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राजनीति
तमिलनाडु और केरल के बीच मुल्लापेरियार बांध के संघर्ष का इतिहास
पश्चिम की ओर बहने वाली पेरियार नदी को पश्चिमी घाट के पूर्व में अर्ध-शुष्क कृषि भूमि की ओर मोड़ने के लिए एक बांध बनाने का विचार बहुत पुराना है। एक स्थानीय प्रशासक प्रदानी मुथिरुलप्पा पिल्लई ने वर्ष 1789 में इसकी परिकल्पना की थी।
श्रुति एमडी
11 Dec 2021
mullaperiyar
मुल्लापेरियार बांध से पानी का बहाव। (फोटो क्रेडिट: प्रकाश आर)

केरल द्वारा पानी न छोड़े जाने की बार-बार अपील किए जाने के बावजूद, तमिलनाडु द्वारा अप्रत्याशित रूप से रात में बांध के शटर खोले जाने के बाद अंतर-राज्यीय मुल्लापेरियार बांध को लेकर एक बार फिर संघर्ष बढ़ गया है। तमिलनाडु द्वारा 6 दिसम्बर की रात 9 बजे पानी छोड़े जाने से केरल के इडुक्की जिले के डाउनस्ट्रीम गांवों में सैकड़ों घर जलमग्न हो गए थे। 

यह उदाहरण मुल्लापेरियार बांध को लेकर केरल और तमिलनाडु के बीच दशकों पुराने संघर्ष का एक हिस्सा है। दोनों राज्यों में संघर्ष की जड़ यह है कि बांध विशेष रूप से केरल के इडुक्की जिले में स्थित है, लेकिन इस पर नियंत्रण तमिलनाडु सरकार का है। लेकिन ऐसा क्यों है? 

इस संघर्ष की सही प्रकृति को समझने के लिए बांध के इतिहास की एक झलक जरूरी है। 

शुरूआती साल

पश्चिम की ओर बहने वाली पेरियार नदी को पश्चिमी घाट के पूर्व में अर्ध-शुष्क कृषि भूमि की ओर मोड़ने के लिए एक बांध बनाने का विचार बहुत पुराना है। एक स्थानीय प्रशासक प्रदानी मुथिरुलप्पा पिल्लई ने वर्ष 1789 में इसकी परिकल्पना की थी। वे मद्रास प्रेसीडेंसी के तहत रामनाद एस्टेट के नाबालिग जमींदार मुथुरामलिंग सेतुपति के एक शक्तिशाली मंत्री थे। 

इस तरह के बांध की परिकल्पना इसलिए की गई थी क्योंकि पेरियार नदी का अतिरिक्त पानी बेकार ढंग से अरब सागर में बह रहा था। उसी समय, मद्रास प्रेसीडेंसी के तत्कालीन मदुरा क्षेत्र में केवल मानसून पर निर्भर जिलों को भीषण सूखे का सामना करना पड़ा था। 

कैप्टन जेएल कॉडवेल, जो मद्रास सेना के मद्रास इंजीनियर्स के हिस्सा थे, उन्होंने वर्ष 1808 में इस बांध को बनाने के लिए उपयुक्त स्थान की खोज की थी। यह इडुक्की जिले के थेक्कडी शहर में पश्चिमी घाट के इलायची पहाड़ियों पर समुद्र तल से 2,890 फीट ऊपर स्थित है। 

जबकि पानी को मोड़ने के लिए एक बांध का विचार अच्छा था, पर यह आसान काम नहीं था। सबसे पहले, यह एक बहुत ही महंगा मामला था, जिसमें असुरक्षित घने जंगलों के अंदर जा कर बांध बनाने के लिए कई वर्षों तक कठोर श्रम की आवश्यकता थी। दूसरे, बांध को अंग्रेजों द्वारा त्रावणकोर क्षेत्र में बनाया जाना था, जो एक रियासत थी और वह ब्रिटिश साम्राज्य की सीमा से बाहर थी।

मद्रास प्रेसीडेंसी ने पेरियार पर बांध बनाने का पहला औपचारिक प्रयास 1850 में किया था। लेकिन अस्वस्थकर हालात में काम करने का हवाला देते हुए मजदूरों द्वारा ज्यादा मजदूरी की मांग करने के बाद इसका इरादा छोड़ दिया गया था। लेकिन, योजना अभी विचाराधीन थी।

फिर आया, 1877 का वह कुख्यात मद्रास अकाल, जब वायसराय लॉर्ड रॉबर्ट बुलवर लिटन के निर्मम कार्यकाल में चार से पांच मिलियन लोगों ने भूख से छटपटा कर दम तोड़ दिया था, इसके बाद पानी के अधिक स्रोतों की जरूरत थी। इसकी वजह से भी बांध बनाने में देरी हुई।

बांध निर्माण

वर्षों की हीलाहवाली के बाद, पेरियार बांध (तब इसी नाम से जाना जाता था) के निर्माण को 1882 में आखिरकार मंजूरी दी गई। मेजर जॉन पेनीक्यूइक एक संशोधित परियोजना तैयार करने के प्रभारी थे, जिसे अंततः वर्ष 1884 में अनुमोदित किया गया था।

ऐसा कहा जाता है कि ब्रिटिश सरकार को त्रावणकोर स्टेट से कोई 24 वर्षों तक बातचीत करनी पड़ी थी, तब जा कर 29 अक्टूबर 1886 को 999 वर्षों तक के लिए पट्टे पर जमीन लेने के लिए त्रावणकोर के महाराजा विशाखम थिरुनल राम वर्मा और ब्रिटिश भारत के राज्य सचिव के के बीच दस्तावेज पर दस्तखत किए थे।

इस समझौते ने मुल्लापेरियार बांध की 100 एकड़ के दायरे में आने वाले जल और 8,000 हजार एकड़ में फैले जलाशय के समस्त जल पर ब्रिटिश सरकार का पूर्ण अधिकार दे दिया। ब्रिटिश सरकार इसकी एवज में प्रति एकड़ 5 रुपये के हिसाब से सालाना 40,000 रुपये कर देती थी। बांध का निर्माण 1887 में शुरू किया गया। यह बांध चट्टान, चूना पत्थर और जले हुए ईंट के पाउडर से बनाया गया था। 

पेनीक्यूइक के लिए नदी का बहाव मोड़ना एक बड़ी चुनौती थी, और पानी के प्रवाह को रोकने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अस्थायी तटबंध लगातार बाढ़ आने से नष्ट हो गए थे। इस समस्या के कारण, ब्रिटिश अधिकारियों ने बांध के लिए धन पर रोक लगा दी।

थेनी में अवस्थित पेनीक्यूइक स्मारक में जॉन पेनीक्यूइक की मूर्ति। (फोटो सौजन्य: कैजुअल वॉकर)

ऐसा लोक विश्वास है कि पेनीक्यूइक ने बांध का निर्माण जारी रखने और उसे पूरा करने के लिए इंग्लैंड में अपनी पत्नी के गहने और संपत्ति बेचकर धन जुटाया था।

आजादी के बाद

अंग्रेजों के 1947 में भारत छोड़ गए। इसके बाद त्रावणकोर और कोचीन केरल से भारत संघ में 1956 में शामिल हो गए। नई राज्य सरकार ने कहा कि ब्रिटिश राज और त्रावणकोर के बीच पहले हस्ताक्षरित समझौता अमान्य था और इसे नवीनीकृत करने की आवश्यकता है। 

कई असफल प्रयासों के बाद, इसे 1970 में नवीनीकृत किया गया था और इसमें प्रति एकड़ 5 रुपये कर को बढ़ाकर 30 रुपये एकड़ कर दिया गया था। साथ ही, मुल्लापेरियार के पानी से उत्पन्न बिजली के लिए प्रति किलोवाट 12 रुपये प्रति घंटे की दर से कर का निर्धारण कर दिया था। इस नई दर से तमिलनाडु अगले 50 वर्षों के लिए कर के रूप में सालाना 10 लाख रुपये की राशि का भुगतान कर रहा है।

हालांकि, 1979 में मोरवी डैम के फेल होने के बाद इस पूरी चर्चा ने एक अलग ही रंग ले लिया, जिसमें 15,000 लोग गुजरात में मर गए थे। केरल सरकार ने मुल्लापेरियार बांध के ज्यादा पुराने होने और उसके भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र में स्थित होने को लेकर सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई थीं। यह आशंका जताई जाने लगी थी कि यह 6 ˈमैग्‌निट्‌यूड्‌ से अधिक तीव्रता वाले भूकंप का सामना नहीं कर सकता है।

तब से, तमिलनाडु पीडब्ल्यूडी द्वारा केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की सिफारिश के मुताबिक बांध के सुदृढ़ीकरण उपायों को अपनाया गया है। 

बांध के भंडारण स्तर को लेकर विवाद होता रहा है। 2011 में सीडब्ल्यूसी ने तमिलनाडु सरकार को 152 फीट जल भंडारण की बजाए 142.2 फीट और फिर मरम्मत का काम करने के लिए 136 फीट तक कम करने का आदेश दिया।

तमिलनाडु के लिए तो मुल्लापेरियार बांध और डायवर्टेड पेरियार जल उसके थेनी, मदुरै, शिवगंगा, डिंडीगुल और रामनाड जिलों के लिए जीवन रेखा के रूप में कार्य करते हैं, जो पीने के लिए और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराते हैं। वहीं, केरल के लिए, यह सैकड़ों साल से भी अधिक पुराना बांध जिसमें कई संरचनात्मक खामियां हैं, अब अगर वह टूटता है तो उसे 3.5 लाख लोगों के लिए खतरा है।

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

History of the Conflict-Ridden Mullaperiyar Dam

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