NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सुप्रीम कोर्ट का रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने का फ़ैसला कितना मानवीय?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हम यह निश्चित तौर पर कहते हैं कि पृथ्वी पर कहीं भी नरसंहार नहीं होना चाहिए। लेकिन दूसरे देशों में जो हो रहा है, हम इसकी निंदा नहीं कर सकते हैं।”
अजय कुमार
10 Apr 2021
सुप्रीम कोर्ट का रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने का फ़ैसला कितना मानवीय?
Image courtesy : New Indian Express

"म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार को लेकर पिछले साल 23 जनवरी को अंतरराष्ट्रीय अदालत ने अपना फैसला दिया। इसमें कहा था कि म्यांमार में सेना ने निर्दोष लोगों की हत्याएं की हैं। इससे करीब 7.44 लाख रोहिंग्या बेघर होकर पड़ोसी देशों में भागने को मजबूर हुए। रोहिंग्या मुसलमानों की जान को म्यांमार में खतरा है, इसलिए इन्हें डिपोर्ट नहीं किया जाना चाहिए। ये मानव अधिकारों का उल्लंघन है।" यह वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के वकालत के शब्द हैं।

सुप्रीम कोर्ट में जम्मू के डिटेंशन सेंटर में रखे गए 170 रोहिंग्या मुसलमानों को फिर से म्यांमार भेजने से रोकने के खिलाफ दायर की गई याचिका पर सुनवाई चल रही थी। उसी दौरान डिटेंशन सेंटर में शरण लिए रोहिंग्या मुसलमानों की सुरक्षा का पक्ष लेते हुए प्रशांत भूषण ने यह बात कही।

सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को नहीं माना। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यों की बेंच ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि इस मामले में राहत देना मुमकिन नहीं है। निर्धारित प्रक्रियाओं के पूरे होने के बाद कैंप में रह रहे शरणार्थियों को फिर से अपने मूल देश यानी म्यांमार भेज दिया जाएगा। भारत दुनिया के सभी अवैध प्रवासियों के लिए राजधानी नहीं हो सकता है। संभवत यह डर है कि जब वह अपने मुल्क वापस लौटेंगे तो उन्हें मार दिया जाए। लेकिन हम उन सभी को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। हम यह निश्चित तौर पर कहते हैं कि पृथ्वी पर कहीं भी नरसंहार नहीं होना चाहिए। लेकिन दूसरे देशों में जो हो रहा है, हम उसकी निंदा नहीं कर सकते हैं। भारत शरणार्थियों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रिफ्यूजी कन्वेंशन का हिस्सा नहीं है। हम अंतरराष्ट्रीय कानूनों से वहीं तक प्रेरणा लेते हैं जहां तक वे कानून हमारे कानूनों के खिलाफ नहीं जाते। हम यह भी मानते हैं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की स्वतंत्रता का अधिकार केवल भारत के नागरिकों को ही नहीं बल्कि भारत की सीमा क्षेत्र में रहने वाले हर एक व्यक्ति को मिला है। लेकिन किसी को अपने देश वापस डिपोर्ट यानी भेजा जाए या नहीं का मसला भारत में रहने और निवास करने से जुड़ता है। भारत सरकार की तरफ से यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि अवैध प्रवासी भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं। इसलिए भले अनुच्छेद 19 के तहत भारत में कहीं भी रहने और बसने का अधिकार मिलता हो लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 19 पर प्रतिबंध भी लगते हैं। इस लिहाज से इन्हें फिर से अपनी मूल देश म्यानमार वापस जाना ही होगा।

कानूनी मामलों के जानकारों का कहना है कि यह फैसला अमानवीय तो है ही लेकिन इसके साथ कानून की तार्किकता के मूलभूत सिद्धांत के खिलाफ भी जाता है।

इस पूरे मसले को कोई इस तरह भी कह सकता है कि अपनी जान बचाने के लिए वह किसी गांव में शरण की गुहार लगाए और गांव की पंचायत मिलकर बड़ी निष्ठुरता से यह फैसला करे कि हम जानते हैं कि आपकी जान को खतरा है, लेकिन हम गांव में आपको शरण नहीं दे सकते हैं। आपको वहीं जाना होगा जहां आपकी जान का खतरा है। उपयुक्त अधिकारियों की कागजी कार्रवाई पूरी होने के बाद आपको उस जगह पर मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा। इससे हमारा कोई लेना देना नहीं। आप कह सकते हैं कि यह एक ही देश के दो गांवों का मामला नहीं, बल्कि दो देशों का मामला है। यही वह पेच है जिसे अलग-अलग स्तर पर मानवतावादी और सुप्रीम कोर्ट देख समझ रहे हैं। 

रोहिंग्या मुसलमान दुनिया में सबसे अधिक सताया जा रहा मुस्लिम समूह है। यह राज्यविहीन है। इसके पास किसी राज्य की नागरिकता नहीं है। न ही मूलभूत सुविधाएं हैं और न ही इतनी क्षमता है कि वह अपने बुनियादी अधिकारों को फिर से हासिल कर सके। साल 2017 में म्यांमार के सैनिकों ने इन पर क्रूर तरीके से हमला किया। खुद को बचाने के लिए यह लोग पैदल और समुद्र के रास्ते अपना देश छोड़कर दूसरे देश में भाग गए। संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर ने इस भयावह जुल्म को नृजातीय संहार का नाम दिया। साल 2017 में भारत सरकार की तरफ से भारत में घुसने वाले रोहिंग्या मुसलमानों का रजिस्ट्रेशन शुरू हो गया। मौजूदा गृह राज्य मंत्री ने कहा कि वह अवैध अप्रवासी हैं और उन्हें यहां रहने का कोई अधिकार नहीं है।

कानूनी मामलों के जानकार सुरहित पार्थसारथी अपने ब्लॉग में लिखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर कि भारत रिफ्यूजी कन्वेंशन का सदस्य नहीं है, रोहिंग्या मुसलमानों को लौटने का आदेश दे दिया। रिफ्यूजी कन्वेंशन के मुताबिक यह प्रावधान है कि किसी ऐसे देश से आए शरणार्थियों को फिर से उस देश में नहीं भेजा जाएगा जहां पर शरणार्थियों को किसी भी आधार पर जान का खतरा हो। 

लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि भारत इस अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन का सदस्य नहीं है इसलिए वह ऐसा कर सकता है। सुरहित पर्थसारथी का कहना है कि यह बात बिल्कुल सही है कि भारत रिफ्यूजी कन्वेंशन का सदस्य नहीं है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कई प्रथाएं, नियम और कानून हैं जिन पर भारत की सहमति है और जिनके मुताबिक रोहिंग्या मुसलमानों को फिर से म्यांमार भेजना सही नहीं है।

सबसे बड़ी बात यह कि भारत के घरेलू कानून में ऐसा कोई कानून नहीं है जो रिफ्यूजी कन्वेंशन के खिलाफ जाता है, बल्कि असलियत तो यह है कि रिफ्यूजी कन्वेंशन का विचार भी भारत के कानूनों का सिद्धांत है। इस लिहाज से यह उचित नहीं लगता कि शरण मांगने वाले लोगों को फिर से वही भेज दिया जाए जहां उन्हें जान का खतरा है।

कानूनी मामलों की जानकार गौतम भाटिया अपने ब्लॉग पर लिखते हैं  कि सुप्रीम कोर्ट की यह बात समझ से परे है कि वह दूसरे देशों में हो रहे नरसंहार पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकती। जबकि हकीकत यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले दूसरे देशों के कई मामलों पर अपनी राय दी है। इस याचिका के मूलभूत मुद्दे से खुद को अलग रखना संविधान द्वारा न्यायालय को मिले कर्तव्य की भूमिका निभाने से खुद को अलग करने जैसा है। याचिकाकर्ता म्यांमार भेजने से रोकने की याचिका नहीं कर रहा बल्कि उस देश में भेजने से रोकने की याचना कर रहा है जहां पर उसे अपनी जान का खतरा है। इस तरह से रोहिंग्या मुसलमानों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की स्वतंत्रता का अधिकार के तहत सुरक्षा मिलनी चाहिए।

कोर्ट का कहना है कि सरकार का गंभीर आरोप है कि इन शरणार्थियों से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है। लेकिन  कोर्ट का काम आरोपों को वैसे ही स्वीकार कर लेना नहीं होता बल्कि उन्हें परखना होता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के आधार क्या हैं? इसका साक्ष्य क्या है? किन प्रमाणों के आधार पर इनसे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है? इन सारे सवालों का कोई जवाब कोर्ट से नहीं मिलता। इसलिए यह फैसला कानून की तार्किकता के आधार पर भी उचित नहीं लगता है।

इसे भी पढ़िए: रोहिंग्या शरणार्थी : डर के साये में जीने को मजबूर! 

Supreme Court
Rohingya Muslims
Rohingya Refugees
Rohingya crisis
Rohingya
Delhi
Myanmar
UNHCR
AAPP
jammu kashmir
CAA
NRC

Related Stories

ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

आर्य समाज द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र क़ानूनी मान्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

समलैंगिक साथ रहने के लिए 'आज़ाद’, केरल हाई कोर्ट का फैसला एक मिसाल

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

जब "आतंक" पर क्लीनचिट, तो उमर खालिद जेल में क्यों ?

धनशोधन क़ानून के तहत ईडी ने दिल्ली के मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ़्तार किया

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश : सेक्स वर्कर्स भी सम्मान की हकदार, सेक्स वर्क भी एक पेशा


बाकी खबरें

  • Farmers Protest in UP
    सुबोध वर्मा
    उत्तर प्रदेश में एक ऐसी लड़ाई, जिसे पूरा भारत आगामी वर्षों में लड़ेगा
    14 Feb 2022
    प्रदेश यह तय करने के लिए बड़े पैमाने पर मंथन से गुजर रहा है कि क्या धार्मिकता के गढ़े गए आक्रामक तर्कों और तरीकों से आदमी की भूख शांत की जा सकती है।
  • up elections
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव दूसरा चरण: अल्पसंख्यकों का दमन, किसानी व कारोबार की तबाही और बेरोज़गारी हैं प्रमुख मुद्दे
    14 Feb 2022
    दूसरे चरण की सीटों पर विपक्ष ने पिछली बार भी अन्य चरणों की तुलना में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था। सपा को अपनी कुल 47 में 15 अर्थात लगभग एक तिहाई सीटें इसी इलाके में मिली थीं।
  • up elections
    प्रज्ञा सिंह
    यूपी चुनाव : कुराली गाँव के हँसते ज़ख़्म
    14 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश चुनाव के दूसरे चरण का मतदान जारी है। इस बीच पढ़िये सहारनपुर ज़िले के कुराली गांव में टूटी सड़कों ग़रीबों को रही परेशानियों की यह रिपोर्ट।
  • uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव: भाजपा एक बार फिर मोदी लहर पर सवार, कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर से उम्मीद
    14 Feb 2022
    उत्तराखंड में चुनावी शोर अब ख़त्म हो गया है। हर दल ने अपने-अपने वादें और घोषणाओं को जनता के सामने रख दिया है। अब उन सभी वादों और घोषणाओं पर जनता के फैसले का समय है। न्यूज़क्लिक ने इस पूरे चुनाव के…
  • channi
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब चुनाव: यह हमारे लिए आसान चुनाव है: चरणजीत सिंह चन्नी
    13 Feb 2022
    इस ख़ास एपीसोड में वरिष्ठ पत्रकार नीलू व्यास ने पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी से बातचीत की। मुख्यमंत्री चन्नी का मानना है कि कांग्रेस दो तिहाई बहुमत के साथ वापस आ रही है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License