NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
अंतरराष्ट्रीय
दुनिया भर की: अब न चेते तो कोई मोहलत नहीं मिलेगी
आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में साफ़ कहा है कि जलवायु परिवर्तन से आर्थिक दरार गहरी होगी, असमानता में इजाफ़ा होगा और ग़रीबी बढ़ेगी। खाने-पीने की चीजों के दाम बेतहाशा बढ़ेंगे और श्रम व व्यापार का बाजार चौपट हो जाएगा। और, यह सब हमारे देखते-देखते होगा।
उपेंद्र स्वामी
01 Mar 2022
Earth's climate system
फ़ोटो साभार : रॉयटर्स

दुनिया की जलवायु में होने वाला बदलाव या इसे सीधे-सीधे कहें तो धरती के तापमान में हो रही बढ़ोतरी कोई कपोल-कल्पना नहीं रही है। न ही यह कोई खालिस अकादमिक बात है। और, न ही यह कोई ऐसा मसला है जिसे आप और हम यह कहकर हवा में उड़ा सकते हैं कि इससे हमें क्या, आने वाली पीढ़ियों को जो भुगतना होगा, वे भुगतेंगे।

यह ऐसी हकीकत है, जिसे हम इस पल भोग रहे हैं और भुगत रहे हैं। इससे हम न तो भाग सकते हैं, न ही बच सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अधीन काम करने वाले- जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी समूह (आईपीसीसी) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में उन खतरों के हमारे तरफ बढ़ने की गति को लेकर आगाह ही किया है जिनके बारे में हमें पिछले कुछ दशकों से बताया जा रहा है। यह वही आईपीसीसी है जिसके मुखिया भारत के आर.के. पचौरी 2002 से 2015 तक थे और जिसे 2007 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। आईपीसीसी ने अपनी ताजा रिपोर्ट सोमवार को जारी की है।

रिपोर्ट खासी बढ़ी है और इसमें तमाम क्षेत्रों और इलाकों पर पड़ने वाले असर के बारे में विस्तार से बताया गया है। लेकिन उतने विस्तार में गए बिना भी कई बातें हैं जिनपर ग़ौर करें तो हमें हालात की गंभीरता का एहसास हो जाएगा। लेकिन इसके निचोड़ में यह है कि इससे नुकसान का जो अंदाजा अब तक लगाया जा रहा था, हकीकत में वह उससे कहीं ज्यादा है।

आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि जलवायु परिवर्तन से आर्थिक दरार गहरी होगी, असमानता में इजाफ़ा होगा और गरीबी बढ़ेगी। खाने-पीने की चीजों के दाम बेतहाशा बढ़ेंगे और श्रम व व्यापार का बाजार चौपट हो जाएगा। और, यह सब हमारे देखते-देखते होगा।

धरती के बढ़ते तापमान से कोई भी बच तो नहीं पाएगा, लेकिन उसका असर हर इलाके पर एक जैसा नहीं होने वाला है। कुछ देशों का भविष्य पिघलती बर्फ और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से तय होगा तो कुछ को अत्यधिक ज्यादा तापमान और दावानल से जूझना होगा। बढ़ता तापमान और बढ़ती उमस एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के तमाम ट्रॉपिकल (उष्ण कटिबंधीय) इलाकों में मच्छरों की तादाद बढ़ाएगी और डेंगू व मलेरिया जैसी बीमारियों का कहर बढ़ेगा।

जलवायु परिवर्तन का असर उन तमाम क्षेत्रों पर सबसे पहले पड़ेगा जो अपने काम काज में मौसम पर ज्यादा निर्भर होते हैं। इनमें कृषि, जंगल, मछलीपालन, ऊर्जा व पर्यटन जैसे क्षेत्र खास हैं। अब अंदाजा लगा लीजिए कि आबादी का कौन-सा हिस्सा इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला है। मौसम के अतिरेक- बेहद गर्मी, अचानक भारी बारिश, बहुत ज्यादा बर्फबारी, बाढ़ व जंगलों की आग से लोगों के जानमाल को जो सीधा नुकसान हो रहा है और होगा, वह तो अलग है। फसलें खराब होने के सिलसिले बढ़ंगे, दुनिया की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ेगी।

यह सब कितनी तेजी से और किस खतरनाक तरीके से होने वाला है, इसका अंदाजा रिपोर्ट में दिए गए इस एक आंकड़े से हो जाता है कि साल 2050 तक (यानी अब से महज 28 साल बाद) गरीब देशों के तकरीबन 18.3 करोड़ लोग और जलवायु परिवर्तन के कारण भुखमरी वाले हालात में पहुंच जाएंगे।

एक बड़ा सीधा-सा आकलन रिपोर्ट में है कि अगर तापमान बढ़ेगा तो खुले में काम करने वालों (कृषि व श्रम क्षेत्रों में) की उत्पादकता घटेगी या फिर वह उस तरह का काम करना बंद कर देंगे। किसानी-खेती दुष्कर होती जाएगी तो इसका क्या असर पड़ेगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। गांव खाली होते जाएंगे, शहरों में भीड़ बढ़ती जाएगी।

शहरों में बढ़ती आबादी का अंदाजा इस बात से लगा लीजिए कि आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार अफ्रीका में नाइजीरिया की राजधानी लागोस इस सदी के अंत तक दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर हो जाएगा। दरअसल अफ्रीका को इसकी मार सबसे ज्यादा बरदाश्त करनी होगी। वह पहले ही इस धरती का सबसे गर्म महाद्वीप है और सबसे ज्यादा गरीब भी। अगर तापमान में वृद्धि को औद्योगीकरण से पहले के स्तर से 1.5 डिग्री ऊपर तक पर न रोका गया तो अफ्रीका में केवल गर्मी से मरने वालों की तादाद में प्रत्येक एक लाख लोगों पर 15 का इजाफा होगा।

हम अपने ही देश की बात करें तो केदारनाथ त्रासदी को कौन भूला होगा। हिमालयी इलाकों में पिघलते ग्लेशियरों के कारण चट्टानों की ओट में बनने वाली झीलों की संख्या और आकार बढ़ेगा। जब चट्टानें उन झीलों को थाम नहीं पाएंगी तो नीचे के इलाके जलमग्न होंगे, जलप्रलय की घटनाएं बढ़ेंगी। साल 2019 में बाढ़ के कारण एशिया में करीब 90 लाख लोग विस्थापित हुए थे। यह संख्या लगातार बढ़ेगी।

जिन एमेजन के जंगलों को धरती के फेफड़े कहा जाता है वे पिछले कई सालों से इंसानी लालच में कटाई का शिकार हैं। दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वतों में दावानल की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। आईपीसीसी का मानना है कि वहां ज्यादा तूफान आएंगे, ज्यादा बाढ़ आएगी और ज्यादा सूखा भी पड़ेगा।

दरअसल हम पिछले दो साल की घटनाओं पर ही नजर डालें तो आईपीसीसी द्वारा व्यक्त की जा रही आशंकाएं साफ समझ में आने लगती हैं। आस्ट्रेलिया में पिछले दो सालों से दिसंबर-जनवरी के गर्म महीनों में भीषण आग लग रही है। यूरोप में भूमध्य सागर के आसपास के देशों- इटली, ग्रीस आदि में इसी तरह की आग ने कहर बरपाया है। उत्तर अमेरिका में पश्चिम के इलाकों में इसी तरह से आग की घटनाएं कैलिफोर्निया के इलाके में बढ़ी हैं तो पूर्वी इलाकों में तूफानों के वाकये निरंतर बढ़ रहे हैं।

इस सारी स्थिति से निबटने की बातें फिलहाल हवाई ज्यादा हैं और अब हमारे पास बेहद छोटा-सा मौका बचा है जिसमें हम इस धरती को इंसानों के रहने लायक बचा सकते हैं। मुश्किल यह है कि जिन्हें इस सिलसिले में कुछ करना चाहिए वे मुनाफे के गुणा-भाग में इतने उलझे रहते हैं कि ज्यादा दूर की सोच नहीं पाते।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

global warming
Earth's climate system
climate change
ICC Report
food security

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

मज़दूर वर्ग को सनस्ट्रोक से बचाएं

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

जलवायु परिवर्तन : हम मुनाफ़े के लिए ज़िंदगी कुर्बान कर रहे हैं

लगातार गर्म होते ग्रह में, हथियारों पर पैसा ख़र्च किया जा रहा है: 18वाँ न्यूज़लेटर  (2022)

अंकुश के बावजूद ओजोन-नष्ट करने वाले हाइड्रो क्लोरोफ्लोरोकार्बन की वायुमंडल में वृद्धि

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान

दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार

जलविद्युत बांध जलवायु संकट का हल नहीं होने के 10 कारण 

संयुक्त राष्ट्र के IPCC ने जलवायु परिवर्तन आपदा को टालने के लिए, अब तक के सबसे कड़े कदमों को उठाने का किया आह्वान 


बाकी खबरें

  • russia ukrain
    एपी/भाषा
    यूक्रेन-रूस घटनाक्रम: रूस को अलग-थलग करने की रणनीति, युद्ध अपराधों पर जांच करेगा आईसीसी
    01 Mar 2022
    अमेरिका ने जासूसी के आरोप में 12 रूसी राजनयिकों को निष्कासित करने की घोषणा की है। रूस की कई समाचार वेबसाइट हैक हो गईं हैं जिनमें से कुछ पर रूस ने खुद रोक लगाई है। तो वहीं संयुक्त राष्ट्र के दुलर्भ…
  •  Atal Progress Way
    बादल सरोज
    अटल प्रोग्रेस वे से कई किसान होंगे विस्थापित, चम्बल घाटी का भी बदल जाएगा भूगोल : किसान सभा
    01 Mar 2022
    "सरकार अपनी इस योजना और उसके असर को छुपाने की कोशिश में है। ना तो प्रभावित होने वाले किसानों को, ना ही उजड़ने और विस्थापित होने वाले परिवारों को विधिवत व्यक्तिगत नोटिस दिए गए हैं। पुनर्वास की कोई…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर एक लाख से कम हुई 
    01 Mar 2022
    पिछले 24 घंटों में देश में कोरोना के क़रीब 7 हज़ार नए मामले सामने आए हैं। देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 92 हज़ार 472 हो गयी है।
  • Imperialism
    प्रभात पटनायक
    साम्राज्यवाद अब भी ज़िंदा है
    01 Mar 2022
    साम्राज्यवादी संबंध व्यवस्था का सार विश्व संसाधनों पर महानगरीय या विकसित ताकतों द्वारा नियंत्रण में निहित है और इसमें भूमि उपयोग पर नियंत्रण भी शामिल है। 
  • Ukraine
    सी. सरतचंद
    यूक्रेन युद्ध की राजनीतिक अर्थव्यवस्था
    01 Mar 2022
    अन्य सभी संकटों की तरह, यूक्रेन में संघर्ष के भी कई आयाम हैं जिनकी गंभीरता से जांच किए जाने की जरूरत है। इस लेख में, हम इस संकट की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि की जांच करने की कोशिश करेंगे।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License