NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
गुरुग्राम में कॉलेज छात्रों की गैंग जबरन कर रही है, रेहड़ी-पटरी वालों से ‘हफ़्ता वसूली‘
फिल्मों में ‘हफ्ता वसूली‘ गुन्डे करते हैं और गुरुग्राम की धरती पर पढ़े लिखे नौजवान कर रहे हैं।
सतीश भारतीय
25 Mar 2022
market
गुरुग्राम सदर बाजार

दिल्ली से सटा गुरुग्राम हरियाणा का प्रमुख औद्योगिक शहर है। जहां पर उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे विभिन्न राज्यों से लाखों की तादाद में कामगार काम की तलाश में आते है। जिनमें से कुछ दिहाड़ी करने लग जाते है, तो वहीं कुछ कामगार किराए पर रेहड़ियां खरीदकर, उनके सहारे, गुरुग्राम में फुटपाथ से लेकर बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच साग-सब्जी, फल सहित अन्य सामान बेचने लगते है। जिससे इनकी दैनिक कमाई 300 से 500 रुपए तक हो पाती है। जिसमें इनकी रोज़ी रोटी चलती है।

ऐसे ही गुरुग्राम के बहुचर्चित सदर बाजार में  सालों से हजारों मजदूर रेहड़ियों पर समान बेचते आ रहे है। जब हमने इन रेहड़ी मजदूरों से मुलाक़ात कर बातचीत की। तब इन्होंने एक ऐसे हैरतअंगेज मामले का खुलासा किया, जिसे आमतौर पर हम फिल्मों में ‘‘हफ्ता वसूली‘‘ के रूप मेें देखते और जानते है। बस फ़र्क़ इतना है कि फिल्मों में ‘हफ्ता वसूली‘ गुन्डे करते है और गुरुग्राम की धरती पर पढ़े लिखे नौजवान कर रहे है।

जब हम सदर बाजार में रेहड़ी मजदूर दिलेर सिंह मिले। जो बिहार के हैं। इनसे हमने पूछा कि हफ्ता वसूली कब से, क्यों और कौन कर रहा है? तब वह बताते है कि यहां कोरानाकाल के बाद से पढ़े-लिखे 15-20 नौजवानों की एक गैंग जोर-शोर से हफ़्ता वसूली कर रही है। जिसमें पास के आईटीआई कॉलेज समेत अन्य कॉलेजों के छात्र शामिल है। लेकिन इनमें से बमुश्किल से केवल एक छात्र का नाम पता चला। जिसका नाम शेरु है।
 
आगे दिलेर सिंह कहते है कि यह नौजवान हफ़्ता वसूली इसलिए करते है, ताकि पार्टियों और शराब, चरस, सिगरेट जैसे अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने के लिए इनका खर्चा निकलता रहेेेे।
 
आगेे हमने जब सवाल किया कि आप लोगों से हफ्ते में कितने रुपए वसूले जाते है और आप लोग पैसे क्यों देते है, इसका विरोध क्यों नहीं करते? तब वहीं मौजूद राजन जो यूपी से हैं। और रेहड़ी पर जूस बेचते है। वह बताते है कि हम लोगों से 50 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक, दो-तीन दिन के अंदर दोपहर 3 बजे से लेकर रात 8 बजे तक हफ्ता के रूप में वसूले जाते है।

फिर वह कहते हैं कि जब हम पैसे नहीं देते और विरोध करते है, तब यह गैंग ज्यादती करते हुए हमारा सामान छीन लेती है। इसके साथ मार-पीट भी करते है। कुछ दिन पहले हमारे 3 साथियों ने हफ़्ता देने से जब इंकार किया, तब उनकी बहुत कुटाई की गयी। और उनकी रेहड़ीयों का सामान भी लतेड़ते हुए, फेंक दिया गया। गैंग द्वारा इन मजदूरों के पुनः रेहड़ियां लगाने पर मार-काट की धमकियां भी दी गयी। जिसके बाद यह मजदूर दोबारा रेहड़ी लगाने का साहस तक नहीं जुटा पाए।

फिर आगे जब हमने यह पूछा कि क्या आप लोगों ने इस मामले की पूलिस स्टेशन में शिक़ायत की? तब वहीं उपस्थित जोगिंदर हां में उत्तर देते हुए कहते हैं कि हमने इस हमले की नज़दीकी पुलिस स्टेशन में शिक़ायत की थी। मगर पुलिस ने केवल शेरु को ही गिरफ़्तार किया था। जिसके चार-पांच दिन बाद उसे रिहा कर दिया।
 
इसके आगे मुहम्मद दानिश कहते हैं कि हफ्ता वसूली से संबंधित इस मामले की जानकारी पुलिस तक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद भी पुलिस कोई ऐसी कार्रवाई करने में अक्षम है, जिससे कि इस हफ्ता वसूली को रोका जा सके।  

इसके उपरांत जब हम थोड़ा आगे गये, तब सदर बाजार ऑटो स्टेन्ड के समीप हम कुछ और रेहड़ी वालों से रू-ब-रू हुए। जब इनसे हफ्ता वसूली के बारें में वार्तालाप करना चाहा। तब इनकी ज़ुबान ने चुप्पी साध ली और इन्हें खामोशी ने जकड़ लिया। जैसे-तैसे एक रेहड़ी वाले ने चुप्पी तोड़ी तो गुमनाम ही रहना पसंद किया। जब इनसे यह पूछा कि हफ्ता वसूली के बारें में आप लोग बातचीत क्यों नहीं करना चाहते?

तब वह कहते हैं कि रेहड़ी वालों के अंदर यह ख़ौफ़ विराजमान है कि हफ्ता वसूली के संबंध में बातचीत करने से कहीं उनका रोजगार बंद होने की नौबत ना आ जाए। क्योंकि एक ओर रेहड़ी वालों से हफ्ता वसूली हो रही ही, तो वहीं दूसरी ओर नगर निगम रेहड़ी वालों को हटाता जा रहा। जैसे हाल ही में सदर बाजार के निकट सेक्टर 32 के बाजार में मजदूर कई वर्षों से रेहड़ियां लगा रहे थे, जिन्हें बेवजह हटा दिया गया। फिर आगे वह कहते हैं कि यहां अधिकतर रेहड़ी वालों के किसी वजह चलते कार्ड भी नहीं बनाए गए। जिससे पुलिस हरदम यहां से रेहड़ियां हटाने पर तुली रहती है।ऐसे में सड़कों के इर्द-गिर्द रेहड़ी लगाना तो मानो दुश्वार हो गया है।

अब इस हाल में हम रेहड़ी लगाएं तो, मगर कहाँ लगाएं? यह सवाल हमारे सिर पर मंडरा रहा है।

जब हमने यहां से आगे की ओर रुख़ किया। तब हमें दुर्गेश और सुनील मिले। इनसे हमने प्रश्न किया कि आपको रेहड़ी लगाकर धंधा करने में क्या चुनौतियां आ रही हैं? तब दुर्गेश बताते है कि कोरोना काल से ऑनलाइन सामान की बिक्री में अत्यधिक तेज़ी आयी है। जिससे रेहड़ियों से लोग सामान कम खरीदते है। ऐसे में हमारे काम में मुनाफ़ा कम हो गया है।

आगे सुनील कहते हैं कि सरकार गुरुग्राम से रेहड़ी-पटरी वालों को साफ करती जा रही है। जबकि यहां जो बड़े-बड़े दुकानदारों का अवैध निर्माण बढ़ता जा रहा, उस पर सरकार की कोई नज़र नहीं है।

दुर्गेश और सुनील

गौर फ़रमाने योग्य है कि गुरुग्राम में लाखों रेहड़ी श्रमिक रेहड़ी के सहारे छुट-पुट सामान बेचते आ रहे हैं। जिससे उनके परिवार का पेट पलता है। ऐसे में एक तरफ रेहड़ी कामगारों से ताबड़-तोड़ हफ़्ता वसूली की जा रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ सरकार इन्हें अतिक्रमण के नाम पर सिकोड़ती जा रही हैं। जिससे इन रेहड़ी-पटरी वालों का हाल बेहाल हो गया और यह अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे। लेकिन इनकी न प्रशासन को खबर, न सरकार को चिंता है। बस ऐसे कामगारों की कहानी वहीं तक है, जहां तक उनका संघर्ष है। संघर्ष खत्म, यानी कहानी खत्म है।  

(सतीश भारतीय स्वतंत्र पत्रकार है)

UttarPradesh
Gurugram
College Gang
Hafta wasuli
Protection money
Street vendors

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?

ख़ान और ज़फ़र के रौशन चेहरे, कालिख़ तो ख़ुद पे पुती है

मनरेगा मज़दूरों के मेहनताने पर आख़िर कौन डाल रहा है डाका?

लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी

ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे: कोर्ट कमिश्नर बदलने के मामले में मंगलवार को फ़ैसला

ज्ञानवापी विवाद में नया मोड़, वादी राखी सिंह वापस लेने जा रही हैं केस, जानिए क्यों?  

ज्ञानवापी मस्जिद सर्वे: कमिश्नर बदलने की याचिका पर फ़ैसला सुरक्षित, अगली सुनवाई 9 को


बाकी खबरें

  • russia
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस यूक्रेन में हस्तक्षेप करेगा
    25 Jan 2022
    रूस के नज़रिये से इस संकट से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका यह है कि यूक्रेन अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता फिर से हासिल करे और वाशिंगटन का मुंह ताकना बंद कर अपने भाग्य का फैसला खुद करे।
  •  RPN Singh
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपी चुनाव:  कांग्रेस को लगा बड़ा झटका, बीजेपी में शामिल हुए आरपीएन सिंह
    25 Jan 2022
    यूपी कांग्रेस के स्टार प्रचारक की लिस्ट में शामिल आरपीएन सिंह बीजेपी में शामिल हो गए हैं, आरपीएन सिंह कांग्रेस के बड़े नेता माने जाते थे।
  • Uttarakhand congress women wing
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: ‘बेटी पढ़ाओ’ और ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ के नारों को खोखला बताती उम्मीदवारों की लिस्ट
    25 Jan 2022
    कुल 70 में से 59 सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों की घोषणा कर चुकी है, लेकिन मात्र 5 महिलाओं को टिकट मिला है, वहीं कांग्रेस की 64 उम्मीदवारों की सूची में मात्र 6 महिलाएं हैं।
  • Pradhan mantri awas yojna
    सरोजिनी बिष्ट
    “2022 तक सबको मिलेगा पक्का घर” वायदे की पड़ताल: ठगा हुआ महसूस कर रहे गरीब परिवार
    25 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश और केंद्र, दोनों सरकारों ने अपने पांच साल के कार्यकाल के भीतर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत सभी शहरी और ग्रामीण गरीबों को पक्का घर देने का वादा किया था। सरकार दावे कुछ भी…
  • ntpc
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : रेलवे परीक्षा परिणाम में धांधली का आरोप लगाते हुए अभ्यर्थियों का दूसरे दिन भी प्रदर्शन
    25 Jan 2022
    भारी संख्या में अभ्यर्थियों ने बिहार की राजधानी पटना और आरा में रेलवे ट्रैक पर गत सोमवार को प्रदर्शन किया वहीं आज मंगलवार को नालंदा, बक्सर, नवादा समेत अन्य स्टेशनों पर उन्होंने रेलवे ट्रैक पर…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License