NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आधारभूत ढाँचे में विशाल निवेश का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐलान किया कि उसके उच्च अधिकार कार्य बल ने 102 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाओं को स्वीकृति दे दी है तथा अगले कुछ महीने में 3 लाख करोड़ रुपये की और योजनाओं को भी मंजूरी दी जायेगी।
मुकेश असीम
02 Jan 2020
Economic slowdown in India

साल 2019 के अंतिम दिन फिर एक बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अर्थव्यवस्था के उद्धारकर्ता देवदूत के अपने जाने पहचाने अवतार में प्रकट हुईं। इस बार जो बड़ी घोषणाओं की बौछार हुई वह आधारभूत ढाँचे में भारी भरकम निवेश से संबंधित थीं।

वित्त मंत्री ने ऐलान किया कि उसके उच्च अधिकार कार्य बल ने 102 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजनाओं को स्वीकृति दे दी है तथा अगले कुछ महीने में 3 लाख करोड़ रुपये की और योजनाओं को भी मंजूरी दी जायेगी। इस प्रकार कुल 105 लाख करोड़ रुपये के कुल पूँजी निवेश की योजना प्रस्तुत की गई।

102 लाख करोड़ की योजनाओं में 18 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों की योजनायें बताई गईं हैं जो 22 विभिन्न मंत्रालयों के अंतर्गत आती हैं।

ये प्रोजेक्ट मुख्यतः इन क्षेत्रों में हैं - ऊर्जा (25 लाख करोड़ रुपये), सड़क (20 लाख करोड़ रुपये), रेलवे (14 लाख करोड़ रुपये), बंदरगाह व हवाई अड्डे (2.5 लाख करोड़ रूपये), डिजिटल (3.2 लाख करोड़ रुपये), सिंचाई, ग्रामीण, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण (16 लाख करोड़ रुपये) तथा यातायात (16 लाख करोड़ रुपये)।

इसमें से 47 लाख करोड़ रुपये की योजनायें पहले से क्रियान्वयन के चरण में हैं, 37 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों की विस्तृत योजना तैयार है और 18 लाख करोड़ रुपये के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई जा रही है।

विभिन्न वित्तीय वर्षों में सरकारी खर्च का अनुमान इस प्रकार है – वित्तीय वर्ष 2020 – 13.6 लाख करोड़ रुपये, 2021 – 19.5 लाख करोड़ रुपये, 2022 – 19 लाख करोड़ रुपये, 2023 – 13.8 लाख करोड़ रुपये, 2024 – 13 लाख करोड़ रुपये, 2025 - लाख करोड़ रुपये।

इस विशाल घोषित खर्च के लिए वित्तीय स्रोत क्या होगा? वित्त मंत्री के अनुसार इस खर्च में 39-39% का बराबर हिस्सा केंद्र तथा राज्यों के जिम्मे होगा जबकि 22% निवेश निजी क्षेत्र के जिम्मे होगा। यह खर्च निवेश के लिए बनाए गए विशेष संस्थानों के जरिये होगा, जो वित्तीय बाजार से कर्ज जुटायेंगे।

निजी क्षेत्र का निवेश पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिये आयेगा। यहाँ यह जरूरी हो जाता है कि अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति और सरकारी वित्तीय घाटे की मौजूदा हालत के परिप्रेक्ष्य में इतने बड़े निवेश की संभावना और उसके संभावित नतीजों का विश्लेषण किया जाये।

31 दिसंबर को ही यह तथ्य भी सामने आया कि चालू वित्तीय वर्ष के दिसंबर में समाप्त पहले नौ महीनों में कुल वित्तीय घाटा पूरे वित्तीय वर्ष के बजट अनुमानों का 115% हो चुका है। प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों, विशेष तौर पर जीएसटी, की वसूली बजट अनुमानों से लगभग दो लाख करोड़ पीछे होने की खबरें भी पहले से सुज्ञात हैं।

हालाँकि सरकार अपने वित्तीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2% बताती रही है किंतु सार्वजनिक क्षेत्र के कुल घाटे (केंद्र सरकार + राज्य सरकार + सार्वजनिक उद्यम) को जोड़ा जाये तो कुल वित्तीय घाटा जीडीपी के 9% के ऊपर है जिसके लिए सरकारों को वित्तीय बाज़ारों से विभिन्न प्रकार से कर्ज लेना पड़ रहा है।

किंतु कॉरपोरेट क्षेत्र को छोड़कर कुल घरेलू क्षेत्र की सालाना बचत सकाल घरेलू उत्पाद का मात्र 7% ही है अर्थात सरकार की ऋण आवश्यकता ही अर्थव्यवस्था में कुल बचत से 2% अधिक है।

आपूर्ति की तुलना में माँग अधिक है इसीलिए रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में 1.35% की कमी और सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी ऋण पर वास्तविक ब्याज दरें कम नहीं हो पा रही हैं। ऋण दरों को कम करने के लिए रिजर्व बैंक पिछले दो सप्ताह से ऑपरेशन ट्विस्ट चला रहा है जिससे वह दस साल के दीर्घ काल के लिए वित्तीय बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ा सके और ब्याज दरें गिरें।

साथ ही अधिकांश जनता की आय भी बढ़ नहीं रही है जबकि महँगाई विशेष तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निजीकरण व व्यवसायीकरण के तेज होते दौर से महँगाई बहुत तेजी से बढ़ी है।

श्रमिक व गरीब किसानों के पास तो बचत की संभावना पहले ही बहुत सीमित थी, किंतु आज की स्थिति में मध्यम वर्ग की वित्तीय बचत क्षमता भी अत्यंत सिकुड़ गई है। अतः घरेलू क्षेत्र की बचत से वित्तीय आपूर्ति बढ़ने की भी तुरंत कोई आशा नहीं है। फिर सरकार निवेश के लिए ऋण कहाँ से जुटाएगी? उसके पास एक ही विकल्प बचाता है। वह है रिजर्व बैंक द्वारा नकदी प्रवाह अर्थात नये नोट ‘छापकर’ मुद्रा प्रसार को बढ़ावा देना। किंतु वह मुद्रा के मूल्य को कम कर आम जनता पर चोर दरवाजे से लगाये टैक्स के समान है। अर्थात कुल मिलाकर आम जनता की जेब से ही आधारभूत ढाँचे पर इस विशाल निवेश का खर्च जुटाया जायेगा।

जहाँ तक निजी क्षेत्र का सवाल है वह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिये इन प्रोजेक्ट में भागीदारी करेगा। पिछले 20 सालों में इन पीपीपी प्रोजेक्ट का अनुभव बताता है कि इसके जरिये कुल खर्च में एक छोटा हिस्सा वहन करने के बावजूद निजी पूँजीपति इन प्रोजेक्ट के मालिक बन जाते हैं, इनसे होने वाली आय को पीछे से चुराते हैं और जब प्रोजेक्ट घाटे में आ जाते हैं तो घाटे को सार्वजनिक क्षेत्र के सिर डालकर अलग हो जाते हैं।

खास तौर पर पीपीपी मॉडल की सबसे बड़ी प्रणेता आईएलएफ़एस और उसकी 335 अनुषंगी कंपनियों के जरिये जिस लूट को अंजाम देकर 2018 में कंपनी को पूरी तरह डुबा दिया गया वह ही पिछले 15 महीने से चल रहे गैर वित्तीय कंपनियों और बैंकों के आर्थिक संकट की एक मुख्य वजह रहा है। तजुरबा यही कहता है कि पीपीपी का अर्थ है – लाभ प्राइवेट, घाटा सार्वजनिक!
 
एक तीसरा पक्ष है कि मौजूदा आर्थिक संकट का मुख्य कारण सिकुड़ती माँग है जिसके कारण पहले से ही स्थापित उद्योग क्षमता के 65-70% पर ही उत्पादन कर पा रहे हैं तथा उनमें ऋण से हुये पूँजी निवेश पर ब्याज चुकाने तक की नकदी आय नहीं जुटा पा रहे हैं। तब नये आधारभूत उद्योग कैसे लाभप्रद होंगे और 2008-09 में किए गए ऐसे ही निवेश के परिणामस्वरूप 2012-13 में बैंकों के सामने आये विशाल डूबे ऋणों के संकट को दोबारा पैदा नहीं करेंगे?

खास तौर पर जिस तरह से पूरे आधारभूत ढाँचे की योजना आधिकांश आबादी की जरूरतों के बजाय 10% अमीर जनसंख्या की चाहत आधारित हो गई है उसमें इनके लिए पर्याप्त माँग कहाँ से आयेगी? इसके लिए दिल्ली मेट्रो का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ भाड़े में वृद्धि होते ही यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट हो गई। मुंबई में एसी लोकल व मेट्रो के लिए जिन किरायों की चर्चा है उससे भी यात्रियों की संख्या बहुत होने की संभावना नहीं है।

अतः कुछ साल में ही ये विशाल चमकते प्रोजेक्ट भारी घाटे में रहने की संभावना है और इनका खर्च जुटाने के लिए आम जनता पर वसूली का एक नया दौर शुरू होगा।

Economic Recession
indian economy
economic crises
Nirmala Sitharaman
corporate
PPP
Public private partnership
modi sarkar
BJP
Poverty in India
unemployment

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 


बाकी खबरें

  • ganga
    सबरंग इंडिया
    गंगा मिशन चीफ ने माना- कोरोना की दूसरी लहर में लाशों से ‘पट’ गई थी गंगा, योगी सरकार करती रही इनकार
    27 Dec 2021
    कोरोना की विनाशकारी दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश में गंगा नदी ‘लाशों को फेंकने की आसान जगह’ बन गई थी। ये दावा एक नई किताब में किया गया है जिसके लेखक नेशनल मिशन टू क्लीन गंगा के महानिदेशक और नमामि…
  • Adityanath and Yogi
    सुबोध वर्मा
    कितना प्रभावी है यूपी का 'डबल इंजन'? 
    27 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश के कुछ प्रमुख आर्थिक संकेतक इस दावे को झूठा साबित करते हैं कि मोदी-योगी का 'डबल इंजन' शासन का मॉडल लोगों के लिए अच्छा है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 6,531 नए मामले, ओमिक्रॉन के मामले बढ़कर 500 के पार पहुंचे 
    27 Dec 2021
    देश में ओमीक्रॉन का ख़तरा लगातार बढ़ता ही जा रहे है। ओमीक्रॉन देश के अब तक 19 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेश में फ़ैल चुका है, और कुल मामलों की संख्या बढ़कर 578 हो गयी है |
  • Narendra Singh Tomar
    अफ़ज़ल इमाम
    तोमर का बयान- एक तीर से दो निशाने !
    27 Dec 2021
    सूत्रों का मानना है कि किसानों की नई नवेली पार्टियों को मुद्दा थमाने के लिए तोमर ने यह बयान दिया है, ताकि इन दोनों राज्यों में उन्हें सक्रिय होने और जन समर्थन हासिल करने का मौका मिल सके।
  • Jammu and Kashmir
    द लीफलेट
    मुद्दा: जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग का प्रस्ताव आख़िर क्यों है विवादास्पद
    27 Dec 2021
    जहां जम्मू को छह नयी विधानसभा सीटें मिलेंगी,वहीं कश्मीर को महज़ एक और अतिरिक्त सीट से संतोष करना होगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License