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कोरोना वायरस के इस दौर में अफवाहों से कैसे लड़ेगा हिंदुस्तान?
आपदा और सामाजिक तनाव अफवाहों के लिए उर्वर जमीन का काम करती हैं। अफवाहें आग की तरह फैलती हैं। ज्यादातर समय मासूम लोग इसका शिकार बनते हैं। इसके चलते भीड़ के हत्थे चढ़कर किसी निर्दोष की मौत होती है तो किसी का सामाजिक बहिष्कार किया जाता है।
अजय कुमार
20 Apr 2020
 अफवाहों से कैसे लड़ेगा हिंदुस्तान
Image courtesy: Youtube

जब भी संकट आता है तो बहुत सारे अफवाहों का खेल भी शुरू हो जाता है। जैसे दंगों के समय बहुत सारी अफवाहें सुनाई देती हैं। ठीक कोरोना में भी अफवाहों का दौर जारी है। कोरोना वायरस फैलने का जिम्मेदार अमेरिका चीन को बता रहा है, चीन अमेरिका को बता रहा है।

पाकिस्तान में सुन्नी शिया को बता रहे हैं, हिंदुस्तान में हिन्दू, मुस्लिमों को बता रहे हैं। साधुओं को भीड़ बर्बरता से मार दे रही है और ट्वविटर पर ट्रेंड कराया जा रहा है कि एक विशेष धर्मिक समुदाय के लोगों ने साधुओं को मारा। अफवाहें फ़ैल रही हैं कि मुस्लिम 2000 रुपये के नोट पर कोरोना का वायरस फैलाकर सड़कों पर फेंक दे रहे हैं। ठेले पर सब्ज़ी बेचने वाले मुस्लिम थूक लगाकर सब्ज़ी बेच रहे हैं। जहां कोरोना से जंग जारी है वहां अफवाहों को लेकर नफरत का बयार भी फ़ैल रहा है।  

इतिहासकारों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि पहली बार अफवाह फैलाई जा रही है। जब भी संकट का समय आता है तो अफवाहें भी जोरों से फैलने लगती है। जब भी यूरोप में महामारी फैलती थी तब यूरोप के यहूदियों पर आरोप लगाया जाता था कि उन्होंने कुएं में जहर घोल दिया है। फ़्रांस की क्रांति के समय तो अमीर और गरीब के बीच गजब की खाई बन चुकी थी। अमीरों पर आरोप लगता था कि वह जहर में लिपटी हुई रोटी बेच रहे हैं, जो जान ले लेती है।  साल 1984 के सिख दंगों में यह अफवाह फैली कि शहर के सारे वाटर सप्प्लाई में जहर घोल दिया गया है, जो सिख गुरुद्वारे में रह रहे हैं, वह हथियार इकठ्ठा कर रहे हैं।

अगर इतिहास को समेटकर देखें तो कोरोना के इस दौर में अफवाहबाज़ियों की चर्चा कोई नई चर्चा नहीं होंगी। हम यह कहते हुए पाए जायेंगे कि सामाजिक तनाव, आपदाएं अफवाहों के लिए उर्वर जमीन का काम करती हैं। अफवाहें आग की तरह फैलती है। लोग इसका शिकार बनते हैं। कोई बलि का बकरा बनता है तो किसी की गर्दन काट जाती है। सामाजिक बहिष्कार का चलन चल पड़ता है। लूटपाट होती है, हिंसा होती है, मामला लिंचिंग तक पहुँच जाता है।

अब सवाल उठता है कि यह अफवाह पैदा कैसे होती हैं? तेजी से क्यों फैलती हैं? ये संकट के समय कैसे पैदा होती है? इन्हें कैसे रोका जा सकता है?

शुरुआत में अफवाह ऐसी सूचना, राय, रिपोर्ट या कहानी के तौर पर हमारे सामने आती है, जिसके बारें में पुख्ता तौर पर कुछ भी कहना मुमकिन नहीं होता। इसलिए इसकी सच्चाई संदेह के दायरे में घिरी होती है। इसका कोई प्रमाण नहीं होता है। यह अस्पष्ट होती है। ऐसी ही बातें अफवाहों की केंद्रीय प्रवृत्ति होती है। या तो सच या झूठ के रूप में लोकमत का हिस्सा बन जाती है। सच और झूठ से भी ज्यादा बड़ी बातें अफवाहों के लिए यह होती है कि लोक मत का हिस्सा बनने में कामयाब हो जाती है। जैसे ही यह लोकमत का हिस्सा बन जाती है, अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं।  

हर एक किस्म की अप्रमाणित सूचना अफवाह नहीं होती है। अफवाहों की भी कुछ प्रकृति होती है। यह सच भले न हो लेकिन सच जैसी लगती है। इनमें कुछ ऐसा संदर्भ होता है जो सुनने वाले और पढ़ने वाले दोनों को कुछ सोचने के लिए मजबूर करता है। कोई भी चाहे जितना तार्किक और ईमानदार हो इसे सीधे तौर पर खारिज नहीं कर पाता। भले किसी को कुछ भी न बताया जाए लेकिन दिमाग का एक हिस्सा जरूर सोचता है कि बात सही भी हो सकती और गलत भी। इसलिए बहुत ही अजीब किस्म की बातें अफवाहें नहीं होती। जैसे यह अफवाह नहीं हो सकती कि सड़क पर दो हजार के नोट बिखरे हुए हैं लेकिन यह अफवाहों की तरह जरूर काम कर सकती है कि कोरोना के दौर में मुस्लिम लोग थूक लगाकर सड़क पर दो हजार के नोट रख रहे हैं। आप पूछेंगे ऐसा क्यों?

इस सूचना को सुनते ही बिजली की तरह हमारे मन में यह बात पैदा होती है कि 'क्या ऐसा हो सकता है'? इस सूचना में मुस्लिमों के प्रति पूर्वाग्रह का एक सामूहिक मनोविज्ञान काम कर रहा है। यानी एक ऐसा पूर्वाग्रह है जिस पर थोड़े या अधिक मात्रा में सब भरोसा करते हैं।  इस तरह की सामूहिकता का साथ मिलती ही अफवाहें बहुत तेजी से फैलती है। धीरे-धीरे बहुत सारे लोग इसे गलत मानकर इससे छुटकारा पा लेते हैं। लेकिन हर समाज में भीड़ भी रहती है, जिसके पास सही और गलत में अंतर करने के औजार नहीं होते हैं। वह उसे सच मानकर स्वीकार कर लेती है। जिसका बहुत ही खतरनाक परिणाम निकलता है।

ऐसा भी हो सकता है कि एक अफवाह कई तरह के और अफवाहों को पैदा कर दे और कई तरह के अफवाहों का साथ पाकर सच भी अफवाह में बदल दिया जाए। जैसे महाराष्ट्र के पालघर की घटना। दो साधुओं को आदिवासी बहुल इलाके में बर्बर तरीके से मारा गया।  लेकिन ट्विटर पर ट्रेंड करवाया जा रहा है कि एक धर्म विशेष के लोगों ने साधुओं को मारा। यानी सच का सहारा लेकर सच को ही अफवाह में बदल दिया गया।

अफवाहें वैसे समाज पर सबसे बुरा असर डालती है जो अफवाहों को स्वीकारने के लिए तैयार बैठे होते हैं। जैसे वैसा समाज जहां सूचनाएं सही तरह से नहीं फैलती, सूचनाएं बहुत कम होती हैं या सूचनाओं की बमबार्डिंग होती रहती है। ऐसे में उन्हें संतुष्टि नहीं मिल पाती है जो सही तरह से सूचनाओं को समझ नहीं पाते हैं। मनोवैज्ञानिक की रिसर्च कहती है कि असंतोष इंसान के दिमाग का जानकारी का हिस्सा बेचैन और अस्थिर रहता है। वह सूचनाओं को तोड़ता है। उसके पास केवल अर्धसत्य रह जाता है। इस अर्धसत्य को अपने मिथकीय दुनिया से बनी भावनाओं में लपेटता है और सही मान बैठता है। जैसे कि नोटबंदी के समय गऱीबों को सही तौर पर कोई भी जानकारी पता नहीं थी। लेकिन इस भावना में की अमीरों के घर पर रखा काला पैसा बर्बाद हो गया, उन्हें थोड़ी सी तकलीफ हो रही है लेकिन वह देश सेवा के भागीदार बन रहे हैं, खुद को संतोष दिला देते थे।  

रांची यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के प्रोफेसर जमुना प्रसाद के अध्ययन का लेखा-जोखा द हिन्दू अखबार में छपा है। 1934 के बिहार- नेपाल भूकंप के समय के लोगों के व्यवहार को जमुना प्रसाद ने अध्ययन किया। जमुना प्रसाद के अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि घनघोर असंतोष और गुस्से के समय लोग दूसरों में अपन दुश्मन खोजते हैं। इसलिए वैसे समाजों में बहुत अधिक परेशानियां सामने आती हैं जो पहले से 'हम और वे में बंटी' हुई है। जो पहले से ध्रुवीकृत हैं। वे एकता दिखाने की बजाए हमेशा बंटवारा करने वाले काम में लगी रहती है। जिससे ऐसा बंटवारा होता है, जो पहले से ज्यादा कारगार साबित होता है। जिसका फायदा उठाने वाले लोग पहले से ज्यादा फायदा उठा लेते हैं। ऐसे अफवाहें कहानियों की तरह काम करती हैं। कहानियां बहुत जल्दी फैलती हैं।  

जमुना प्रसाद के बात को तब्लीगी जमात से जोड़ कर देखा जाए तो अफवाहों की हकीकत सामने दिखती है। यह बात सच है कि तब्लीगी जमात के प्रोग्राम में लोग कोरोना के संक्रमित पाए गए। लेकिन इसके बाद मुस्लिमों को ही कोरोना का जिम्मेदार ठहरा देना उसी समाज में अफवाहों की कहानी बन सकती है जो पहले से ही घनघोर तरीके से बंटी हुई है। इसके बाद कई तरह के अफवाह पैदा हुए और सबने मिलकर पहले से मौजूद दरार को और अधिक गहरा किया।

राजनीतिक चिंतक राजीव भार्गव कहते हैं कि अफवाहों के लिए पहले से बंटा हुआ समाज तो दमदार तरीके से काम करता है। लेकिन इसके अलावा कुछ और भी बातें है जो अफवाहों के फैलने के लिए जिम्मेदार होती है। हम वैसे समाज में रहते हैं जहाँ समाज का डर हमारे साथ  हमेशा चलता रहता है। हमें लगता है कि हम अपने समाज से जैसे ही अलग-थलग दिखेंगे हमें बेदखल कर दिया जाएगा। ठीक ऐसा ही समूहों के साथ भी होता है। हम सब अपने समूह में हाँ में हां और ना में ना कहने के आदी होते हैं। इस वजह से अगर हमरे नॉलेज का सोर्स केवल समाज है तो हम सवाल खड़ा करने वाले व्यक्ति के तौर पर अपना विकास नहीं कर पाते।

वो कहते हैं कि भारतीय समाज में रहने वाला आम व्यक्ति कमोबेस ऐसा ही होता है। एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी कई तरह के पूर्वाग्रहों के साथ चलता है और कई तरह की अफवाहों को आसानी से स्वीकार कर लेता है। अफवाहों पर जितनी अधिक चर्चा की जाती है अफवाहों को उतनी अधिक स्वीकृति मिलती है। अफवाहों को जब ऐसे लोगों द्वारा खारिज किया जाता है जिनपर अफवाहों पर भरोसा करने वाले लोग तनिक भी विश्वास नहीं करते तो अफवाहें और अधिक मजबूती से गहरी होती जाती है। भले ही अफवाहों को खारिज करने वाले लोग विद्वान क्यों न हो, अगर अफवाहों पर भरोसा रखने वालों की नजरों में वे भरोसेमंद इंसान नहीं है तो इसका कोई फायदा नहीं।  

राजीव भार्गव आगे कहते हैं कि कोई भी समाज एक परफेक्ट समाज नहीं होता है इसलिए अफवाहों को खत्म कर देना नामुमकिन है। संकट की स्थिति में तो अफवाहें सुनामी की तरह फैलती है। लेकिन अफवाहों को रोका जा सकता है। दो तरीके हैं पहला— लम्बे समय का सोचकर काम किया जाए और दूसरा है तत्कालीक तौर पर अफवाहों को रोकने के लिए जो भी जरूरी कदम है, उसे उठाया जाए। कोशिश किया जाए कि कम से कम बंटवारे वाला समाज बने। पूर्वाग्रहों को तोड़ने वाली जीवनशैली बने। समाज सवाल पूछना सीखे। लोगों के असंतोष को शांत किया जाए। इनकी बेचैनियों को सही सलाह मिले। कुल मिलाकर कहा जाए तो एक स्वस्थ समाज बनाने की हर वक्त कोशिश हो। चूँकि अफवाहें सूचनाएं, रिपोर्ट, राय और कहानियों के सहारे ही आगे बढ़ती हैं इसलिए इन सबको फैलाने की सबसे कारगर संस्था अगर सही से काम नहीं करती हैं तो इन्हें रोक पाना असंभव है।  

तत्काल का उपाय दूसरा है।  इससे केवल अफवाहों को कुछ समय के लिए रोक जा सकता है, वह माहौल नहीं खत्म किया जा सकता है, जिसमें अफवाहें आग की तरह फैलती है।  सरकार डंडा दिखाए, सजा दे, कड़े से कड़ा कानून बनाएं तो बात कुछ समय के लिए बन सकती है लेकिन अगर नेता से लेकर राजनीति तक और समाज के लेकर व्यक्ति तक सब एक गलत माहौल में पल रहे हों तो अफवाहों को रोकना नामुमकिन है।  

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