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कोविड-19
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भारत में कोविड की दूसरी लहर : क्या सरकार इसे संभाल सकती है?
लगता है कि अव्यवस्थित नीति और पिछली ग़लतियों से सीखने में अक्षम मोदी सरकार अभी भी उसी रास्ते पर चल रही है।
सुबोध वर्मा
09 Apr 2021
Translated by महेश कुमार
भारत में कोविड की दूसरी लहर : क्या सरकार इसे संभाल सकती है?

भारत तथाकथित दूसरी लहर के चलते कोविड-19 संक्रमण की सुनामी का सामना कर रहा है। 7 अप्रैल को एक दिन में सबसे अधिक नए मामले यानि 1.27 लाख मामले दर्ज किए गए, जो कि पिछले साल 16 सितंबर को दर्ज किए गए 97,894 से काफी ऊपर है। [नीचे चार्ट देखें]

जो सबसे डरावनी बात वह यह कि: कुछ विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की है कि नए मामले बढ़ कर अप्रैल के मध्य तक अपने चरम पर पहुंचेंगे, लेकिन देखें तो पिछले साल का तजुरबा असफल  मॉडल और अनुमानों से अटा पड़ा है। इसलिए, इस बात को स्वीकार करने में कोई गलती नहीं  होगी कि यह बहुत ही गंभीर संकट है जिसकी गंभीरता को समान रूप से समझने की जरूरत है, और वह भी बड़ी तेजी के साथ ताकि स्थिति को जल्दी नियंत्रण में लाया जा सके।

इस संबंध में लंबे समय से तर्क दिया जा रहा था कि भारत को वास्तव में उस तरह की कोविड मौतों का सामना नहीं करना पड़ा जैसा कि यूरोपीय देशों और अमेरिका, मैक्सिको और ब्राजील को करना पड़ा है, और इसलिए संकट का मूल्यांकन उन देशों की स्थिति के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। भारत बेहतर स्थिति में है, हर वक़्त यही तर्क दिया जाता रहा है, क्योंकि केसों की बड़ी संख्या होने के बावजूद मरने वाले लोगों की संख्या काफी कम हैं।

यह एक खतरनाक और खुद को खुश करने वाली बात है क्योंकि इस तर्क से वायरस से बीमार पड़ने वाले लोगों को होने वाले नुकसान को कम करके आँकने की बड़ी गलती की जा रही है। अब तक, स्वास्थ्य मंत्रालय के डेटा के अनुसार, 30 जनवरी, 2020 से भारत में कोविड-19 से  कुछ 1.28 करोड़ लोगों के संक्रमित होने की रपट को आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया है। निश्चित तौर पर यह एक अनुमान है कि लाखों लोग प्रभावित हुए होंगे, लेकिन उनकी जांच नहीं हुई और इसलिए उनकी गिनती भी नहीं की गई है।

सिरो-सर्वे बीमारी फैलने के पैमाने का संकेत देते हैं - तीसरे सीरो-सर्वे के परिणामों से पता चला कि लगभग 21 प्रतिशत वयस्कों (18 वर्ष से अधिक) और 25 प्रतिशत बच्चों (10-17 वर्ष) में कोरोनोवायरस के एंटीबॉडी पाए गए हैं, यानि वे जो वाइरस से संक्रमित हो गए थे। यह सर्वेक्षण दिसंबर-2020, जनवरी-2021 में किया गया था। इसका मतलब है कि लगभग 19 करोड़ वयस्क वाइरस से संभावित रूप से संक्रमित हुए हैं। 

आमदनी का नुकसान, और परिवारों  के बजट पर बढ़ता बोझ पहले से ही हालात को बिगाड़े दे रहा है, उस अपर अगर इलाज़ पर कीमती संसाधनों झोक दिया जाता है तो उससे अन्य खर्चों में बड़ी कटौती होगी, इससे परिवार के सदस्यों में संक्रमण का खतरा ओर भी बढ़ जाता है क्योंकि आवास कि स्थिति बहुत दयनीय होती है – इस सब का मतलब है कि लोगों को भारी नुकसान हुआ होगा। बेशक, कई लोगों में हल्के लक्षण पाए गए होंगे, लेकिन फिर भी हम करोड़ों में बात कर रहे हैं। कम मृत्यु दर के मामले में खुशी जताने के चक्कर में अक्सर इस गंभीर वास्तविकता को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

पहले की ही तरह, संक्रमित होने वाले लोगों में मृत्यु दर अभी भी कम है, और वर्तमान में यह पहले की दैनिक मृत्यु दर से लगभग आधी है। [नीचे दिया गया चार्ट देखें] हालांकि, यह स्वागत योग्य है, लेकिन फिर से, इन आंकड़ों के विश्लेषण में सावधानी बरतने की जरूरत है। यहां तक कि एक दिन में 685 लोगों का मारना अनुचित और चौंकाने वाला हैं।

और, मृत्यु दर अभी भी बढ़ सकती है क्योंकि मृत्यु एक लंबे समय अंतराल के बाद होगी, जिसका अनुमान अस्पताल में भर्ती होने के 14 दिन बाद होगा। जैसे-जैसे मामलों की संख्या में तेजी आएगी, वैसे-वैसे दुर्भाग्य से मौतें भी बढ़ेंगी। इसके साथ अस्पताल की सुविधाओं से संबधित वही मुद्दे मुह बाए खड़े होंगे जैसे कि क्रिटिकल देखभाल और वेंटिलेटर आदि का उपलब्ध होना।

संक्रमण की वजह से दैनिक मौतों का ऊपर की ओर जाना स्पष्ट संकेत है। जिस दर से यह ऊपर चढ़ा है वह अपने आप में चौंकाने वाला है - दो सप्ताह में, इसकी बढ़ाने की दर 151 प्रतिशत है। और रुझान अभी भी तेजी से बढ़ने के मिल रहे है। लेकिन हम अभी चरम पर नहीं पहुंचे हैं।

मोदी सरकार जो अभी भी भूल रही है 

सबसे पहले, महामारी के विज्ञान की दृष्टि से, जांच और संपर्क अनुरेखण यानि कोंटेक्ट ट्रेसिंग का काम केवल कागज पर ही है - या कहें सिर्फ शब्दों में ही रह गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी हाल ही में कुछ दिनों पहले इसी मंत्र को दोहराया था। लेकिन वास्तव में, देशव्यापी जांच अभी भी गड्ड-बड्ड है, इसमें कर्मकांड अधिक और ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए उस पर गौर बहुत कम है। दैनिक जांच बहुत धीरे-धीरे बढ़ रही है जबकि संक्रमण की दूसरी लहर तेज़ है, पहले की तरह ही इसमें देरी हो रही है। [अखिल भारतीय जांच के नीचे दिए चार्ट को देखें]

इसके अलावा, कोंटेक्ट ट्रेसिंग और इसके बाद (आइसोलेशन, इलाज़ आदि) सभी सार्थक बातें लागू नहीं होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मोदी सरकार ने इस सबकी ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की दहलीज पर डाल दी है।

दूसरा, केंद्र सरकार का राज्य सरकारों के साथ संबंधों में खराब प्रबंधन है। महामारी की रोकथाम या इसके नुकसान को कम करने के प्राथमिक कार्य के लिए राज्यों से अपेक्षा करने में कुछ भी गलत नहीं है। वास्तव में, कानूनी रूप से कहा जाए, तो इसके लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं और वे ही हैं जिन्हें इसे जमीन पर लागू करना होगा। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या राज्यों सरकारों के पास संसाधन हैं? क्या पिछले एक साल में लोगों को कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग के लिए प्रशिक्षित करने का कोई प्रयास किया गया है? क्या मोदी सरकार ने राज्यों को आर्थिक या तकनीकी रूप से इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभाने में मदद की है? सभी उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि ऐसा नहीं किया गया है। केंद्र सरकार लोगों को अध्यातम का ज्ञान और राज्य सरकारों को परामर्श देने पर ज़ोर दिए हुए है, और खुद अन्य देशों को वैक्सीन देने, या इस या उस आकस्मिक स्थिति के बारे में योजना बनाने आदि जैसे कार्य लगी है हैं।

8 अप्रैल को, प्रधानमंत्री मोदी महामारी पर राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करने वाले हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसके पहले उन्होने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ ग्यारह बैठकें की हैं। यह बात भी काफी उल्लेखनीय है कि ये बैठकें आम तौर पर सलाह देने के लिए की जाती हैं न कि किसी आम रणनीति पर काम करने के लिए।

मोदी ने 24 मार्च की रात को देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा से कुछ दिन पहले 20 मार्च, 2020 को पहली बैठक आयोजित की थी। इस बैठक में, लगता है, देश को लॉक करने की कोई योजना का उल्लेख नहीं किया गया था। इस तरह की गोपनीयता पूरी तरह से अनावश्यक थी - लोगों को पहले सूचना देने से अधिक लाभ होता। इसी तरह, लॉकडाउन बढ़ाने या उसे खोलने से पहले भी सुचना दी जानी चाहिए थी। यह सब कोविड-19 के पिछले साल सितंबर-नवंबर में अपने चरम पर पहुंचने से पहले हुआ था। अंत में, वैक्सीन रोलआउट 16 जनवरी को शुरू हुई, वह भी बिना मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक किए, जो अंततः दो महीने बाद यानि 17 मार्च को की गई थी। 

तीसरी, और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात, वह यह कि केंद्र सरकार ने खजाने पर शिकंजा कश कर रखा। महामारी के समय न केवल स्वास्थ्य सेवा के लिए बल्कि बीमारी से प्रभावित लोगों का आर्थिक समर्थन करने के साथ-साथ सामान्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर धन लगाने की जरूरत होती है। पिछले साल कुछ महीनों तक, जनधन खाता धारकों को खाद्यान्न और 500 रुपये प्रति माह दिए गए थे। यह बहुत कम समर्थन था और जिसके कारण हताश लोगों को सबसे दयनीय यातना से गुजरना पड़ा - सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना, भूखे या आधे पेट ज़िंदा रहना, शिक्षा का नुकसान, अन्य जरूरतों के लिए चिकित्सा सेवाओं की कमी, आदि ने हालात ओर गंभीर बना दिए थे। 

यह न सिर्फ अतीत और विलाप की ओर इशारा करता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, हर बीतते दिन बढ़ती महामारी से स्थिति बिगड़ती जा रही है और देश के लोगों को बचाने के लिए, पिछली गलतियों को सुधारते हुए प्रभावी कार्रवाई करने की जरूरी है। अन्यथा, बढ़ती महामारी के चलतेब आम लोगों की दुख-तकलीफ के अधिक बढ़ने की संभावना है।

(डाटा पीयूष शर्मा ने तैयार किये हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

India’s Second COVID Wave – Can the Govt Handle it?

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Lockdown
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COVID Daily Cases
Modi Govt
Covid Testing
Covid Tracing

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