NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
पंजाब के दलित कैसे किसान आन्दोलन का हिस्सा बन गए?
पंजाब में जो किसान हाशिये पर पड़े समुदायों से आते हैं, उनका मानना है कि इन नए अधिनियमित कानूनों से उन्हें सबसे अधिक मार झेलनी पड़ेगी। 
रवि कौशल
24 Dec 2020
पंजाब

संत रविदास और अंबेडकर की छवियों वाले फ्लेक्स को हाथों में थामे हुए गुरप्रीत लल्ली अपने दोस्तों से बार-बार फोटो खींचने का आग्रह कर रहे हैं, जिसे वे किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन में अपनी भागीदारी के यादगार के तौर पर भविष्य के लिए सहेज कर रखना चाहते हैं।

लल्ली, सत गुरु रविदास धर्म समाज, लुधियाना के अपने दल-बल के साथ दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर हाल ही में लागू किये गए तीन कृषि कानूनों और प्रस्तावित बिजली (संशोधन) विधेयक को निरस्त किये जाने की माँग को लेकर डेरा डाले हुए है, जिसकी तुलना किसानों के संगठनों ने भारतीय कृषि की ताबूत में कील ठोंकने से की है।

लल्ली जोकि पंजाब में रविदसिया जाति (दलित) से आते हैं, ने बताया कि ये कानून हाशिये पर पड़े समुदायों की उन्नति के लिए एक बड़ा झटका साबित होने जा रहे हैं, जिसे उन्होंने दशकों के संघर्ष के बाद जाकर हासिल किया था। न्यूज़क्लिक से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा “पारंपरिक तौर पर अधिकांश दलित समुदाय भूमिहीन थे। यह हमारे लंबे और कड़ी मशक्कत से किये गए संघर्ष का ही परिणाम है जिसके चलते हमारी पंचायतों में हमें जमीन के पट्टे हासिल हो सके थे। हालाँकि ये जमीनें इतनी पर्याप्त नहीं थी कि इनसे कुछ खास रिटर्न हासिल हो सके। लेकिन अब जबकि इन कानून अनुबंध आधारित खेती और बड़ी जोत-आधारित कृषि की सुविधा को मुहैय्या कराया जा रहा है, तो ऐसे में हम जैसे लोग ही इससे सबसे बुरी तरह से प्रभावित होने जा रहे हैं।”

वे आगे कहते हैं “दूसरी बात यह है, जो कई लोगों को नजर नहीं आ रही है, वो यह है कि एपीएमसी बाजारों में काम करने वाले अधिकतर श्रमिक दलित समुदाय से आते हैं, और एक बार इसके ध्वस्त हो जाने पर उन्हें विस्थापन का सामना करना पड़ेगा। इसलिए यह हमारे लिए दोहरा झटका है, जिन्होंने हाल ही में गरिमापूर्ण एवं सम्मान का जीवन जीना शुरू किया था।”

आँखों में आँसू लिए उन्होंने आगे कहा “अब हमें भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है, क्योंकि आज हम अच्छा कमा खा रहे हैं। मैं जर्मन जूते, कनाडा की बनी कमीज और इटालियन जैकेट पहनता हूँ, क्योंकि हमारे पूर्वजों ने हमारे खातिर संघर्ष किया है। यह अब हमारे जीवन-मरण का प्रश्न बन चुका है। हम इस संघर्ष को बीच में ही नहीं छोड़ सकते।”

सामाजिक भेदभाव की उपस्थिति के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा “हमें उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे अन्य राज्यों की तरह खुल्लम-खुल्ला भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है, लेकिन मैं समझता हूँ कि यह अब कहीं ज्यादा छुपे तौर पर जारी है। उदाहरण के लिए स्कूल प्रशासन विद्यार्थियों को अलग-अलग रंगों के आधार विभिन्न हाउस में विभाजित कर देते हैं। मेरे बच्चे रेड हाउस में हैं। दिलचस्प बात यह है कि मैं भी रेड हाउस में ही था। दूसरा, उनके रजिस्टरों में अब धर्म और जाति का कॉलम भी बने हुए हैं। इस नवजात उम्र में वे बच्चों को क्या यही सब सिखा रहे हैं?”

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के प्रति घोर अविश्वास के बारे में पूछे जाने पर लल्ली के बगल में खड़े अवतार सिंह बोल पड़ते हैं “हमें उनकी बातों पर कोई यकीन नहीं रहा। कानून एक लिखित दस्तावेज होते हैं, इसमें मौखिक का कोई मोल नहीं। हमें मौखिक आश्वासनों की कोई दरकार नहीं है। हम न्यूनतम समर्थन मूल्य पर एक कानून बनाये जाने को देखना चाहते हैं। उन्होंने किसी भी किसान या उनके संगठनों से उनकी राय (इन कानूनों को पारित करने से पहले) नहीं पूछी थी। कुलमिलाकर हम सिर्फ इतना ही कहना चाहते हैं कि देश को इस तरह से नहीं चलाया जा सकता है। वे किसी सड़कछाप ज्योतिषि के तोते की तरह बर्ताव कर रहे हैं।”

लागत मूल्यों और अपनी फसल पर मिलने वाले रिटर्न के बारे में बात करते हुए उनका कहना था “यदि मुझे प्रति एकड़ लागत का हिसाब लगाना हो तो हम चावल की पैदावार के लिए एक एकड़ पर 35,000 रूपये नकद खर्च करते हैं, जबकि मैंने अपनी उपज मात्र 60,000 रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से बेची थी। गेंहूँ पर भी इसी प्रकार के रिटर्न की उम्मीद की जा सकती है। यदि सरकार ने एमएसपी पर कानून पारित कर दिया तो मैं समझता हूँ कि हम कम पानी की खपत वाली फसलों को (जिसमें कम लागत लगेगी) उगा सकने में सक्षम हो सकते हैं।”

मुख्य मंच से दूर खड़े पंजाब राज्य बिजली बोर्ड कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अवतार सिंह कैंथ ने महँगाई से लेकर निजीकरण तक के बारे में अपनी चिंताओं को प्रकट किया। कैंथ ने न्यूज़क्लिक को बताया कि यदि निजी खिलाडियों को जमाखोरी की छूट दी गई तो दलित समुदाय के सदस्य इसके सबसे बड़े भुक्तभोगी साबित होने जा रहे हैं। 

उनका तर्क था “हम सुन रहे हैं कि अडाणी एग्रो द्वारा विशाल साइलो का निर्माण चल रहा है। अगर इन जैसे निगमों द्वारा चावल, दालों, सरसों या मूंगफली जैसी आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी की जाती है तो इससे मजदूरों को सबसे अधिक नुकसान होने जा रहा है। उनकी आय वैसे भी पहले से ही कम है। ऐसे में इन खून के इन प्यासे निगमों के बीच कोई भला कैसे जीवित रह सकेगा?”

वे बड़े पैमाने पर निजीकरण और समुदायों पर इसके चलते पड़ रहे प्रभावों को लेकर भी चिंतित दिखे। उनका कहना था “मैं इस बारे में खुद बिजली बोर्ड से एक उदाहरण का हवाला देता हूँ। एक समय बोर्ड ने 1,10,000 स्थायी कर्मचारियों को नियुक्त किया हुआ था। लेकिन लागत में कटौती के नाम पर कर्मचारियों की संख्या को घटाकर इस संख्या को 40,000 तक कर दिया गया है। कई कर्मचारियों को या तो दूसरे विभागों में स्थानांतरित कर दिया गया या कर्मचारियों ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति कबूल कर ली थी।”

उन्होंने आगे बताया “अब हमें पुनर्गठन के नाम पर एक ताजा लक्ष्य दिया गया है जिसमें कर्मचारियों की संख्या को अब सिर्फ 25,000 तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि कोई भी निजी कंपनी हमारे लिए सीटें आरक्षित करके रखने नहीं जा रहा है। नया बिजली बिल ऐसा प्रतीत होता है कि यह निजीकरण और आउटसोर्सिंग को नया बढ़ावा देने जा रहा है। हमने अब पहले से ही चंडीगढ़ बोर्ड के निजीकरण के उदाहरण को देख लिया है।”

राज्य में किसानों और दलित आन्दोलन के एक साथ आने पर टिप्पणी करते हुए कैंथ ने कहा “हम अपने स्वंय के मुद्दों को लेकर संघर्ष करते रहे हैं। हमारी आबादी का बेहद छोटा हिस्सा ही सरकारी क्षेत्र में काम कर रहा है। इसलिए सीधी भर्ती, पदोन्नति इत्यादि मामलों को लेकर हमारे खुद के अपने मुद्दे हैं। हाँ, यह सही है कि जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने दो साल पहले एससी एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कमजोर करने का काम किया था तो भारी उथल-पुथल देखा गया था, और तब आम आबादी ने हमारा समर्थन नहीं किया था। लेकिन यह आंदोलन भिन्न है। यह एक जनांदोलन में तब्दील हो चुका है और इसने विभिन्न समुदायों को करीब लाने का काम किया है। पंजाब में हिंदुत्व का प्रभाव बेहद कम होने के कारण यहाँ पर अत्याचार का स्तर अपमानजनक स्तर तक नहीं है। लेकिन भेदभाव बना हुआ है और हम सामूहिक तौर पर इसका मुकाबला करेंगे। इस आन्दोलन ने हमारे अंदर नई उम्मीद जगाई है।”

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

How Dalits Became Part of Farmers’ Movement in Punjab

MSP
apmc
Dalit Movement in Punjab
Dalit Farmers
Dalit Rights
farmers protest
Dalit Participation in Farmers Movement

Related Stories

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

कॉर्पोरेटी मुनाफ़े के यज्ञ कुंड में आहुति देते 'मनु' के हाथों स्वाहा होते आदिवासी

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में सैलून वाले आज भी नहीं काटते दलितों के बाल!

दलित किशोर की पिटाई व पैर चटवाने का वीडियो आया सामने, आठ आरोपी गिरफ्तार

ग्राउंड रिपोर्ट: ‘पापा टॉफी लेकर आएंगे......’ लखनऊ के सीवर लाइन में जान गँवाने वालों के परिवार की कहानी

राजस्थान : दलितों पर बढ़ते अत्याचार के ख़िलाफ़ DSMM का राज्यव्यापी विरोध-प्रदर्शन

भेदभाव का सवाल व्यक्ति की पढ़ाई-लिखाई, धन और पद से नहीं बल्कि जाति से जुड़ा है : कंवल भारती 

दलित और आदिवासी महिलाओं के सम्मान से जुड़े सवाल

मुद्दा: सवाल बसपा की प्रासंगिकता का नहीं, दलित राजनीति की दशा-दिशा का है


बाकी खबरें

  • up
    न्यूज़क्लिक टीम
    शिक्षक उम्मीदवारों ने योगी सरकार को दी 2022 के लिए चुनौती
    07 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक ने इस ग्राउंड रिपोर्ट में लखनऊ में जून 2021 से चल शिक्षक उमीदवारों के विरोध प्रदर्शन में शामिल उमीदवारों से बात की| दरअसल, 2019 उत्तर प्रदेश शिक्षक प्रवेश परीक्षा में 69,000 सहायक…
  • Abahlali
    पवन कुलकर्णी
    अबहलाली बेस के नवनिर्वाचित महासचिव मजोंडोलो का संकल्प: "हम प्रतिरोध करेंगे"
    07 Dec 2021
    अपने ज़बरदस्त दमन के दौरान भी अपने प्रभाव का विस्तार करते हुए आयोजित होती रहने वाली अबहलाली बेस मजोंडोलो की इस कांग्रेस ने दक्षिण अफ़्रीका के झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे लोगों के इस आंदोलन को लेकर…
  • Omicron
    संदीपन तालुकदार
    ओमिक्रॉन: प्राथमिक अध्ययन के मुताबिक दोबारा हो सकता है कोरोना संक्रमण
    07 Dec 2021
    एंटीबॉडी, ओमिक्रॉन पर कैसे हमला करती हैं, अभी इसे देखने के लिए परीक्षण चल रहे हैं और आने वाले हफ़्ते में इनके जारी होने की संभावना है।
  • democracy
    डॉ. राजू पाण्डेय
    संविधान दिवस की गूंज और लोकतंत्र को कमज़ोर करने के सुनियोजित प्रयास
    07 Dec 2021
    फ्रीडम हाउस के अनुसार जब से नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तब से राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतन्त्रता में गिरावट आई है और यह गिरावट 2019 में मोदी जी के दुबारा चुने जाने के बाद और तेज…
  • Sudha Bharadwaj
    भाषा
    एल्गार परिषद मामला: सुप्रीम कोर्ट ने सुधा भारद्वाज की ज़मानत के ख़िलाफ़ एनआईए की याचिका ख़ारिज की
    07 Dec 2021
    न्यायमूर्ति यू यू ललित, न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने एनआईए की दलीलों पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘हमें उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License