NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कला
भारत
नीता कुमार के चित्रों में लोक कला : चटख रंग और रेखाएं
कई बार शास्त्रीय कलायें नियमों और सिद्धांतों के पालन से यंत्रवत या मंद गति हो जाती हैं। ऐसे में कलाकार अपने भावाभिव्यक्ति के लिए नये रूप आकार की तलाश करने लगता है।
डॉ. मंजु प्रसाद
03 Jan 2021
रेखाचित्र
रेखाचित्र, साभार: नीता कुमार

नीता कुमार उत्तर प्रदेश, लखनऊ की विख्यात कलाकार रही हैं। उनके आकृति मूलक चित्रों में लोक कला शैली जैसी ही गति है। कई बार शास्त्रीय कलायें नियमों और सिद्धांतों के पालन से यंत्रवत या मंद गति हो जाती हैं। ऐसे में कलाकार अपने भावाभिव्यक्ति के लिए नये रूप आकार की तलाश करने लगता है।

बंगाल स्कूल के मंद गति या ब्रिटिश अकादमिक शैली की यांत्रिकता से ऊब कर यामिनी राय ने बंगाल पटचित्र शैली से प्रेरित होकर अपनी एक नितांत नवीन चित्र शैली ईज़ाद की जिससे उनके चित्र उनके जीवन काल में ही बहुत बिके। हालांकि उस समय और उनके काफी बाद भी उनके चित्रों को बहुत स्तरीय नहीं माना गया। समयानुसार लोगों के दृष्टि कोण में विकास हुआ और लोक कला शैली को भी महत्वपूर्ण माना जाने लगा। फिर तो कई आधुनिक भारतीय कलाकारों ने ठेठ ग्रामीण परिवेश में बनाये जाने वाले चित्रण शैली को अपनाया तो विदेशों में इसे अनोखा मान कर हाथों हाथ लिया जाने लगा।

चित्रकार नीता कुमार, कैनवास पर ऐक्रेलिक रंग। साभार: नीता कुमार

मुझे याद है मेरे एक कला प्राध्यापक ने जबकि मैं कला की बेसिक जानकारी पाने के लिए उद्वेलित थी, कहना शुरू किया की, 'मधुबनी शैली में चित्रण करो'। मेरे सामने भारतीय चित्रकला की सर्वोत्कृष्ट और सुन्दर चित्रण शैली अजंता के भित्ति चित्र और लघु चित्र की राजपूत शैली, पहाड़ी शैली, मुगल शैली और पटना कलम का प्रभाव था। दूसरी ओर पाश्चात्य की मोहक यथार्थवादी शैली भी मुझे प्रभावित कर रही थी। ऐसे में उस समय जानबूझकर कर मानव आकृतियों को मैं विरूपित नहीं कर पाई। जिसके कारण मेरे वो प्राध्यापक आज तक खफा हैं। मुझे माफ नहीं कर पाये। दिल्ली कालेज ऑफ आर्ट के छात्रों को मैंने देखा कोई पिकासो की अनुकृति कर रहा है तो कोई जॉन मीरो का। पाश्चात्य कलाकारों के कृतियों की अनुकृति करने के बनिस्पत क्षेत्रीय कला शैली अपनाना सही है। लेकिन ये भी नहीं कि एक कलाकार क्षेत्र विशेष की लोक शैली अपना रहा है तो सभी उसे ही अपनाकर कूपमंडूक बनें और अपने मौलिक विकास का रास्ता ही अवरुद्ध कर दें। ये है कला में दिशाहीनता।

बहरहाल मैं उत्तर प्रदेश की मशहूर चित्रकार नीता कुमार के चित्रों पर बात कर रही हूँ। उनके चित्रों में उपस्थित रंग और रेखाएं बहुत उल्लसित और सरल हैं। जो भारत के लोक चित्रों की याद दिलाते हैं।

बेहद दुखद बात है कि 28 दिसंबर 2019 में मात्र 55 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। जबकि उन्हें बहुत काम करना था। उनमें बहुत संभावनाएं थीं।

कला की शैली अब परम्परागत नहीं रह गयी। चित्रण शैली भी विश्व व्यापी हो गई हैं। कलाकार के ऊपर है कि अपनी भावाभिव्यक्ति के लिए जो भी  शैली पसंद है उसे अपना सकता है। समकालीन कलाजगत से उसे अलिखित स्वीकृति प्राप्त हो रही है। निरंतर नयापन  देखने के लिए  उसे वह अपना रहा है, आत्मसात कर रहा है।कला रसास्वादन भी सामाजिक स्वरूप के समान अत्याधुनिक हो गया है।

नीता कुमार ने भी अपने सरल और ज़िंदादिल भाव के अनुकूल ही कला शैली अपनाई थी। नीता के चित्र स्त्री प्रधान होते रहे हैं। चित्र ऐक्रेलिक रंगों या तैल रंगों में होते थे। रंग चटकीले, सपाट (फ्लैट ) लगाए हुए होते थे जिनको सभी तरफ से घेर कर काले या गहरे रंगों के बाह्य रेखाओं (आउट लाइन ) से महिला आकृति, पक्षी, फूल पत्तियों का सरल और चित्ताकर्षक रूप दिया जाता रहा। बच्चियाँ, महिला उनके चित्रों में उनके स्वभाव अनुसार ही लोक या ग्रामीण पोशाक से सजे हुए नजर आते हैं जो उनके चित्रों की विशेषता है। कई आकृतियों में दुखी सी दिखतीं हैं, उनका सिर घड़े के समान है। नीता के पति चूंकि मूर्तिकार हैं तो स्वाभाविक रूप से कई बार मूर्ति शिल्प जैसे आकार भी उपस्थित हो जाते हैं, दैनंदिनचर्या वाले सामग्रियों के साथ।

चित्रकार नीता कुमार, कैनवास पर ऐक्रेलिक रंग। साभार: नीता कुमार

नीता के चित्रों में आकार, आकृतियाँ और रेखाएं उनके चरित्र और स्वभाव के अनुसार जटिल और अबूझ नहीं रहे हैं। उनमें भी बहुत  संभावनाएं हैं । उन्हें आम जन भी आसानी से समझ सकते हैं। अपनी सुरक्षा, नारी सुलभ और नैसर्गिक भावनाओं की सुरक्षा, असुरक्षित देश, शहर में खुद को सुरक्षित रखना आदि ने महिला चित्रकारों को बाध्य किया जानबूझ कर जटिल चित्रण करने को। वो जटिलताएं नीता के चित्रों में नहीं दिखती हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले के रेखाचित्र रुक कर कुछ सोचने को बाध्य जरूर करती हैं। लेकिन उनमें उपस्थित सरल और सुगम रेखाएँ आंखों को भली लगती हैं। उनके रेखाचित्र में भी अपार संभावनाएं थीं। वह कला क्षेत्र में अपने चित्रों को बहुत आगे ले जा सकती थीं।

मुझे लगता है कि लखनऊ में भी कला और कलाकार के प्रति प्रेम में कमी आई है। क्योंकि यहाँ के सभी प्रमुख कला विथिका में कलाप्रेमी तो क्या दृश्य कला की शिक्षा लेने वाले छात्र या कलाकार भी झांकने की कोशिश नहीं करते। कारण आज तक समझ में नहीं आया।

नीता जलरंग माध्यम में अच्छा काम कर लेती थीं। जो उनके ग्रामीण परिवेश और प्रकृति प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति रही है। उन्होंने ढेरों लैंडस्कैप बनाए। मैं नीता कुमार को 1994 से जानती हूँ। वो मुझे हमेशा भली और व्यावहारिक लगीं।

वो और उनके पति धर्मेंद्र कुमार जो लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट में पूर्व प्रिंसिपल रहे हैं उत्तर प्रदेश के प्रख्यात मूर्तिकार हैं, मेरे कवि, लेखक जीवनसाथी श्याम कुलपत के मित्रों में से हैं। इस तरह व्यवहार में नीता कला के क्षेत्र में मेरी बड़ी बहन के समान भी थीं। वो  अक्सर मुझे कॉलेज में और अपने घर आमंत्रित किया करतीं और अपने काम दिखातीं। मैं उनसे हमेशा उनके चित्र शैली की तारीफ करतीं और उन्हें ज्यादा काम करने को कहतीं। मुझसे उनका मित्रवत व्यवहार ही मुझे लखनऊ में बांधे रहा।

नीता कुमार  लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट में चित्रकला की प्राध्यापक थीं। उन्होंने वहीं से ललित कला में स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की थी। नीता दो साल का फैशन डिजाइनिंग और कम्प्यूटर का डिप्लोमा कोर्स भी किया था। वे इसी महाविद्यालय में चित्रकला की प्राध्यापक थीं। छात्रों के बीच अपने प्रेम पूर्ण व्यवहार की वजह से नीता अत्यंत लोकप्रिय थीं। लखनऊ आर्ट्स कालेज में 'कला इतिहास' पढ़ाने के दौरान इसको मैंने प्रत्यक्षतः महसूस किया। अपनी  अत्यंत व्यस्त जिंदगी में उन्होंने अपने मौलिक सृजन  और कला गांव से जुड़ी गतिविधियों  के बीच बढ़िया संतुलन बना रखा था। समय-समय पर भारत भर में उनके चित्रों की प्रदर्शनी होती रही। उन्हें पति के रूप में एक सरल और विनम्र मूर्तिकार जीवन साथी धर्मेन्द्र कुमार ( पूर्व डीन/ प्रिंसिपल लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट्स) मिले। जो अत्यंत सहयोगी सिद्ध हुए। नीता को अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले। उनके चित्र भारत के कई प्रमुख स्थलों पर संग्रहित हैं। उनकी दो प्यारी पुत्रियां हैं। जिनकी शिक्षा दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया। लेकिन शारीरिक अस्वस्थता ने उन्हें असमय ही हमसे  छीन लिया। भारतीय कला जगत की एक बढ़िया कलाकार हमारे बीच नहीं रहीं। 28 दिसंबर 2019 को लखनऊ में बहुत बीमार होने की वजह से  उनकी असमय मृत्यु हो गई। वह हमेशा हमें प्रेरित करती रहेंगी।

कवि और चित्रकार अजय कुमार ने उनके बारे में सही लिखा है, 'कला गाँव उसका ड्रीम प्रोजेक्ट था जिसे उसने धर्मेन्द्र जी के सहयोग से साकार किया था'। 

(लेखिका डॉ. मंजु प्रसाद एक चित्रकार हैं। आप इन दिनों लखनऊ में रहकर पेंटिंग के अलावा ‘हिन्दी में कला लेखन’ क्षेत्र में सक्रिय हैं।)

कला विशेष में इन्हें भी पढ़ें :

नीर भरी दुख की बदली : चित्रकार कुमुद शर्मा 

कला विशेष: प्राचीन चीन से आधुनिक युग तक सतत बहती कला धारा

कला प्रेमी समाज के लिए चाहिए स्तरीय कला शिक्षा: आनंदी प्रसाद बादल

कला विशेष : चित्रकार उमेश कुमार की कला अभिव्यक्ति

कला विशेष: हितकारी मानवतावाद से प्रेरित चित्रकार अर्पणा कौर के चित्र

चित्रकार बी.सी. सान्याल की‌ कलासाधना : ध्येय, लोक रूचि और जन संवेदना

Neeta Kumar
Indian painter
art
artist
Indian painting
Indian Folk Life
Art and Artists
Folk Art
Folk Artist
Indian art
Modern Art
Traditional Art

Related Stories

'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला

राम कथा से ईद मुबारक तक : मिथिला कला ने फैलाए पंख

पर्यावरण, समाज और परिवार: रंग और आकार से रचती महिला कलाकार

सार्थक चित्रण : सार्थक कला अभिव्यक्ति 

आर्ट गैलरी: प्रगतिशील कला समूह (पैग) के अभूतपूर्व कलासृजक

आर्ट गैलरी : देश की प्रमुख महिला छापा चित्रकार अनुपम सूद

छापा चित्रों में मणिपुर की स्मृतियां: चित्रकार आरके सरोज कुमार सिंह

जया अप्पा स्वामी : अग्रणी भारतीय कला समीक्षक और संवेदनशील चित्रकार

कला गुरु उमानाथ झा : परंपरागत चित्र शैली के प्रणेता और आचार्य विज्ञ

चित्रकार सैयद हैदर रज़ा : चित्रों में रची-बसी जन्मभूमि


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License