NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
तमाम दिक्कतों के बावजूद एक साथ आगे बढ़ सकते हैं भारत और चीन
आख़िर भारत और चीन के संबंधों में कौन-कौन से बाधक हैं और कहां कुछ प्रगति की जा सकती है? या फिर मोदी और ट्रंप की ‘हाउडी मोदी’ मुलाकात की तरह यह शिखर सम्मेलन भी बहुत सारे सपनों और बिना किसी ठोस प्रगति के ख़त्म माना जाए।
उज्ज्वल के चौधरी
13 Oct 2019
modi jinping
image courtesy: The print

धरोहर शहर मामल्लापुरम, जहां भारत और चीन अपने व्यापार संबंधों की प्राचीन जड़ें खोज सकते हैं। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पारंपरिक पोशाक पहनकर, पश्चिमी वेशभूषा में पहुंचे चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का स्वागत किया। दोनों ने हाथ मिलाया और एक दूसरे की तरफ मुस्कान बिखेरी। कुल मिलाकर दृश्य बेहद शानदार रहा।

दोनों नेताओं की सीधी मुलाकात का यह तीसरा मौका था। इससे पहले गुजरात में साबरमती नदी के किनारे और उसके बाद वुहान मीट में दोनों नेताओं की एक-दूसरे से सीधी मुलाकात हुई थी। हालांकि दोनों नेताओं ने कम से कम दस मौकों पर एक दूसरे का सामना किया है। इसमें रूस-चीन-इंडिया फोरम, एससीओ (शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन) मीट, ब्रिक्स मीट और जी-20 मीट की मुलाकातें शामिल हैं। इन सभी मुलाकातों के बाद विदेश सचिव स्तर के डॉयलॉग होते हैं, इनकी शुरूआत 1988 में हुई थी। तब 2003 से शुरू ‘अधिकार प्रदत्त विशेष प्रतिनिधि’ स्तर की मुलाकात होती है। 

तो सब कुछ अच्छा है, लेकिन फिर भी कोई बहुत बड़ी खबर सामने नहीं आई। बिना एजेंडा वाले एक अनौपचारिक शिखर सम्मेलन से बड़े नतीजों की उम्मीद नहीं होनी चाहिए। चार दिन पहले तक किसी भी पक्ष ने उपस्थिति की पुष्टि नहीं की थी। जरूरी है कि इस तरह की वैश्विक मेल-जोल से कोई ठोस उन्नति हो। 

प्रगति में बाधक

आखिर भारत और चीन के संबंधों में कौन-कौन से बाधक हैं और कहां कुछ प्रगति की जा सकती है? या फिर मोदी और ट्रंप की हाउडी मोदी मुलाकात की तरह यह शिखर सम्मेलन भी बहुत सारे सपनों और बिना किसी ठोस प्रगति के खत्म माना जाए।

पहला, भारत और चीन में व्यापार अंसतुलन काफी ज्यादा है, भारत का व्यापार घाटा 54 बिलियन डॉलर का है। भारत लगातार इस मुद्दे को उठाता रहा है, लेकिन वुहान की अनौपचारिक मुलाकात तक भी किसी किस्म की प्रगति नहीं हुई। निर्यात में अपने उत्पाद और सेवाओं के लिए भारत बिना बाधा के बराबरी का मैदान चाहता है। वह लगातार चीन से भारत में ज्यादा निवेश करने की भी मांग करता रहा है। लेकिन दोनों मोर्चों पर भारत को कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी।

अमेरिका और चीन में जारी ट्रेड वार के चलते भारत, चीन के लिए एक आकर्षक व्यापारिक केंद्र बन जाता है, लेकिन चीन से अगर भारतीय बाजारों में सिर्फ आयात ही होता रहा, तो इससे बस व्यापार घाटा ही बढ़ेगा। चीन की अर्थव्यवस्था, भारत से पांच गुनी (भारत 2.8 ट्रिलियन डॉलर और चीन 14 ट्रिलियन डॉलर) बड़ी है। इसलिए वो हमें नजरंदाज कर सकता है। लेकिन यह भारत के पक्ष में होगा कि वह व्यापार घाटे को 53 बिलियन डॉलर से कम कर अगले पांच सालों में 10-12 बिलियन डॉलर तक ले आए।

दूसरा, भारत इस मुगालते में है कि वह चीन के साथ रणनीतिक क्षमता रखता है, यह बेहद गलत बात है। न केवल चीन की अर्थव्यवस्था बड़ी है, बल्कि उसकी सेना भी ज्यादा ताकतवर और सुनियोजित है। वह अपने ज्यादातर हथियार खुद बनाता है, जबकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार और गोलाबारूद का आयातक  है। दूसरी तरफ चीन भारत की पाकिस्तान से तुलना करता है और पाकिस्तान पर भारत की आर्थिक, सैन्य, लोकतांत्रिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और शैक्षणिक श्रेष्ठता को नजरंदाज कर देता है। दोनों तरफ से यह खत्म होना चाहिए।

तीसरा, दूसरी बात को ही आगे बढ़ाते हुए कहना होगा कि दोनों देशों को हिमालय सीमा, खासकर अरुणाचल प्रदेश और ट्रांस काराकोरम रेंज में झड़पों को कम करना होगा। एक उच्च स्तरीय प्रणाली बनानी चाहिए और सीमा प्रबंधन के लिए आपसी सैन्य विश्वास को मजबूत करने वाले कदम उठाने चाहिए। ताकि आगे डोकलाम जैसी स्थिति से बचा जा सके। भले ही डोकलाम भारत के संरक्षित राष्ट्र भूटान में हो, लेकिन वहां चीन ने भारत की चिढ़ को बढ़ाते हुए स्थायी निर्माण कर रखा है।

चौथा चीन और भारत को अपने राजनायिक संबंधों की 70वीं सालगिरह मनानी चाहिए, जो माओ के चीन और नेहरू के भारत के बीच 1950 में शुरू हुए थे। यह दुनिया की दो सबसे पुरानी सभ्यताओं और सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक-सैन्य-तकनीकी शक्तियों को पास लाने का काम करेगी। दूसरी तरफ लोगों से लोगों का संबंध और सांस्कृतिक गठजोड़ बढ़ाने के लिए आपसी यात्राएं, फिल्म फेस्टिवल, चीन में इंडिया फेस्ट और भारत में चाइना फेस्ट का आयोजन करना चाहिए। साथ ही शैक्षणिक, औद्योगिक और आधिकारिक यात्राओं को बढ़ाना चाहिए।

पांचवां, कई बार एशिया की शताब्दी कहे जाने वाले युग की दो एशियाई शक्तियों को दुनिया के सामने इज्जत पाने के लिए मध्य-पूर्व संकट, जलवायु परिवर्तन, प्राचीन कला और धरोहरों के संरक्षण जैसे मुद्दों पर कुछ एकरूपता दिखानी चाहिए। एक ऐसा चीन जो भारत को उपमहाद्वीप तक सीमित कर देना चाहता है और एक भारत जो दुनिया के मंचों पर चीन को नजरंदाज कर देता है, ऐसा दोनों देशों के हित में नहीं है।

आज हम कहां खड़े हैं?

मोदी ने 2014 के चुनावी कैंपेन में लगातार चीन को लाल आंखें दिखाने की बात कही थी। लेकिन वो नरमी के साथ डोकलाम से हट गए और कभी अक्साई चीन की भी बात नहीं की। हालांकि आजकल पीओके पर खूब बात होती है।

मोदी सत्ता में आने के बाद शी से 11 बार मिल चुके हैं। लेकिन आज तक एक भी वजनदार समझौता नहीं हुआ। अतीत में भी चीन के मोर्चे पर सतर्कता के चलते भारत अमेरिका, खासकर पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में सावधान रहा है। हाल ही में भारत ने हुवावेई की 5G ट्रॉयल्स को भारत में अनुमति दे दी, जबकि कंपनी पर चीन के लिए जासूसी करने का आरोप लगता रहा है। भारत अक्सर अमेरिका और चीन के त्रिकोण में चीन के साथ अपनी सहूलियत या ताकत को जरूरत से ज्यादा मान लेता है।

शी को अपने हाथों में शक्ति केंद्रित करने के लिए जाना जाता है और उन्होंने यह तय कर दिया है कि मरने तक वही अपने देश के सर्वोच्च नेता बने रहें। अब वो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन का प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। यही ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ है, जिससे क्षेत्र में बड़ी आधारभूत संरचना का निर्माण होगा और इससे चीन का व्यापारिक और सैन्य हित भी आगे बढ़ेंगे। भारत इसका विरोध कर रहा है।

अमेरिका के साथ जारी व्यापारिक युद्ध में शी को नकारात्मक परिणाम मिल रहा है। इसलिए चीन को भारत की आज सबसे ज्यादा जरूरत है। आर्थिक, सैन्य और तकनीकी विकास में केवल अमेरिका से पीछे, एक महाशक्ति के तौर पर उभरते चीन को ‘मित्र भारत’ की जरूरत है। लेकिन पिछले 6 सालों में 11 मुलाकातों के बाद भी सभी उपाय भारत के हितों के लिए हानिकारक रहे हैं। इसमें पाकिस्तान को चीन का मौखिक समर्थन और हाल ही में कश्मीर मुद्दे को सुरक्षा परिषद में ले जाने की कोशिश भी शामिल है।

शी का कश्मीर मुद्दे का हल यूएन प्रस्ताव के हिसाब से करने की बात भी भारत को पसंद नहीं आई। साथ ही चीन ने सक्रिय तौर पर सुरक्षा परिषद और न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत के प्रवेश का विरोध किया है।

आगे क्या?

चीन के साथ कोई बड़ा समझौता लगभग असंभव है। तो छोटी शुरूआत करते हुए ट्रेक-2 डिप्लोमेसी और सांस्कृतिक संबंधों को बनाने के लिए आपसी संबंधों की 70 वीं सालगिरह मनाई जाए। सीमा पर आपसी सैन्य विश्वास को बनाने के लिए छोटे-छोटे उपाय किए जाएं। चीनी निवेशकों को भारत में आने दिया जाए (कई आना चाहते हैं, लेकिन उन्हें आधिकारिक समस्याएं आती हैं)। उनके व्यापार को सुलभ बनाया जाए।

एक दूसरे की संस्कृति, धरोहर, कला, दर्शन, खान-पान और सिनेमा को बढ़ावा दिया जाए। चीन में भारतीय निर्यात को बढ़ावा देने की कोशिश हो। भारत में सार्वजनिक अधारभूत संरचना विकास के लिए चीन की मदद ली जाए। हाल के लिए विवाद के मुद्दे, जैसे- कश्मीर और दक्षिण चीन सागर, इनको दूर रखा जाए। दुनिया के सामने साझा चुनौतियों पर एकराय बनाई जाए, जिससे वैश्विक स्तर पर एशिया का मजबूत चेहरा दिखे। साथ ही इस नाजुक वक्त में बड़बोले प्रचार को भारत और चीन के बीच में नहीं आने देना चाहिए।

China India optics
Modi Xi meetings
Diplomacy and South Asia
Modi diplomacy outcome
India-China Relations
Narendra modi
Xi Jinping

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • शिरीष खरे
    कोरोना लॉकडाउन के दो वर्ष, बिहार के प्रवासी मज़दूरों के बच्चे और उम्मीदों के स्कूल
    16 Apr 2022
    सरकारी स्कूलों में खास तौर से गरीब परिवारों के बच्चे बड़ी तादाद में आ रहे हैं। इनमें से कई बच्चे प्रवासी मजदूर परिवारों से हैं।
  • न्यायमूर्ति के चंद्रू
    जय भीम: माई जजमेंट इन द लाइट ऑफ़ अंबेडकर
    16 Apr 2022
    2 नवंबर, 2021 को दुनिया भर में विकिपीडिया में जिन शब्दों को सर्च किया गया था, उनमें सबसे लोकप्रिय शब्द जय भीम था।
  • मुकुंद झा
    दिल्ली पुलिस का ये कहना कि धर्म संसद में हेट स्पीच नहीं हुई, दुर्भाग्यपूर्ण है: पूर्व आईपीएस अधिकारी
    16 Apr 2022
    पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में दिल्ली पुलिस के रवैये पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए इसे काफी दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि पुलिस नफ़रती भाषण देने वालों पर कार्रवाई नहीं…
  • विजय विनीत
    प्रयागराज: घर में सोते समय माता-पिता के साथ तीन बेटियों की निर्मम हत्या!
    16 Apr 2022
    घटनास्थल को देखकर लग रहा था कि मरने से पहले सभी ने हमलावरों का प्रतिरोध किया था। चारों के शवों पर कपड़े अस्त-व्यस्त हो गए थे। इस वारदात को खुदकुशी का एंगल भी देने की कोशिश की गई है।
  • पी.रमन
    कैसे चुनावी निरंकुश शासकों के वैश्विक समूह का हिस्सा बन गए हैं मोदी और भाजपा
    16 Apr 2022
    मोदी और भाजपा को बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट फंडिंग, बड़े बजट के सोशल मीडिया और ग्राउंड नेटवर्क और अंततः हिंदी समाचार चैनल के कट्टर एंकरों और मालिकों का समर्थन हासिल हो चुका है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License