NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
भारत-नेपाल संबंध: पहले साझा थी महाकाली नदी, अब सरहद बन गई
जिस महाकाली नदी को टायर-ट्यूब पर बैठकर भारतीय-नेपाली लोग आसानी से पार कर जाया करते थे। अब ये नदी भी बंदूकों के साये में होगी। आपसी व्यवहार-व्यापार दोनों टूटेगा। आपसी सौहार्द के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को राजनीति की नज़र लग गई।
वर्षा सिंह
26 Jun 2020
 महाकाली नदी
image courtesy : Hindustan Times

नेपाल के साथ भारत का रिश्ता बड़े भाई-छोटे भाई वाला ही रहा। अब यही तकरार की वजह भी बन रहा है। नेपाल के नए राजनीति नक्शे और दावे ने सीमा के आरपार बसे लोगों को मुश्किल में डाल दिया है। इस देश के साथ उत्तराखंड सिर्फ सीमा ही नहीं साझा करता है बल्कि खेती-बाड़ी, बेटी-ब्वारी वाला रिश्ता भी बुना हुआ है। उत्तराखंड के लहलहाते खेतों की मिट्टी में नेपाली श्रमिकों की मेहनत बोयी हुई है। नेपाल के कई घरों में ख़ुशहाली का रास्ता उत्तराखंड के खेतों से होकर गुज़रता है।

उत्तराखंड के बंजर खेतों में नेपाली मज़दूरों ने उगाई फ़सल

चकराता के त्यूणी गांव में नेपाल से परिवार समेत आए पेरूमल लीज पर ज़मीन लेकर खेती करते हैं। वह बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से त्यूणी में ही रह रहे हैं। पहले खेत में मज़दूरी करते थे। थोड़ा मुनाफा हुआ। परिवार का बेहतर भरण-पोषण होने लगा। इसके बाद लीज़ पर ज़मीन लेकर खेती शुरू की। इस वर्ष लॉकडाउन के चलते उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन वे उत्तराखंड की मिट्टी में पूरी तरह रच-बस गए हैं।

त्यूणी में खेती कर रहे नेपाली मूल के पेरूमल.jpeg

टिहरी के चंबा में परिवार समेत रहने वाले पद्मबहादुर भी इन्हीं नेपाली श्रमिकों में से एक थे। कोरोना के डर से वे नेपाल के अपने जिले दैलेख वापस लौट गए। लॉकडाउन के समय पद्मबहादुर बेहद परेशान थे। नेपाल लौटने का पास बनवाने के लिए वे जिलाधिकारी कार्यालय के चक्कर काट रहे थे और मदद मांग रहे थे। पद्मबहादुर भी यहीं के खेतों में अपना पसीना बहाते थे। उन्होंने बताया कि यहां रोजगार मिल जाता है। बेहतर आमदनी हो जाती है। इसलिए नेपाल से लोग यहां आना पसंद करते हैं।

पूरे उत्तराखंड में नेपाली मज़दूर हर जगह मिलेंगे। पहाड़ों पर माल ढुलाई करना, राशन-गैस सिलेंडर जैसे सामान ढोने के काम तो वे करते ही हैं। खेती में मुनाफा नहीं होने, जंगली जानवरों से फसल को नुकसान जैसी मुश्किलों से परेशान होकर यहां के युवाओं ने महानगरों का रुख़ किया और उनके बंजर खेतों को इन नेपाली श्रमिकों ने अपनी मेहनत से हरा-भरा किया।

उत्तराखंड के सामाजिक कार्यकर्ता विजय जुयाल कहते हैं कि हमने गांव में रहते हुए अपने खेत बंजर छोड़े हैं, उन्हीं खेतों में नेपाली मूल के लोग टमाटर, मटर समेत सारी सब्जियां उगा रहे हैं। जिनके खेत हैं उन्हें भी वे सब्जियां देते हैं और अपना परिवार भी चलाते हैं। इस तरह दोनों ख़ुश रहते हैं। उत्तरकाशी में सेब के बगीचों की देखभाल भी नेपाली करते हैं। घोड़े-खच्चर चलाने वाले ज्यादातर नेपाली मिलेंगे। सड़क और घर निर्माण में भी नेपाली मज़दूर ही काम करते हैं।

रोजगार के लिए आए बहुत से नेपाली नागरिक समय के साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में बस भी चुके हैं। किसी के दादा यहां काम की तलाश में आए थे। किसी के पिता। किसी की कई पीढ़ियां यहीं गुज़र गईं।

धारचुला सड़क से नेपाल के नक्शे तक पहुंचा विवाद

8 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से धारचुला को लिपुलेख से जोड़ने वाली सड़क का उद्घाटन किया। जिस पर नेपाल ने आपत्ति दर्ज करायी। फिर नेपाल ने उत्तराखंड के तीन गांवों कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को अपने नए नक्शे में शामिल करने का संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश किया। धारचुला-लिपुलेख को जोड़ने वाली सड़क सामरिक दृष्टि से तो अहम बनी ही। हर साल कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले यात्रियों की मुश्किलों को कम करती है। यहां बसे गांवों के लोगों के लिए बड़ी राहत है। जहां पैदल मार्ग भी बहुत कठिन है। पिथौरागढ़ में अब भी ऐसे कई गांव हैं जहां सड़क न होने से घोड़े-खच्चर के ज़रिये राशन पहुंचाया जाता है।

काली नदी के आर-पार बसे गांव नहीं चाहते सीमा विवाद

पिथौरागढ़ के धारचुला से कांग्रेस विधायक हरीश धामी कहते हैं कि इस विवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित लोग मेरे विधानसभा क्षेत्र के हैं। धामी कहते हैं कि नेपाल से हमारा बेटी-ब्वारी का संबंध है। वहां की बेटियों की शादी हमारे गांवों में हुई है। यहां की बेटियां महाकाली नदी को पार कर नेपाल के गांवों में ब्याही गई हैं। सीमा से सटे गांवों के लोगों की सीमा पार रिश्तेदारियां हैं। धामी कहते हैं कि धारचुला में काली नदी पार नेपाल के छांगरु और टिंकर गांव की एक सौ एक प्रतिशत रिश्तेदारियां हमारे गांवों में हैं। काली नदी के पश्चिमी तट पर धारचुला है और पूर्वी तट पर नेपाल का दारचुला। दोनों छोर पर कोई नहीं चाहता कि इस तरह का विवाद हो।

google map kali nadi.png

कालापानी से ही काली नदी का उदगम है। काली नदी (जिसे महाकाली भी कहते हैं) को भारत-नेपाल के बीच सरहद माना गया है। हरीश धामी कहते हैं कि कालापानी में गर्ब्यालों, गुंज्यालों, नपल्च्यालों (उत्तराखंड में बसी स्थानीय जातियां) की नाप भूमि है, जो भू-अभिलेखों में दर्ज है। ये सभी रं समुदाय के लोग हैं। इसी समुदाय के लोग नदी पार नेपाल के टिंकर और छांगरू गांव में हैं।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपल्च्याल पिथौरागढ़ के नपल्च्यू गांव के रहने वाले हैं। जो महाकाली के पश्चिमी छोर पर गूंजी से लगता हुआ गांव है। कालापानी में तीन गांव आते हैं गूंजी, नाबी और कुटी। वह कहते हैं कि नेपाल ने नक्शा बनाकर अनावश्यक विवाद खड़ा कर दिया है। बताते हैं कि गूंजी गांव के लोगों की खेती की ज़मीन नेपाल में भी है। काली नदी के दोनों छोर पर बसे लोग खेती के साथ सांस्कृतिक तौर पर भी जुड़े हुए हैं।

भारत-नेपाल के बीच सुगौली संधि

पूर्व आईएएस और राज्य में कई अहम पदों पर रहे एसएस पांगती भी दोनों देशों के बीच उपजे इस विवाद को निराशाजनक बताते हैं। वर्ष 1814-15 में ईस्ट इंडिया कंपनी और गोरखाओं के बीच युद्ध हुआ था। जिसमें पराजय के बाद नेपाल सरकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सुगौली संधि की थी। जिसमें 9 आर्टिकल हैं। उत्तराखंड से संबंधित विवाद आर्टिकल 5 में दर्ज है। जिसमें कहा गया है कि काली नदी के पश्चिम में जो भी ज़मीन है, नेपाल के राजा ने उस पर अपना अधिकार छोड़ दिया है। नदी के पूर्व का हिस्सा नेपाल का है और पश्चिम का हिस्सा भारत का। काली नदी भारत-नेपाल के बीच सीमा मानी गई। संधि में काली नदी के उत्तर या दक्षिण दिशा के किसी ज़मीन का जिक्र नहीं किया गया है। यानी काली नदी को उत्तर-दक्षिण दिशा में प्रवाहित नदी माना गया है। काली नदी का उदगम काला पानी में माना जाता है।

लिपुलेख में सड़क के उदघाटन के बाद से नेपाल की नाराजगी बढ़ी। पांगती कहते हैं कि सड़क एक दिन में तो बनी नहीं। वहां निर्माण कार्य चल रहे थे तब तक नेपाल को कोई आपत्ति नहीं है। वे चीन-भारत और नेपाल के ताजा समीकरणों का हवाला देते हैं।

सीमा पर बढ़ी सैन्य गतिविधियां

दो देशों की तकरार में सबसे ज्यादा सीमा पर रहने वाले लोग पिसते हैं। नेपाली रेडियो पर भारत विरोधी गाने बजे। जो पिथौरागढ़ के लोगों ने सुने। इस बीच नेपाल सरकार नागरिकता कानून में बदलाव करने जा रही है। नेपाली पुरुषों के साथ विवाह करने वाली विदेशी महिलाओं को सात साल लगातार साथ रहने के बाद नेपाल की नागरिकता मिलेगी। बहुत सी भारतीय महिलाएं इस कानून की जद में आएंगी। विदेशी बहुओं को सात साल तक राजनीतिक अधिकार नहीं मिलेगा।

उत्तराखंड में भारत-नेपाल की शांत सरहदों पर अब दोनों तरफ से सैन्य गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। नेपाल ने पहली बार भारत-चीन-नेपाल की लगती सीमा पर अपने सैनिक तैनात किए हैं। नेपाल में सीमा पर सड़क निर्माण का कार्य तेज़ हो गया है। नेपाली सेना अब सड़क बनाने के काम में जुटी है। भारतीय सीमा से सटे अपने इलाकों मालपा, जूलाघाट और दार्चुला में नेपाल ने अस्थायी हैलिपैड तैयार कर लिया है। बार्डर आउट पोस्ट यानी बीओपी की संख्या बढ़ाई जा रही है। भारतीय सेना ने भी यहां सुरक्षा बढ़ा दी है। सैन्य गतिविधियां तेज़ हो गई हैं।

जिस महाकाली नदी को टायर-ट्यूब पर बैठकर भारतीय-नेपाली लोग आसानी से पार कर जाया करते थे। अब ये नदी भी बंदूकों के साये में होगी। आपसी व्यवहार-व्यापार दोनों टूटेगा। आपसी सौहार्द के सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को राजनीति की नज़र लग गई। 

India-Nepal
India
Nepal
border issue
Uttrakhand
Nepali Worker
citizenship law
Sarda River
Mahakali River

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

वित्त मंत्री जी आप बिल्कुल गलत हैं! महंगाई की मार ग़रीबों पर पड़ती है, अमीरों पर नहीं

कार्टून क्लिक: चीन हां जी….चीन ना जी

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!


बाकी खबरें

  • EVM
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: इस बार किसकी सरकार?
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में सात चरणों के मतदान संपन्न होने के बाद अब नतीजों का इंतज़ार है, देखना दिलचस्प होगा कि ईवीएम से क्या रिजल्ट निकलता है।
  • moderna
    ऋचा चिंतन
    पेटेंट्स, मुनाफे और हिस्सेदारी की लड़ाई – मोडेरना की महामारी की कहानी
    09 Mar 2022
    दक्षिण अफ्रीका में पेटेंट्स के लिए मोडेरना की अर्जी लगाने की पहल उसके इस प्रतिज्ञा का सम्मान करने के इरादे पर सवालिया निशान खड़े कर देती है कि महामारी के दौरान उसके द्वारा पेटेंट्स को लागू नहीं किया…
  • nirbhaya fund
    भारत डोगरा
    निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?
    09 Mar 2022
    महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसाधनों की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन धूमधाम से लॉंच किए गए निर्भया फंड का उपयोग कम ही किया गया है। क्या सरकार महिलाओं की फिक्र करना भूल गई या बस उनकी उपेक्षा कर दी?
  • डेविड हट
    यूक्रेन विवाद : आख़िर दक्षिणपूर्व एशिया की ख़ामोश प्रतिक्रिया की वजह क्या है?
    09 Mar 2022
    रूस की संयुक्त राष्ट्र में निंदा करने के अलावा, दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में से ज़्यादातर ने यूक्रेन पर रूस के हमले पर बहुत ही कमज़ोर और सतही प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा दूसरों…
  • evm
    विजय विनीत
    यूपी चुनाव: नतीजों के पहले EVM को लेकर बनारस में बवाल, लोगों को 'लोकतंत्र के अपहरण' का डर
    09 Mar 2022
    उत्तर प्रदेश में ईवीएम के रख-रखाव, प्रबंधन और चुनाव आयोग के अफसरों को लेकर कई गंभीर सवाल उठे हैं। उंगली गोदी मीडिया पर भी उठी है। बनारस में मोदी के रोड शो में जमकर भीड़ दिखाई गई, जबकि ज्यादा भीड़ सपा…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License