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भारत
राजनीति
भाषा के आधार पर बना भारत का एकमात्र विश्वविद्यालय घोर आर्थिक संकट में
यह राजकीय विश्वविद्यालय पंजाब का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, इसके अंतर्गत 271 कॉलेज आते है। यह पहली बार हो रहा है कि इसके अध्यापकों, कर्मचारियों और पेंशनर्स को तनख्वाहें और अन्य भुगतान देरी से हो रहे हैं।
शिव इंदर सिंह
23 Apr 2021
Punjabi University Patiala
पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला। फोटो साभार : The Tribune India

भाषा के आधार पर बना दुनिया का दूसरा और भारत का पहला विश्वविद्यालय, ‘पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला’ इस समय घोर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। मोटे अनुमान के अनुसार यूनिवर्सिटी ढाई सौ करोड़ रूपये के घाटे में चल रही है।

यह राजकीय विश्वविद्यालय पंजाब का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है, इसके अंतर्गत 271 कॉलेज आते है। यह पहली बार हो रहा है कि इसके अध्यापकों, कर्मचारियों और पेंशनर्स को तनख्वाहें और अन्य भुगतान देरी से हो रहे हैं। कई अहम पद खाली पड़े हैं।

पंजाब के बुद्धिजीवी इस यूनिवर्सिटी को पंजाब व पंजाबियत के आस्तित्व का प्रतीक मानते हैं। इस यूनिवर्सिटी में पंजाब के सबसे बड़े क्षेत्र मालवा के बड़ी गिनती में नौजवान पढ़ते हैं, जिनमें से ज्यादातर गरीब किसानों व दलित परिवारों से सम्बन्धित हैं।

इस बार पंजाब विधानसभा में भी पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला का मुद्दा भारी रहा। विपक्षी पार्टियों ने कैप्टन अमरिंदर सरकार पर आरोप लगाया कि वह यूनिवर्सिटी की कोई सहायता नहीं कर रही। गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर की अपेक्षा पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला आर्थिक तौर पर काफी पीछे चली गई है।

उच्च शिक्षा विभाग द्वारा जो आंकड़े दिए गए हैं उसके अनुसार पंजाबी यूनिवर्सिटी की मौजूदा समय में 235.49 करोड़ रुपये की देनदारी है। यूनिवर्सिटी के कुल खर्चे का 50 प्रतिशत हिस्सा विद्यार्थियों की फीसों से आता है। इस बार के पंजाब बजट में पंजाबी यूनिवर्सिटी के लिए 90 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। आम आदमी पार्टी के विधायक बुद्ध राम ने कहा है कि यूनिवर्सिटी को कम से कम 500 करोड़ रुपये की फौरी जरूरत है। पंजाब सरकार ने यूनिवर्सिटी को रिसर्च वर्क के लिए पिछले तीन सालों में फूटी को कौड़ी तक नहीं दी है। जबकि गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर को इन तीन सालों में पंजाब सरकार ने खोज कार्यों के लिए 33.42 करोड़ रूपये दिए हैं। गुरु नानक यूनिवर्सिटी को अन्य स्रोतों से खोज कार्यों के लिए 120.65 करोड़ रुपये मिले हैं और केंद्र सरकार से इस यूनिवर्सिटी को 87.37 करोड़ रूपये प्राप्त हुए हैं।

कुछ आलोचक पंजाबी यूनिवर्सिटी के आर्थिक संकट का कारण वहां हुई ज्यादा भर्तियों को भी मानते हैं।

सूत्रों ने हमें बताया कि पंजाबी यूनिवर्सिटी इस पड़ाव पर पहुंच गई है कि उसके छोटे-छोटे चेक भी बाउंस होने लगे हैं। यूनिवर्सिटी ने करीब 150 करोड़ रुपये का कर्जा भी उठाया हुआ है।

सन् 1992 से ही सरकार ने यूनिवर्सिटी ग्रांट को लगातार घटाया है व अपने दखल को बढ़ाया है। एक तरफ राज्य में निजी विश्वविद्यालयों की गिनती बढ़ रही है दूसरी तरफ सरकारी मदद से चल रहे विश्वविद्यालयों की तरफ सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही। पंजाबी यूनिवर्सिटी का प्रति माह के वेतन व पेंशन का बजट 28 करोड़ रुपये से अधिक है। यूनिवर्सिटी में लगभग 4500 कर्मचारी हैं। राज्य सरकार से हर महीने 8.74 करोड़ रूपये की ग्रांट मिलती है।

पंजाबी यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के प्रधान डॉ. निशान सिंह देओल ने मांग उठाई है कि यूनिवर्सिटी को वित्तीय संकट से उभारने के किये पंजाब सरकार एक पैकेज दे। यूनिवर्सिटी की फीसें बाकी यूनिवर्सिटीयों के मुकाबले बहुत कम हैं क्योंकि यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी नहीं एक विरासत है इसलिए सरकार को यूनिवर्सिटी की मदद करनी चाहिए।

पंजाबी यूनिवर्सिटी वित्तीय संकट के साथ-साथ सैंविधानिक संकट से भी जूझ रही है। यहाँ उप-कुलपति समेत कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। यूनिवर्सिटी के तीन दर्जन से अधिक अध्यापकों द्वारा 40 अतिरिक्त पदों से इस्तीफे दे दिए गए हैं जिसके चलते रजिस्ट्रार व डीन अकादमी की कुर्सियां खाली हो गई हैं। यूनिवर्सिटी एक तरह से बिना किसी वाली-वारिस के हो गई है। यूनिवर्सिटी के इतिहास में पहली बार रोषस्वरूप अध्यापकों ने बड़ी संख्या में प्रशासनिक पदों से इस्तीफे दिए हैं। डॉ. निशान सिंह देओल के अनुसार मौजूदा कार्यकारी वीसी के नियमित यूनिवर्सिटी ना आने के कारण यह मसला लगातार उलझ रहा है। इसका हल यही है कि पंजाब सरकार रेगूलर वीसी की नियुक्ति करे।

1961 के पंजाब एक्ट नंबर 35 के अंतर्गत 30 अप्रैल 1962 को पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला की स्थापना हुई। पंजाबी भाषा के नाम पर बनी इस यूनिवर्सिटी का मुख्य उद्देश्य पंजाबी भाषा, साहित्य, कला व सभ्याचार के साथ साथ अन्य विषयों में भी पंजाबी भाषा में पढ़ने व अध्ययन योग्य सामग्री उपलब्ध करवाना है। अपने 59 वर्षों के शानदार इतिहास के दौरान यूनिवर्सिटी ने अपने लक्ष्य को हर सम्भव तरीके से पूरा किया है। यह यूनिवर्सिटी पंजाबी भाषा में होने वाली खोजों का केंद्र बिंदु है। यहाँ पर ‘सिख इनसाइक्लोपीडिया’ तैयार किया गया है। पंजाबी भाषा की बड़ी डिक्शनरी ‘पंजाबी शब्द जोड़ कोश’ को तैयार करना यूनिवर्सिटी की बड़ी उपलब्धि रही है। पंजाब की सभी यूनिवर्सिटीयों से अधिक किताबों का प्रकाशन इस यूनिवर्सिटी के हिस्से आया है। पंजाबी यूनिवर्सिटी ने अन्य विषयों खासकर सामाजिक विज्ञान के विषयों को पंजाबी माध्यम में पढ़ाने, परीक्षा देने की सुविधा प्रदान करने, पंजाब के इतिहास को नये सिरे व विभिन्न पहलुओं से पड़ताल करने का काम किया है। मातृभाषा पंजाबी में विज्ञान विषय में विशेष कार्य करना व ‘विज्ञान दे नक्श’ नामक साइंस पत्रिका को प्रकाशित करना इस यूनिवर्सिटी की उपलब्धि रही है। पंजाबी बोली में सॉफ्टवेयर, मोबाइल ऐप व पंजाबी टाइपिंग सॉफ्टवेयर यूनिवर्सिटी लगातार तैयार कर रही है। यूनिवर्सिटी द्वारा विश्व साहित्य की शाहकार रचनाओं का पंजाबी अनुवाद किया है।

इस यूनिवर्सिटी ने डॉ. गंडा सिंह, डॉ. फौजा सिंह, डॉ. कृपाल सिंह, डॉ. तारन, डॉ. वजीर सिंह, डॉ. अतर सिंह, डॉ. रतन सिंह जग्गी, नाटककार डॉ. हरचरन सिंह, उपन्यासकार दिलीप कौर टिवाणा, पंजाबी के प्रसिद्ध कवि सुरजीत पात्र, जीवविज्ञानी डॉ. सुरजीत सिंह ढिल्लों, डॉ. हरदेव सिंह विर्क, अर्थशास्त्री डॉ. सुच्चा सिंह गिल जैसे विद्वान् पैदा किए हैं।

पंजाबी लेखक व विद्वान डॉ. भीम इंदर सिंह यूनिवर्सिटी के मौजूदा हालत के बारे अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं, “अपनी शानदार प्राप्तियों के बावजूद यूनिवर्सिटी पिछले कुछ समय से सरकारों की बेरुखी की शिकार है। यह यूनिवर्सिटी पंजाब के नौजवानों के लिए रोशनी का प्रतीक है। इस यूनिवर्सिटी को कमजोर करने का अर्थ है पंजाब, पंजाबी, पंजाबियत की जड़ों को कमजोर करना व हमारी बुनियाद को हिलाना। असल में सरकारों की नीयत ठीक नहीं है। मैं पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को याद करवाना चाहता हूँ कि उनके पिताजी का योगदान इस यूनिवर्सिटी की स्थापना में रहा है लेकिन उनके राज में यूनिवर्सिटी आर्थिक तौर पर कमजोर हो गई है।”

पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के अर्थशास्त्र विभाग की अध्यक्षा डॉ. अनुपमा उप्पल का कहना है, “यूनिवर्सिटी के वित्तीय घाटे के कई कारण बताये जाते हैं जैसे अधिक भर्तियाँ होना, वीसी की भूमिका आदि, पर मुझे लगता है कि ये सब गौण मुद्दे हैं सबसे बड़ी बात तो यह कि सरकारों की तरजीह शिक्षा होनी चाहिए जोकि नहीं है। जब सरकारें शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफ़े की बात सोचती है और उच्च शिक्षा संस्थानों से मुंह फेर लेतीं हैं तो मतलब साफ़ है कि सरकारें अपने नागरिकों को शिक्षित नहीं करना चाहतीं।”

पंजाबी यूनिवर्सिटी की आर्ट्स व कल्चर फैकल्टी की पूर्व डीन डॉ. निवेदिता सिंह हमें बताती है, “मसला बहुत उलझा हुआ व बहुपरती है जिसमें उच्च शिक्षा के निजीकरण, व्यापारीकरण और गलत राजनीतिक चालें दोषी है। इस संकट की बुनियाद 90वें दशक में रखी गई थी जब विश्व बैंक ने उच्च शिक्षा को सरकारों के ध्यान देने योग्य मसलों से बाहर करने को कहा। सन् 2000 में उस समय की केंद्र सरकार ने एक कमेटी बनाई जिसमें सदस्यों के तौर पर देश के बड़े उद्योगपति व व्यापारी भी शामिल हुए। इन सदस्यों ने सरकार को कहा कि उच्च शिक्षा मुनाफ़े का धंधा है इसे हमारे लिए छोड़ दिया जाये। धीरे-धीरे सरकारें स्टेट यूनिवर्सिटियों को खत्म करने के रास्ते पर चल पड़ीं। जहाँ इन शिक्षण संस्थानों को 95प्रतिशत वित्तीय सहायता सरकारों से मिलती थी उसमें धीरे-धीरे कट लगना शुरु हो गया। साथ ही यह भी कहा गया कि यूनिवर्सिटियां अपने वित्तीय साधन खुद जुटाएं। इसका सीधा असर यूनिवर्सिटियों की शैक्षणिक कार्यप्रणाली पर पड़ा। राजकीय यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों से ज्यादा फीसें नहीं ले सकतीं क्योंकि ऐसा करने पर पब्लिक यूनिवर्सिटी होने के धर्म की पालना नहीं होगी।”

डॉ. निवेदिता बेबाकी से कहती हैं,“चाहे पूरे मुल्क में स्टेट यूनिवर्सिटियों की हालत खस्ता है पर मेरा मानना है पंजाब की यूनिवर्सिटियों से ज्यादा धक्का किया जा रहा है। पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में पंजाब के सबसे बड़े क्षेत्र मालवा के छात्र पढ़ते है, मालवा क्षेत्र जन आंदोलनों का केंद्र रहा है यहाँ प्रगतिशील विचारधारा पनपती है। पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में से हमेशा साहित्यिक और प्रगतिशील धारायें निकली हैं शायद यही बातें सरकारों को नहीं भाती।”

रिपोर्ट लिखने तक पंजाब सरकार ने प्रो. अरविंद को पंजाबी यूनिवर्सिटी का नया वीसी नियुक्त कर दिया है। हालांकि अभी उन्होंने अपना पदभार नहीं संभाला है।

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