NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
गांधी जी की हत्या के मूल में भारत विभाजन नहीं, बल्कि हिन्दूराष्ट्र का दु:स्वप्न था!
गांधी जी की हत्या के प्रयास लंदन में हुई गोलमेज कॉन्फ्रेंस में भाग लेकर उनके भारत लौटने के कुछ समय बाद 1934 से ही शुरू हो गए थे, जब पाकिस्तान नाम की कोई चीज पृथ्वी पर तो क्या पूरे ब्रह्मांड में कहीं नहीं थी।
अनिल जैन
30 Jan 2020
Gandhi ji
साभार

महात्मा गांधी की हत्या के संदर्भ में उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे के समर्थक और हिंदुत्वादी नेता अक्सर यह दलील देते रहते हैं कि गांधी जी ने भारत के बंटवारे को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया, उनकी वजह से ही पाकिस्तान बना और उन्होंने ही पाकिस्तान को 55 करोड रुपये दिलवाए, जिससे क्षुब्ध होकर गोडसे ने गांधी की हत्या की थी। लेकिन हकीकत में यह दलील बिल्कुल बेबुनियाद और बकवास है। ऐसी दलील देने के पीछे उनका मकसद गोडसे को एक देशभक्त के रूप में पेश करना और गांधी जी की हत्या का औचित्य साबित करना होता है। सत्ता में बैठे या सत्ता से इतर भी जो हिंदूवादी लोग या संगठन मजबूरीवश गांधी की जय-जयकार करने का दिखावा करते हैं वे भी गोडसे की निंदा कभी नहीं करते।

दरअसल, गांधी जी की हत्या के प्रयास लंदन में हुई गोलमेज कॉन्फ्रेंस में भाग लेकर उनके भारत लौटने के कुछ समय बाद 1934 से ही शुरू हो गए थे, जब पाकिस्तान नाम की कोई चीज पृथ्वी पर तो क्या पूरे ब्रह्मांड में कहीं नहीं थी। तब तक किसी ने पाकिस्तान का नाम ही नहीं सुना था, उन लोगों ने भी नहीं जिन्होंने बाद में पाकिस्तान की कल्पना की और उसे हकीकत में बदला भी। पाकिस्तान बनाने की खब्त तो ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के नेताओं के दिमाग पर 1936 में सवार हुई थी, जिससे बाद में मुहम्मद अली जिन्ना भी सहमत हो गए थे। पाकिस्तान बनाने का संकल्प या औपचारिक प्रस्ताव 1940 में 22 से 24 मार्च तक लाहौर में हुए मुस्लिम लीग के अधिवेशन में पारित किया गया था।

हालांकि कि ये सच है कि द्विराष्ट्र का सिंद्धात हिन्दुत्ववादियों के दिमाग़ में बहुत पहले आ गया था। हिन्दू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर इसके निर्माता थे। गांधी हत्या के अभियुक्त रहे और मास्टर माइंड माने जाने वाले सावरकर ने 1937 में अहमदाबाद में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में साफ-साफ शब्दों में कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो पृथक राष्ट्र हैं, जो कभी साथ रह ही नहीं सकते। यही विचार वे 1921 में अंडमान की जेल से माफी मांगकर छूटने के बाद लिखी गई अपनी किताब 'हिंदुत्व’ में पहले ही व्यक्त कर चुके थे। शायद यही वजह थी कि गांधी जी की हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को उस वक्त किया गया था जब वे पूना में एक सभा को संबोधित करने जा रहे थे।

उस समय गांधी जी की मोटर को निशाना बनाकर बम फेंका गया था लेकिन चूंकि गांधी जी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गए थे। हत्या का यह प्रयास हिंदुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले के जूते में गांधी और नेहरू के चित्र पाए गए थे, ऐसा पुलिस रिपोर्ट में दर्ज है।

गांधी जी की हत्या का दूसरा प्रयास 1944 मे पंचगनी में किया गया। जुलाई 1944 में गांधी जी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गए थे। तब पूना से 20 युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा था। दिनभर वे गांधी जी के खिलाफ नारेबाजी करते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गांधी जी ने बात करने के लिए बुलाया, मगर नाथूराम ने गांधी जी से मिलने के लिए इन्कार कर दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ मे छुरा लेकर गांधी जी की तरफ लपका था, लेकिन पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भिलारे गुरुजी नाम के युवक ने नाथूराम को पकड लिया था। पुणे में मई 1910 में जन्मे नाथूराम के जीवन की यह पहली खास घटना थी। उसके जीवन की दूसरी बडी घटना थी एक वर्ष बाद यानी 1945 की, जब ब्रिटिश वायसराय ने भारत की स्वतंत्रता पर चर्चा के लिए राजनेताओं को शिमला आमंत्रित किया था। तब नाथूराम 'अग्रणी’ पत्रिका के संवाददाता के रूप मे वहां उपस्थित था।

gandhi godse.JPG

गांधी जी हत्या का तीसरा प्रयास भी इसी साल यानी 1944 के सितंबर महीने में वर्धा में हुआ, जब वे भारत के विभाजन को रोकने के लिए मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बंबई जाने वाले थे। गांधी जी बंबई न जा सकें, इसके लिए पूना से हिंदू महासभा के नेता लक्ष्मण गणेश थट्टे की अगुवाई में एक समूह वर्धा पहुंचा था। चौंतीस वर्षीय नाथूराम, थट्टे के सहयोगी प्रदर्शनकारियों में शरीक था। उसका इरादा खंजर से बापू पर हमला करने का था, लेकिन आश्रमवासियों ने उसे पकड़ लिया था। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक उस युवक ने अपने बचाव में बयान दिया था कि यह खंजर गांधी जी की मोटर के टायर पंक्चर करने के लिए लाया गया था।

इस घटना के संबंध में गांधी जी के सचिव रहे प्यारेलाल ने लिखा है: ''आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस सुपरिटेंडेंट से सूचना मिली कि आरएसएस के स्वयंसेवक गंभीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर जरूरी कार्रवाई करनी पड़ेगी। पुलिस से मिली इस सूचना के बाद बापू ने कहा कि मैं उन लोगों के बीच अकेला जाऊंगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूंगा। अगर आरएसएस के स्वयंसेवक खुद ही अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहे तो दूसरी बात है। बापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिटेंडेंट आए और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला तो चेतावनी देने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। धरना देने वालों का नेता बहुत ही उत्तेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता है, इससे कुछ चिंता होती है। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बड़ा छुरा निकला।’’

इस प्रकार आरएसएस के प्रदर्शनकारी स्वयंसेवकों की यह योजना विफल हुई। 1944 के सितम्बर में भी पाकिस्तान की बात उतनी ही दूर थी, जितनी जुलाई में थी।

गांधी जी की हत्या का चौथा प्रयास 29 जून, 1946 को किया गया था, जब वे विशेष ट्रेन से बंबई से पूना जा रहे थे। उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच रेल पटरी पर बडा पत्थर रखा गया था, लेकिन उस रात को ट्रेन ड्राइवर की सूझ-बूझ के कारण गांधी जी बच गए।

दूसरे दिन, 30 जून की प्रार्थना-सभा में गांधी जी ने पिछले दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा : ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरश: मृत्यु के मुंह से सकुशल वापस आया हूँ। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुंचाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है। फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास भी निष्फल गया।’’

नाथूराम गोडसे उस समय पूना से 'अग्रणी’ नाम की मराठी पत्रिका निकालता था। गांधी जी की 125 वर्ष जीने की इच्छा जाहिर होने के बाद 'अग्रणी’ के एक अंक में नाथूराम ने लिखा- 'पर जीने कौन देगा?’ यानी 125 वर्ष आपको जीने ही कौन देगा? गांधी जी की हत्या से डेढ़ वर्ष पहले नाथूराम का लिखा यह वाक्य है। यह वाक्य साबित करता है कि हिंदुत्ववादी लोग गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत थे।

1946 के जून में पाकिस्तान बन जाने के आसार तो दिखायी देने लगे थे, लेकिन 55 करोड रुपये देने का तो उस समय कोई सवाल ही पैदा नहीं हुआ था।

इसके बाद 20 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने मदनलाल पाहवा के साथ मिलकर नई दिल्ली के बिडला भवन पर बम फेंका था, जहां गांधीजी दैनिक प्रार्थना सभा कर रहे थे। बम का निशाना चूक गया था। पाहवा पकड़ा गया था, मगर नाथूराम भागने में सफल होकर मुंबई में छिप गया था। गांधी जी की हत्या का यह पांचवां प्रयास था जो सफल नहीं हो सका था।

दस दिन बाद वह अपने अधूरे काम को पूरा करने करने के लिए फिर दिल्ली आया था। उसके साथ मदनलाल पाहवा और नारायण आप्टे भी था। तीनों दिल्ली के एक होटल में ठहरे थे। गांधी जी की हत्या से एक दिन पहले 29 जनवरी की रात में तीनों ने एक ढाबे में खाना खाया था। आप्टे ने शराब भी पी थी। खाना खाने के बाद गोडसे सोने के लिए होटल के अपने कमरे में चला गया था। पाहवा गया था सिनेमा का नाइट शो देखने और आप्टे पहुंचा था पुरानी दिल्ली स्थित वेश्यालय में रात गुजारने। यह रात आप्टे के लिए अपने जीवन की यादगार रात रही, ऐसा खुद उसने अपनी उस डायरी में लिखा था, जो बाद में गांधी हत्या के मुकदमे के दौरान दस्तावेज के तौर पर पुलिस द्वारा कोर्ट में पेश की गई थी।

godse.jpg

नाथूराम को उसके प्रशंसक एक धर्मनिष्ठ हिंदू के तौर पर भी प्रचारित करते रहे हैं लेकिन तीस जनवरी की ही शाम की एक घटना से साबित होता कि नाथूराम कैसा और कितना धर्मनिष्ठ था। गांधीजी पर पर तीन गोलियां दागने के पूर्व वह उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया था। पोती मनु ने नाथूराम से एक तरफ हटने का आग्रह किया था क्योंकि गांधीजी को प्रार्थना के लिए देरी हो गई थी। धक्का-मुक्की में मनु के हाथ से पूजा वाली माला और आश्रम भजनावाली जमीन पर गिर गई थी। लेकिन नाथूराम उसे रौंदता हुआ ही आगे बढ़ गया था 20वीं सदी का जघन्यतम अपराध करने।

नाथूराम का मकसद कितना पैशाचिक रहा होगा, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि गांधीजी की हत्या के बाद पकड़े जाने पर खाकी निकर पहने नाथूराम ने अपने को मुसलमान बताने की कोशिश की थी। इसके पीछे उसका मकसद देशवासियों के रोष का निशाना मुसलमानों को बनाना और उनके खिलाफ हिंसा भड़काना था। ठीक उसी तरह जैसे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के साथ हुआ था। पता नहीं किन कारणों से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हत्यारे के नाम का उल्लेख नहीं किया लेकिन उनके संबोधन के तुरंत बाद गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आकाशवाणी भवन जाकर रेडियो पर देशवासियों को बताया कि बापू का हत्यारा एक हिंदू है। ऐसा करके सरदार पटेल ने मुसलमानों को अकारण ही अन्य देशवासियों का कोपभाजन बनने से बचा लिया।

इन सभी तथ्यों से यही जाहिर होता है कि महात्मा गांधी की हत्या के मूल में भारत विभाजन से उपजा रोष नहीं, बल्कि गांधी जी की सर्वधर्म समभाव वाली वह विचारधारा थी, जिसे मुट्ठीभर हिंदुत्वादियों के अलावा पूरे देश ने स्वीकार किया था। यही विचारधारा हिंदू राष्ट्र के स्वप्नदृष्टाओं को तब भी बहुत खटकती थी और आज भी बहुत खटकती है। सांप्रदायिक नफरत में लिपटे हिंदू राष्ट्र का यही विचार गांधी-हत्या के शैतानी कृत्य का कारण बना था।

(यह लेख महात्मा गांधी के निजी सचिव रहे प्यारेलाल की पुस्तक 'महात्मा गांधी: पूर्णाहुति’ (प्रथम खंड) और गांधी हत्या की पुलिस में दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट और अन्य जानकारियों पर आधारित है।)

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

Mahatma Gandhi
Nathuram Godse
Hindutva
Round Table Conferences
गोलमेज सम्मेलन
RSS
hindu-muslim
india-pakistan

Related Stories

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

मुस्लिम जेनोसाइड का ख़तरा और रामनवमी

नफ़रत की क्रोनोलॉजी: वो धीरे-धीरे हमारी सांसों को बैन कर देंगे

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!

कश्मीर फाइल्स: आपके आंसू सेलेक्टिव हैं संघी महाराज, कभी बहते हैं, और अक्सर नहीं बहते

उत्तर प्रदेशः हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं जनमत के अपहरण को!

जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License