NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
फिल्में
भारत
राजनीति
फिल्म रिव्यू: हॉरर ड्रामा 'बुलबुल' में चुड़ैल से नहीं, नारी की प्रताड़ना से डर लगता है
19वीं सदी के आखिरी दौर के बंगाली समाज की पृष्ठभूमि पर बनी 'बुलबुल' में नारी के उत्पीड़न और उसके बदला लेने की दास्तान को इतने मुकम्मल तरीके से दिखाया गया है कि फिल्म देखते हुए आपको लगता है कि आज भी नारी की कहानी में बदलाव नहीं हुआ है। सिर्फ उत्पीड़न के तरीके ही बदले हैं।
पायल चौधरी
25 Jun 2020
बुलबुल

"बड़ी हवेलियों में बड़े राज़ होते हैं।" ये कहावत कई फिल्मों एवं वेब सीरीज में हमें हमेशा सुनने को मिलती है लेकिन नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई फिल्म 'बुलबुल' में इस कहावत का एक अलग ही रूप दिखाया गया है। अनुष्का शर्मा के बैनर 'क्लीन स्लेट' फिल्म्स के तले बनी इस फिल्म के निर्माता एवं लेखक अन्विता दत्त हैं जोकि एक मशहूर लेखक एवं संगीतकार भी हैं।

फिल्म के ट्रीजर और ट्रेलर को देखकर यह हॉरर फिल्म लगी थी लेकिन इस फिल्म की चुड़ैल से नहीं बल्कि महिलाओं की प्रताड़ना को देखकर डर लगता है। 19वीं सदी के आखिरी दौर के बंगाली समाज की पृष्ठभूमि पर बनी 'बुलबुल' में नारी के उत्पीड़न और उसके बदला लेने की दास्तान को इतने मुकम्मल तरीके से दिखाया गया है कि फिल्म देखते हुए आपको लगता है कि आज भी नारी की कहानी में बदलाव नहीं हुआ है। सिर्फ उत्पीड़न के तरीके ही बदले हैं।

फिल्म की कहानी की शुरुआत 1881 के बंगाल प्रेसीडेंसी में बुलबुल नाम की बालिका वधु (तृप्ति डिमरी) के विवाह से होती है। बुलबुल को ससुराल जाकर यह पता चलता है कि उसका पति कोई बच्चा नहीं हवेली का बड़ा ठाकुर है।

बुलबुल को अपने हमउम्र देवर सत्या से लगाव हो जाता है, लेकिन बड़े ठाकुर को ये लगाव खटकने लगता है और वह सत्या को लंदन भिजवा देते हैं। बचपन में सत्या बुलबुल को एक चुड़ैल की कहानी सुनाता है, जोकि कई सालों से खून की प्यासी होती है और जंगल में रहा करती है, पेड़ों पर चढ़कर घूमा करती है और उसके पाँव उलटे होते हैं। बुलबुल सत्या के साथ इस कहानी को सुनती और एक डायरी में लिखती है लेकिन सत्या ये सब पीछे छोड़ लंदन चला जाता है।

इस फिल्म में समाज की उस घिनौनी सच्चाई को दिखाया है जो सदियों से चली आ रही है। जब बड़े ठाकुर को ये ज्ञात होता है कि बुलबुल सत्या के जाने से बहुत दुखी है तो वह उसको बुरी तरह पीटता है और उसके दोनों पांव को तोड़ देता है।लेकिन  बुलबुल की व्यथा यही नहीं ख़त्म होती है।

बुलबुल का दूसरा देवर महेंद्र जोकि मानसिक रूप से थोड़ा कमज़ोर है, उसकी बुलबुल पर बुरी नज़र होती है। जब बुलबुल को बड़े ठाकुर पीट देते हैं और वह बिस्तर पर मरहम पट्टी होने के बाद लेटी होती है। तब ही महेंद्र उसके साथ बलात्कार करता है और बलात्कार के बाद अपनी बीवी (पाओली दा) के पास छिप कर बैठ जाता है और पाओली तब बुलबुल को चुप रहने को कहती है।

इस फिल्म का डरावना रहस्य एक चुड़ैल का है जो हर उस पुरुष को ख़त्म कर देती है, जिसने एक औरत पर ज़ुल्म किया हो। हालांकि एक फिल्म के रूप में बुलबुल में काफी कमियां हैं। साथ ही फिल्म बहुत धीमी चलती है। लेकिन एक कहानी के तौर पर यह अपना मैसेज देने में सफल रहती है। फिल्म में जो चुड़ैल है वह असली दानव नहीं है। दरअसल असली दानव तो हमारा समाज है जो न पहले स्त्री को अपने बराबर समझा था और कहीं न कहीं आज भी नहीं समझ पाया है।

फिल्म के कई दृश्य बेजोड़ बन गए है। ऐसे ही इस फिल्म में एक दृश्य है जहाँ बुलबुल की पिशि माँ नन्ही बुलबुल को बिछिया पहनाती हैं और बुलबुल उनसे पूछ पड़ती है कि बिछिया क्यों पहनाये जाते हैं, इस बात पर खीज कर पिशि माँ जवाब देती हैं कि बिछिया औरत को वश में करने के लिए होते हैं।

हालांकि मर्दवादी दुनिया हमेशा औरतों को वश में क्यों करना चाहती है, यह मेरी समझ में आजतक नहीं आया है लेकिन हर कहानी में चाहे वो आज की हो या आज से दो सदी पहले की, औरतों को वश में करना मर्दों की सबसे बड़ी चाहत होती है। इसी चाहत में वह महिलाओं के उत्पीड़न से भी बाज नहीं आता है।

दरअसल हवेली, गहने और रेशम से ज़्यादा औरत को सम्मान एवं समझे जाने का लोभ होता है लेकिन समाज के एक बड़े तबके को यह कभी समझ में नहीं आता है। ये फिल्म, इसके किरदार, हमारे इस खोखले समाज का आईना हैं जो आज भी औरत की लालसा, उसका सम्मान और उसकी इज़्ज़त को लात मारते हैं और उसका अपमान भी करते है।

बुलबुल, फिल्म में पुनः जीवित हो जाती है, जब वह एक चुड़ैल बनकर हर उस बुरे मर्द पर वार करती है जिसने एक औरत पर ज़ुल्म ढाया होता है। अन्विता दत्त की कहानी को ख़ूबसूरत हवेलियां, रोशनदान, पुराने पंखें, तालाब, जंगल आदि चार चाँद लगा देते हैं। इस फिल्म का संगीत एवं कैमरावर्क भी आँखों को एक नयी कहानी में खो जाने को थोड़ा मजबूर ज़रूर कर देता है। कुल मिलाकर ये फिल्म एक अच्छी फिल्म है जो आप अपने संडे नेटफ्लिक्स बिंज में ज़रूर शामिल कर सकते हैं।

Bulbbul Movie Review
Bulbbul Movie
bollywood
Netflix
Anushka Sharma
Harassment of women
patriarchal society

Related Stories

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

ओटीटी से जगी थी आशा, लेकिन यह छोटे फिल्मकारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा: गिरीश कसारावल्ली

फ़िल्म निर्माताओं की ज़िम्मेदारी इतिहास के प्रति है—द कश्मीर फ़ाइल्स पर जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल

कलाकार: ‘आप, उत्पल दत्त के बारे में कम जानते हैं’

भाजपा सरकार के प्रचार का जरिया बना बॉलीवुड

रश्मि रॉकेट : महिला खिलाड़ियों के साथ होने वाले अपमानजनक जेंडर टेस्ट का खुलासा

Squid Game : पूंजीवाद का क्रूर खेल

तमिल फिल्म उद्योग की राजनीतिक चेतना, बॉलीवुड से अलग क्यों है?

भारतीय सिनेमा के महानायक की स्मृति में विशेष: समाज और संसद में दिलीप कुमार

भारतीय सिनेमा के एक युग का अंत : नहीं रहे हमारे शहज़ादे सलीम, नहीं रहे दिलीप कुमार


बाकी खबरें

  • बेनतीजा रही बातचीत, किसानों ने घेरा सचिवालय
    न्यूज़क्लिक टीम
    बेनतीजा रही बातचीत, किसानों ने घेरा सचिवालय
    08 Sep 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी हरियाणा के करनाल में धरना दे रहे किसानों पर, रेलवे के निजीकरण के ख़िलाफ़ रेल कर्मियों के राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन पर, तालिबान की नई सरकार द्वारा जारी…
  • सोनिया यादव
    बहुजनहित की बात करने वाली मायावती अचानक ब्राह्मणों के मान-सम्मान लिए क्यों आवाज़ उठा रही हैं?
    08 Sep 2021
    उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता बीएसपी के जाटव और सपा के यादवों के बाद चुनाव का एक महत्वपूर्ण कारक हैं। ऐसे में क़रीब 14 साल बाद अब एक बार फिर बीएसपी दलित और ब्राह्मण ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के जरिए अपने…
  • किसानों से डरी सरकार, उसके जन और जनतंत्र विरोध का हुआ पर्दाफाश
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसानों से डरी सरकार, उसके जन और जनतंत्र विरोध का हुआ पर्दाफाश
    08 Sep 2021
    करनाल की किसान मोर्चेबंदी का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश.
  • क्या जरूरी थी जलियाँवाला बाग के इर्द गिर्द हुई मरम्मत?
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्या जरूरी थी जलियाँवाला बाग के इर्द गिर्द हुई मरम्मत?
    08 Sep 2021
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस एपिसोड में नीलांजन बात करते हैं इतिहासकार सलिल मिश्र से जलियाँवाला बाग के नवीनीकरण के बारे में.
  • geelani
    अजाज़ अशरफ
    क्या सैयद शाह गिलानी राष्ट्रीय मीडिया से श्रृद्धांजलि मिलने के भी पात्र नहीं थे?
    08 Sep 2021
    कश्मीरी अलगाववादी नेता गिलानी और संपादक चंदन मित्रा के निधन की विरोधाभासी कवरेज से पता चलता है कि राष्ट्रीय प्रेस सरकारी जुबान में बोलती है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License