NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
क्या हमारा देश बच्चों के के लिए सुरक्षित नहीं रह गया?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वार्षिक के मुताबिक भारत में पिछले तीन साल में बच्चों के ख़िलाफ़ 4,18,385 अपराध दर्ज किए गए। इनमें पॉक्सो एक्ट के तहत करीब 1,34,383 मामले दर्ज हुए।
सोनिया यादव
25 Nov 2021
 Is our country no longer safe for children
'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

भारत में यौन शोषण के शिकार हुए बच्चों की एक बड़ी संख्या है। पॉक्‍सो यानी प्रोटेक्‍शन ऑफ चिल्‍ड्रेन अगेंस्ट सेक्‍सुअल ऑफेंस जैसे कड़े कानून होने के बावजूद इस ग्राफ में साल दर साल इजाफा हो रहा है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक में इस तरह के घिनौने अपराधों का जाल फैलता रहा है। हाल ही में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की साल 2020 की रिपोर्ट बताती है कि देश में बाल यौन शोषण के 47,221 मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में अधिकतर पीड़ित लड़कियां ही थीं।

बता दें कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वार्षिकी के मुताबिक भारत में पिछले तीन साल में बच्चों के खिलाफ 4,18,385 अपराध दर्ज किए गए। इनमें पॉक्सो एक्ट के तहत करीब 1,34,383 मामले दर्ज हुए। यौन हिंसा और यौन शोषण की वारदात सबसे अधिक 16 से लेकर 18 वर्ष की लड़कियों के साथ हुईं। वहीं सबसे ज्यादा मामले मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु , गुजरात, छत्तीसगढ़ में सामने आए हैं।

रिपोर्ट में क्या खास है?

एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2016 से 2020 तक रिपोर्ट किए गए बाल यौन शोषण के मामलों की संख्या में करीब 31 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। साल 2016 में 36,321 मामले रिपोर्ट हुए, जो बढ़कर 2020 में 47 हजार से अधिक हो गए। विशेषज्ञों के अनुसार यह संख्या भी हिमखंड का सिरा मात्र है।

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में से सिर्फ 36 फीसदी ही पॉक्सो के तहत दर्ज होते हैं। इसका एक बड़ा कारण अपराध को अंजाम देने वाले अपराधियों का जानकार होना है। रिपोर्ट के अनुसार बच्चों का सबसे ज्यादा यौन शोषण, उनके परिचितों के जरिए किया गया है। 2020 की रिपोर्ट के अनुसार 28065 मामलों में से केवल 1131 मामले ऐसे थे, जिसमें बच्चों का यौन शोषण किसी अपरिचित व्यक्ति द्वारा किया गया। यानी 96 फीसदी मामले ऐसे रहे, जहां पर बच्चों का यौन शोषण उनके दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी, परिवार के सदस्यों द्वारा किया गया है।

मालूम हो कि कोरोना काल में ऑनलाइन अपराधों की बाढ़ आ गई है। पिछले दिनों सीबीआई ने चाइल्ड पोर्नोग्राफी बनाने और उन्हें शेयर करने के मामले में कई राज्यों में एक साथ छापेमारी की थी। सीबीआई ने अपने छापे के दौरान कई इलेक्ट्रॉनिक गैजैट्स जैसे कि मोबाइल फोन, लैपटॉप आदि जब्त किए. सीबीआई को शुरूआती जांच में 50 से ज्यादा ग्रुप्स और 5 हजार से ज्यादा लोगों के बारे में पता चला है, जो बच्चों से जुड़े यौन शोषण वाले वीडियो सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर साझा करते थे। सीबीआई ने करीब 80 आरोपियों के खिलाफ बच्चों के यौन शोषण में शामिल होने को लेकर 23 मुकदमे दर्ज किए हैं। बताया जा रहा है कि यह धंधा 100 देशों तक फैला हुआ है।

ऑनलाइन बच्चों को शिकार बनाने की कोशिश

वी प्रोटेक्ट ग्लोबल एलायंस द्वारा ग्लोबल थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट 2021 में कहा गया है कि कोविड-19 ने बाल यौन शोषण और ऑनलाइन दुर्व्यवहार में महत्वपूर्ण वृद्धि में योगदान दिया है। तो वहीं इंटरपोल की ओर से जारी आंकड़ों में बताया गया कि साल 2017 से 2020 के दौरान भारत में करीब 24 लाख बच्चों का ऑनलाइन यौन उत्पीड़न हुआ। इस तरह के मामलों में शिकार बनीं 80 फीसदी लड़कियों की उम्र 14 साल से भी कम बताई जा रही है।

इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज़ की हर महीने ऑनलाइन 50 लाख कंटेट की डिमांड 100 शहरों से है। रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के कंटेट इस्तेमाल करने वाले यूजर में 90 फीसदी पुरुष हैं।

रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर लोग वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) के जरिए इस तरह के कंटेट देख रहे हैं। सीबीआई की कार्रवाई में 50 से ज्यादा व्हाट्सएप ग्रुप उसके रडार पर थे। जांच में करीब 5 हजार से ज्यादा लोगों के नाम सामने आए, जो कि बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का सोशल मीडिया पर प्रसार कर रहे हैं।

पॉक्सो का कठोर कानून और इसका ढीला क्रियान्वयन

गौरतलब साल 2012 में भारत में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने वाला क़ानून (पॉस्को) बनाया गया ताकि बाल यौन शोषण के मामलों से निपटा जा सके लेकिन इसके तहत पहला मामला दर्ज होने में दो साल लग गए। साल 2014 में नए क़ानून के तहत 8904 मामले दर्ज किए गए लेकिन उसके अलावा इसी साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने बच्चों के बलात्कार के 13,766 मामले; बच्ची पर उसका शीलभंग करने के इरादे से हमला करने के 11,335 मामले; यौन शोषण के 4,593 मामले; बच्ची को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या शक्ति प्रयोग के 711 मामले; घूरने के 88 और पीछा करने के 1,091 मामले दर्ज किए गए। ये आंकड़े बताते हैं कि बाल यौन शोषण के अधिकतर मामलों में पॉस्को लगाया ही नहीं गया।

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह क़ानून बहुत अच्छा बना है लेकिन इसके अमल और सज़ा दिलाने की दर में भारी अंतर है। और इसका बहुत बड़ा कारण ये है कि अक्सर पीड़ितों के अभियुक्त- जो हमेशा ही बच्चे को जानते हैं या उनके रिश्तेदार होते हैं- उन पर मुकर जाने का दबाव डालते हैं, इसलिए यह मामले अंजाम तक नहीं पहुंच पाते।

क्या कर रही है सरकार?

बाल यौन उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने साल 2019 में पॉक्सो कानून को और कड़ा करने के लिए इसमें संशोधनों को मंजूरी दी। संशोधनों में बच्चों का गंभीर यौन उत्पीड़न करने वालों को मृत्युदंड तथा नाबालिगों के खिलाफ अन्य अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया। बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) कानून में प्रस्तावित संशोधनों में बाल पोर्नोग्राफी पर लगाम लगाने के लिए सजा और जुर्माने का भी प्रावधान किया गया। सरकार ने कहा कि कानून में बदलाव से देश में बढते बाल यौन शोषण के मामलों के खिलाफ कठोर उपाय और नई तरह के अपराधों से भी निपटने की जरूरत पूरी होगी।

सरकार ने तब ये भी कहा कि कानून में शामिल किए गए मजबूत दंडात्मक प्रावधान निवारक का काम करेंगे। सरकार ने कहा, ‘इसकी मंशा परेशानी में फंसे असुरक्षित बच्चों के हितों का संरक्षण करना तथा उनकी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना है। संशोधन का उद्देश्य बाल उत्पीड़न के पहलुओं तथा इसकी सजा के संबंध में स्पष्टता प्रावधान लेकर आने का है।’ लेकिन अब तक ये बातें केवल बातें बन कर ही रह गईं औक ज़मीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला। सरकार 'न्यू इंडिया' का गुणगान करने में व्यस्त रही और अभिभावक 'सब चंगा सी' के भ्रम में।

सिर्फ कानून बनाने से रुकेगा अपराध?

आंकड़ों, अपराध की प्रवृत्ति, पुलिसिया रवैया और समाज की भूमिका को देखने के बाद यह बात साफ तौर से कही जा सकती है कि बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाओं में सिर्फ इजाफा ही नहीं हो रहा है बल्कि ऐसी घटनाएं इतनी तेजी से बढ़ रही हैं कि उन्हें सिर्फ कानून बनाकर रोक पाना असंभव है। इसके लिए हमें एक बड़े सामाजिक आंदोलन की जरूरत है जिससे सभी पक्षों को जागरूक किया जा सके।

ये कितनी बुरी बात है कि हम अपने बच्चों को न्याय भी नहीं दिला पा रहे हैं। हालिया आंकड़ों से भी साफ है कि अदालतों में बच्चों के प्रति हुए अपराधों में से ज़्यादातर का निराकरण नहीं हो रहा है। लापरवाही, कमज़ोर जांच, असंवेदनशीलता और भ्रष्टाचार के कारण समय से चार्जशीट ही नहीं दायर की जा रही है।

निसंदेह अगर पीड़ित बच्चे गरीब या वंचित समुदाय के होंगे तो हालात और भी बुरे होंगे। उनकी सुनवाई पुलिस, सरकार और अदालतों में भी नहीं हो पाएगी। यानी 21वीं सदी में वे बिना इंसाफ मिले बड़े हो जाएंगे।

दरसअल विकास और न्यू इंडिया के तमाम दावे करते वक्त हमारी सरकारें ऐसे आंकड़ों को नज़रअंदाज़ कर देती हैं और आने वाले कल की एक बेहतर तस्वीर पेश करती हैं लेकिन वास्तविकता बदतर स्थिति की तरफ इशारा कर रही है।

सरकारों के अलावा एक समाज के रूप में भी हम तेजी से पतन की तरफ बढ़ रहे हैं। लोग भले ही हमारी समृद्ध परंपरा की दुहाई देते हुए तमाम बातें करें लेकिन सच्चाई यही है कि हमारा देश बच्चों के के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है।

NCRB
POCSO Act
violence against Children
child sexual abuse
crime against child

Related Stories

इतनी औरतों की जान लेने वाला दहेज, नर्सिंग की किताब में फायदेमंद कैसे हो सकता है?

योगी सरकार के दावे की पड़ताल: क्या सच में यूपी में नहीं हुआ है एक भी दंगा?

चुनाव चक्र: यूपी की योगी सरकार का फ़ैक्ट चेक, क्या हैं दावे, क्या है सच्चाई

असम: बलात्कार आरोपी पद्म पुरस्कार विजेता की प्रतिष्ठा किसी के सम्मान से ऊपर नहीं

यूपी: चुनावी समर में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का महिला सुरक्षा का दावा कितना सही?

भारत में सबसे कम जेल में रहने की दर होने के बावजूद लक्षद्वीप को पांचवीं जेल की आवश्यकता क्यों है?

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या

यूपी : ‘न्यूनतम अपराध’ का दावा और आए दिन मासूमों साथ होती दरिंदगी!

भारतीय जेलों के लिए  बजट में क्या गड़बड़ी है?

क्या वाकई देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में कमी आई है?


बाकी खबरें

  • दक्षिण अफ़्रीका के ट्रेड यूनियनिस्ट के हत्यारों की अब तक नहीं हुई गिरफ़्तारी
    पीपल्स डिस्पैच
    दक्षिण अफ़्रीका के ट्रेड यूनियनिस्ट के हत्यारों की अब तक नहीं हुई गिरफ़्तारी
    23 Aug 2021
    मालीबोंग्वे मडाजो जिन्होंने पांच खनन कंपनियों के 7,000 कर्मचारियों के हड़ताल का नेतृत्व किया था उनकी श्रम विवाद के बीच कमीशन फॉर कॉन्सिलिएशन, मेडिएशन एंड अर्बिट्रेशन (सीसीएमए) के दरवाज़े पर सरेआम…
  • कोरोना
    भाषा
    कोरोना अपडेट: देश में 25,072 नए मामले, 389 मरीज़ों की मौत
    23 Aug 2021
    करीब 160 दिन बाद उपचाराधीन मरीजों की संख्या सबसे कम दर्ज की गई है।
  • सुंदरवती महिला महाविद्यालय
    सोनिया यादव
    बिहार: चोटी के जरिये पितृसत्ता की बेड़ियों में नहीं बंधना चाहतीं भागलपुर कॉलेज की लड़कियां
    23 Aug 2021
    नए ड्रेस कोड के हर नियम पर छात्राओं की पूरी सहमति है लेकिन बालों में चोटी बांधने वाले फरमान पर उनमें भारी नाराजगी है। उनका मानना है कि यहां मामला मानसिकता का है, जो अब धीरे-धीरे मनुवाद की ओर ले जाने…
  • गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य को PASA के तहत डिटेंशन आदेश पारित करने से रोका
    सबरंग इंडिया
    गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य को PASA के तहत डिटेंशन आदेश पारित करने से रोका
    23 Aug 2021
    अदालत ने कहा कि नागरिकों को इस तरह से अधर में नहीं छोड़ा जा सकता। जीएसटी अपराधों के ऐसे मामलों में, समान स्थिति वाले व्यापारियों के खिलाफ PASA नहीं लगाया जा सकता है।
  • sc
    भाषा
    वकीलों को वरिष्ठ का दर्जा देने संबंधी याचिकाओं को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगा उच्चतम न्यायालय
    23 Aug 2021
    “वकीलों का दर्जा निर्दिष्ट समिति द्वारा दिए गए अंकों के आधार पर तय होना चाहिए और मतदान का सहारा केवल तब लिया जाना चाहिए जब कोई और रास्ता न हो। उच्च न्यायालय मतदान एक अपवाद के रूप में नहीं बल्कि एक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License