NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आधी आबादी
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: महिलाओं के संघर्ष और बेहतर कल की उम्मीद
श्रम आंदोलन से उपजे इस आयोजन के केंद्र में प्रदर्शन की अहमियत रही है, लिहाज़ा आज महिलाओं के संघर्ष ने एक लंबा सफ़र तय किया है और इसमें उनका अपने ह़क़ और हुक़ूक के लिए आवाज़ बुलंद करना, सड़कों पर धरने-प्रदर्शन और रैलियां निकालना अपने आप में उनकी ताक़त का प्रतीक है।
सोनिया यादव
08 Mar 2022
International Women's Day
Image courtesy : Literary Hub

साल 1908 में जब न्यूयॉर्क शहर की 15 हज़ार महिलाओं ने काम के घंटे कम करने, बेहतर वेतन और वोट देने की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन निकाला, तब पूरी दुनिया ने महिला संघर्ष की एक नई ताकत को उभरते हुए देखा। तब से अब तक श्रम आंदोलन से उपजा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस लगातार महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने और उनके लिए बेहतर दुनिया बनाने की याद दिलाता है।

समाज, राजनीति और आर्थिक तौर पर महिलाएं कितनी सशक्त हुई हैं, इसके जश्न के तौर पर इंटरनेशनल वीमेंस डे का आयोजन होता है। लेकिन इस आयोजन के केंद्र में प्रदर्शन की अहमियत रही है, लिहाज़ा महिलाओं के साथ होने वाली असमानताओं को लेकर ज़ागरूकता बढ़ाने के लिए विरोध प्रदर्शन का आयोजन भी होता है।

बता दें कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को संयुक्त राष्ट्र ने सालाना आयोजन के तौर पर स्वीकृति दी है। इसे आठ मार्च को मनाने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। साल 1917 में रूस की महिलाओं ने रोटी और शांति की मांग के साथ चार दिनों का विरोध प्रदर्शन किया था। तब तत्कालीन रूसी ज़ार को सत्ता त्यागनी पड़ी और अंतरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार भी दिया। जिस दिन रूसी महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, वह रूस में इस्तेमाल होने वाले जूलियन कैलेंडर के मुताबिक़, 23 फ़रवरी और रविवार का दिन था। यही दिन ग्रेगॉरियन कैलेंडर के मुताबिक़, आठ मार्च था और तब से इसी दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कैंपेन के मुताबिक़ बैंगनी, हरा और सफेद इंटरनेशनल वीमेंस डे के रंग हैं। बैंगनी रंग न्याय और गरिमा का सूचक है। हरा रंग उम्मीद का रंग है और सफ़ेद रंग को शुद्धता का सूचक माना गया है। ये तीनों रंग 1908 में ब्रिटेन की वीमेंस सोशल एंड पॉलिटिकल यूनियन (डब्ल्यूएसपीयू) ने तय किए थे। इसके तहत हर साल इस आयोजन का थीम भी सेट किया जाता है।

'जेंडर इक्वालिटी टुडे फॉर ए सस्टेनेबल टुमॉरो'

इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2022 की थीम है 'जेंडर इक्वालिटी टुडे फॉर ए सस्टेनेबल टुमारो' यानी आज लैंगिक बराबरी एक स्थायी कल के लिए जरूरी है। जेंडर बराबरी के लिए महिलाएं एक लंबे समय से संघर्ष कर रही हैं, लेकिन हक़ीकत यही है कि आज भी देश-विदेश में उन्हें समाज में अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर ही उतरना पड़ता है। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं अपने अस्तित्व की पहचान के लिए लंबे समय से लड़ाई लड़ती रही हैं और यह आज भी जारी है। अपने ह़क और हुकूक के लिए आवाज़ बुलंद करना, सड़कों पर धरने-प्रदर्शन और रैलियां निकालना महिलाओं के लिए कोई नई बात नहीं है, इसका अपना एक लंबा इतिहास है। समय-समय पर देश-विदेश में ये आंदोलन महिलाओं की स्वायत्तता बनाने, उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने और महिलाओं के अधिकारों की अलग-अलग आवाज का प्रतिनिधि करते नज़र आए हैं।

महिलाओं का संघर्ष और आंदोलन

इतिहास में जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो ऐसे कई आंदोलन हमारे जहन में आते हैं जिन्होंने रूढ़िवादी समाज की बुनियान को झकझोर दिया। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं का कई सौ साल पुराना मुक्ति आंदोलन हो या हाल ही में देश में हुआ शाहीन बाग और किसान आंदोलन। सभी ने न सिर्फ सत्ता की नींद उड़ा दी बल्कि शासन-प्रशासन की आंखों में आंखें डाल सवाल भी पूछे। इन तमाम आंदोलनों में महिलाओं ने पितृशाही और मनुवादी सोच को चुनौती देकर न सिर्फ़ अपनी हिस्सेदारी दिखाई बल्कि उन आंदोलनों की अगुवाई भी की। आज महिलाएं न सिर्फ़ अपने समुदाय के बल्कि सभी के अधिकारों के लिए सड़क की लड़ाई लड़ रही हैं।

महिला मुक्ति आंदोलन की बात करें तो इसे महिला अधिकार आंदोलन भी कहा जाता है। इस आंदोलन के जरिए 1960 और 70 के दशक में महिलाओं के लिए समान अधिकारों, समान अवसर और महिलाओं के लिए निजी स्वतंत्रता की मांग की गई। महिलाओं के लिए कानूनी अधिकार जैसे संपत्ति का अधिकार, तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी के मुद्दे उठाए गए। इसकी शुरुआत मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी और इसमें शांतिपूर्ण तरीके से गुलामी, नस्लभेद और महिलाओं को दिए गए दूसरे दर्जे जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर विरोध-प्रदर्शन किए गए थे।

शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन

विश्वस्तर पर नारीवादियों का सबसे प्रसिद्ध विरोध प्रदर्शन ‘ब्रा बर्निग मिस अमेरिका मार्च’ भी रहा। इसका आयोजन महिलाओं ने 7 सिंतबर 1968 को अटलांटिक सिटी कन्वेंशन सेंटर के सामने ‘मिस अमेरिका प्रतियोगिता’ के विरोध में प्रदर्शन किया। इस विरोध प्रदर्शन में औरतों ने हाई हिल्स के सैंडल, मेकअप, हेयरस्प्रे, ब्रा जैसी उन तमाम चीज़ों को फेंक दिया जिन्हें वे महिला के उत्पीड़न का प्रतीक मानती थीं। इसके अलावा 18 मार्च 1970 को नारीवादियों ने ‘द लेडीज होम जर्नल’ की कार्यशैली के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हुए एक जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने 11 घंटे तक लगातार दफ्तर की घेराबंदी की और दफ्तर में महिलाओं को शोषण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

इसके बाद फिर अमेरिका में ही समान अधिकार संशोधन का आंदोलन हुआ। ये अमेरिका के संविधान में एक प्रस्तावित संशोधन था जिसमें सभी नागरिकों के लिए बिना किसी लैंगिक भेदभाव के समान कानूनी अधिकारों को देने के लिए बनाया गया था। महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने की मांग में यह संशोधन मील का पत्थर बना।

यौन हिंसा और घरेलू हिंसा के खिलाफ आंदोलन

यौन हिंसा और घरेलू हिंसा को समाप्त करने के लिए ‘टेक बैक द नाइट’ एक प्रमुख आंदोलन था। ये एक संगठन के तौर पर भी अस्तित्व में है और हर साल इसके द्वारा दुनिया के 30 से अधिक देशों में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कार्यक्रम में बलात्कार, यौन उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के खिलाफ सीधी कार्रवाई की मांग के लिए विरोध-प्रदर्शन, रैलियां निकलती हैं। साल 1970 से वर्तमान तक ‘टेक बैक द नाइट’ के झंडे तले रात में मार्च और रैलियां महिला समानता की मांग में दुनियाभर में निकलती आ रही हैं।

अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की गर्भसमापन-विरोधी नीतियों को टारगेट करता ‘वीमन्स लाइव्स’ मार्च को भला कौन भूल सकता है। ये एक ऐतिहासिक मार्च था, जिसे महिलाओं के शरीर की स्वायत्ता और प्रजनन अधिकारों की मांग के लिए निकाला गया था।

25 अप्रैल 2005 में नेशनल मॉल, वाशिंगटन पर 500,000 से 800,000 के बीच प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरें। इस प्रदर्शन में सुसान सरंडन, व्हूपी गोल्डबर्ग और कैथलीन टर्नर जैसी हस्तियों ने भी भाग लिया था और इसका आयोजन बड़ी संख्या में महिला संगठनों ने मिलकर किया था।

महिलाओं के हौसले और उनकी ताक़त

देश की बात करें तो, आज़ादी की लड़ाई से लेकर चिपको आंदोलन तक देश में महिलाओं के संघर्ष की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यूं तो निर्भया मामले से लेकर किसान मोर्चे तक महिलाओं में ये सजगता और साहस पहले भी कई मौक़ों पर दिखा है। साल 2012 में निर्भया मामले के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चियां इंडिया गेट पर जमा हुईं। उन्होंने पुलिस की लाठियां और वॉटर कैनन झेले, लेकिन अपने हौसले और दृढ़ता से महिलाओं ने सरकार को यौन हिंसा के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून बनाने के लिए बाध्य किया।

महाराष्ट्र में मार्च 2018 में महिला किसानों के छिले हुए नंगे पैरों की तस्वीरें आज भी इंटरनेट पर मिल जाती हैं। ये नासिक से मुंबई तक किसानों की एक लंबी रैली थी। इसमें महिला किसानों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनके इसके बाद नवंबर 2018 में क़र्ज़ माफ़ी की मांग को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान महिलाएं विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली पहुंची थीं।

रूढ़ीवादी परंपरा को तोड़ती हुई औरतें, सबरीमाला मंदिर हो या हाजी अली दरगाह, हिंसक प्रदर्शनकारियों के सामने अपनी जान जोख़िम में डालकर भी मंदिर पहुंचीं। महिलाओं की इस ताक़त में उम्र की कोई सीमा नहीं है। युवा, उम्रदराज़ और बुज़ुर्ग, हर उम्र की महिला के हौसले बुलंद नज़र आते हैं।

कुल मिलाकर देखें तो महिलाओं के संघर्ष ने एक लंबा सफ़र तय किया है लेकिन साल 2020 में जिस तरह नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ महिलाएं बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरीं और जिस तरह साल 2021 की सर्द रातों में महिलाओं ने किसान आंदोलन में अपनी आवाज़ बुलंद की, उसने आने वाले दिनों में महिला आंदोलनों की एक नई इबारत लिख दी है।

International Women's Day
women's day
gender inequality
gender discrimination
patriarchal society
male dominant society
unequal sex ratio
Women Rights

Related Stories

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

सवाल: आख़िर लड़कियां ख़ुद को क्यों मानती हैं कमतर

यूपी से लेकर बिहार तक महिलाओं के शोषण-उत्पीड़न की एक सी कहानी

सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा

निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?

किसान आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी एक आशा की किरण है

भाजपा ने अपने साम्प्रदायिक एजेंडे के लिए भी किया महिलाओं का इस्तेमाल

दलित और आदिवासी महिलाओं के सम्मान से जुड़े सवाल

महिला दिवस विशेष : लड़ना होगा महिला अधिकारों और विश्व शांति के लिए

बढ़ती लैंगिक असमानता के बीच एक और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस


बाकी खबरें

  • paul
    कैप्टन पॉल वाटसन
    पृथ्वी पर इंसानों की सिर्फ एक ही आवश्यक भूमिका है- वह है एक नम्र दृष्टिकोण की
    23 Dec 2021
    जहाँ एक तरफ दुनिया के महासागर, गैर-मानवीय जानवर और पेड-पौधे हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को बरक़रार रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहीं हम इसे नुकसान पहुंचाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं?
  • dharm sansad
    अजय कुमार
    हरिद्वार में ‘धर्म संसद’ के नाम पर तीन दिन तक चलते रहे अल्पसंख्यक विरोधी भाषण, प्रशासन मौन! 
    23 Dec 2021
    ‘धर्म संसद' नाम का इस्तेमाल कर उत्तराखंड के हरिद्वार में 17 दिसंबर से लेकर 19 दिसंबर तक एक ऐसी सभा का आयोजन हुआ जिसमें सब कुछ अपवित्र और आपत्तिजनक था।
  • mid day meal
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    उत्तराखंड : दलित भोजन माता की नियुक्ति और विवाद का ज़िम्मेदार कौन है?
    23 Dec 2021
    चंपावत के सूखीढांग इंटर कॉलेज मामले में कई बड़े झोल सामने आ रहे हैं। कभी भोजन माता की नियुक्ति को अवैध बताया जा रहा है, तो कभी जातिवाद का मुद्दा हावी हो रहा है। बहरहाल, मामला जो भी हो ज़िम्मेदारी और…
  • Saudis
    पीपल्स डिस्पैच
    यमन में युद्ध अपराध की जांच कर रहे यूएन इंवेस्टिगेटर की जासूसी के लिए सऊदी ने किया पेगासस का इस्तेमाल
    23 Dec 2021
    सऊदी अरब ने यमन में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के सदस्यों के ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चलाने की सिफ़ारिश करते हुए स्वतंत्र पैनल द्वारा एक रिपोर्ट जारी करने से हफ्तों पहले ही संयुक्त राष्ट्र के एमिनेंट…
  • vikaram harijan
    सबरंग इंडिया
    जाति देखकर नंबर देने के आरोप में प्रोफेसर विक्रम हरिजन से इलाहाबाद विवि ने 2 साल बाद मांगे साक्ष्य
    23 Dec 2021
    जातिवाद, भ्रष्टाचार पर यूपी के विश्वविद्यालयों में घमासान, कहीं प्रोफेसर पर आरोप, कहीं वीसी कटघरे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License