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ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा
जिस ऐतिहासिक आंदोलन को मोदी शाह खट्टर योगी की सत्ता का दुर्धर्ष दमन और कोई छल छद्म न तोड़ सका, वह अगर अपने अंतर्विरोधों से कमजोर होता है तो यह इतिहास की विराट त्रासदी होगी, जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी होगी।
लाल बहादुर सिंह
20 Mar 2022
kisan
फाइल फोटो।

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने केंद्र सरकार की वायदा-खिलाफी के विरुद्ध 21 मार्च को जिला और ब्लॉक स्तर पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करने का फैसला किया है। इसके अलावा, 11 से 17 अप्रैल के बीच न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (MSP) की लीगल गारंटी के लिए ‘एमएसपी सप्ताह’ मनाया जाएगा। मोर्चे ने 28 और 29 मार्च को, ट्रेड यूनियनों की तरफ से दिए गए भारत बंद के कॉल का समर्थन करने का ऐलान किया है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है, " केंद्र ने  एमएसपी पर कानून बनाने तथा किसानों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने के मुद्दे पर किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में कोई पहल नहीं की है, न ही  केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी को मंत्रिमंडल से हटाया। "

सांगठनिक मोर्चे से आ रही दुर्भाग्यपूर्ण खबरें

पर इसी बीच किसान मोर्चे से बेहद चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण खबरें आ रही हैं। चुनाव में भागेदारी के सवाल पर मोर्चे के अंदर शुरू हुए विवाद ने ugly turn ले लिया है। दरअसल, संयुक्त किसान मोर्चा ने जहां विधानसभा चुनावों में विशेषकर यूपी व उत्तराखंड में भाजपा के खिलाफ अभियान चलाने का फैसला किया था, वहीं आंदोलनकारी संगठनों का एक हिस्सा पार्टी बनाकर सीधे पंजाब चुनाव में उतर पड़ा, इनमें अनेक छोटे संगठनों के साथ शीर्ष किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल और गुरुनाम सिंह चढूनी भी थे।

संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने उनके इस फैसले को गलत मानते हुए यह stand लिया था कि उसका उन किसान संगठनों से कोई संबंध नहीं है जिन्होंने दल बनाकर पंजाब में विधानसभा चुनाव लड़ा। जनवरी में अपनी बैठक में संयुक्त किसान मोर्चा ने तय किया था कि उससे जुड़ा कोई भी संगठन यदि विधानसभा चुनाव में पार्टी बनाता है तो वह मोर्चा का हिस्सा नहीं होगा। मोर्चा ने यह भी तय किया था कि यदि जरूरत हुई तो विधानसभा चुनाव के बाद अप्रैल में इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाएगा।

जाहिर है संयुक्त किसान मोर्चे और चुनाव लड़ने वाले दल के separation का यह stand गैर-पार्टी मंच के बतौर उसकी उसूली स्थिति और सांगठनिक अनुशासन की दृष्टि से सही था।  पंजाब में जिन संगठनों व नेताओं ने चुनाव लड़ा, अब उनकी भागीदारी के अनुभव से भी साफ है कि उनका फैसला राजनीतिक दृष्टि से नुकसानदेह  था। और सारे कारण छोड़ भी दिए जाएं तो आन्दोलन के शीर्षस्थ नेता को 5 हजार से भी कम वोट मिलने से आन्दोलन की प्रतिष्ठा में कोई चार चांद नहीं लगा है और गोदी मीडिया को आन्दोलन को प्रभावहीन साबित करने का एक और बहाना मिला है।

उम्मीद की जानी चाहिए थी कि अनुभव से सीखते हुए किसान नेता अपनी रणनीतिक गलती realise करेंगे, उधर संयुक्त किसान मोर्चा के लिए भी पूरे मामले को एक सीमा से अधिक तूल देने का कोई औचित्य नहीं था। आखिर चुनाव लड़ना उनका लोकतान्त्रिक हक था, पार्टी बनाकर उन्होंने चुनाव लड़ा। जाहिर है उनका राजनीतिक दल तो मोर्चे में शामिल हो ही नहीं सकता है, पर अगर उनका किसान संगठन आंदोलन में शामिल रहना चाहता है, तो आंदोलन के समग्र हित की दृष्टि से, उसे अलग रखने का क्या औचित्य है? बल्कि यहां यह देखना अधिक महत्वपूर्ण था कि क्या उन्होंने चुनाव  ऐसे plank पर या ऐसी ताकतों के साथ मिलकर लड़ा जो किसान आंदोलन की दिशा के खिलाफ था?

यदि ऐसा नहीं था तो दोस्ताना आलोचना के साथ फिर एकताबद्ध होकर आगे बढ़ने की जरूरत थी। सम्भवतः इसी दृष्टि से मोर्चे ने अप्रैल के बाद पुनर्विचार की बात की भी थी।

लेकिन अचानक 14 मार्च को दिल्ली के गाँधी पीस फाउंडेशन में मोर्चे द्वारा आहूत बैठक में अशोभनीय स्थिति पैदा हो गयी। SKM के बयान में कहा गया है, ‘‘ पुनर्विचार के सवाल पर मोर्चा के फैसले का इंतजार किये बगैर ही बलबीर सिंह राजेवाल के संयुक्त समाज मोर्चा एवं गुरनाम सिंह चढूनी की संयुक्त संघर्ष पार्टी जबरन सभास्थल पर पहुंच गयी और सभागार पर काबिज होकर समानांतर बैठक करने लगे।’’ बयान के अनुसार किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए मोर्चे की समन्वय समिति ने फैसला किया कि देशभर से आए प्रतिनिधि बाहर लॉन में बैठक करेंगे।
एसकेएम ने उन दोनों ही संगठनों पर उसके नाम का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उसने उन लोगों के विरुद्ध अनुशानात्मक कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी जो इन दोनों संगठनों के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।

उधर राजेवाल ने कहा कि राकेश टिकैत और योगेन्द्र यादव समेत संयुक्त मोर्चे के तमाम नेता चुनाव लड़े और हारे हैं। उन्होंने संयुक्त किसान मोर्चा की समन्वय समिति को भंग करने की घोषणा कर दिया ! साथ ही आगे की योजना तय करने के लिए 21 मार्च को लखीमपुर में समानांतर कार्यक्रम की घोषणा कर दिया।

लचीले रुख के साथ किसान आंदोलन की एकता को हर हाल में बचाना ज़रूरी

यह सब बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, किसान आंदोलन के हित में सभी नेताओं को संयम का परिचय देना चाहिए और आन्दोलन की एकता की नुकसान पहुंचाने वाली बयानबाजी पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।

सबसे दुःखद यह है कि यह सब ऐसे समय हो रहा है जब UP और उत्तराखंड में भाजपा की घोर लोकतंत्र-विरोधी एवं किसान-विरोधी  सरकारों की फिर सत्ता में वापसी हो गयी है, जिनके खिलाफ किसान-आंदोलन ने मोर्चा खोला था।  गोदी मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान चुनाव परिणाम आने के बाद से ही यह झूठ स्थापित करने में लगे हैं कि किसान-आंदोलन पूरी तरह बेअसर रहा। अब किसान नेताओं के बीच के विवाद से उन्हें बड़ा मौका मिल गया है और वे किसान-आंदोलन की obituary लिखने में लग गए हैं। कहा जा रहा है कि किसान मोर्चा दो फाड़ हो गया, वह टूट की ओर बढ़ रहा है....।

MSP की कानूनी गारण्टी के लिए कमेटी बनाने के अपने वायदे को तो मोदी सरकार पहले ही ठंडे बस्ते में डाल चुकी है, यह बिल्कुल तय है कि किसान आंदोलन का दबाव कम होते ही वह कृषि के कारपोरेटीकरण के अपने लंबित अभियान में फिर उतर पड़ने के लिए बिल्कुल तैयार बैठी है। Pro-corporate कृषि-सुधारों के प्रबल पक्षधर बुद्धिजीवी किसान नेता अनिल घनवत जिन्हें कृषि कानूनों पर बनी SC की कमेटी में भी रखा गया था, पहले ही इसके लिए बैटिंग शुरू कर चुके हैं।

जाहिर है आगामी दिन बेहद चुनौतीपूर्ण हैं, न  सिर्फ किसान-हित के लिये, बल्कि देश बचाने और लोकतन्त्र की रक्षा के लिए भी, जिन्हें किसान-आंदोलन ने अपने वृहत्तर सरोकारों में शामिल किया है।

जिस ऐतिहासिक आंदोलन को मोदी शाह खट्टर योगी की सत्ता का दुर्घर्ष दमन और कोई छल छद्म न तोड़ सका, वह अगर अपने अंतर्विरोधों से कमजोर होता है तो यह इतिहास की विराट त्रासदी होगी, जिसकी कीमत पूरे देश को चुकानी होगी। किसान आंदोलन ने साल भर जिस तरह पूरे देश का एजेंडा बदल कर रख दिया था और उसके खत्म होते ही उन्मादी ध्रुवीकरण का एजेंडा जगह बनाने लगा है, यहां तक कि एक नफरती फ़िल्म को promote करने में प्रधानमंत्री समेत पूरा संघ-भाजपा कुनबा लगा हुआ है, वह आंख खोल देने वाला है।

किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा।

यह बेहतर ही होता कि किसान आन्दोलन के साथ-साथ उसकी राजनीति भी खड़ी होती और वह किसान-आंदोलन के गढ़ पंजाब में सत्ता पर काबिज होती, लेकिन परिस्थितियां उसके लिए अभी परिपक्व नहीं थीं, जाहिर है पंजाब के कतिपय किसान संगठनों का चुनाव में भाग लेने का फैसला premature था और परिस्थिति के गलत मूल्यांकन पर आधारित था।

बहरहाल, इतिहास के turning points पर कई बार गलत मूल्यांकन और फैसले हो जाते हैं। जाहिर है उनसे नुकसान तो होता ही है। इसलिए, उन पर लड़ने-अड़ने और अलग समांतर गतिविधि चलाने की बजाय, अपनी गलती को स्वीकार करने, उससे सीखने और एकताबद्ध होकर आगे बढ़ने की जरूरत है।

आंदोलन के लिए नुकसानदेह गलत फैसलों की आलोचना और  सांगठनिक अनुशासन की संयुक्त किसान मोर्चा की चिंता बिल्कुल ठीक है लेकिन उस विवाद को ऐसे मुकाम तक नहीं खींचा जाना चाहिए कि उससे आंदोलन की एकता ही टूट जाए। इसकी बजाय लचीले रुख के साथ आंदोलन की व्यापकतम सम्भव एकता के लिए प्रयास होना चाहिए।

ऐतिहासिक किसान आंदोलन के नेताओं को अपने उस गौरवशाली भूमिका को जो अभी इतिहास नहीं हुई है बल्कि जीवित वर्तमान का हिस्सा है, याद रखना होगा और हर हाल में अपनी एकता की रक्षा करते हुए देश की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा। वरना इतिहास कभी उन्हें माफ नहीं करेगा।

13 महीने की अपनी झंझावाती यात्रा में, पहले भी किसान आंदोलन बाहरी और अंदरूनी, बड़ी से बड़ी चुनौतियों से जूझा है और सुर्खरू होकर निकला है, उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा संकट पर वह विजय हासिल करेगा।

किसान-आंदोलन हमारे लोकतन्त्र की सबसे बड़ी उम्मीद हैं, विधानसभा के निराशाजनक नतीजों के बाद आज जब देश 2024 की फैसलाकुन घड़ी की ओर बढ़ रहा है, उसकी भूमिका और बढ़ गयी है।

(लेखक इलाहबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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