NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
चुनाव 2022
नज़रिया
युवा
विधानसभा चुनाव
समाज
भारत
राजनीति
गोवा चुनाव: सिविल सोसायटी ने जारी किया गोवा का ग्रीन मेनिफेस्टो
गोवा के युवाओं, विभिन्न संस्थाओं और गणमान्य नागरिकों ने मिलकर गोवा का हरित घोषणा-पत्र यानी गोवा का ग्रीन मेनिफेस्टो जारी किया है। इस बारे में हमने आमचे मोलें सिटिज़न मूवमेंट से जुड़े स्वभू कोहली से साक्षात्कार किया है।
राज कुमार
27 Jan 2022
Goa
गोवा में आम नागरिक पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं

गोवा की राजनीति और चुनावी हलचल से वास्तविक मुद्दे गायब है। विधायकों का दल-बदल, सीटों का बंटवारा और नेताओं के इस्तीफ़े तक ही गोवा के चुनाव की चर्चा सीमित हो गई है। ऐसे में गोवा की सिविल सोसायटी अपने घोषणा-पत्र जारी करके कोशिश कर रही हैं कि चुनावी चर्चा को मुद्दों पर लाया जाए। गोवा के युवाओं, विभिन्न संस्थाओं और गणमान्य नागरिकों ने मिलकर गोवा का हरित घोषणा-पत्र यानी गोवा का ग्रीन मेनिफेस्टो जारी किया है। इस बारे में हमने आमचे मोलें सिटिज़न मूवमेंट से जुड़े स्वभू कोहली से साक्षात्कार किया है। स्वभूकोहली घोषणा-पत्र की परिकल्पना, चर्चाओं और निर्माण से जुड़े रहे हैं।

ग्रीन मेनिफेस्टो किस मंच से जारी किया गया है?

असल में आमचे मोलें सिटिज़न मूवमेंट से गोवा के बहुत सारे युवा जुड़े हुए हैं। इसमें अलग-अलग संस्थाओं और एक्सपर्ट जो लॉ, मेडिसन, इकोलॉजी, आर्किटेक्चर आदि क्षेत्र में काम कर रहे हैं उन सबसे संपर्क किया गया। सिविल सोसायटी से संपर्क और विमर्श किया गया और गोवा के नागरिकों की तरफ से ये घोषणा-पत्र बनाया गया। इसे बनाने में बहुत सारी संस्थाएं, एक्सपर्ट, पर्यावरणविद, शोधकर्ता और युवा ग्रुप शामिल हुए हैं। सबने मिलकर इसे बनाया है। “सेव मोलें” ने पहल ली और गोवा हेरिटेज़ एक्शन ग्रुप, गोवा बर्ड कंज़रवेशन नेटवर्क, चिकलिम यूथ फार्मर क्लब, महादेइ रिसर्च सेंटर, गोयंत कोलसो नाका, रिस्पांसिबल टूरिज़्म कलेक्टिव, मोर्जिम सि टरटल ट्रस्ट और कॉस्टल इम्पैक्ट आदि संस्थाओं ने इसे समर्थन दिया।

ऐसा कह सकते हैं कि इस घोषणा-पत्र के पीछे सबसे बड़ी पहलकदमी गोवा के युवाओं की है?

जी! बिल्कुल कहना चाहिये कि इस घोषणा-पत्र की रीढ़ युवा हैं। जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभाव हमारे युवा देख रहे हैं। युवा चाहते हैं कि अब पर्यावरण को चुनाव की प्राथमिकता बनना चाहिये। सभी युवा वोटर भी हैं और चाहते हैं कि पार्टियों की प्राथमिकता पर पर्यावरण होना चाहिये। लेकिन इसे महत्व नहीं दिया जा रहा है, इसीलिये हमने ये घोषणा-पत्र बनाया है ताकि पार्टियां इसे समझे और अपने घोषणा-पत्र में शामिल करें। आने वाले भविष्य को लेकर पर्यावरण के संदर्भ में हमारी चिंताएं चुनाव का मुद्दा होनी ही चाहिए। 

आपके हिसाब से गोवा में पर्यावरण से संबंधित क्या ख़तरे हैं?

जैसा कि आप जानते हैं कि गोवा देश का सबसे छोटा राज्य है लेकिन जैव विविधता भरपूर है। बहुत तरह के इको सिस्टम यहां पाए जाते हैं। वेस्टर्न घाट बहुत समृद्ध है। यहां पर सांस्कृतिक विविधता भी बहुत है। ये सांस्कृति विविधता, जैविक विवधता की संगति में रहती आ रही है। लेकिन पिछले सालों में अनियोजित ढंग से तथाकथित विकास की परियोजनाएं लागू की जा रही है, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के नाम पर बहुत सारी चीजें पास की जा रही हैं। ये प्रोजेक्ट हमारे सेंसिटिव इको सिस्टम ज़ोन को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

आप देख सकते हैं कि पिछले साल गोवा में हर महीने में बारिश हुई है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। गोवा में पिछले साल दो बार बाढ़ आई। हर महीने पर्यावरण में कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है जो पहले नहीं हुआ। लगातार साइक्लोन बढ़ रहे हैं। जबकि पहले पश्चिमी तट पर साइक्लोन नहीं होते थे। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हमारे दरवाजे पर खटखटा रहे हैं। लेकिन सरकारे आंख मूंद कर अब भी प्रोजेक्ट्स को पास किये जा रही हैं और इको सिस्टम को कोई महत्व नहीं दे रही हैं। जंगल काटे जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लड़ने में इको सिस्टम ही हमारी मदद करेगा। लेकिन हम उसी को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। इन सब चीजों को ध्यान में रखकर ये घोषणा-पत्र बनाया गया है। ताकि सरकार इस मुद्दे को गंभीरत से लेना शुरु करे। 

मोलें के वो कौन से तीन प्रोजेक्टस है जिनका आप विरोध कर रहे हैं और क्यों?

कोविड महामारी के दौरान 30 प्रोजेक्ट वीडियो कांफ्रेस के माध्यम से पास किये गये। बिना किसी कंसल्टेशन के, बिना इनवायरनमेंट इम्पैक्ट अससमेंट के, तमाम प्रक्रियाओं को दरकिनार करके ये प्रोजेक्ट पास किये गये। इनमें से तीन प्रोजेक्ट गोवा के हैं। 

1. ट्रांसमिशन लाइन का विस्तार 

2. रेलवे ट्रैक को डबल करना

3. हाइवे की चौड़ाई का विस्तार

ये प्रोजेक्ट भगवान महावीर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी मोलें नेशनल पार्क को प्रभावित करेंगे। ये हमारा सबसे समृद्ध और सेंसिटिव इको सिस्टम है। भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से हमें बचाने के लिए ये बहुत महत्वपूर्ण है। ये तीनों प्रोजेक्ट इसकी सूरत बदल देंगे, इसे बर्बाद कर देंगे।  

आपको क्या लगता है कि इसका क्या असर पड़ेगा?

देखिये, वैज्ञानिक केरल के बारे में लगातार कह रहे थे कि अगर इको सेंसिटिव फॉरेस्ट को आप नुकसान पहुंचाएंगे तो बाढ़ की संख्या बढ़ती जाएगी। हमने देखा है कि केरल कैसी ख़ौफनाक बाढ़ से गुजरा है। वैज्ञानिक चेता रहे हैं कि अब अगला नंबर गोवा का है। जलवायु परिवर्तन का पहला प्रभाव है समुद्र तल में वृद्धि। हम तटीय क्षेत्र में रहते है। गोवा पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। मोलें के जंगलों के साथ हमारा एक भावनात्मक संबंध भी है। हमारी पहचान इससे जुड़ी हुई है। गोवा की पहचान इससे जुड़ी हुई है। हमारी यादें इससे जुड़ी हुई हैं। हम चाहते हैं कि जो भी परियोजनाएं की जाएं उसके लिए वैधानिक तरीका अपनाया जाए, लोगों की राय ली जाए, इनसे पर्यावरण को क्या नुकसान पहुंचेगा इसका आकलन किया जाए और फिर पर्यावरण की संगति में ही वैकल्पिक तरीके अपनाए जाएं। जलवायु परिवर्तन हमारी आंखों में आंखें डालकर ठीक हमारे सामने, एक गंभीर ख़तरे के तौर पर खड़ा हुआ है। इसे सरकार नकार क्यों रही हैं, देख क्यों नहीं रही? आमचे मोलें सिटिज़न मूवमेंट इसीलिये चलाया गया।

मोलें और पश्चिमी घाट इकॉलजी और जैव विविधता के नज़रिये से दुनिया का आठवां हॉट-स्पॉट है। यहां पर काफी ऐसे पक्षी, सांप, जीव-जंतु और वनस्पति है जो दुनिया में और कहीं भी नहीं पाई जातीं। कायदे से तो इसकी रक्षा करना हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी होना चाहिये। अगर इन जंगलों पर असर पड़ता है तो ये दुलर्भ वनस्पति, जीव-जंतु और वन्य-प्राणी भी विलुप्त हो जाएंगे। इसके बाद ये पूरी दुनिया में कहीं नहीं पाए जाएंगे। इन जंगलों में हर साल दस-बारह नई प्रजातियां पाई जाती हैं। इन जंगलों में क्या-क्या छिपा है अभी हम इसके बारे में पूरा जानते भी नहीं है। हमें कोई अंदाज़ा नहीं है कि हम क्या खो देंगे। यहां ऐसे नज़ारे, वनस्पति, जीव-जंतु और वन्य प्राणी पाए जाते हैं जिससे भारत की पूरी दुनिया में एक पहचान बनती है। हम इसे नष्ट करके अपनी पहचान मिटा देंगे। हम धरोहर को नष्ट कर रहे हैं। जबकि हम इको सस्टेनेबल पर्यटन को बढ़ावा दे सकते हैं। जिससे पूरे प्रदेश को फायदा होगा। अभी तक गोवा में मैन-एनिमल कॉन्फ़्लिक्ट की घटनाएं नहीं हैं। लेकिन अगर जंगलों को काटा गया तो ये घटनाएं भी बढ़ सकती है। अगर इन जंगलों के बीच से हाइवे निकाले गये तो जानवरों की दुर्घटनाएं होंगी। अभी भीगोवा में बहुत सारे सांप सड़क पर वाहनों से कुचल कर मर जाते हैं। अगर गोवा के कदीमी पेड़-पौधे नष्ट हुए तो वो जीव-जंतु तितलियां आदि भी नष्ट हो जाएंगी जिनके लिए ये पेड़-पौधे ही खाना बनाते है। हरेक चीज एक-दूसरी से जुड़ी हुई है। नुकसान बहुत बड़ा है।

तो आपकी मुख्य मांगें क्या हैं?

बहुत सारी हैं। हमने बड़े विस्तार से घोषणा-पत्र में लिखा है। हमने वातावरण के मुद्दे को नौ इको सिस्टम में बांटा है। जंगल, तट, पानी, हवा,प्राकृतिक संसाधन, कृषि, रिहायश, समाज और गवर्नेस। इनके अंतर्गत हमने बहुत से मुद्दे सामने रखे हैं। हमारा मानना है कि आइसोलेशन में कोई काम नहीं हो पाएगा। सभी क्षेत्रों में मिलकर एक साथ एक दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। इसमें अफोर्डेबल पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी सवाल है, पीने के पानी का भी सवाल है, पारंपरिक खेती को बढ़ावा देना, ग्राम पंचायतें सुचारू रूप से कार्य करें और जैव विविधता का नियोजन करें, स्वास्थ्य पर फोकस किया जाए, तालाबों आदि के रख-रखाव पर ध्यान दिया जाए वगैरह-वगैरह। हमने पर्यावरण के मुद्दे को समग्रता के साथ घोषणा-पत्र में रखा है। हमारी मांग है कि तीनों प्रॉजेक्ट को निरस्त किया जाए। हम कह रहे हैं कि विकास और पर्यावरण को आमने-सामने क्यों रखा जाता है? जबकि हमारे पास वैकल्पिक तरीके और वैज्ञानिक समाधान मौजूद हैं। हमारे पास रिसर्च हैं, डेटा है, हम इसे क्यों नज़रअंदाज कर रहे हैं। गोवा के युवा इससे बहुत गुस्से में हैं। क्योंकि सरकार को मालूम है कि इन परियोजनाओं से क्या नुकसान होगा। विज्ञान इस बारे में जो कह रहा है, हमारा खुद का अनुभव जो बोल रहा है, सरकार को उसे सुनना होगा। इसीलिये ये घोषणा-पत्र जारी किया गया है।

राजनैतिक पार्टियों का आपके घोषणा-पत्र के बारे में क्या कहना है?

हमने अभी एक-दो दिन पहले ही घोषणा-पत्र जारी किया है। हम इसे बहुत सक्रियता के साथ सांझा कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि राजनैतिक पार्टियां इसमे इंगेज़ हों। हर पार्टी इस मुद्दे को अपने घोषणा-पत्र में शामिल करें। हम सब पार्टियों को इस घोषणा-पत्र की प्रति भेजेंगे। हम सभी राजनैतिक पार्टियों को पत्र भी लिखेंगे कि वो हमसे इस बात पर चर्चा करें कि हमारे घोषणा-पत्र को वो अपने घोषणा-पत्र में कैसे जोड़ें। ये बड़े दुख की बात है कि किसी भी पार्टी की प्राथमिकता पर पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। गोवा के युवा ये कह रहे हैं कि अब पर्यावरण को प्राथमिकता देनी ही होगी। 

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है। विचार व्यक्तिगत हैं।)

ये भी पढ़ें: गोवा चुनावः मनोहर पर्रिकर के बेटे ने भाजपा छोड़ी, पणजी से होंगे निर्दलीय उम्मीदवार

Goa elections 2022
goa
Goa environment
Goa issues
Goa Crisis
Goa manifesto

Related Stories

तो क्या अब सिलेबस पढ़ाना भी अपराध हो गया है?


बाकी खबरें

  • पीपल्स डिस्पैच
    कोलंबिया की नेशनल स्ट्राइक कमेटी ने प्रदर्शन का आह्वान किया
    09 Jun 2021
    इस विरोध प्रदर्शन का आह्वान यह मांग करने के लिए किया गया है कि राष्ट्रीय सरकार आंदोलनकारी क्षेत्रों की मांगों पर बातचीत करने के लिए आगे बढ़ने और प्रदर्शन के अधिकार का प्रयोग करने के लिए गारंटी प्रदान…
  • पीपल्स डिस्पैच
    इज़रायल की संसद में रविवार को नई सरकार को मंज़ूरी देने के लिए मतदान
    09 Jun 2021
    अगर गठबंधन की नई सरकार को बहुमत मिलता है तो यह बेंजामिन नेतन्याहू के इज़रायल के प्रधानमंत्री के रूप में 12 साल के लंबे शासन को समाप्त कर देगा जो विवाद, भ्रष्टाचार और हिंसा के लिए जाना जाता है।
  • Wheat Produce
    मो. इमरान खान
    बिहार: बंपर फसल के बावजूद गेहूं की कम ख़रीद से किसान मायूस
    09 Jun 2021
    इस वर्ष सरकार ने अब तक अपने कुल गेहूं की खरीद के लक्ष्य से 40% से भी कम की खरीद की है।
  • दिल्ली : राशन को लेकर सरकारों के आपसी झगड़े में ग़रीबों के लिए क्या है?
    मुकुंद झा
    दिल्ली : राशन को लेकर सरकारों के आपसी झगड़े में ग़रीबों के लिए क्या है?
    09 Jun 2021
    दिल्ली की ग़रीब वर्ग के घर तक राशन पहुंचाने को लेकर केजरीवाल और केंद्र सरकार के बीच तकरार जारी है, मगर सवाल यह है कि काफ़ी देर से लागू हो रही इस योजना का जनता को कितना फ़ायदा मिल पाएगा?
  • बिरसा मुंडा का उलगुलान : सामाजिक जागरण का अभियान
    अनिल अंशुमन
    बिरसा मुंडा का उलगुलान : सामाजिक जागरण का अभियान
    09 Jun 2021
    बिरसा मुंडा द्वारा छेड़ा गया उलगुलान (विद्रोह) अंग्रेजी हुकूमत और स्थानीय शोषकों के खिलाफ महज एक तात्कालिक आदिवासी विद्रोह मात्र नहीं था। बल्कि यह पूरा आन्दोलन उस समय के आदिवासी और व्यापक समाज के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License