NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
इंदिरा निरंकुशता से मोदी निरंकुशता तक
इंदिरा निरंकुशता के ख़िलाफ़ लड़ाई इतिहास में दर्ज है। मोदी निरंकुशता के ख़िलाफ़ लड़ाई की शुरुआत के आसार दिख रहे हैं।
अजय सिंह
25 Jun 2021
Indira and Modi
फ़ोटो साभार: गूगल

सर्वहारा वर्ग की तानाशाही को छोड़कर बाक़ी सभी तानाशाहियां और निरंकुशताएं बुरी और उखाड़ फेंकने लायक होती हैं। चाहे वह अतीत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निरंकुशता रही हो या मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘वैधानिक, चुनी हुई’ निरंकुशता। इंदिरा निरंकुशता के ख़िलाफ़ लड़ाई इतिहास में दर्ज है। मोदी निरंकुशता के ख़िलाफ़ लड़ाई की शुरुआत के आसार दिख रहे हैं।

1975 में 25-26 जून की रात जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक आपातकाल या इमर्जेंसी लगाने की औपचारिक घोषणा की, तब यह आज़ाद भारत की बिलकुल नयी घटना थी। इसके पहले यह नौबत नहीं आयी थी। लोगों को इसके असर, विस्तार की व्यापकता को समझने में कुछ वक़्त लगा। दमन, उत्पीड़न व निरंकुशता का सिलसिला चल पड़ा। (हालांकि इसके पहले देश के विभिन्न हिस्सों में नक्सलवादियों का बर्बर दमन करने की वजह से इंदिरा सरकार कुख्यात हो चुकी थी।)

इमर्जेंसी के दौरान जीवन का अधिकार समेत संविधान-प्रदत्त सारे बुनियादी व लोकतांत्रिक अधिकार स्थगित कर दिये गये, प्रेस पर कठोर सेंसर लगा दिया गया, काफ़ी बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां हुईं, विरोध व असहमति की आवाज़ और विपक्ष को दबा दिया गया। लाखों-लाख लोगों की ज़बरन नसबंदी की गयी। भय, आतंक और संदेह का सर्वव्यापी माहौल था। हर कोई हर किसी को सरकारी जासूस समझता था। इमर्जेंसी के विरोध में भूमिगत (अंडरग्राउंड) राजनीतिक कार्रवाइयां शुरू हो चुकी थीं।

लेकिन एक बात ग़ौर करने की है। इंदिरा निरंकुशता के दौर में—ख़ासकर इमर्जेंसी के दौरान (1975-77)—सरकार की तरफ़ से संगठित तौर पर, योजना बना कर, किसी ख़ास समुदाय या समूह को निशाना नहीं बनाया गया (पुरानी दिल्ली में तुर्कमान गेट घटना अपवाद है)। सरकार द्वारा पोषित और समर्थित गुंडा गिरोह नहीं थे, न हमलावर/हत्यारी टोलियां थीं। लिंचिंग नहीं थी। हत्यारों और बलात्कारियों को खुलेआम सरकारी संरक्षण और उनका तिरंगा अभिवादन नहीं था। और बहुसंख्यकवाद व हिंदू राष्ट्रवाद के आधार पर देश व सरकार को चलाने का संकल्प भी नहीं था। संविधान की प्रस्तावना को बदलने या उसे तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश नहीं की गयी, न धर्म-आधारित नागरिकता का प्रस्ताव पेश किया गया।

अब मई 2014 के बाद से, जब केंद्र में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, देश के हालात क्या हैं? 2014 से 2021 तक के सात वर्षों के अंदर भारत लगभग हिंदू राष्ट्र बन चुका है और हिंदुत्व फ़ासीवाद इसकी विचारधारा बन चुकी है। अब इसकी सार्वजनिक, औपचारिक घोषणा करने की ज़रूरत नहीं है। कई चीज़ें अघोषित चल रही हैं, और वे सब संविधान-सम्मत और संसद-सम्मत हैं!

नरेंद्र मोदी के शासनकाल में—जिसे मोदी निरंकुशता का दौर भी कहा जा रहा है—हालात इमर्जेंसी के दौर (1975-77) की तुलना में कहीं ज़्यादा भयावह और आतंककारी हैं। पिछले दौर की तुलना में लोग इस समय ज़्यादा डरे हुए, शंकित और असुरक्षित हैं। घोषित तौर पर इस समय आपातकाल नहीं है। लेकिन लोगों के दिलोदिमाग़ में बेलगाम, ग़ैर-जवाबदेह सरकारी दमनतंत्र का ऐसा ज़बर्दस्त मनोवैज्ञानिक डर बैठा दिया गया है कि वह व्यक्ति की स्वतंत्र विचार प्रणाली और कार्य प्रणाली को बाधित करने लगा है। मोदी सरकार की पूरी कोशिश है कि लोग दिमाग़ी तौर पर सरकार के अनुकूल बन जायें। विचार, बहस, सवाल और संदेह करने की स्वतंत्रता को अपराध बना दिया गया है।

मोदी निरंकुशता के इस दौर में हर तरफ़ पुलिस एफआईआर की भरमार है, सिडीशन ऐक्ट (राजद्रोह क़ानून) की बहार है और एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून) की ज़हरीली फुफकार है! जो कोई भी विरोध या असहमति में आवाज़ उठाये, सरकार की आलोचना करे, ज़मीनी हक़ीकत की तस्वीर दिखाये—जेल उसका इंतज़ार कर रही है। लिंचिंग बेरोकटोक जारी है, गुंडा गिरोहों को सरकारी अभयदान मिला हुआ है, हमलावर/हत्यारी टोलियां ख़ुलेआम विचरण करती रहती हैं, और हत्यारों व बलात्कारियों को आयेदिन सरकारी संरक्षण और तिरंगा अभिवादन दिखायी देता है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के जरिए नागरिकता को धर्म-आधारित बना दिया है। यह क़ानून एक प्रकार से भारत के हिंदू राष्ट्र बनने की घोषणा है। इस सरकार के खुले निशाने पर मुसलमान, महिला, ईसाई, दलित, आदिवासी, अन्य यौन झुकाव वाले समूह, और ग़रीब-वंचित-घुमंतू समुदाय हैं। इसने उदार-सेकुलर-वामपंथी बुद्धिजीवी समुदाय, नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) और पत्रकारों को भी अपने हमले का निशाना बनाया है। सरकार ने सारी लोकतांत्रिक व संवैधानिक संस्थाओं को क़रीब-क़रीब नष्ट कर दिया है।

जब हम 2021 में खड़े होकर 1975-77 के दौर को देखते हैं, तो पाते हैं कि तानाशाही और निरंकुशता अपने को दोहराती हैं। लेकिन हूबहू उसी रूप में नहीं। इसे इतिहास की गहरी विडंबना ही कहेंगे कि इंदिरा निरंकुशता की तुलना में ज़्यादा बर्बर मोदी निरंकुशता को कहीं ज़्यादा सामाजिक स्वीकृति मिलती हुई दिखायी देती है।

(लेखक वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Emergency in India
Emergency
unannounced emergency
Emergency in India 1975
indira gandhi
Narendra modi
modi sarkar
democracy
electoral autocracy
आपातकाल
घोषित आपातकाल
अघोषित आपातकाल

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..

ख़बरों के आगे-पीछे: राष्ट्रीय पार्टी के दर्ज़े के पास पहुँची आप पार्टी से लेकर मोदी की ‘भगवा टोपी’ तक

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल मॉडल ऑफ़ गवर्नेंस से लेकर पंजाब के नए राजनीतिक युग तक

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!


बाकी खबरें

  • लव पुरी
    क्या यही समय है असली कश्मीर फाइल को सबके सामने लाने का?
    04 Apr 2022
    कश्मीर के संदर्भ से जुडी हुई कई बारीकियों को समझना पिछले तीस वर्षों की उथल-पुथल को समझने का सही तरीका है।
  • लाल बहादुर सिंह
    मुद्दा: क्या विपक्ष सत्तारूढ़ दल का वैचारिक-राजनीतिक पर्दाफ़ाश करते हुए काउंटर नैरेटिव खड़ा कर पाएगा
    04 Apr 2022
    आज यक्ष-प्रश्न यही है कि विधानसभा चुनाव में उभरी अपनी कमजोरियों से उबरते हुए क्या विपक्ष जनता की बेहतरी और बदलाव की आकांक्षा को स्वर दे पाएगा और अगले राउंड में बाजी पलट पायेगा?
  • अनिल अंशुमन
    बिहार: विधानसभा स्पीकर और नीतीश सरकार की मनमानी के ख़िलाफ़ भाकपा माले का राज्यव्यापी विरोध
    04 Apr 2022
    भाकपा माले विधायकों को सदन से मार्शल आउट कराये जाने तथा राज्य में गिरती कानून व्यवस्था और बढ़ते अपराधों के विरोध में 3 अप्रैल को माले ने राज्यव्यापी प्रतिवाद अभियान चलाया
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक हज़ार से भी कम नए मामले, 13 मरीज़ों की मौत
    04 Apr 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 12 हज़ार 597 हो गयी है।
  • भाषा
    श्रीलंका के कैबिनेट मंत्रियों ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया
    04 Apr 2022
    राजनीतिक विशेषज्ञों ने कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के कारण पैदा हुए आर्थिक संकट से सरकार द्वारा कथित रूप से ‘‘गलत तरीके से निपटे जाने’’ को लेकर मंत्रियों पर जनता का भारी दबाव था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License