NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
हरियाणा की प्राइवेट नौकरियों में बाहरी की एंट्री बंद करने वाला क़ानून क्या सही है?
हरियाणा में डबल इंजन की सरकार फिर भी प्राइवेट सेक्टर में नौकरी के लिए हरियाणा के लोगों को 75 फ़ीसदी आरक्षण! क्या ये संवैधानिक है? विश्लेषण कर रहे हैं अजय कुमार।
अजय कुमार
06 Mar 2021
नौकरियों
Image Courtesy : Times of India

महज वोट बटोरने के लिए काम करना एक तरह का धंधा है, राजनीति नहीं। देश और समाज को चलाने के लिए राजनीति की जरूरत होती हैं, धंधे की नहीं। केवल वोट के नफा-नुकसान का ख्याल रखकर छोटा नहीं सोचा जाता, बल्कि जनकल्याण का ख्याल रखकर बड़ा और बहुत दूर का सोचा जाता है। 

इसलिए भारत के संविधान में यह कहीं भी नहीं लिखा कि बिहार की सरकार बिहार की नौकरी केवल बिहारियों को देने का कानून बना सकती है। महाराष्ट्र की सरकार महाराष्ट्र की नौकरी केवल मराठियों को देने का कानून बना सकती है। बल्कि संविधान में यह साफ-साफ लिखा हुआ है कि जन्म स्थान के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। 

लेकिन हरियाणा सरकार ने यह कानून बना दिया है कि महीने की 50 हजार रुपये से कम वेतन वाली हरियाणा की प्राइवेट नौकरियों में 75% आरक्षण हरियाणा के लोगों को मिलेगा। यानी हरियाणा की प्राइवेट नौकरियों में महज 25 फ़ीसदी कामगारों के अलावा सब हरियाणा से होंगे। निवास स्थान के आधार पर नौकरियों को आरक्षित करने का कानून केवल हरियाणा में ही नहीं बना है। लेकिन इससे पहले कर्नाटक मध्य प्रदेश में भी बन चुका है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2020 में हरियाणा 43.2 प्रतिशत बेरोजगारी के साथ देश में पांचवे नंबर पर था। यानी पूरे भारत की तरह हरियाणा में भी बेरोजगारी बहुत बड़ी परेशानी है। लेकिन इस बेरोजगारी का इलाज क्या है?

क्या इलाज यही है कि हरियाणा में दूसरे राज्यों से आने वाले लोग काम ना करें? हरियाणा की नौकरियां हरियाणा के लोगों को ही मिले?

क्या इसे बेरोजगारी की बीहड़ परेशानी का इलाज कहा जाएगा?

कोई भी सुलझा हुआ नागरिक ऐसे नियम पर यह कहेगा कि अगर हरियाणा ने यह कानून बनाया है तो कल बिहार, उत्तर प्रदेश भी ऐसा कानून बनाएंगे। तब क्या होगा जब पलट कर दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य हरियाणा से यह पूछ बैठें कि हरियाणा के बहुत बड़े इलाके का विकास दिल्ली और नोएडा की वजह से हुआ है, हरियाणा की बहुत बड़ी आबादी दिल्ली और नोएडा में काम करती है। अगर दिल्ली और नोएडा भी हरियाणा की तरह कानून लाएं तो क्या होगा?

क्या ऐसे कानूनों से बेरोजगारों की परेशानी सुलझ जाएगी। इसीलिए अगर यह कहा जाए कि हरियाणा की सरकार ने बहुत बड़ा नहीं सोचा, पूरे देश के बारे में नहीं सोचा, बहुत दूर का नहीं सोचा महज वोट के बारे में सोचा तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

ऐसे कानूनों के साथ यही दिक्कत है। इसीलिए ऐसे कानून संविधान के खिलाफ भी होते हैं। भारत के संघवाद के खिलाफ होते हैं। नागरिकों से उनकी अवसर की समानता से जुड़ा मूल अधिकार छीनते हैं। भारत के संविधान के मुताबिक जन्म स्थान के आधार पर राज्य भेदभाव नहीं कर सकता है। किसी भी व्यक्ति को भारत में कहीं भी आने जाने की छूट है। कहीं भी रहने की छूट है। किसी भी तरह के पेशे को अपनाने की छूट है। कुछ जायज अपवादों के अलावा राज्य नागरिकों से उनके ये अधिकार नहीं छीन सकता है। कहने का मतलब यह है कि बिहार में पैदा हुए शख्स की नौकरी की तलाश अगर हरियाणा में पूरी होती है तो संविधान के मुताबिक इस पर कोई रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। 

फिर भी कुछ परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 16 (3) के तहत नौकरियों के लिए निवास स्थान के आधार की बात करता है। लेकिन संविधान इस पर कानून बनाने का हक राज्य को नहीं बल्कि संसद को देता है। यानी संसद को अगर लगता है कि नौकरी देने के मामले में निवास स्थान का भी गौर किया जाना चाहिए तो इस पर संसद में कानून प्रस्तावित किया जा सकता है है। यह हक राज्य को नहीं मिला है।

अब सवाल उठता है कि आखिरकर संसद को यह हक क्यों मिला है? हरियाणा ऐसे मामले में कानून क्यों नहीं बना सकता है? इसका जवाब ढूंढने के लिए भारतीय राज्य को वैचारिक तौर पर समझना चाहिए। भारत में एकल नागरिकता है। यानी लोग बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक,आंध्र प्रदेश के नागरिक नहीं होते बल्कि इन सभी राज्यों में बसे लोग भारत के नागरिक होते हैं।

इन नागरिकों के साथ आधारभूत तरीके से व्यवहार कैसे होगा, इसकी व्याख्या भारत के संविधान में मौजूद है ना कि गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल ने अपने खुद के संविधान बनाए हैं और उसके आधार पर अपने राज्य के लोगों के लिए नियम-कानून। 

इसलिए पूरे देश में अगर कोई कानून या नियम बनता है तो उसका आधारभूत स्रोत भारत का संविधान ही होता है। इस संविधान से अलग होकर नियम कानून नहीं बन सकते हैं। हरियाणा का एंप्लॉयमेंट ऑफ लोकल कैंडिडेट एक्ट 2020 का आधार भी भारत के संविधान से अलग नहीं हो सकता। 

लेकिन फिर भी कुछ मामले ऐसे होते हैं, कुछ परिस्थितियां ऐसी होती हैं, जहां पर अलग तरीके से काम करने की जरूरत पड़ती है। लेकिन इसका फैसला करने का अधिकार उसे है, जिसमें भारत की संप्रभुता निहित है। यानी ऐसे फैसले करने का अधिकार भारत सरकार और संसद को है। इसीलिए भारत सरकार भारत में रहने वाले नागरिकों के बीच कोई भेदभाव नहीं कर सकती लेकिन अपनी संप्रभु शक्तियों की वजह से भारत से बाहर रहने वाले दूसरे देशों के नागरिकों के साथ दूसरे आधारों पर भी बर्ताव कर सकती है। इसी तरह से जब परिस्थितियां बिल्कुल ऐसी हो कि निवास स्थान के आधार पर नौकरी देने की जरूरत आन पड़े तो इसका फैसला करने का अधिकार संसद को है ना की किसी राज्य के विधान मंडल को। 

लेकिन इसके बाद भी यह सवाल उठ सकता है कि स्वराज और भारतीय प्रशासन में विकेंद्रीकरण की बात की जाती है, जिसके तहत स्थानीयता को केंद्र में रखा जाता है, इसलिए अगर हरियाणा सरकार ने स्थानीय लोगों को नौकरी में तवज्जो दी तो गलत क्या किया? हरियाणा सरकार ने गलत किया और बिल्कुल गलत किया। केंद्र, राज्य और पंचायतों की तीन स्तरीय व्यवस्था अपने आप में विकेंद्रीकरण ही है। 

विकेंद्रीकरण का असल मकसद यह है कि सब जगह की परिस्थितियां अलग होती हैं। सब जगह को एक ही तरह से हांका नहीं जा सकता है। बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले की परेशानी की तरह महाराष्ट्र के लातूर जिले की परेशानी नहीं है। उन दोनों में बहुत अंतर है। इसलिए उन दोनों परेशानियों का हल अलग-अलग तरीके से किया जाना चाहिए।

विकेंद्रीकरण और स्वराज की बात इससे जुड़ती है कि भूगोल के आधार पर बदलने वाली परेशानियां और मानव संसाधन से जुड़ी परेशानिया भूगोल तक पहुंचकर हल की जाए। ना कि सब का हल केवल दिल्ली में बैठे लोग करें। 

विकेंद्रीकरण और स्वराज का मतलब कहीं से भी यह नहीं होता कि लोगों का विकल्प खत्म कर दिया जाए। लोगों की चुनने की आजादी खत्म कर दी जाए। एक भौगोलिक सीमा के अंदर उन्हें कैद करके रखा जाए। बल्कि विकेंद्रीकरण और स्वराज का मतलब यह होता है कि हर भौगोलिक सीमा तक पहुंचा जाए और हर भौगोलिक सीमा की परेशानी का हल किया जाए। इस आधार पर बेरोजगारी की परेशानी हल करने का तरीका यह हो सकता है कि हरियाणा सरकार अपने राज्य के अनुकूल मानव संसाधन को विकसित करे। वह तरीके और प्रबंधन अपनाएं जिससे हरियाणा में रोजगार के अवसर विकसित हो। हरियाणा के इलाके तक शिक्षा की पहुंच हो। कौशल उन्नत करने से जुड़े योजनाएं पहुंचे।

प्रोफेसर प्रताप भानु मेहता इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में तो जरूर जाएगा। हरियाणा सरकार को भी पता है कि संविधान के आधार पर इस कानून को खारिज कर दिया जाएगा। लेकिन इसके खतरनाक परिणाम दिखाई दे रहे हैं। ऐसे कानून अपवाद स्वरूप बनते थे। लेकिन अब बहुत सारी सरकारें यह चालाकियां अपनाने लगी हैं। अगर यह कानून सुप्रीम कोर्ट के जरिए रद्द कर दिया जाता है फिर भी स्थानीयता की आग से उठी लपटों से कैसे बचा जाएगा। स्थानीयता की वही आग जिसे  शिव सेना के जरिए महाराष्ट्र में मराठी बनाम बाहरी करके पूरा भारत देख चुका है।

संवैधानिक तौर पर तो यह कानून बहुत कमजोर है लेकिन आर्थिक तौर पर भी बहुत कमजोर है। मान लीजिए अगर किसी काम के लिए जरूरी कौशल वाले लोग हरियाणा में उपलब्ध नहीं  हों तब क्या होगा? ऐसे में धांधली बढ़ेगी। लोग कानून तोड़ने के लिए मजबूर होंगे। इंस्पेक्टर राज की बढ़ोतरी होगी। अगर यह सारे काम नहीं होंगे तो मजबूरन उद्योग को हरियाणा छोड़ना पड़ेगा। नौकरी की जगह और कम होगी। यानी यह कानून व्यवहारिक भी नहीं है।  खट्टर सरकार की अदूरदर्शिता का परिणाम है। मोदी जी के शब्दों में कहा जाए तो डबल इंजन की सरकार होते हुए भी हरियाणा सरकार केंद्र से अलग होकर कानून बना रही है। क्या हरियाणा सरकार को मोदी जी की नीतियों पर भरोसा नहीं है। क्या मोदी जी की नीतियां हरियाणा में रोजगार के संसाधन पैदा नहीं कर सकती? 

Haryana
manohar laal khattar
BJP
Jobs
unemployment
Private jobs
Government Jobs

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !


बाकी खबरें

  • yogi
    रोहित घोष
    यूपी चुनाव: योगी आदित्यनाथ बार-बार  क्यों कर रहे हैं 'डबल इंजन की सरकार' के वाक्यांश का इस्तेमाल?
    25 Feb 2022
    दोनों नेताओं के बीच स्पष्ट मतभेदों के बावजूद योगी आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी के नाम का इसतेमाल करने के लिए बाध्य हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि नरेंद्र मोदी अब भी जनता के बीच लोकप्रिय हैं, जबकि योगी…
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    खोज ख़बर, युद्ध और दांवः Ukraine पर हमला और UP का आवारा पशु से गरमाया चुनाव
    24 Feb 2022
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने Ukraine पर Russia द्वारा हमले से अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की हार पर चर्चा की। साथ ही, Uttar Pradesh चुनावों में आवारा पशु, नौकरी के सवालों पर केंद्रित होती…
  • UP Elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022 : आवारा पशु हैं एक बड़ा मुद्दा
    24 Feb 2022
    न्यूज़क्लिक के इस ख़ास इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पांडे से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। डॉ पांडेय ने…
  • russia ukrain
    अजय कुमार
    अमेरिकी लालच से पैदा हुआ रूस और यूक्रेन का तनाव, दुनिया पर क्या असर डाल सकता है?
    24 Feb 2022
    अमेरिका के लालच से पैदा हुआ रूस और यूक्रेन का तनाव अगर बहुत लंबे समय तक चलता रहा तो दुनिया के बहुत से मुल्कों में आम लोगों के जीवन जीने की लागत बहुत महँगी हो जाएगी।
  • Tribal Migrant Workers
    काशिफ काकवी
    मध्य प्रदेश के जनजातीय प्रवासी मज़दूरों के शोषण और यौन उत्पीड़न की कहानी
    24 Feb 2022
    गन्ना काटने वाले 300 मज़दूरों को महाराष्ट्र और कर्नाटक की मिलों से रिहा करवाया गया। इनमें से कई महिलाओं का यौन शोषण किया गया था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License