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भूख लोगों को खा जाएगी, जागो सरकार!
भूख की महामारी का दायरा कितना व्यापक है इसे समझने के लिए हम आपको कोरोना से ग्रस्त भारत नहीं, बल्कि कोरोना से पहले के भारत की तस्वीर दिखाते हैं। यानी तथाकथित 'नॉर्मल' भारत।
राज कुमार
29 May 2020
hunger
'प्रतीकात्मक तस्वीर' फोटो साभार: Quora

आपने इन दिनों, लोगों के ये खूब कहते सुना होगा कि कोरोना तो बाद में मारेगा, पहले भूख से मर जाएंगे। सिर्फ कोरोना से नहीं बल्कि भूख से भी मौतें हो रही हैं। सरकार जहां एक तरफ कोरोना से लड़ाई में पिछड़ती जा रही है वहीं दूसरी तरफ भूख को एक गंभीर समस्या की तरह रेखांकित भी नहीं कर रही है। भारत में कोरोना के केस डेढ लाख से ज्यादा हो चुके हैं और अब तक साढ़े चार हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं। विश्व स्तर पर भारत अब 10वें नंबर पर पहुंच गया है।

भूख एक भयानक महामारी की तरह जनता को निगलने के लिये खड़ी है। लेकिन, भारतीय जनता पार्टी सरकार का एक साल पूरा होने पर जश्न की तैयारी कर रही है। भूख एक वास्तविक समस्या है और महामारी की हद तक पहुंच चुकी है। लेकिन सरकार इसे अनदेखा करके लाखों लोगों को भूख से मरने के लिये उनके हाल पर छोड़ रही है। भूख की महामारी का दायरा कितना व्यापक है इसे समझने के लिए हम आपको कोरोना से ग्रस्त भारत नहीं, बल्कि कोरोना से पहले के भारत की तस्वीर दिखाते हैं। यानी तथाकथित 'नॉर्मल' भारत।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2019 को एक बार फिर से देखिये और उसके बाद 20 लाख करोड़ के पैकेज़ पर नज़र डालिये। सड़कों पर पूरे परिवार समेत दर्दानाक मौत मर रहे मज़दूरों की हृद्य विदारक तस्वीरें देखिये और अपना माथा पीट लीजिये। गलोब्ल हंगर इंडेक्स के अनुसार भारत में भूख का संकट गंभीर है। 117 देशों में से भारत 102 वें नंबर पर है। और ये कोविड-19 से पहले की स्थिति है। यानी ‘नॉर्मल’ भारत की तस्वीर 

‘विश्वगुरू’ भारत की भूख से जूझ रही संतानों में सबसे पहली क़तार में बच्चे, महिलाएं और ग़रीब लोग हैं। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में पांच साल से कम उम्र के 8 लाख 80 हज़ार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार थे। यानी हर रोज लगभग 1687 बच्चों की मौत होती है। कुपोषण और भूख के बीच का अंतर भी बड़ी दिलचस्प है। आमतौर पर सरकारें भूख से मौतों का नकारती रहती हैं। इसलिये पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट में कुपोषण लिखा होता है।

नेशलन फैमिली हैल्थ सर्वे की रिपोर्ट पर भी नज़र डालिये। जो बताती है कि 6-23 महीने के बच्चों में सिर्फ 9.6 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त पोषण मिल पाता है। 38.4 प्रतिशत बच्चों का शारीरिक विकास कुपोषण की वजह से नहीं हो पाता। 35.8 प्रतिशत बच्चे कम वज़नी यानी अंडरवेट हैं। महिलाओं के पोषण के हालात भी भयावह हैं। 53.1 प्रतिशत महिलाएं खून की कमी की शिकार हैं। मात्र महिलाएं ही नहीं बल्कि 22.7 प्रतिशत पुरुष भी खून की कमी के शिकार हैं।

कोविड से पहले भी भारत में करोड़ों लोगों को रोज कुआं खोदकर पानी पड़ता था। यानी रोज मज़दूरी करके ही रोज का भोजन खा सकते थे। लेकिन कोरोना के बाद तो स्थिति और भी भयावह हो गई है। जिसे सरकार ने और भी भयंकर बना दिया है। भारत में कोरोना का पहला केस जनवरी में आया था और अभी मई बीत रहा है। लेकिन कोरोना की रोकथाम तो छोड़िये सरकार अभी मज़दूरों को उनके घर तक नहीं पहुंचा पाई है।

गौरतलब है कि कोरोना के बाद पोषण और भूख की ये स्थिति और भी बदतर हुई है। लोगों का रोज़गार जा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार श्रम शक्ति में 35.4 प्रतिशत की गिरावट है। ये संख्या करोड़ों में हैं। अकेले प्रवासी मज़दूरों की संख्या का 8 करोड़ का अनुमान है। ये बेरोज़गार भारत क्या खायेगा? भूख की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। लेकिन सरकार इसे स्वीकर करने में आनाकानी कर रही है। ठीक उसी तरह, जिस तरह राज्य सरकारें भूख से हुई मौतों को मानने से इंकार करती रही हैं।

सरकार के बदइंतज़ाम ने आग में घी का काम किया है। बिना किसी भी तैयारी के लॉकडाउन की घोषणा। मज़दूरों को सड़कों पर मरने के लिये छोड़ देना। ट्रेनों का कहीं से कहीं पहुंच जाना। पानी और खाने की कोई व्यवस्था ना होना। ये सब दिखाता है कि किस तरह सरकार ने ग़रीब लोगों को कोरोना और भूख से मरने के लिये अपने हाल पर ‘आत्मनिर्भर’ छोड़ दिया है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते रहते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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