NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
कृषि
नज़रिया
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
किसान आंदोलन : …तुमने हमारे पांव के छाले नहीं देखे
जिन भी लोगों को लगता है कि किसान दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन के नाम पर पिकनिक मना रहे हैं, ऐसे लोगों को दो दिन ज़रूर सिंघु या टिकरी बॉर्डर पर गुज़ारने चाहिए और देखना चाहिए कि कैसे सड़क पर ये सर्द दिन कटते हैं, कैसे रात गुज़रती है।
मुकुल सरल
29 Dec 2020
Farmers protest

शायद बहुत लोगों को ख़ासकर खाये-अघाये शहरी मध्यवर्ग और सरकार समर्थकों को लग रहा है कि किसान बहुत मज़े में हैं। उनकी नज़रों में आंदोलन स्थल पर पिज़्ज़ा और हलवा के लंगर खटक रहे हैं, लेकिन उन्हें न किसानों का संघर्ष दिख रहा है, न उनकी रात-दिन की चिंता। लंगर दिख रहे हैं, लेकिन लंगर के पीछे का सेवाभाव नहीं, लंगर बनाने वाले सेवादार नहीं।

जिन भी लोगों को लगता है कि किसान दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन के नाम पर पिकनिक मना रहे हैं, ऐसे लोगों को दो दिन ज़रूर सिंघु बॉर्डर या टिकरी बॉर्डर पर गुज़ारने चाहिए और देखना चाहिए कि कैसे सड़क पर ये सर्द दिन कटते हैं, कैसे रात गुज़रती है।

कुछ ऐसी ही कैफ़ियत के लिए शायर बशीर बद्र ने कहा था-

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं

तुमने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा

वाकई किसानों का बिस्तर देखना है तो आपको भी दो-चार रात सिंघु, टिकरी, गाज़ीपुर, चिल्ला या शाहजहांपुर जिस भी बॉर्डर पर आप चाहें, ज़रूर गुज़रानी चाहिए।

देखना चाहिए कि जब इस दिसंबर में आपको अपने बंद घर में रजाई में भी ठंड सताती है तो कैसे किसान औरतें, मर्द, बच्चे, बुजुर्ग लगभग अस्थायी कैंप या ट्रॉली के अंदर या नीचे किस तरह दिन और रात बिता रहे हैं।

तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ देश के लाखों किसान राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर एक महीने से ज़्यादा समय से डटे हैं। लेकिन हमें उनकी मांग, उनकी मुश्किलें कुछ नहीं दिखाई देतीं।

हमें उनकी पगड़ी, उनकी जींस, उनके पांव में जूते तो दिखते हैं लेकिन उनके पांव के छाले नहीं दिखते।

और नहीं दिखता सरकार का दमन, सरकार का हमला। सरकार के तीर, तलवारें, भाले, उनकी ज़ंजीर, उनके ताले कुछ नहीं दिखते।

सरकार समर्थित मीडिया कभी आंदोलनकारियों को पाकिस्तानी कहकर नवाज़ता है तो कभी खालिस्तानी, कभी नक्सली। अब और कुछ नहीं तो लंगर की कहानियां हैं, लेकिन ये लोग नहीं जानते कि सिख किसान कभी भी लंगर बनाने और छकाने से पीछे नहीं हटे। आंदोलन में ही नहीं, आपदा में भी। और वे ‘आपदा में अवसर’ नहीं ‘आपदा में सेवा’ देखते हैं। और सिर्फ़ खाने के लंगर नहीं हैं, दवाई और पढ़ाई के भी लंगर हैं। जी हां! आइए आपको लिए चलते हैं सिंघु बॉर्डर दिखाते हैं इस आंदोलन के रंग। यहां सभा है, सफाई है, दवाई है, पढ़ाई भी है।

सभा


सिंघु बॉर्डर में प्रवेश करते ही आपको एक बड़ा मंच दिखेगा। यही है इसका मुख्य सभा स्थल। हालांकि इससे पहले भी एक छोटा मंच सजा है। थोड़ा दिल्ली की ओर लेकिन जैसे ही आप मेन बॉर्डर पर पहुंचते हैं, वहीं बड़ा और मुख्य मंच और सभा है। यहां ही तमाम किसान नेता और अन्य लोग अपने विचार रखते हैं। भाषण होते हैं।

सफ़ाई की चौकस व्यवस्था

यहां हज़ारों लोग दिन-रात डटे हैं और हज़ारों दिन भर आते-जाते रहते हैं तो सफ़ाई की व्यवस्था भी ज़रूरी है, लेकिन ये आंदोलनकारी किसान सफाई के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं। जिसभाव से ये आपको लंगर खिलाते हैं उसी सेवाभाव से खुद सफ़ाई में भी जुटे रहते हैं।

मेडिकल कैंप

अब यहां इतना बड़ा जमावड़ा है तो दवा की व्यवस्था भी रखनी होगी। इसलिए दवा की भी पूरा इंतज़ाम है। यहां तमाम संस्थाएं निशुल्क मेडिकल कैंप लगा रही हैं। सीटू, एक्टू जैसे मज़दूर संगठन भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। जगह-जगह छोटे-बड़े मेडिकल कैंप लगे हैं। जहां ज़रूरी दवाओं के साथ शुगर और ब्लड प्रेशर नापने की भी पूरी व्यवस्था है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ये सब आम किसान-मज़दूरों के चंदे और सहयोग से ही चल रहे हैं।

जनता लाइब्रेरी

सिंघु बॉर्डर पर पढ़ाई की भी व्यवस्था है। मेडिकल कैंप की तरह ही यहां जगह-जगह छोटे-बड़ी लाइब्रेरी स्थापित हैं। जहां आंदोलन और संघर्ष की सीख देती हिंदी और पंजाबी की तमाम किताबें हैं। यहां आप बैठकर उन्हें पढ़ सकते हैं और अपना नाम दर्ज कराके अपनी ट्रॉली पर पढ़ने को भी ले जा सकते हैं।

ट्रॉली से याद आया कि यहां एक ट्रॉली टाइम्स भी निकाला जा रहा है। आंदोलन की ख़बरें देने के लिए पंजाबी और हिंदी दोनों भाषाओं में यह अख़बार है।

कुल मिलाकर यहां शरीर को स्वस्थ रखने के लिए लंगर और मेडिकल कैंप के साथ मानसिक स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। और क्यों न हो, इतना मानसिक प्रदूषण जो फैला रखा है बीजेपी आईटी सेल और उनकी ट्रोल आर्मी ने। इसी वजह से किसानों को अपनी भी पूरी डिजीटल टीम खड़ी करनी पड़ी जो फेसबुक, ट्वीटर, यू-ट्यूब पर अपना चैनल चला रही है ताकि फेक प्रोपेगंडा का सामना किया जा सके और लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचाईं जा सकें। यही वजह है कि यहां गोदी मीडिया को भी पूरी तरह बैन कर दिया गया है।


गोदी मीडिया को लेकर किसान इतने सतर्क हैं कि कई बार तो इस लेखक से पूछ लिया कि आप कहां से हैं? जब उन्हें ये यकीन हो गया कि गोदी मीडिया नहीं है, तभी उन्होंने बातचीत की।

तरह-तरह के लंगर

लंगर के बारे में तो आपने काफ़ी पढ़ और देख लिया होगा। ट्रोल आर्मी का सबसे ज़्यादा हमला इन्हीं लंगरों पर है। गोदी मीडिया भी तरह-तरह की काहनियां गढ़कर आपको इसकी तस्वीरें दिखा रहे हैं। लेकिन वे नहीं जानते कि ये लंगर गुरु नानक की सीख अनुसार न सिर्फ सदियों से चले आ रहे हैं, बल्कि ये सेवादार हर मुश्किल वक्त और जगह पर पहुंच जाते हैं। यहां बड़े प्यार से आपको चाय-पानी, खाने के लिए पूछा जाता है। यहां रोटी, दाल-चावल, कढ़ी, सब्ज़ी सबकुछ है। यहां तक कि हलवा और पिज़्ज़ा तक भी। लेकिन अगर आप खाने को देखते हैं तो खाने वालों को भी देखिए। यहां न जाने कितने ग़रीब-गुरबे भी रोज़ भरपेट खाना खा रहे हैं। जिनके भोजन की जिम्मेदारी पूरे समाज और सरकार की थी। इसके अलावा देखिए कि ये लंगर छकाने वाले आपसे या सरकार से कोई पैसे की मदद या दान नहीं मांगते। यह सब उनका आपसी सहयोग से चलता है। ये गेहूं, चावल, दाल, सब्ज़ी किसानों की है। वो पूरे देश का पेट भरते हैं तो अपना क्यों नहीं भर सकते।

लंगर को देखते हुए सेवादार को भी देखिए। बहुत लोग जिन्हें अपना या अपने घर के दो लोगों का दो वक्त का खाना बनाना भी भार लगता है, मुश्किल काम लगता है, वे दूसरों के लिए इतनी मेहनत की कल्पना तक नहीं कर सकते। क्या महिला, क्या पुरुष। बच्चे-बुजुर्ग तक यहां अपनी सेवा देते हैं। कोई सब्ज़ी काट रहा है, कोई आटा गूंथ रहा है, कोई चावल पका रहा है। और ये कोई वैतनिक काम नहीं हैं। यहां हर कोई सेवा कर रहा है। ‘वाहे गुरु’ के नाम पर हर कोई डटा है। तभी तो किसान नेता राकेश टिकैत पूछते हैं कि ‘ये मंदिर वाला एक भी आदमी यहां नहीं दिखाई दे रहा।’ वे वाजिब सवाल पूछते हैं कि आम लोग किसान, पशुपालक सालभर मंदिरों में चढ़ावा देते रहे हैं। गाय-भैंस का पहला दूध मंदिरों में चढ़ा देते हैं। लेकिन इन मंदिर वालों ने तो आंदोलन में किसी को एक प्याला चाय तक नहीं पिलाई। ये सीधे-सीधे धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा, आरएसएस और ब्राह्मणवाद पर चोट थी, जिससे बिलबिलाकर बहुत भक्त अब टिकैत पर हमला कर रहे हैं।


विरोध के नायाब तरीके

यहां हर कुछ मिनट में एक जुलूस गुजर जाता है, जिसमें किसानों की मांगों और सरकार के विरोध में जोरदार नारेबाज़ी होती है।

नारेबाज़ी के अलावा हर जुलूस में विरोध का कोई न कोई नायाब तरीका भी शामिल रहता है। कोई सरकार की अरथी निकाल रहा है, तो कोई भैंस के प्रतीक के माध्यम से सरकार पर प्रहार कर रहा है।

यहां पानी गर्म करने के लिए देसी गीजर भी है तो कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन भी। किसानों ने अपना जुगाड़ कर लिया है तो कुछ लोगों को इस पर भी आपत्ति है। अरे भाई अब कोई इतने दिन बिना नहाए या कपड़े धोए बिना तो रह नहीं सकता। और किसान आंदोलन कर रहे हैं कोई झूठ-मूठ का त्याग या दिखावा नहीं।

यहां अगर सिर या पांव का मसाज हो रहा है, तो उसके पीछे भी प्रतिरोध की भावना और प्रतीक है। जैसे इन्हें देखिए कैसे सर की मालिश की जा रही है, लेकिन हर सेवादार की टीशर्ट पर क्या लिखा है, गौर से पढ़ लीजिए।


और इसे भी पढ़ लीजिए, ये सरकार के लिए संदेश है-

कुल मिलाकर यह किसान आंदोलन बहुत कुछ दिखाता और सिखाता है। दिखाता है प्रतिरोध के तरीके, सिखाता कि कैसे अपने हक़ के लिए लड़ा जाता है, कैसे मुश्किलों में भी हँसा जाता है। कैसे खुद को संकट में भी डालकर दूसरों की सेवा की जाती है। और हां, आख़िरी और सबसे ज़रूरी बात- ये आंदोलन सिर्फ़ किसानों के लिए किसानों का आंदोलन नहीं, ये देश बचाने की लड़ाई है, जिसे हम सबकी तरफ़ से किसान लड़ रहा है। क्योंकि जान लीजिए कि खेती-किसानी बचेगी तो देश बचेगा।

चलते-चलते : आंदोलन के कुछ और रंग

सभी फोटो : मुकुल सरल

farmers protest
Farm bills 2020
MSP
MSP for farmers
farmers protest update
Singhu Border
Tikri Border Ground Report
Singhu border Ground Report
Narendra modi
Modi government
Amit Shah
kisan andolan
AIKS
All India Kisan Sabha
Farmers union
agrarian crises
Agriculture Laws
farmers crises

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

देशव्यापी हड़ताल का दूसरा दिन, जगह-जगह धरना-प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License