तरह टिकरी बॉर्डर पर भी लाइब्रेरी हैं। यानी सिर्फ़ लंगर ही न चखिए, कुछ पढ़िए भी, समझिए भी। सिर्फ़ गोदी मीडिया और वाट्सएप यूनिवर्सिटी से ज्ञान लेना बहुत आत्मघाती हो सकता है। बिल्कुल वैसे ही उस कहानी की तरह जिसमें कालीदास जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे।

इसलिए चाहे नौकरी हो या आंदोलन पढ़ना ज़रूरी है। टिकरी बॉर्डर पर तो काफी बड़ी शहीद भगत सिंह लाइब्रेरी है। आप यहां बैठकर किताबें पढ़ सकते हैं और रजिस्टर में दर्ज कराके अपने डेरे-ट्रॉली में ले भी जा सकते हैं। अगर मोदी सरकार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर या वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पढ़ना चाहें तो उनके लिए भी मुफ़्त में कुछ किताबें जारी कराई जा सकती हैं।

image

और किताबें ही नहीं किसानों और आंदोलन का अख़बार भी है। जी हां, ट्रॉली टाइम्स। ट्रॉली टाइम्स हमने आपको सिंघु बॉर्डर पर ही पढ़वा दिया था। टिकरी बॉर्डर पर आपको दिखाते हैं ट्रॉली टॉकीज़। जी हां ट्रॉली टॉकीज़।

किसानों के संघर्ष को, उनके आंदोलन को अब अख़बार के बाद सिनेमा के जरिये भी पेश किया जा रहा है। इसके दो मकसद हैं। एक तो वही क्योंकि सिनेमा सब तक पहुंचने का एक सशक्त माध्यम है, दूसरा जो लोग अख़बार नहीं पढ़ सकते वो सिनेमा के जरिये आंदोलन क्या है, क्यों है, क्या मुद्दे हैं, क्या प्रेरणा है। इसे देख समझ सकते हैं। ट्रॉली नाम क्यों जोड़ा गया ये तो आपको पता ही है क्योंकि ट्रैक्टर-ट्रॉली ही किसान की पहचान है ये पूरा आंदोलन ट्रॉली के साथ जारी है। तो ये ट्रॉली टॉकीज़ दिन ढलने के साथ यानी जब मुख्य स्टेज पर सभा और अन्य कार्यक्रम ख़त्म हो जाते है, तब उसके बाद शाम 6.30 बजे शुरू किया जाता है। नौ-दस बजे तक चलने वाले इस टॉकीज़ में छोटी-छोटी फ़िल्मों के माध्यम से किसानों को जागरूक बनाया जा रहा है। टिकरी बॉर्डर पर हमने नए साल के मौके पर ट्रॉली टॉकीज़ की टीम से बात की। सुनिए-

ये पढ़कर-देखकर आपको भी लग रहा होगा कि आपको भी किसान आंदोलन में जाना चाहिए। ज़रूर जाना चाहिए। यहां दिल्ली ही क्या देश के हर कोने से लोग पहुंच रहे हैं। किसान-मज़दूर ही नहीं समाज का लगभग हर वर्ग किसानों के समर्थन में आगे आ रहा है। छात्र भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। अपने सहयोग से लंगर तक चला रहे हैं।

इसी तरह नए साल पर AIDSO (All India Democratic Students Organisation) के छात्र यहां टिकरी बॉर्डर पर किसानों के बीच जोश जगाते मिले। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलाकाता से आए AIDSO के दो छात्रों से हमने बात की। जिन्होंने बताया कि कैसे दिल्ली बॉर्डर के इस आंदोलन की प्रेरणा से देश के हर हिस्से में किसान आंदोलन खड़ा हो रहा है और वे इस ऐतिहासिक आंदोलन को ही देखने-समझने और सीखने यहां इतनी दूर आए हैं।

तो यहां क़दम-क़दम पर नए अनुभव और नई प्रेरणाएं हैं। जो हमें संघर्ष और जीवन की सीख देती हैं। अब इन दार जी से ही मिलिए।

दार जी का नाम है बिलोर सिंह। उम्र सवा बहत्तर साल। यानी 72 साल चार महीने। लेकिन जोश ऐसा कि युवा भी शरमा जाएं। एक पांव नहीं है, कृत्रिम पांव लगा है, जिसकी पत्ती भी टूट गई है, लेकिन इस जाड़े में भी पंजाब के बरनाला से आकर टिकरी बॉर्डर पर डटे हैं। पूछने पर कहते हैं- जीतेंगे 100 परसेंट, खाली नहीं मुड़ेंगे।

इन्हें भी पढ़ें : बीच बहस: आह किसान! वाह किसान!

आज 'भारत बंद' है

बतकही : किसान आंदोलन में तो कांग्रेसी, वामपंथी घुस आए हैं!

बतकही: वे चटनी और अचार परोस कर कह रहे हैं कि आधा खाना तो हो गया...

बतकही: विपक्ष के पास कोई चेहरा भी तो नहीं है!

बात बोलेगी: विपक्ष बुलाए शीत सत्र, दिल्ली बॉर्डर पर लगाई जाए जन संसद

farmers protest
Farm bills 2020
MSP
MSP for farmers
farmers protest update
Singhu Border
Tikri Border Ground Report
Singhu border Ground Report
Narendra modi
Modi government
Amit Shah
kisan andolan
AIKS
All India Kisan Sabha
Farmers union
agrarian crises
Agriculture Laws
farmers crises

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    'राम का नाम बदनाम ना करो'
    17 Apr 2022
    यह आराधना करने का नया तरीका है जो भक्तों ने, राम भक्तों ने नहीं, सरकार जी के भक्तों ने, योगी जी के भक्तों ने, बीजेपी के भक्तों ने ईजाद किया है।
  • फ़ाइल फ़ोटो- PTI
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?
    17 Apr 2022
    हर हफ़्ते की कुछ ज़रूरी ख़बरों को लेकर फिर हाज़िर हैं लेखक अनिल जैन..
  • hate
    न्यूज़क्लिक टीम
    नफ़रत देश, संविधान सब ख़त्म कर देगी- बोला नागरिक समाज
    16 Apr 2022
    देश भर में राम नवमी के मौक़े पर हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद जगह जगह प्रदर्शन हुए. इसी कड़ी में दिल्ली में जंतर मंतर पर नागरिक समाज के कई लोग इकट्ठा हुए. प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि सरकार हिंसा और…
  • hafte ki baaat
    न्यूज़क्लिक टीम
    अखिलेश भाजपा से क्यों नहीं लड़ सकते और उप-चुनाव के नतीजे
    16 Apr 2022
    भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर क्यों इस कदर आश्वस्त है? क्या अखिलेश यादव भी मायावती जी की तरह अब भाजपा से निकट भविष्य में कभी लड़ नहींं सकते? किस बात से वह भाजपा से खुलकर भिडना नहीं चाहते?
  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों में औंधे मुंह गिरी भाजपा
    16 Apr 2022
    देश में एक लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के नतीजे नए संकेत दे रहे हैं। चार अलग-अलग राज्यों में हुए उपचुनावों में भाजपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License