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भारत
राजनीति
हिन्दू कार्ड खेलने के चक्कर में  क्या केजरीवाल अपनी पहचान के साथ भी समझौता कर रहे हैं?
यदि उनकी राजनीतिक बयानबाजी में कोई फर्क नहीं रह जाता, तो फिर यह बात भी कोई मायने नहीं रखती कि चुनावों में आप जीते अथवा बीजेपी।
प्रज्ञा सिंह
20 Nov 2020
हिन्दू कार्ड खेलने के चक्कर में  क्या केजरीवाल अपनी पहचान के साथ भी समझौता कर रहे हैं?
फोटो साभार: एनडीटीवी ट्विटर 

दिवाली के दिन यह बात स्पष्ट हो गई कि अरविन्द केजरीवाल अपने इंडिया अगेंस्ट करप्शन आन्दोलन की जड़ों से ही नहीं बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने शुरूआती वर्षों के कार्यकाल से भी भटक चुके हैं। सिल्क के कपड़ों में सजे-धजे अपनी कैबिनेट से घिरे, उन्होंने यह शाम अक्षरधाम मंदिर में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में देवी लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हुए बिताई। वह शख्स जो कभी राजधानी की गली-गली में घूमकर बिजली के बिलों को “बढ़ा हुआ” बताकर आग के हवाले करता नजर आता था, पिछले काफी समय से हिन्दू भावनाओं को पुचकारने की कोशिशों में लगा हुआ है। दिवाली की रात से यह स्पष्ट हो चुका है कि उनकी पार्टी को इस बात का भरोसा है कि इससे चुनावी फसल काटी जा सकती है।

आम आदमी पार्टी सरकार चाहती थी कि दिल्ली निवासी दिवाली के अवसर पर पटाखे न फोड़कर अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रार्थना करें। लेकिन दिल्लीवासियों ने पटाखे फोड़ने पर लगे प्रतिबंधों का जमकर उल्लंघन किया जबकि केजरीवाल प्रार्थना करने में लगे रहे। विडंबना यह है कि इस कार्यक्रम का आयोजन एक ऐसे मंदिर में किया जा रहा था जो यमुना के बाढ़-ग्रस्त मैदान पर निर्मित किया गया था और जिसने कई पर्यावरण नियम-कानूनों का उल्लंघन किया था। 

अतीत पर नजर डालें तो केजरीवाल खुले तौर पर कांग्रेस और बीजेपी के आलोचक थे। उन्होंने लोगों से स्वच्छ प्रशासन की मांग करने का आह्वान किया था। 2011 से लेकर 2015 विधानसभा चुनावों में वे नियमित तौर पर भारी भीड़ को अपनी सभाओं में इकट्टा कर पाने में सफल रहे, जो इस बात की सूचक थी कि दिल्ली की राजनीति जाति के बजाय वर्ग से कहीं अधिक संचालित है। फिर केजरीवाल ने जो चीजें उनकी पार्टी के लिए कारगर साबित हो रही थीं, से रुख बदलने का फैसला क्यों किया? कई अन्य राजनीतिज्ञों की तरह उन्हें भी यही दिखा कि बीजेपी लोगों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर वोट दिलवाने में सफल रही है। यही वे “हिन्दू मतदाता” हैं जिन्हें आप अपनी और आकर्षित करने की उधेड़बुन में लगी है। ऐसा प्रतीत होता है कि केजरीवाल के मन में कहीं न कहीं यह बात घर कर गई है कि वे इन मतदाताओं से खुद को अलगाव में डालने का जोखिम नहीं उठा सकते और यह कि बीजेपी खुद को हिन्दुओं की एकमात्र हितरक्षक बताकर इसका लाभ उठती रही है।

बीजेपी राष्ट्रवाद और मुसलमानों को कटघरे में खड़ाकर लोगों को नागरिक होने या आर्थिक मुद्दों के बजाय हिन्दुओं के तौर पर वोट करने के लिए उकसाती है। दरअसल इस साल दिल्ली के चुनाव प्रचार के दौरान शुरू-शुरू में आप की तुलना में बीजेपी रेस में काफी पीछे थी, लेकिन जब इसके नेताओं ने बदनाम “गोली मारो” जैसे भयावह नारे लगाने शुरू कर दिए तो इसकी लोकप्रियता में अचानक से इजाफा देखने को मिला। बीजेपी ने इन भावनात्मक मुद्दों को उठाकर बाकी के सभी मुद्दों को किनारे लगा दिया था। इसलिए केजरीवाल को लगता है कि अपने विकास के अजेंडे को जारी रखने के लिए भी उन्हें बीजेपी के ट्रम्प कार्ड को बेअसर करना होगा और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्हें सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड खेलने की प्रेरणा मिली। 

ऐसा लगता है कि 2019 के लोक सभा चुनाव में मिली मोदी की जीत ने केजरीवाल के दिलोदिमाग को बदल कर रख दिया है। पहले उन्होंने जम्मू कश्मीर को हासिल विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने का समर्थन किया। नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) पर वे दूसरे पाले में लुढ़कते दिखे और कहा कि इससे नागरिकों के बीच में “भय व्याप्त” हो रहा है। लेकिन शाहीन बाग़ पर एक बार फिर से पलटते नजर आये जब उन्होंने बीजेपी का मुकाबला नहीं करने का फैसला लिया और सीएए-एनआरसी-एनपीआर के मुद्दे पर चल रहे धरना-प्रदर्शन को कभी भी अपना समर्थन नहीं दिया। ज्यादातर मुसलमानों ने उस समय इस बात को स्वीकार कर लिया था कि केजरीवाल के पास विकल्प काफी सीमित हैं और विरोध प्रदर्शनों में उनके शामिल होने से ध्रुवीकरण हो सकता है। लेकिन इस सबके बावजूद केजरीवाल ने बेवजह कहा कि यदि दिल्ली पुलिस पर केंद्र सरकार के बजाय उनकी सरकार का नियन्त्रण होता तो वे इस “विरोध प्रदर्शन को दो घंटों के भीतर खत्म” कर सकते थे।

इसके बाद जैसे ही आप ने दिल्ली के चुनावों में जीत दर्ज की, केजरीवाल ने सबसे पहले कदम के तौर पर हनुमान मंदिर जाने की ठानी। आप नेता सौरभ भारद्वाज ने इसे वहाँ से उठाकर माँग कर डाली कि अयोध्या में जहाँ राम मंदिर बनाया जाना है वहां पर हनुमान की मूर्ति भी लगनी चाहिए, उस स्थल पर जहाँ कभी बाबरी मस्जिद हुआ करती थी। भले ही ये उटपटांग हरकतें एक तनी हुई रस्सी पर चलने का संकेत देते हों, लेकिन फरवरी और मार्च में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा के बाद भी आप की भूमिका कोई बेहतर नहीं रही है। यह सच है कि पुलिस का नियन्त्रण केंद्र सरकार के हाथ में है लेकिन लोग इस बात से खफा थे कि केजरीवाल ने ज्यादातर मुस्लिम पीड़ितों को लेकर कुछ नहीं कहा।

शायद केजरीवाल का मानना है कि “मुस्लिम मुद्दों” पर चुप्पी ही “हिन्दू मतदाताओं” को बीजेपी से दूर रख पाने का सबसे उत्तम मार्ग है। यही वजह है कि जब उनके सामने दो अलग-अलग रास्तों से टकराने की नौबत आई तो उन्होंने सॉफ्ट हिंदुत्व की राह चुनने का फैसला लिया है। उदाहरण के लिए आप सरकार ने केंद्र के राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ विधानसभा प्रस्ताव पारित किया था। दिल्ली हिंसा के बाद आप ने दंगा पीड़ितों के लिए राहत शिविरों और मुआवजे दिलवाने का प्रबंध किया। इतना ही नहीं, दिल्ली सरकार ने अब तक दो बार केंद्र द्वारा दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुने गए अधिवक्ताओं को ख़ारिज कर दिया है, लेकिन शायद ही कभी केजरीवाल ने पीड़ितों की ओर से कोई बात कही हो।

इस चुप्पी का अर्थ निश्चित तौर पर दिल्ली में चुनावों से परे है जहाँ आप ने हाल ही में 70 विधानसभा सीटों में से 62 पर जीत हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी। शायद उनकी पार्टी 2021 में होने जा रहे दिल्ली नगर निगम के चुनावों में अपनी जीत को लेकर बैचेन है। पंजाब और उत्तराखण्ड पर भी इसकी निगाहें जमी हुई हैं, जहाँ 2022 में चुनाव होने हैं। पंजाब में आप को तब झटका लगा जब इसने धार्मिक राजनीति के साथ छेड़छाड़ करने का काम किया था। और उत्तराखण्ड में चुनावी नतीजे धर्म के बजाय जातीय समीकरण से कहीं ज्यादा निर्धारति होते हैं। यही वजह है कि यह बात हैरान करने वाली है कि केजरीवाल हिन्दुओं को लुभाने में क्यों लगे हुए हैं, उन्हें प्रतिद्वंदी हिंदुत्व के खतरे का अहसास नहीं हो पा रहा है।

पहला यह कि बीजेपी का कट्टर हिंदुत्व बेहद आसानी से अपने नरम हिंदुत्व वाले प्रतिद्वंदियों को पटखनी देने में कामयाब हो सकता है। आखिरकार “सॉफ्ट” हिंदुत्व भी “हार्ड” हिंदुत्व के सापेक्ष ही हुआ। यदि बीजेपी ने अपने अल्पसंख्यक-विरोधी जुमलेबाजी और नीतियों को जोर-शोर से उठाना शुरू कर किया तो उसे पकड़ पाने में आप के हाथ-पाँव फूल सकते हैं। इसे चुप्पी से हिंदुत्व के मौन समर्थक के तौर पर खड़े रहने की और ठेला जा सकता है। दूसरा यदि “हिन्दू मतदाताओं” को अपनी और लुभा पाने की आप की रणनीति असफल साबित हो जाती है तो इसे केजरीवाल द्वारा बीजेपी को सत्ता पर पहले से ज्यादा मजबूत पकड़ बनाने में मदद करने के तौर एक और सुबूत के तौर पर देखा जायेगा। तीसरा बीजेपी की रणनीति को अपनाकर आप के पास अपने ही समर्थकों से हाथ धोने का खतरा बन गया है। लिबरल हिन्दू हमेशा के लिए केजरीवाल से दूर जा सकते हैं, जो किनारे पर बैठे हैं उनका मोहभंग हो सकता है, मुसलमान अन्य दलों को वोट कर सकते हैं- और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि “हिन्दू वोट” आप की ओर खिसक कर आ जाएँ।

केजरीवाल इस बात को भूल रहे हैं कि 2011 से लेकर 2020 के बीच में भारी संख्या में लोगों ने उनका समर्थन इसलिए किया था क्योंकि उन्होंने आप में बीजेपी और कांग्रेस के विकल्प को देखा था। उन्हें केजरीवाल पर यकीन था जब उन्होंने कहा था कि आईएसी में शामिल होकर वे “क्रांति” का हिस्सा बन रहे हैं। आप ने अपनी स्वच्छ प्रशासन की छवि को बुनियादी सेवाओं जैसे कि स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, स्वच्छ पेयजल, सस्ती बिजली एवं अन्य मुद्दों पर अभियान के जरिये आगे बढ़ाया था। ये अभियान जारी हैं लेकिन उन्होंने अब सॉफ्ट हिंदुत्व को भी इसमें शामिल कर लिया है। यह केजरीवाल और उनकी राजनीति के प्रति जूनून में कमी लाने जा रहा है क्योंकि लोग किसी ऐसे नेता के साथ खुद की पहचान को जोड़कर नहीं रखना चाहते, जिसके पास अपने खुद की कोई दृढ राय न हो।

2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों में आप के अनुभव ने इस बात को साबित कर दिया था कि पहचान की राजनीति से केजरीवाल सफलता हासिल नहीं कर सकते। उस दौरान आप ने सिखों को लुभाने की कोशिश की थी, लेकिन एक बार उनकी पार्टी पर “खालिस्तानियों को समर्थन देने” का आरोप चस्पा हुआ, तो सिख मतदाताओं के एक वर्ग के साथ-साथ हिन्दुओं के बीच में पूरी तरह से केजरीवाल का पत्ता साफ़ हो गया था। अब चूँकि उन्होंने मुसलमानों के पक्ष में कोई बात नहीं की है, पंजाब में आप की संभावनाएं और भी धूमिल होती नजर आ रही हैं, क्योंकि सिख भी खुद को एक अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर देखते हैं। पंजाब के हिन्दू मतों के भी आप, कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी और अकाली दल के बीच में विभाजित होने की संभावना है, क्योंकि दोनों अब सहयोगी दल नहीं रहे।

इन्हीं सब वजहों को देखते हुए केजरीवाल को गवर्नेंस के मुद्दे पर ही टिके रहना चाहिए जिसने मूल रूप से मतदाताओं, खासकर युवाओं को अपनी ओर आकर्षित किया था। उनका सबसे बड़ा समर्थन आधार गरीबों के बीच में है, जो उनसे सुशासन की उम्मीद रखते हैं, ना कि मंदिर, चर्च और मस्जिद में जाकर दर्शन करने की। यदि केजरीवाल कहीं से भी बीजेपी को बेअसर कर सकते हैं तो ऐसा वह हितों की राजनीति को और अधिक धारदार बनाकर ही कर सकते हैं, न कि पहचान की राजनीति के जरिये। बीजेपी के पाले में खेलकर केजरीवाल अपनी ही पार्टी के मूल एजेण्डे से हाथ धोने का खतरा मोल ले रहे हैं जो कि इसके समर्थन का मुख्य स्रोत है।

बिहार में बीजेपी के हालिया बेहतर प्रदर्शन को देखने से भले ही यह धारणा पुख्ता होती हो कि चुनावी जीत के लिए “हिन्दू हितों” को उठाते रहना ही सफलता की मुख्य कुंजी साबित हो सकती है। 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नेताओं ने हिन्दू धार्मिक हस्तियों से संपर्क साधकर जीत हासिल की थी। हालाँकि महाराष्ट्र में बीजेपी ने मतदाताओं के ध्रुवीकरण की कोशिश की लेकिन इसके बावजूद वह पिछले साल चुनाव जीत पाने में असफल रही, जैसा कि यह झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में नाकामयाब रही थी और इससे पूर्व राजस्थान में भी यह देखने को मिला था। किसी भी सूरत में हिन्दू कार्ड आप को मदद करने नहीं जा रहा है। कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता की धार को पहले से ही कुंद कर डाला है और बीजेपी इसके संपूर्ण खात्मे को लेकर तत्पर है। इस दलदल में शामिल होने की दौड़ में आप केवल दौड़-भाग ही कर सकती है। जिस काम को करके वे सोचते हैं कि वे हिन्दुओं को खुश कर रहे हैं बजाय कि उनके अंदर सुधार लाने के, तो केजरीवाल की यह जीत भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद और संविधान की कीमत पर उन्हें हासिल हो सकती है। 

हो सकता है कि केजरीवाल यह साबित करने में लगे हों कि वे “हिन्दू विरोधी” नहीं हैं, जैसा कि बीजेपी का कहना है और वे अपने गवर्नेंस को साबित करने का मौका चाहते हों, लेकिन यह तय है कि वे राज्य को बीजेपी की आकांक्षाओं के अनुरूप ढालने में लगे हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे एक हिन्दू राज्य के निर्माण में मददगार साबित हो रहे हैं। यदि उनकी राजनीतिक बयानबाजी में कोई अंतर नहीं दिखता तो यह बात भी कोई मायने नहीं रखती कि चुनावों में आप जीतती है अथवा बीजेपी।

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख पढ़ने  के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

In Playing Hindu Card, is Kejriwal Compromising his Identity?

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