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महामारी से कितनी प्रभावित हुई दलित-आदिवासी शिक्षा?
हाल ही में नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स ने दलित आदिवासियों की शिक्षा पर एक अध्ययन किया। इस अध्ययन में अपेक्षा से अधिक दुखद तथ्य सामने आए हैं।
राज वाल्मीकि
06 Nov 2021
Dalit-Adivasi education

पिछले दो सालों में कोरोना महामारी ने अन्य व्यवस्थाओं के साथ शिक्षा व्यवस्था को भी अस्त-व्यस्त कर दिया। सुखद है कि अब धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था पटरी पर लौटने लगी है। महामारी ने यूं तो सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को भी प्रभावित किया पर दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं का तो भविष्य ही दांव पर लग गया। इसमें हमारी जातिवादी और पितृसत्तावादी मानसिकता और उभर कर सामने आई। हाल ही में दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन– नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (NCDHR) ने दलित आदिवासियों की शिक्षा पर एक अध्ययन किया। इस अध्ययन में अपेक्षा से अधिक दुखद तथ्य सामने आए हैं।

“CONFRONTING THE PANDEMIC : RESPONSE AND RECOVERY FOR DALIT AND ADIVASI STUDENTS” नाम से जारी इस अध्ययन के अनुसार महामारी के दौरान दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के सामने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुईं खासतौर से उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे स्टूडेंट्स के साथ ये दुविधा वाली स्थिति उत्पन्न हो गई वे अपनी पढ़ाई को जारी रखें या छोड़ दें। इसके पीछे कई कारण रहे। महामारी के दौरान स्टूडेंट्स के माता-पिता जो भी आजीविका कमा रहे थे वह छूट गई। उनका काम खत्म हो गया। अब उनके लिए अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना तो दूर उनके भोजन की व्यवस्था करना भी मुश्किल हो गया। ऐसे में कुछ छात्र-छात्राओं को तो अपनी पढ़ाई छोड़कर घर चलाने में मदद के लिए काम करना पड़ा।

जब स्कूल-कॉलेज बंद हो गए और ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई तो दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं के लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई। उनके पास स्मार्ट फोन, इंटरनेट, लैपटॉप उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में अपनी पढ़ाई-लिखाई जारी रखना उनके लिए मुश्किल हो गया। ऐसे में पितृसत्तावादी मानसिकता वाले अभिभावकों ने लड़कों को किसी तरह सुविधा उपलब्ध कराई भी तो लड़कियों की उपेक्षा कर दी।

गांव और शहर के दलित आदिवासी छात्र-छात्राओं की अपनी समस्याएं थीं। इंटरनेट की उपलब्धता एक अलग समस्या बन गई -  खासतौर  से ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र-छात्रों के लिए।

ऐसे में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों को मिलने वाली पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप (PMS) समय पर उपलब्ध न होने से अनेक छात्रों को अपनी पढ़ाई जारी रखने में कठिनाई आई।

विभिन्न अध्ययनों और सरकारी आंकड़ों से यह भी पता चला कि दलित-आदिवासी छात्रों की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से वे उच्च शिक्षा में प्रवेश नहीं ले सके या बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। क्योंकि शिक्षा संस्थान की फीस देने के लिए उनके पास पैसा नहीं था। महामारी और लॉकडाउन की वजह से इन छात्र-छात्राओं के सामने शिक्षा प्राप्त करने में बड़ी चुनौती पेश कर दी थी।

एक तो असमानता और भेदभाव के कारण पहले ही दलित-आदिवासी छात्र समुचित रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं कर पा रहे थे। महामारी ने उनकी असमानता और भेदभाव की खाई को और गहरा कर दिया था, जिससे उनके लिए शिक्षा प्राप्त करने में और बाधाएं खड़ी हो गईं थीं। उनके परिवार की आय खत्म होने से उनकी गरीबी और बढ़ गई थी। इससे घर में भुखमरी की नौबत आ गई थी।

परिणामस्वरूप उनके घरों में तनाव और हिंसा भी बढ़ गई थी। ऐसे में ज्यादातर यही संभवना बन रही थी कि वे अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपना घर चलाने के लिए परिवार वालों का हाथ बंटाएं। कुछ काम करें कुछ कमा कर लाएं।

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने दलित-आदिवासियों के अंदर जो शिक्षित होने की लौ जगाई थी उसके लिए प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप और पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप इन गरीब छात्र-छात्राओं के लिए एक बड़ी उम्मीद रही है। लेकिन पिछले पांच सालों से सरकार द्वारा इसका बजट निरंतर कम किया जा रहा है।  वर्ष 2017 से केंद्र सरकार ने अपनी भागीदारी सिर्फ 11 प्रतिशत तक सीमित कर दी है। इस वजह से कई राज्य इस स्कॉलरशिप को बंद करना चाहते हैं।  ऐसे में दलित-आदिवासी छात्रों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो रहा है। क्योंकि इनमे से अधिकांश के माता-पिता साफ-सफाई के काम से जुड़े हुए हैं और उनकी आमदनी बहुत कम है। इसलिए ऐसे छात्र स्कॉलरशिप के भरोसे ही अपनी आगे की पढाई करने में सक्षम हो पाते हैं। 

महामारी के दौरान ऑनलाइन क्लास करना इन दलित-आदिवासी छात्रों के लिए और भी मुश्किल हो गया है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के अनुसार भारत में दलितों की 74% आबादी गाँव में रहती है। 24% भारतीय घरों में ही इन्टरनेट की सुविधा है। 42 % शहरी क्षेत्रों में इन्टरनेट उपलब्ध है। गाँव में इन्टरनेट की सुविधा 15% घरों में है। इससे ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने में दलितों-आदिवासियों की बड़ी संख्या को खासी परेशानी होती है।  ऐसे में सरकार द्वारा इनकी स्कॉलरशिप की धनराशि इनके खाते में ट्रान्सफर न करने से इन पर आर्थिक संकट और गहरा गया है।

गौरतलब है कि जनगणना 2021 के अनुसार दलित और आदिवासियों की आबादी भारत की कुल आबादी का 25% है। पर सामाजिक असमानता के कारण यह समाज आर्थिक विकास में पिछड़ा हुआ है। एक अध्ययन  के अनुसार 36.8% दलित और 47.3% आदिवासी छात्र गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। हमारे देश की सामाजिक व्यवस्था उच्च-निम्न क्रम पर आधारित है। ऐसे में इस महामारी ने सामाजिक और आर्थिक असमानता को और बढ़ाया है। दलित और आदिवासी का बड़ा वर्ग नौकरी-पेशा विहीन हुआ है, प्रवासी हुआ है, भोजन और आश्रय की तलाश में दूर तक गया यह वर्ग महामारी में अपने जन्मस्थान लौटने के लिए विवश हुआ, हजारों किलोमीटर की यात्रा पैदल चलने को विवश हुआ।  भोजन और पानी के अभाव में कईयों की तो मौत रास्ते में ही हो गई।

गरीबी से पीड़ित इन दलित-आदिवासियों के लिए शिक्षा ही एक ऐसा रास्ता प्रदान करती है जिससे कि वे अपनी गरीबी से उबर सकें और मानवीय गरिमा के साथ जीवन जी सकें। पर दबंग जाति के लोग इनसे भेदभाव कर इन्हें शिक्षा से दूर रखने का प्रयास करते हैं ताकि ये यथास्थिति में बने रहें और जीवन में तरक्की न कर सकें। यहां तक कि शिक्षा संस्थानों में इनके साथ भेदभाव किया जाता है। इन्हें पीछे की बेंच पर बिठाया जाता है। इसी कारण  सरकार द्वारा इनके सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए जो योजनाएं बनाई जाती हैं वे जमीनी स्तर पर सफल नहीं हो पातीं।

महामारी और लॉकडाउन के कारण दलित-आदिवासियों के साथ भेदभाव और सामाजिक बहिष्करण और भी बढ़ा है। इस सन्दर्भ में दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन ने 6 राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तर प्रदेश का अध्ययन किया। उसमे निकलकर आया है कि दलित-आदिवासियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना आसान नहीं है। इन छात्रों के सामने कई प्रकार की चुनौतियां हैं। इस बारे में एशिया दलित राईट फोरम के चेयरपर्सन पॉल दिवाकर कहते हैं कि सामाजिक न्याय के लिए लड़ना और भेदभाव-रहित समाज का निर्माण करना कठिन तो है पर असंभव नहीं है। दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन की टीम हमें प्रोत्साहित करती है और उम्मीद जगाती है कि बाबा साहेब ने जिस समाज का सपना देखा था वह पूरा होगा।

दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन  के अध्ययन के अनुसार इस महामारी में 22% दलितों और 29% आदिवासियों का रोजगार खो गया। इनमे दलित आदिवासी महिलाओं का प्रतिशत 21% है। इधर जो छात्र-छात्राएं हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे उनमें महामारी के दौरान भी छात्र-छात्राओं को हॉस्टल के किराये में कोई छूट नहीं दी गई। ऐसे अनुसूचित जाति के छात्रों की संख्या 61% और अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या 68 % थी। इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं की पढाई और भविष्य किस कदर खतरे में पढ़ गया है।

ऐसी स्थिति में दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन द्वारा दलित-आदिवासी छात्र-छात्राओं को शिक्षा समुचित रूप से प्राप्त हो इसके लिए कुछ सिफारिशें की गईं हैं जिनका अनुमोदन किया जाना चाहिए। कुछ प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं :

1. महामारी की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप अजा/अजजा के उन छात्रों के लिए जारी की जाए जो फीस न भरने की वजह से पढ़ाई छोड़ चुके हैं। उनका फिर से एडमिशन लिया जाए और उनकी पूरी फीस माफ़ की जाए।

2. जो पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप की धनराशि लंबित है उसे तुरंत जारी किया जाए।

3. पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप के बारे में जागरूकता अभियान चलाया जाए।

4. हर कॉलेज में उन छात्रों के लिए हेल्प डेस्क स्थापित किए जाएं जो पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप को लेकर किसी प्रकार की परेशानी का सामना कर रहे हैं।

5. केंद्र और राज्य सरकारों की सभी स्कीमों में 50% अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित की जाए।

6. पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप की पूरी धनराशि अजा/अजजा के छात्रों के बैंक अकाउंट में पहले ही जमा करा दी जाए जिससे इन्हें शिक्षा के दौरान किसी प्रकार की आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े।

आशा है इन सिफारिशों को सरकार के संबंधित विभाग गंभीरता से लेगी ताकि दलित और आदिवासी छात्र-छात्राएं समुचित रूप से शिक्षा प्राप्त कर सकें और महामारी के दौरान जो शिक्षा की कमी रह गई थी उसकी भरपाई की जा सके।

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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