NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
फिल्में
भारत
राजनीति
फ़िल्म निर्माताओं की ज़िम्मेदारी इतिहास के प्रति है—द कश्मीर फ़ाइल्स पर जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल
जाने-माने फ़िल्म निर्माता और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से नवाज़े गये श्याम बेनेगल ने बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीबुर्रहमान की ज़िंदगी पर आधारित अपनी आने वाली बायोपिक फ़िल्म और दूसरे मुद्दों पर बातचीत की।
अरविंद दास
24 Apr 2022
shyam benegal
तस्वीर साभार: Indian express

जाने-माने निर्देशक, पटकथा लेखक और वृत्तचित्र फ़िल्म निर्माता श्याम बेनेगल 'बंगबंधु' शेख मुजीबुर्रहमान की ज़िंदगी पर आधारित एक बायोपिक फ़िल्म-मुजीब: द मेकिंग ऑफ़ ए नेशन पर काम कर रहे हैं। भारत और बांग्लादेश में फ़िल्मायी गयी यह फ़िल्म इसी साल रिलीज होने वाली है। पिछले महीने बेनेगल ने मुंबई में राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम (NFDC) में अपनी इस फ़िल्म का पोस्टर जारी किया। 

1934 में जन्मे बेनेगल भारत में समानांतर सिनेमा के अग्रदूत हैं और उन्होंने अपने पचास साल के करियर में कई उत्कृष्ट कृतियों का सृजन किया है। अरविंद दास ने उनसे उनकी आने वाली फ़िल्म, भारत में सिनेमा और फ़िल्म निर्माताओं की भूमिका के बारे में बात की। प्रस्तुत है उस बातचीत का संपादित अंश:

आप पचास सालों से फ़िल्में बना रहे हैं। आप 87 साल के हो चुके हैं, फिर भी आप रोज़ दफ़्तर जाते हैं। क्यों? वह क्या है, जो आपसे यह सब करवा रहा है?

यह तो बस काम ही है,जो मुझे चलाता रहता है। फ़िलहाल मैं शेख मुजीबुर्रहमान पर एक बड़ी फ़िल्म पूरी करने जा रहा हूं। यह उनकी ज़िंदगी पर आधारित फिल्म है। शायद सितंबर के आख़िर में रिलीज हो।

इससे पहले आपने महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस पर फ़िल्में बनायी थीं। मुजीबुर्रहमान पर बन रही यह फिल्म बाक़ी फ़िल्मों से कैसे अलग है ?

यह एक ऐतिहासिक जीवनी है।यह बहुत हद 'द मेकिंग ऑफ़ द महात्मा' या 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फ़ॉर्गॉटन हीरो' की तरह ही है। यह हमारे उपमहाद्वीप की एक अहम शख़्सियत को लेकर है। शेख़ मुजीब एक ऐसे शख़्स थे, जिन्होंने एक नये राष्ट्र-बांग्लादेश का निर्माण किया था। उनकी कहानी बहुत ही दिलचस्प है, और वह एक मोहक शख़्स भी थे। वह किसी संपन्न परिवार से नहीं थे। उनकी पृष्ठभूमि जवाहरलाल नेहरू या गांधी जैसी नहीं थी। नेहरू एक बहुत ही जाने-माने वकील के बेटे थे; उनका परिवार प्रतिष्ठित था। महात्मा गांधी सौराष्ट्र में दीवानों वाले परिवार से आते थे। ज़्यादातर राजनीतिक हस्तियां ऐसी ही पृष्ठभूमि से आयी हैं, लेकिन शेख़ मुजीब बहुत ही मामूली जगह से थे। वह एक कामकाजी व्यक्ति थे। इसका मतलब इस तरह समझा जा सकता है कि अगर मिसाल के तौर पर नेहरू के उस फ़ैसले को लें,जिसमें उन्होंने तय किया था कि उन्हें काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है, तो इसका मतलब तो यही था कि उनके पास पहले से ही एक विशेष पृष्ठभूमि थी, समाज में उनके पिता की हैसियत थी और उनके पास बहुत सारे पैसे थे। लेकिन, शेख मुजीब उच्च-मध्यम वर्ग नहीं,बल्कि एक आम मध्यमवर्गीय परिवार से आते थे। उनके पास न तो बहुत सारी ज़मीन थी और न ही कोई ज़मींदारी थी।

यह फ़िल्म एक सहयोगी परियोजना है; क्या आप इस बारे में कुछ विस्तार से बता सकते हैं?

हां,बिल्कुल। यह भारत और बांग्लादेश सरकारों के बीच एक सहयोगात्मक उद्यम है। हाल ही में हमने बांग्लादेश की 50वीं जयंती और शेख मुजीब की 100वीं जयंती मनायी थी। जब हमने इस फ़िल्म को बनाना शुरू किया था, तब तक देर हो चुकी थी, इसीलिए यह फ़िल्म उन समारोहों का हिस्सा नहीं बन सकी।

सत्तर के दशक में आपने अंकुर, निशांत, मंथन बनायी और बाद के दशकों में मम्मो, सरदारी बेगम और जुबैदा आयी। आपने जीवनी पर आधारित फ़िल्मों का भी निर्देशन किया है। यह सफ़र काफ़ी लंबा रहा है, जिसमें कई विषय शामिल रहे हैं। इस दायरे का आपके लिए क्या मायने है?

हर एक फ़िल्म सीखने की एक सतत प्रक्रिया होती है। फ़िल्म बनाना अपने परिवेश, अपने लोगों, अपने देश के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानने जैसा है। फ़िल्म बनाते हुए खुद को शिक्षित करने की प्रक्रिया से गुज़रने की तरह है।

आपकी कई फ़िल्में सामाजिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। एक बार आपने कहा था कि सिनेमा समाज को नहीं बदल सकता, लेकिन यह बदलाव का माध्यम ज़रूर बन सकता है। क्या आप अब भी ऐसा मानते हैं?

बेशक, लेकिन, फ़िल्में (भी) जो कुछ कर सकती हैं, वह यह कि आपको अंतर्दृष्टि दे सकती हैं। हो सकता है कि आपको बहुत ज़्यादा सीखने की ज़रूरत न हो ! सिनेमा जो कुछ करता है, वह यही कि आपको न सिर्फ़ अपने ख़ुद के बारे में, बल्कि परिवेश, आपकी पृष्ठभूमि के बारे में भी एक अंतर्दृष्टि देता है; यह आपके देश, आपके इतिहास, और इसी तरह की बहुत सारी चीज़ों को लेकर अंतर्दृष्टि देता है।

आप सांसद भी रहे हैं। आज हम अपने चारों ओर संघर्ष और हिंसा देखते हैं। आप समकालीन समाज में सिनेमा की क्या भूमिका देखते हैं ? मसलन, हालिया फ़िल्म ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ बहुत ही ध्रुवीकरण कर रही है...

देखिए, समस्या यही है। फ़िल्मों का बहुत असर होता है, और वे दुनिया के बारे में आपकी सोच को आकार देने में भी भूमिका निभाती हैं। मैंने 'द कश्मीर फ़ाइल्स' नहीं देखी है, लेकिन मैंने (इसके बारे में) सुना है। फ़िल्म बनाते हुए आप (फ़िल्म निर्माताओं) की इतिहास के प्रति एक ज़िम्मेदारी होती है। आपकी फ़िल्म का जितना ही ज़्यादा प्रचार होगा, उसकी अहमियत उतनी ही कम होगी। सच तो यही है कि आप फ़िल्मों को प्रोपेगेंडा के तौर पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन, जब आप इतिहास से जुड़ी कोई फ़ीचर फ़िल्म बना रहे होते हैं, तो आपमें एक हद तक वस्तुनिष्ठता होनी चाहिए। उस निष्पक्षता के बिना वह फ़िल्म तो प्रचार बन जाती है।

'समानांतर सिनेमा' के ज़रिये आपने बॉम्बे फ़िल्म उद्योग को कई अच्छे अभिनेताओं-अभिनेत्री दिये हैं। आपकी ऐसी ही तलाश में शबाना भी हैं, और उन्होंने एक बार कहा था कि आप एक असंतुष्ट गुरु हैं! आपको क्या लगता है कि उन्होंने आपको असंतुष्ट रहने वाला शख़्स क्यों बताया?

शबाना एक प्रशिक्षित अभिनेत्री हैं। मुझे ख़ुशी है कि वह सोचती हैं कि मुझे एक भूमिका निभानी है, लेकिन वास्तव में हक़ीक़त तो यही है कि उन्हें उस तरह की भूमिकाओं के चलते ही वह अवसर मिले, जिसके लिए मैंने उन्हें उपयुक्त पाया। उन्होंने इन अवसरों का भरपूर फ़ायदा उठाया और 'अंकुर', 'निशांत', 'मंडी' और दूसरी फ़िल्मों में अपने अभिनय की तारीफ़ बटोरी है। यह उनकी सहज और स्वाभाविक क्षमता थी। वह बहुत व्यक्तिवादी हैं। उन्होंने जो भी भूमिका निभायी, उन्होंने उन भूमिकाओं में ख़ुद को समा लिया। वह अपनी भूमिकाओं को ख़ुद का बना लेती थीं !

सिनेमा की मौजूदा स्थिति के बारे में आपका क्या कहना है?

सिनेमा बहुत बदल गया है। आज ज़रूरी नहीं कि आप सिनेमा हॉल में ही फ़िल्म देखने जायें, क्योंकि पूरा पैटर्न ही अलग हो गया है। टेलीविज़न के प्रसार के चलते अब ज़्यादातर लोग टीवी पर फ़िल्में देखते हैं। और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म के आने के साथ तो आपके पास अब एक वैकल्पिक गुंज़ाइश भी बन गयी है, जिसने सिनेमा की जगह ले ली है। आपको इन विभिन्न धारणाओं को लेकर समायोजन करना होगा। इसलिए, जब आप कोई फ़िल्म बनाते हैं, तो आप उसे बड़े पर्दे के सिनेमा हॉल में देखना चाहते हैं। लेकिन, आज सिनेमा हॉल में बहुत कम फ़िल्में देखने को मिलती हैं। आप इसे टेलीविज़न पर देखना पसंद करते हैं। और इस बात ने फ़िल्म निर्माताओं के फ़िल्म बनाने के तरीके पर असर डाला है।

ऐसे में आपको क्या लगता है कि सिनेमा का भविष्य क्या है?

बहरहाल, हमारी इस (भविष्य) पर नज़र हैं ! मुझे नहीं पता कि सिनेमा का भविष्य क्या होगा ! सिनेमा का भविष्य तो है, लेकिन जरूरी नहीं कि जैसा हमने सोचा हो,वह वैसा ही हो। सिनेमा जिस तरह आकार लेता है, इसमें प्रौद्योगिकी और इतिहास दोनों की भूमिका होती है। सिनेमा का रूप तो ख़ुद-ब-ख़ुद बदलता रहता है। साथ ही आप जिस तरह से फ़िल्में देखने जा रहे हैं, वह तरीक़ा भी भविष्य में हम किस तरह फ़िल्में बनाते हैं, इस पर असर डालेगा।

(अरविंद दास एक स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया शोधकर्ता हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

‘The More Propaganda Your Film has, the Less Valuable it Will be’—Shyam Benegal on The Kashmir Files

shyam benegal
Films
Shabana Azmi
indian cinema
parallel cinema
filmmakers
bollywood
Hindi films
off-beat films
cinema and society
OTT platforms
The Kashmir Files

Related Stories

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

ओटीटी से जगी थी आशा, लेकिन यह छोटे फिल्मकारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा: गिरीश कसारावल्ली

कलाकार: ‘आप, उत्पल दत्त के बारे में कम जानते हैं’

कश्मीर फाइल्स हेट प्रोजेक्ट: लोगों को कट्टरपंथी बनाने वाला शो?

भाजपा सरकार के प्रचार का जरिया बना बॉलीवुड

कश्मीर फाइल्स की कमाई कश्मीरी पंडितों को देने के सवाल को टाल गए विवेक अग्निहोत्री

कश्मीरी पंडितों ने द कश्मीर फाइल्स में किए गए सांप्रदायिक दावों का खंडन किया

तिरछी नज़र: बिन देखे मुझे भी पता है कि फ़िल्म बहुत ही अधिक अच्छी है

हिटलर से प्रेरित है 'कश्मीर फाइल्स’ की सरकारी मार्केटिंग, प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ता तक

सद्भाव बनाए रखना मुसलमानों की जिम्मेदारी: असम CM


बाकी खबरें

  • up elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पूर्वांचल की जंग: 10 जिलों की 57 सीटों पर सामान्य मतदान, योगी के गोरखपुर में भी नहीं दिखा उत्साह
    03 Mar 2022
    इस छठे चरण में शाम पांच बजे तक कुल औसतन 53.31 फ़ीसद मतदान दर्ज किया गया। अंतिम आंकड़ों का इंतज़ार है। आज के बाद यूपी का फ़ैसला बस एक क़दम दूर रह गया है। अब सात मार्च को सातवें और आख़िरी चरण के लिए…
  • election
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव: बस्ती के इस गांव में लोगों ने किया चुनाव का बहिष्कार
    03 Mar 2022
    बस्ती जिले के हर्रैया विधानसभा में आधा दर्ज़न गांव के ग्रामीणों ने मतदान बहिष्कार करने का एलान किया है। ग्रामीणों ने बाकायदा गांव के बाहर इसका बैनर लगा दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी…
  • gehariyaa
    एजाज़ अशरफ़
    गहराइयां में एक किरदार का मुस्लिम नाम क्यों?
    03 Mar 2022
    हो सकता है कि इस फ़िल्म का मुख्य पुरुष किरदार का अरबी नाम नये चलन के हिसाब से दिया गया हो। लेकिन, उस किरदार की नकारात्मक भूमिका इस नाम, नामकरण और अलग नाम की सियासत की याद दिला देती है।
  • Haryana
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हरियाणा: आंगनबाड़ी कर्मियों का विधानसभा मार्च, पुलिस ने किया बलप्रयोग, कई जगह पुलिस और कार्यकर्ता हुए आमने-सामने
    03 Mar 2022
    यूनियन नेताओं ने गुरुवार को कहा पंचकुला-यमुनानगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बरवाला टोल प्लाजा पर हड़ताली कार्यकर्ताओं और सहायकों पर  हरियाणा पुलिस ने लाठीचार्ज  किया।  
  • Russia Ukraine war
    अजय कुमार
    बेहतर भविष्य का रास्ता युद्ध से होकर नहीं जाता है
    03 Mar 2022
    चाहे जितने भी जायज तर्क हों, लेकिन वह युद्ध को जायज नहीं बता सकते। युद्ध वर्तमान को तो बर्बाद करता ही है, साथ में भूत और भविष्य सबको तबाह कर देता है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License