NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
ईश्वर और इंसान: एक नाना और नाती की बातचीत
मैंने अगला प्रश्न किया, कि क्या तुम मानते हो कि दुनिया में कोई ईश्वर है? अब वह थोड़ा झिझका और बोला, ‘कोई है तो जो हम सब को बनाता है’। मैंने एक जिज्ञासा उठाई, कि मनुष्य का पैदा होना एक बायोलॉजिकल प्रॉसेस है, उसमें भला ईश्वर, भगवान, ख़ुदा, अल्लाह या गॉड का क्या रोल?
शंभूनाथ शुक्ल
12 Dec 2021
god and man
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : गूगल

प्लस-टू (12वीं) में पढ़ने वाले मेरे नाती को फ़िज़िक्स और केमेस्ट्री की कुछ किताबें चाहिए थीं, उन्हें ख़रीदवाने के लिए मैं साथ जा रहा था। रास्ते में गाड़ी की स्पीड कम करते हुए मैंने उससे पूछा, कि ईश्वर के बारे में तुम क्या सोचते हो?

एक 16-17 वर्ष के किशोर को यह समझ ही नहीं आया, कि उसके नाना ने यह कैसा सवाल पूछ लिया। थोड़ी देर के बाद वह बोला, कि ‘भगवान का जो वर्णन लोग करते हैं, वह तो मैं नहीं मानता लेकिन यह मानता हूँ, कि भगवान एक है’। मैंने पूछा, कैसे? तो उसने कहा, ‘जैसे राम, कृष्ण, शिव सब एक हैं’। मैंने फिर कहा और ईश्वर, अल्लाह, गॉड? तब भी उसने जवाब दिया, कि सब एक हैं।

मैंने अगला प्रश्न किया, कि क्या तुम मानते हो कि दुनिया में कोई ईश्वर है? अब वह थोड़ा झिझका और बोला, ‘कोई है तो जो हम सब को बनाता है’। मैंने एक जिज्ञासा उठाई, कि मनुष्य का पैदा होना एक बायोलॉजिकल प्रॉसेस है, उसमें भला ईश्वर, भगवान, ख़ुदा, अल्लाह या गॉड का क्या रोल? खूब सोच कर वह बोला, कि ‘पहला आदमी तो भगवान ने ही बनाया होगा’। मैंने जवाब दिया, कि तुम्हें यह तो पता ही होगा, कि कोई भी जीव सेल्स से बनता है और सेल का बनना एक नेचुरल क्रिया है। जैसे कि मिट्टी, पानी और मॉयश्चर मिल कर सेल बना देते हैं। आख़िर मलेरिया अथवा तमाम बीमारियों के बैक्टीरिया ऐसे ही तो बनते हैं।

अब उसके पास कोई जवाब नहीं था इसलिए वह बोला कि लेकिन ईश्वर, भगवान, ख़ुदा या गॉड जो लोग बनाते हैं, वे इंसानियत के कुछ नियम बनाते हैं, जिससे समाज में अच्छाई बनी रहती है। मैंने कहा, मगर बुराई भी तो खूब है। इस पर उसने कहा, कि “जो लोग धर्म बना देते हैं, वे कुछ तो अच्छे नियम बनाते हैं और कुछ बुराइयाँ भी लाते हैं। जैसे ये अच्छा है कि हम शराब न पियें, हिंसा न करें, सबकी मदद करें। लेकिन धर्म बुराइयाँ भी लाता है। जैसे इस्लाम में हिज़ाब पहनना और हिंदू धर्म में गाय को लेकर सेंसेटिव हो जाना। नेहरू जी ने कहा था भारत में यूनिटी इन डायवर्सिटी है। इसलिए हमें डायवर्सिटी को बचाए रखना चाहिए। कल को यदि दूसरे लोग राज करने लगें और कह दें, सब लोग गाय खाएँ तो हमें कैसा लगेगा?”

डायवर्सिटी के बारे में एक 16-17 साल के बच्चे की इस समझ ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मिडिल क्लास परंपरावादी घरों में अपने बच्चों से ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाते। उसे बस इतनी लिबर्टी होती है, कि वह जो चाहे सो खाये, कोल्ड ड्रिंक पिये, हर तरह के खेल खेले। लेकिन क्लास में सदैव अव्वल आए और अच्छी-सी नौकरी करें। माँ-बाप का उसकी पढ़ाई पर फ़ोकस इतना अधिक होता है, कि हम अपने बच्चे से उसके स्वतंत्र चिंतन को छीन लेते हैं। हमने धर्म के नाम पर एक लकीर खींच रखी है, ताकि वह धर्म और उसके कर्मकांड पर सवाल न उठाये। यही कारण है, कि प्योर साइंस पढ़े वैज्ञानिक भी धर्म और ईश्वर को लेकर कनफ़्यूज्ड रहते हैं। वह स्पेस शटल में बैठ कर वे कर्मकांड करने लगते हैं जो उनके पोंगापन का इज़हार होता है। ऐसा कोई एक धर्म के लोग नहीं बल्कि सभी धर्मों के लोग करते हैं। इसकी वजह है धर्म और भगवान को लेकर हमारे दिमाग़ में पैठी हुई ग्रंथि। अगर बच्चों के मन में उठ रहे स्वाभाविक सवालों पर हम उनकी राय को जानें तो हम उनमें बेहतर इंसान बनने की समझ विकसित कर सकते हैं।

वर्ष 2006 की जनवरी में मुझे पुद्दुचेरी जानने का अवसर मिला। वहाँ पर एक धार्मिक नेता अमृता आनंदमयी माँ ने सुनामी में बर्बाद हो चुके गाँवों का पुनर्निर्माण करवाया था। इसलिए उनकी संस्था के पीआर विभाग ने प्रचार हेतु दिल्ली के सभी नामी-गिरामी अख़बार से एक-एक लोगों को ले जाने का कार्यक्रम रखा था। दिल्ली से चेन्नई को जाने वाली सुबह की जेट फ़्लाइट में अधिकांश पत्रकार ही थे। मेरे बग़ल में एक चाइनीज़ पत्रकार था, जो बीजिंग के किसी अख़बार का भारत स्थित संवाददाता था। क़रीब पौने तीन घंटे की उड़ान में हम दोस्त बन गए और फिर चेन्नई से बस द्वारा पुद्दुचेरी गए तो वहाँ भी यह युवक मेरे ही साथ बैठा। हम लोग एक ही रूम में रुके। मृदभाषी इस पत्रकार ने मुझसे पूछा, कि आपके देश में किसी धार्मिक नेता के पीछे इतनी भीड़ कैसे आ जाती है? हमारे यहाँ तो ऐसा कभी नहीं होता। इसका कोई तार्किक जवाब मेरे पास नहीं था। क्योंकि हमारे घरों और स्कूलों में ऐसे सवाल-जवाब नहीं किए जाते। सुबह प्रार्थना होती है, और बच्चों के मन में उठ रहे उस प्रार्थना के आराध्य के बारे सवालों का कोई समाधान नहीं होता। नतीजा बच्चे ठीक अपने पिता की तरह लकीर पीटने लगते हैं।

हम अपने बच्चों को कभी नहीं बताते कि धर्म की जीवन में क्यों ज़रूरत है? और अगर है, तो वही क्यों, जो उसके बाप-दादा मानते आए हैं। यही कारण है, हम भीड़ के पीछे चल देते हैं। कभी यह भी सोचिये, हम भीड़ के पीछे क्यों चल देते हैं? क्यों नहीं उस ईश्वर, उस धर्म या उन मान्यताओं के बारे में सवाल नहीं उठाते जो हमें कूढ़-मगज़ बनाती हैं। अगर ईश्वर है, तो कोई बताये कि हां, है और मैंने उसे देखा है। और अगर नहीं है, तो उसके लिए जड़ता कैसी? जब हम पूरे विश्व को एक गांव बना रहे हैं, तो हम इन जड़ मान्यताओं से पीछा क्यों नहीं छुड़ाते। इसका कारण है, कि हम अपने बच्चों को सही शिक्षा नहीं देते। उनको कभी भी स्कूली किताबों के इतर यह नहीं बताते कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा है, सिर्फ़ साइंस या कोर्स की किताबें पढ़ कर समझ नहीं आएगा, उनके लिए स्वतंत्र चिंतन करो। मैं ही यदि अपने नाती से आज इस तरह के सवाल न करता तो हो सकता मैं कभी जान न पाता कि यह छोटा किशोर भी यह जानता है, कि धर्म तब तक ही मान्य है, जब तक वह परस्पर लड़वाये नहीं।

धर्म का मूल स्वरूप ईश्वर में आस्था नहीं है, बल्कि एक अनजान शक्ति के भय से उन बातों से दूर करने का उपाय है, जो एक ख़ास वक़्त में मनुष्यों के मन में पारस्परिक सद्भाव के लिए पनपा होगा। लेकिन हर धर्म के नियंताओं ने उसे जड़ बना लिया, वे नहीं समझ सके कि सामाजिक नियम समय-सापेक्ष होते हैं। उत्पादन के साधन हमारे आचार-विचार और नैतिकता की हमारी परिभाषा को नियंत्रित करते हैं। जब तक इस तथ्य को नहीं समझा जाएगा, हम धर्म को लेकर यूँ ही रूढ़ बने रहेंगे। इसे समझने के लिए ज़रूरी है, कि बच्चों को उन गूढ़ विषयों से भी रू-ब-रू होने देना, जो उनके निरंतर प्रगति के लिए आवश्यक हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

human
God
religion
politics
Nature

Related Stories

'मैं भी ब्राह्मण हूं' का एलान ख़ुद को जातियों की ज़ंजीरों में मज़बूती से क़ैद करना है

सोचिए, सब कुछ एक जैसा ही क्यों हो!

रामचंद्र गुहा हमारे दौर के इस संकट को ठीक से क्यों नहीं समझ पा रहे हैं!

बात बोलेगी: क्या मामला सिर्फ़ जेएनयू को निपटाना है?

फ़ैज़ भाई, जय श्रीराम!

प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता के लिए ओएमआर में करना होगा बदलाव

जटिल है जनसंख्या नियंत्रण का प्रश्न


बाकी खबरें

  • SC
    भाषा
    लखीमपुर खीरी हिंसा: सुप्रीम कोर्ट का यूपी सरकार को गवाहों के संरक्षण का निर्देश
    26 Oct 2021
    शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को पत्रकार की पीट-पीटकर हत्या करने के मामले से जुड़ी दो शिकायतों के संबंध में रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने कहा, ‘‘ राज्य को इन मामलों में अलग-अलग जवाब…
  • Defence Unions
    रौनक छाबड़ा
    रक्षा कर्मचारी संघों का केंद्र सरकार पर वादे से मुकरने का आरोप, आंदोलन की चेतावनी 
    26 Oct 2021
    कर्मचारी महासंघों ने ने केंद्र को उनकी सेवा शर्तों के साथ हेराफेरी नहीं करने के अपने वादे से मुकरने का दोषी ठहराया है।जिसे देखते हुए श्रमिक संघों ने अपनी 11 मांगों को सूचीबद्ध करते हुए “आंदोलन का…
  • cricket
    भाषा
    आईसीसी आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में कुमारा और दास पर जुर्माना
    26 Oct 2021
    मैदान पर तीखी बहस के बाद दोनों क्रिकेटर एक दूसरे पर प्रहार करने की कोशिश में थे जिससे अंपायरों और बाकी खिलाड़ियों को दखल देना पड़ा ।
  • diwali
    भाषा
    दिल्ली सरकार का 27 अक्टूबर से ‘पटाखे नहीं दीया जलाओ’ अभियान
    26 Oct 2021
    मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 15 सितंबर को पटाखों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करते हुए कहा था कि यह ‘‘जीवन बचाने के लिए आवश्यक’’ है।
  • delhi high court
    भाषा
    समलैंगिक विवाहों को मान्यता देने की याचिकाओं पर 30 नवंबर को अंतिम सुनवाई
    26 Oct 2021
    पहली याचिका में, अभिजीत अय्यर मित्रा और तीन अन्य ने तर्क दिया है कि उच्चतम न्यायालय के दो वयस्कों के बीच सहमति से अप्राकृतिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर किये जाने के बावजूद समलैंगिक विवाह संभव…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License