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किसान आंदोलन : …तुमने हमारे पांव के छाले नहीं देखे
जिन भी लोगों को लगता है कि किसान दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन के नाम पर पिकनिक मना रहे हैं, ऐसे लोगों को दो दिन ज़रूर सिंघु या टिकरी बॉर्डर पर गुज़ारने चाहिए और देखना चाहिए कि कैसे सड़क पर ये सर्द दिन कटते हैं, कैसे रात गुज़रती है।
मुकुल सरल
29 Dec 2020
Farmers protest

शायद बहुत लोगों को ख़ासकर खाये-अघाये शहरी मध्यवर्ग और सरकार समर्थकों को लग रहा है कि किसान बहुत मज़े में हैं। उनकी नज़रों में आंदोलन स्थल पर पिज़्ज़ा और हलवा के लंगर खटक रहे हैं, लेकिन उन्हें न किसानों का संघर्ष दिख रहा है, न उनकी रात-दिन की चिंता। लंगर दिख रहे हैं, लेकिन लंगर के पीछे का सेवाभाव नहीं, लंगर बनाने वाले सेवादार नहीं।

जिन भी लोगों को लगता है कि किसान दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन के नाम पर पिकनिक मना रहे हैं, ऐसे लोगों को दो दिन ज़रूर सिंघु बॉर्डर या टिकरी बॉर्डर पर गुज़ारने चाहिए और देखना चाहिए कि कैसे सड़क पर ये सर्द दिन कटते हैं, कैसे रात गुज़रती है।

कुछ ऐसी ही कैफ़ियत के लिए शायर बशीर बद्र ने कहा था-

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं

तुमने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा

वाकई किसानों का बिस्तर देखना है तो आपको भी दो-चार रात सिंघु, टिकरी, गाज़ीपुर, चिल्ला या शाहजहांपुर जिस भी बॉर्डर पर आप चाहें, ज़रूर गुज़रानी चाहिए।

देखना चाहिए कि जब इस दिसंबर में आपको अपने बंद घर में रजाई में भी ठंड सताती है तो कैसे किसान औरतें, मर्द, बच्चे, बुजुर्ग लगभग अस्थायी कैंप या ट्रॉली के अंदर या नीचे किस तरह दिन और रात बिता रहे हैं।

तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ देश के लाखों किसान राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर एक महीने से ज़्यादा समय से डटे हैं। लेकिन हमें उनकी मांग, उनकी मुश्किलें कुछ नहीं दिखाई देतीं।

हमें उनकी पगड़ी, उनकी जींस, उनके पांव में जूते तो दिखते हैं लेकिन उनके पांव के छाले नहीं दिखते।

और नहीं दिखता सरकार का दमन, सरकार का हमला। सरकार के तीर, तलवारें, भाले, उनकी ज़ंजीर, उनके ताले कुछ नहीं दिखते।

सरकार समर्थित मीडिया कभी आंदोलनकारियों को पाकिस्तानी कहकर नवाज़ता है तो कभी खालिस्तानी, कभी नक्सली। अब और कुछ नहीं तो लंगर की कहानियां हैं, लेकिन ये लोग नहीं जानते कि सिख किसान कभी भी लंगर बनाने और छकाने से पीछे नहीं हटे। आंदोलन में ही नहीं, आपदा में भी। और वे ‘आपदा में अवसर’ नहीं ‘आपदा में सेवा’ देखते हैं। और सिर्फ़ खाने के लंगर नहीं हैं, दवाई और पढ़ाई के भी लंगर हैं। जी हां! आइए आपको लिए चलते हैं सिंघु बॉर्डर दिखाते हैं इस आंदोलन के रंग। यहां सभा है, सफाई है, दवाई है, पढ़ाई भी है।

सभा


सिंघु बॉर्डर में प्रवेश करते ही आपको एक बड़ा मंच दिखेगा। यही है इसका मुख्य सभा स्थल। हालांकि इससे पहले भी एक छोटा मंच सजा है। थोड़ा दिल्ली की ओर लेकिन जैसे ही आप मेन बॉर्डर पर पहुंचते हैं, वहीं बड़ा और मुख्य मंच और सभा है। यहां ही तमाम किसान नेता और अन्य लोग अपने विचार रखते हैं। भाषण होते हैं।

सफ़ाई की चौकस व्यवस्था

यहां हज़ारों लोग दिन-रात डटे हैं और हज़ारों दिन भर आते-जाते रहते हैं तो सफ़ाई की व्यवस्था भी ज़रूरी है, लेकिन ये आंदोलनकारी किसान सफाई के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं। जिसभाव से ये आपको लंगर खिलाते हैं उसी सेवाभाव से खुद सफ़ाई में भी जुटे रहते हैं।

मेडिकल कैंप

अब यहां इतना बड़ा जमावड़ा है तो दवा की व्यवस्था भी रखनी होगी। इसलिए दवा की भी पूरा इंतज़ाम है। यहां तमाम संस्थाएं निशुल्क मेडिकल कैंप लगा रही हैं। सीटू, एक्टू जैसे मज़दूर संगठन भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। जगह-जगह छोटे-बड़े मेडिकल कैंप लगे हैं। जहां ज़रूरी दवाओं के साथ शुगर और ब्लड प्रेशर नापने की भी पूरी व्यवस्था है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ये सब आम किसान-मज़दूरों के चंदे और सहयोग से ही चल रहे हैं।

जनता लाइब्रेरी

सिंघु बॉर्डर पर पढ़ाई की भी व्यवस्था है। मेडिकल कैंप की तरह ही यहां जगह-जगह छोटे-बड़ी लाइब्रेरी स्थापित हैं। जहां आंदोलन और संघर्ष की सीख देती हिंदी और पंजाबी की तमाम किताबें हैं। यहां आप बैठकर उन्हें पढ़ सकते हैं और अपना नाम दर्ज कराके अपनी ट्रॉली पर पढ़ने को भी ले जा सकते हैं।

ट्रॉली से याद आया कि यहां एक ट्रॉली टाइम्स भी निकाला जा रहा है। आंदोलन की ख़बरें देने के लिए पंजाबी और हिंदी दोनों भाषाओं में यह अख़बार है।

कुल मिलाकर यहां शरीर को स्वस्थ रखने के लिए लंगर और मेडिकल कैंप के साथ मानसिक स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। और क्यों न हो, इतना मानसिक प्रदूषण जो फैला रखा है बीजेपी आईटी सेल और उनकी ट्रोल आर्मी ने। इसी वजह से किसानों को अपनी भी पूरी डिजीटल टीम खड़ी करनी पड़ी जो फेसबुक, ट्वीटर, यू-ट्यूब पर अपना चैनल चला रही है ताकि फेक प्रोपेगंडा का सामना किया जा सके और लोगों तक सही सूचनाएं पहुंचाईं जा सकें। यही वजह है कि यहां गोदी मीडिया को भी पूरी तरह बैन कर दिया गया है।


गोदी मीडिया को लेकर किसान इतने सतर्क हैं कि कई बार तो इस लेखक से पूछ लिया कि आप कहां से हैं? जब उन्हें ये यकीन हो गया कि गोदी मीडिया नहीं है, तभी उन्होंने बातचीत की।

तरह-तरह के लंगर

लंगर के बारे में तो आपने काफ़ी पढ़ और देख लिया होगा। ट्रोल आर्मी का सबसे ज़्यादा हमला इन्हीं लंगरों पर है। गोदी मीडिया भी तरह-तरह की काहनियां गढ़कर आपको इसकी तस्वीरें दिखा रहे हैं। लेकिन वे नहीं जानते कि ये लंगर गुरु नानक की सीख अनुसार न सिर्फ सदियों से चले आ रहे हैं, बल्कि ये सेवादार हर मुश्किल वक्त और जगह पर पहुंच जाते हैं। यहां बड़े प्यार से आपको चाय-पानी, खाने के लिए पूछा जाता है। यहां रोटी, दाल-चावल, कढ़ी, सब्ज़ी सबकुछ है। यहां तक कि हलवा और पिज़्ज़ा तक भी। लेकिन अगर आप खाने को देखते हैं तो खाने वालों को भी देखिए। यहां न जाने कितने ग़रीब-गुरबे भी रोज़ भरपेट खाना खा रहे हैं। जिनके भोजन की जिम्मेदारी पूरे समाज और सरकार की थी। इसके अलावा देखिए कि ये लंगर छकाने वाले आपसे या सरकार से कोई पैसे की मदद या दान नहीं मांगते। यह सब उनका आपसी सहयोग से चलता है। ये गेहूं, चावल, दाल, सब्ज़ी किसानों की है। वो पूरे देश का पेट भरते हैं तो अपना क्यों नहीं भर सकते।

लंगर को देखते हुए सेवादार को भी देखिए। बहुत लोग जिन्हें अपना या अपने घर के दो लोगों का दो वक्त का खाना बनाना भी भार लगता है, मुश्किल काम लगता है, वे दूसरों के लिए इतनी मेहनत की कल्पना तक नहीं कर सकते। क्या महिला, क्या पुरुष। बच्चे-बुजुर्ग तक यहां अपनी सेवा देते हैं। कोई सब्ज़ी काट रहा है, कोई आटा गूंथ रहा है, कोई चावल पका रहा है। और ये कोई वैतनिक काम नहीं हैं। यहां हर कोई सेवा कर रहा है। ‘वाहे गुरु’ के नाम पर हर कोई डटा है। तभी तो किसान नेता राकेश टिकैत पूछते हैं कि ‘ये मंदिर वाला एक भी आदमी यहां नहीं दिखाई दे रहा।’ वे वाजिब सवाल पूछते हैं कि आम लोग किसान, पशुपालक सालभर मंदिरों में चढ़ावा देते रहे हैं। गाय-भैंस का पहला दूध मंदिरों में चढ़ा देते हैं। लेकिन इन मंदिर वालों ने तो आंदोलन में किसी को एक प्याला चाय तक नहीं पिलाई। ये सीधे-सीधे धर्म की राजनीति करने वाली भाजपा, आरएसएस और ब्राह्मणवाद पर चोट थी, जिससे बिलबिलाकर बहुत भक्त अब टिकैत पर हमला कर रहे हैं।


विरोध के नायाब तरीके

यहां हर कुछ मिनट में एक जुलूस गुजर जाता है, जिसमें किसानों की मांगों और सरकार के विरोध में जोरदार नारेबाज़ी होती है।

नारेबाज़ी के अलावा हर जुलूस में विरोध का कोई न कोई नायाब तरीका भी शामिल रहता है। कोई सरकार की अरथी निकाल रहा है, तो कोई भैंस के प्रतीक के माध्यम से सरकार पर प्रहार कर रहा है।

यहां पानी गर्म करने के लिए देसी गीजर भी है तो कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन भी। किसानों ने अपना जुगाड़ कर लिया है तो कुछ लोगों को इस पर भी आपत्ति है। अरे भाई अब कोई इतने दिन बिना नहाए या कपड़े धोए बिना तो रह नहीं सकता। और किसान आंदोलन कर रहे हैं कोई झूठ-मूठ का त्याग या दिखावा नहीं।

यहां अगर सिर या पांव का मसाज हो रहा है, तो उसके पीछे भी प्रतिरोध की भावना और प्रतीक है। जैसे इन्हें देखिए कैसे सर की मालिश की जा रही है, लेकिन हर सेवादार की टीशर्ट पर क्या लिखा है, गौर से पढ़ लीजिए।


और इसे भी पढ़ लीजिए, ये सरकार के लिए संदेश है-

कुल मिलाकर यह किसान आंदोलन बहुत कुछ दिखाता और सिखाता है। दिखाता है प्रतिरोध के तरीके, सिखाता कि कैसे अपने हक़ के लिए लड़ा जाता है, कैसे मुश्किलों में भी हँसा जाता है। कैसे खुद को संकट में भी डालकर दूसरों की सेवा की जाती है। और हां, आख़िरी और सबसे ज़रूरी बात- ये आंदोलन सिर्फ़ किसानों के लिए किसानों का आंदोलन नहीं, ये देश बचाने की लड़ाई है, जिसे हम सबकी तरफ़ से किसान लड़ रहा है। क्योंकि जान लीजिए कि खेती-किसानी बचेगी तो देश बचेगा।

चलते-चलते : आंदोलन के कुछ और रंग

सभी फोटो : मुकुल सरल

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