NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
हम महज़ एक साल में एलपीजी सिलेंडर के लिए 300 रुपये से ज़्यादा का भुगतान कर रहे हैं !
पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में भी उछाल इसलिए आया है क्योंकि मोदी सरकार ने बतौर टैक्स 3.73 लाख करोड़ रुपये से भी ज़्यादा की ज़बरदस्त कमाई की है।
सुबोध वर्मा
16 Oct 2021
Cooking Gas

केंद्र सरकार रसोई गैस और पेट्रोल/डीज़ल जैसे ज़रूरी ईंधनों की क़ीमतों को लगातार बढ़ाते हुए लाखों भारतीयों को निचोड़ रही है। पिछले एक साल में रसोई गैस (एलपीजी) के मानक 14.2 किलोग्राम सिलेंडर की क़ीमत अक्टूबर 2020 में 604.63 रुपये (चार महानगरों के औसत) से अक्टूबर 2021 में 906.38 रुपये तक हैरान करती हुई 301.75 रुपये बढ़ गयी है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) की वेबसाइट पर दर्ज ये इंडेन की क़ीमतें हैं। (नीचे दिया गया चार्ट देखें)

जहां एक तरफ़ प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी ग़रीब परिवारों के लिए अपनी इस "मुफ़्त" रसोई गैस योजना का बार-बार ज़िक़्र करते हुए आम लोगों की ओर से तारीफ़ बटोरने की बात करते हैं, वहीं गैस सब्सिडी के ख़त्म किये जाने और गैस की क़ीमतों में इस बेलगाम इज़ाफ़े ने इन परिवारों के लिए खाना पकाने में इस एलपीजी के इस्तेमाल को मुश्किल बना दिया है। पिछले एक साल में जो बढ़ोत्तरी हुई है, वह वाक़ई बेरहम है, क्योंकि गुज़रे एक साल का वक़्त एक ऐसा समय था, जब महामारी और लॉकडाउन ने नौकरियां छीन ली थीं, कमाई को घटा दिया था और लाखों लोगों को भूख के कगार पर धकेल दिया था।

पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों का भी यही हाल है। पिछले एक साल में चार महानगरों में पेट्रोल की औसत क़ीमतों में 26% और डीज़ल की क़ीमतों में 31% की बढ़ोत्तरी हुई है। (नीचे दिये गये चार्ट देखें) इन दोनों उत्पादों की क़ीमतों में हुई बढ़ोत्तरी से सभी वस्तुओं की क़ीमतों पर इसलिए व्यापक असर  पड़ा है, क्योंकि इससे परिवहन लागत बढ़ जाती है और उपभोक्ताओं को सब्ज़ियों, अन्य खाद्य पदार्थों और वास्तव में अलग-अलग तरह की उपभोग वाली वस्तुओं के लिए ज़्यादा पैसे चुकाने होते हैं।

इतना ही नहीं, डीज़ल की बढ़ी हुई लागत का मतलब यह भी है कि किसानों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है, क्योंकि उनमें से एक बड़ी संख्या में किसान सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों के लिए डीज़ल जेनसेट पर निर्भर होते हैं। आमतौर पर इसकी भरपाई उत्पाद को बेचे गये मूल्य के हिसाब से नहीं की जाती है, यही वजह है कि बेबस किसानों की कमाई और भी कम हो जाती है।

ग़ौरतलब है कि इस एक साल पेट्रोलियम उत्पादों की क़ीमतों में यह बढ़ोत्तरी थोड़ी भी कम नहीं हुई है। 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से पेट्रोल की क़ीमतों में 79% और डीजल की कीमतों में 101% का इज़ाफ़ा हुआ है। पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों के तमाम आंकड़े उस पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) से लिये गये हैं, जो पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत काम करता है।

ऊंची क़ीमतों के पीछे की वजह क्या है ?

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता अक्सर इस बात को समझाने की कोशिश करते हैं कि यह इज़ाफ़ा इसलिए हुआ है क्योंकि पेट्रोल/डीज़ल की क़ीमतें अब बाज़ार से जुड़ी हुई हैं और अगर अंतर्राष्ट्रीय क़ीमतें बढ़ती हैं, तो घरेलू क़ीमतों में इज़ाफ़ा होना होता है। यह बात भी पूरी तरह ग़लत है।

मगर, जैसा कि नीचे दिये गये चार्ट से पता चलता है कि इसकी असली वजह तो यह है कि  अंतर्राष्ट्रीय क़ीमतें बढ़े या घटे, दोनों ही हालात में मोदी सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क लगातार बढ़ा रही है। यहां इस्तेमाल किये जा रहे आंकड़े पीपीएसी से ही लिये गये है।

वित्तीय वर्ष 2020-21 में केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों से रिकॉर्ड तोड़ 3.73 लाख करोड़ रुपये उत्पाद शुल्क की वसूली की। यह पिछले साल के मुक़ाबले 1.5 लाख करोड़ रुपये या 67% की हैरतअंगेज़ बढ़ोत्तरी थी। 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से पेट्रोलियम उत्पादों से उत्पाद शुल्क संग्रह तक़रीबन 99,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 3.73 लाख करोड़ रुपये हो गये हैं,यानी कि सात सालों में उत्पाद शुल्क के संग्रह में तक़रीबन  277% का इज़ाफ़ा!

उत्पाद शुल्क के अलावा, जिन करों को केंद्र सरकार की ओर से लगाया जाता है, उनमें वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) आदि सहित कई दूसरे कर भी शामिल हैं,जिन्हें उगाहा जा रहा है। इस अवधि में उन करों की उगाही में भी वृद्धि हुई है, लेकिन उतनी नहीं,जितना की उत्पाद शुल्क संग्रह में इज़ाफ़ा हुआ है। 2020-21 में पेट्रोलियम उत्पादों से कुल कर संग्रह 4.2 लाख करोड़ रुपये का हुआ है, जिसमें से 3.73 लाख करोड़ रुपये या लगभग 90% अकेले इस पर लगने वावे उत्पाद शुल्क के है।

केंद्र सरकार की तरफ़ से इस भारी कराधान के अलावा राज्य सरकारें भी बिक्री कर / मूल्य वर्धित कर,यनी वैट, राज्य जीएसटी, चुंगी, प्रवेश कर आदि जैसे अलग-अलग तरह की कर लगाती हैं। हालांकि, ये कर केंद्र सरकार के पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाये जा रहे उत्पाद शुल्क के आधे से भी कम रक़म वाली हैं। इस लिहाज़ से 2020-21 में राज्य सरकारों की ओर से कुल कर संग्रह बढ़कर 2.17 लाख करोड़ रुपये हो गया था। इसलिए, जो क़ीमतें बढ़ रही हैं,उसके पीछे की वजह राज्य सरकारें तो नहीं हैं।

ग़ौरतलब है कि पिछले एक साल में महामारी और लॉकडाउन ने पेट्रोलियम उत्पादों की खपत को कम कर दिया था,इसके बावजूद मोदी सरकार बार-बार शुल्क दरों को बढ़ाकर उत्पाद संग्रह से और भी ज़्यादा रक़म हासिल कर पाने में कामयाब रही है।

मोदी सरकार इस पैसे का कर क्या रही है ?

इस बात को लेकर अक्सर यह हैरानी जतायी जाती रही है कि मोदी सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क जैसे अप्रत्यक्ष करों के ज़रिये लोगों को आख़िर इतना निचोड़ क्यों रही है। इसका जवाब बहुत आसान है और जवाब यह है कि वह अमीरों पर कर बढ़ाना नहीं चाहती, बल्कि उन्हें और ज़्यादा रियायतें देना चाहती है। इसलिए, यह संसाधन जुटाने वाली नीतियों का एक पूरा का पूरा सेट का विस्तार कर रही है। इन नीतियों में लोगों पर अप्रत्यक्ष कर (जैसा कि ऊपर चर्चा की गयी है); विभिन्न सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए धन में कटौती; सरकारी रिक्तियों को नहीं भरना: सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति को कम से कम क़ीमत पर भी बेच देना: सड़कों, बंदरगाहों, दूरसंचार बुनियादी ढांचे, रेलवे स्टेशनों और देश की अन्य प्रमुख भौतिक संपत्ति को निजी मुनाफ़ाखोरों के हाथों पट्टे पर दे देने के साथ इसी तरह की और भी नीतियां शामिल हैं। इन उपायों से जुटाये गये धन का इस्तेमाल लोगों को फ़यादे पहुंचाने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि इसका इस्तेमाल कॉरपोरेट्स के लिए बैंक क़र्ज़ों को बट्टे खाते में डालने, करों से छूट देने, कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती के कारण होने वाले नुक़सान और बेहद अमीर तबके के लिए इस तरह की अन्य उदारता बरतने में किया जाता है।

संक्षेप में कहा जाये, तो पेट्रोलियम उत्पादों पर लगाये जा रहे भारी कर आम भारतीयों की जेब से एक-एक पैसे निकाल लेने और इन पैसों को बड़े-बड़े कारोबारियों और विदेशी इजारेदारों के ख़जाने में डाल देने की मोदी सरकार की सुनियोजित रणनीति का एक और पहलू है।

लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

In Just One Year, We’re Paying Over Rs. 300 More for LPG Cylinder!

Cooking gas
LPG Prices
Petro Products
Petrol Excise
fuel prices
Diesel Prices

Related Stories

महंगाई की मार मजदूरी कर पेट भरने वालों पर सबसे ज्यादा 

पेट्रोल/डीज़ल की बढ़ती क़ीमतें : इस कमर तोड़ महंगाई के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

महानगरों में बढ़ती ईंधन की क़ीमतों के ख़िलाफ़ ऑटो और कैब चालक दूसरे दिन भी हड़ताल पर

ईंधन की क़ीमतों में बढ़ोतरी से ग़रीबों पर बोझ न डालें, अमीरों पर लगाएं टैक्स

महंगे ईंधन से थोक की क़ीमतें बढ़ीं, कम मांग से कम हुई खुदरा क़ीमतें

मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स का बोझ आम जनता पर लादा

कार्टून क्लिक: इस महंगाई के लिए थैंक्यू मोदी जी!

फिर बढ़ सकती हैं पेट्रो उत्पादों की कीमतें

आसमान छू रहीं ईंधन क़ीमतों के ख़िलाफ़ हुए अखिल भारतीय प्रदर्शन में शामिल हुए किसान संगठन

खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं


बाकी खबरें

  • beedi worker
    सतीश भारतीय
    बीड़ी कारोबार शरीर को बर्बाद कर देता है, मगर सवाल यह है बीड़ी मजदूर जाएं तो जाएं कहां?
    05 Feb 2022
    मध्यप्रदेश का सागर जिला जिसे बीड़ी उद्योग का घर कहा जाता है, वहां बीड़ी कारोबार नशा से बढ़कर गरीब आवाम की रोजी-रोटी का सहारा है। उन्हें बीड़ी कारोबार से बाहर निकालकर गरिमा पूर्ण जीवन मुहैया करवाने के…
  • handloom
    मोहम्मद ताहिर
    ग्राउंड रिपोर्ट : जिस ‘हैंडलूम और टेक्सटाइल इंडस्ट्री' को PM ने कहा- प्राइड, वो है बंद होने की कगार पर
    05 Feb 2022
    देश के प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिन पहले हैंडलूम सेक्टर को मेरठ का ’प्राइड’ कहा था। न्यूज़क्लिक ने जब इस सेक्टर की पड़ताल की तो पता चला कि ये सेक्टर अपने सबसे ख़राब दिनों से गुजर रहा है। जिसकी…
  • up elections
    एस एन साहू 
    यूपी चुनाव: क्या पश्चिमी यूपी कर सकता है भाजपा का गणित ख़राब?
    05 Feb 2022
    पश्चिमी यूपी में 10 फरवरी, 2022 को होने वाला पहले चरण का चुनाव, शेष चरणों के लिए भी काफी महत्व रखता है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से, पश्चिमी यूपी में अधिकांश विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करने वाला राजनीतिक…
  • up chunav
    सौरभ शर्मा
    यूपी चुनाव: कांस्य युग में फंसा एक द्वीपनुमा गांव
    05 Feb 2022
    उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार चल रहा है, लेकिन ग्रामीणों को अभी तक उनके क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के बारे में पता तक नहीं चल पाया है। इसके पीछे की वजह है-बुनियादी सुविधाओं का अभाव। 21वीं…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 1.28 लाख नए मामले, 1,059 मरीज़ों की मौत
    05 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,27,952 नए मामले सामने आए हैं | देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 4 करोड़ 20 लाख 80 हज़ार 664 हो गयी है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License