NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
आंदोलन
पुस्तकें
भारत
राजनीति
‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण
‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’ पुस्तक इस लिहाज से बेहद प्रासंगिक है क्योंकि इसमें फ़ादर स्टैन स्वामी द्वारा सरकारों की जन-विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ लिखे गए चर्चित निबंधों का महत्वपूर्ण संग्रह किया गया है। इसे उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने अनगिनत साथियों और सहकर्मियों के काफी कहने के उपरांत लिखा था।
अनिल अंशुमन
27 Apr 2022
Stan swamy

सच्चाई इतनी कड़वी क्यों हो गयी है? असहमति इतनी असह्य और न्याय, पहुँच से परे क्यों? उक्त बेख़ौफ़ सवाल फ़ादर स्टैन स्वामी द्वारा अपनी पुस्तक ‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’ के पहले पन्ने पर ही उठाया जाना, दर्शाता है कि जीवनपर्यंत जनाधिकारों के लिए उनकी सतत सक्रियता क्यों रही। जिसकी क़ीमत भी अंततोगत्वा अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। क्योंकि जीवनपर्यंत देश की सत्ता-सरकारों से विचारों और सड़कों के जन अभियानों द्वारा वे ऐसे सवालों को बुलंदी के साथ उठाते रहे।    

जन अधिकारों के सवालों और संघर्षों को गति देने के लिए ही उन्होंने सामाजिक संस्थान ‘बगईचा’ स्थापना की थी। जिसे फ़ादर स्टैन की सामाजिक जन सक्रियताओं से हमेशा खार खाने वाली सरकार व पुलिस प्रशासन ने ‘लाल बगईचा’ के नाम से दुष्प्रचारित कर रखा था। 

झारखंड प्रदेश की राजधानी रांची से सटे नामकुम में स्थापित इसी ‘बगईचा’ के प्रांगण में 25 अप्रैल ’22  को फ़ादर स्टैन स्वामी के 85 वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में उक्त पुस्तक का लोकार्पण हुआ। जिसका आयोजन बगईचा समेत कई अन्य सामाजिक एवं वाम जन संगठनों ने किया था। गहन शोक और संकल्पबद्धता के साथ फ़ादर स्टैन स्वामी का जन्मदिवस मनाते हुए बगईचा परिसर में ही उनकी मूर्ति का भी अनावरण किया गया।

जन्मदिवस पर आयोजित स्मृति-सभा सह फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित दो पुस्तकों के लोकार्पण कार्यक्रम को आचार्य बिशप फेलिक्स टोप्पो, प्रोवेन्शियल फ़ादर अजित खेस्स, फ़ादर जेम्स टोप्पो, जाने माने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़, जनफिल्मकार मेघनाथ, झारखंड विधान सभा में जन मुद्दों की मुखर आवाज़ कहे जानेवाले भाकपा माले विधायक विनोद सिंह व आंदोलनकारी दयामनी बारला समेत कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने संबोधित किया। साथ ही संयुक्त रूप से उक्त पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।

सभी वक्ताओं ने गहरी टीस के साथ याद करते हुए फ़ादर स्टैन के असाधारण आन्दोलनकारी व्यक्तित्व से प्रेरणा आत्मसात करने पर जोर दिया। फ़ादर फेलिक्स ने अपने वक्तव्य में कहा कि उन्होंने जो रास्ता चुना, उसकी कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी। माले विधायक ने चर्चा करते हुए कहा कि कैसा दुर्भाग्य है कि जिस महान व्यक्तित्व ने जेलों में बंद विचाराधीन निर्दोष लोगों के लिए सदा आवाज़ उठायी, उन्हीं की जान विचाराधीन कैदी बनाकर ले ली गयी। लम्बे समय तक फ़ादर स्टैन स्वामी के साथ विभिन्न जन अभियानों में सक्रीय रहीं आन्दोलनकारी दयामनी बारला ने बताया कि लोग सदा उन्हें अपने बीच के व्यक्ति और आन्दोलन के हिस्से के रूप में मानते थे। आयोजन में शामिल एआईपीएफ़ व झारखंड जसम के संयोजक तथा जंगल बचाओ अभियान से जुड़े युवा आदिवासी एक्टिविष्ट जेवियर कुजूर ने कहा कि उनकी शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी। 

इस अवसर पर फ़ादर स्टैन स्वामी खूंटी जिला क्षेत्र में राज्य दमन का शिकार हो रहे जिन आदिवासी समाज के लोगों के मानवाधिकारों के सवाल को मुखरता के साथ उठाया था, वहाँ से आयीं महिला प्रतिनिधियों का भी सामान किया गया।

जन्म दिवस कार्यक्रम में ही फ़ादर स्टैन स्वामी द्वारा महिला अधिकारों पर अंग्रेजी में लिखी हुई पुस्तक ‘IF NOT NOW, WHEN’ के साथ-साथ उन्हीं के द्वारा अंग्रेजी में लिखी पुस्तक का हिंदी अनुदित क़िताब ‘ मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’ का भी लोकार्पण किया गया।        

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’ पुस्तक इस लिहाज से बेहद प्रासंगिक है क्योंकि इसमें फ़ादर स्टैन स्वामी द्वारा सरकारों की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ लिखे गए चर्चित निबंधों का महत्वपूर्ण संग्रह किया गया है। जिसे उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में अपने अनगिनत साथियों और सहकर्मियों के काफी कहने के उपरांत लिखा था। लेकिन तब उन्हें यह पता नहीं था कि यह पुस्तक उनके मरणोपरांत ही प्रकाशित होगी। इंडियन सोशल इंस्टीच्यूट, बंगलौर द्वारा अंग्रेजी में प्रकशित इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद फ़ादर जेम्स टोप्पो (ये।स।) ने किया है। जिसमें महाराष्ट्र के तलोता जेल में क़ैद के समय दी जा रही भीषण यातनाओं के खिलाफ उनके लिखित बयानों को भी प्रकाशित किया गया है।

जानी मानी समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर नंदिनी सुन्दर ने इसकी प्रस्तावना में ‘एक लौ जो तेज़ जलती है’ से अपनी बात शुरू करते हुए लिखा है कि- मेरे लिए “फ़ादर स्टैन स्वामी की स्मृति-शिला” के लिए प्राक्कथन लिखना एक अप्रत्याशित गौरव की बात है। स्टैन स्वामी को इस देश की महान विभूतियों के समक्ष गिनना चाहिए; मेरे तो वे अप्रतिम व्यक्तिगत नायक थे।

अपनी बातों को विस्तार देते हुए वे आगे लिखती हैं कि सरकार उनसे भयभीत थी। क्योंकि स्टैन स्वामी को अन्याय चाहे वह किसी भी रूप में हो, कहीं भी क्यों न हो, कतई बर्दाश्त नहीं था। उन्होंने हमेशा अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। और बीते दशक के आदिवासी भारत बुरी तरह घायल करने वाले मुद्दों में, हज़ारों हज़ार की संख्या में माओवादी होने के अनुमान मात्र पर आदिवासी युवाओं को अंधाधुंध गिरफ्तार कर कैदखाने में डालने के मानवाधिकार विरोधी प्रसंग ने उन्हें भावुक ही नहीं “पागल” सा कर दिया था। जैसा कि स्टैन की बानगी स्वयं कहती है, “यदि एक पीढ़ी की सारी युवा शक्ति अनिश्चित काल के लिए क़ैदखाने में बंद हो जाए, उस समाज में ऐसी विडंबना का प्रभाव बहुत ही विध्वंशक प्रमाणित हो सकता है। स्टैन स्वामी ने अपने साथियों के साथ मिलकर 102 विचाराधीन कैदियों के घरों में जा जाकर सर्वे किया और पाया कि 97 कैदियों का माओवादियों से सम्बन्ध एकदम शून्य था।”

जनवरी 2018 में उन्हेंने इस सवाल को लेकर झारखंड हाई कोर्ट में एफ़आईआर दर्ज़ कराई गई। जिसपर संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने तत्कालीन सरकार से उन विचाराधीन कैदियों के बारे में लिखित जानकारी मांगी। इसे दुर्भाग्य ही कहना होगा कि एफ़आईआर दर्ज़ कराने के तुरंत बाद ही राज्य ने स्टैन पर खिसियानी बिल्ली की तरह आक्रमण कर दिया। हम सुनते आए थे कि कानून सदा समस्तरीय सक्रियता के आधार पर काम करता है, पर इस मामले में वो पूरी तरह नदारद था।

कार्यक्रम में शामिल सभी लोगों की मनोदशा का इज़हार करते हुए जेवियर कुजूर ने कहा कि कई दिनों बाद फ़ादर स्टैन जी का बगईचा जब फिर से गुलज़ार हो रहा है तो इसके भी केंद्र में हमेशा की भांति फ़ादर स्टैन हमारे बीच मौजूद हैं। 

निस्संदेह उक्त कथन दिल को भावुक करने के लिए काफी है, लेकिन यह भी उतना बड़ा सच है कि जिस झारखंड प्रदेश को फ़ादर स्टैन स्वामी ने अहम् कार्यभूमि बनाकर एक ओर ज़मीनी जन सक्रियताओं की यादगार भूमिका निभायी, वहीं जनमानस व आदिवासी अधिकारों के पक्ष में अपने अकाट्य तर्कों भरी लेखनी के साथ-साथ जन मुद्दों पर गहन शोध कार्य कर सवालों को उन्हें सत्ता राजनीती के लिए चुनौती बना दी। डा. नंदिनी सुन्दर के ही शब्दों में कहें तो, फ़ादर स्टैन की लेखिनी उन लोगों की दर्द भरी कहानी सह जिजीविषा की तस्वीर उकेरती है जिनके जीवन वे स्वयं हमराही बने रहे। हम सबों के लिए स्टैन का अनमोल उपहार है

tribals
Stan Swamy
Bhima Koregaon
Jharkhand

Related Stories

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

बाघ अभयारण्य की आड़ में आदिवासियों को उजाड़ने की साज़िश मंजूर नहीं: कैमूर मुक्ति मोर्चा

झारखंड: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन सत्याग्रह जारी, संकल्प दिवस में शामिल हुए राकेश टिकैत

सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा

मध्य प्रदेश के जनजातीय प्रवासी मज़दूरों के शोषण और यौन उत्पीड़न की कहानी


बाकी खबरें

  • J&K
    जसविंदर सिद्धू
    'कश्मीर में नागरिकों की हत्याओं का मक़सद भारत की सामान्य स्थिति की धारणा को धूमिल करना है'—मिलिट्री थिंक-टैंक के निदेशक
    20 Oct 2021
    मौजूदा हालात सीपीओ (केंद्रीय पुलिस संगठन) बलों के लिए और ज़्यादा समस्यायें पैदा करने वाले इसलिए हैं क्योंकि अब सेना को उन इलाक़ों में तैनात नहीं किया जाता है, जिन इलाक़ों में इमारतें हैं या घनी आबादी…
  • पार्थ एस घोष
    कैसे कश्मीर, पाकिस्तान और धर्मनिर्पेक्षता आपस में जुड़े हुए हैं
    20 Oct 2021
    हिंदुत्व को बढ़ावा देना पाकिस्तान की सैन्य-नौकरशाही एजेंसी द्वारा बिछाए गए जाल में फंसने जैसा है। धर्मनिर्पेक्षता को नकारना दक्षिण एशिया के सामाजिक ताने-बाने की बर्बादी का कारण बन सकता है।
  • Bhutan
    एम. के. भद्रकुमार
    भारत के निर्णयों को प्रभावित करने वाले नैरेटिव और ज़मीनी हक़ीक़त में इतना अंतर क्यों है? 
    20 Oct 2021
    भूटान और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने के लिए गुरुवार को थिम्पू में हस्ताक्षरित 'रोडमैप' ने तो भारत के डोकलाम-नैरेटिव में एक बड़ा सुराख कर दिया है, इतना बड़ा कि उस से होकर अब…
  • valmiki
    राज वाल्मीकि
    महर्षि वाल्मीकि जयंती के बहाने स्वच्छकार समाज को धर्मांध बनाए रखने की साज़िश!
    20 Oct 2021
    ये समाज कभी नहीं सोचेगा कि ये आमंत्रित अतिथिगण जिन महर्षि वाल्मीकि जी की इतनी प्रशंसा कर रहे हैं, जिनके पदचिह्नों पर चलने का उपदेश दे रहे हैं, उनकी तस्वीर तक अपने घर में नहीं लगाते हैं। जिस स्वच्छकार…
  • khoj khabar
    न्यूज़क्लिक टीम
    खोज ख़बर : कश्मीर हिंसा या सिंघु लिंचिंगः साज़िश ही साज़िश
    19 Oct 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने कश्मीर में बढ़ती हिंसा और सिंघु बॉडर में हुई लिंचिग के पीछे की साज़िश पर कश्मीर के नेता यूसुफ़ तारागामी और अर्थशास्त्री नवशरण कौर से बातचीत की। एक तरफ़ किसान…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License