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भारत
राजनीति
जम्मू-कश्मीर : कई बार बदलाव से स्थिति बदतर हो जाती है
इसलिए अब वक़्त है, जब लोकतांत्रिक विचारों वाले लोग भारत द्वारा कश्मीर से ग़लत व्यवहार पर ग़ौर करें और समझें कि काउंटर-इंसरजेंसी, महज़ ''उप-पारंपरिक युद्ध (Sub Conventional War)'' का ही एक हिस्सा है।
गौतम नवलखा
09 Apr 2020
जम्मू-कश्मीर

जम्मू-कश्मीर 1990 से ही 'अशांत क्षेत्र' है। इसका मतलब कि यहां स्थितियों को ठीक रखने के लिए वैधानिक सुरक्षा प्राप्त केंद्रीय सुरक्षाबलों को रखना होता है। पिछले 30 सालों से चीजें सामान्य करने, सामान्य के पास स्थिति ले जाने की कहानियों के बीच यही स्थिति बरकरार है और क्षेत्र 'अशांत' ही बना हुआ है।

यही अशांति वास्तिविकता है, क्योंकि बाकी तो कश्मीरी मुस्लिमों और पाकिस्तान पर दोष मढ़कर खेला जाने वाला तर्कशास्त्र का खेल है। 2018 से राज्य सीधे केंद्रीय हाथों में है। प्रदेश सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और जम्मू-कश्मीर में प्रशासन, केंद्र और उसके नुमाइंदों के हाथ में है। यह लोग कश्मीरी लोगों के प्रतिनिधि नहीं हैं, न ही उनके लिए ज़िम्मेदार हैं।

5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A हटा दिया। मतलब राज्य का विशेष दर्जा हटाकर लॉकडाउन लागू कर दिया, जिसके तहत संचार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया, बड़े स्तर पर गिरफ़्तारियां हुईं, जिसमें 7000 लोगों को हिरासत में लिया गया। इनमें 141 बच्चे भी शामिल थे। यह लॉकडाउन क़रीब सात महीने चला। जब ऐसा लगा कि अब थोड़ी राहत मिल सकती है, तो कश्मीर के लोगों को एक और लॉकडाउन का सामना करना पड़ गया। इस बार कोरोना वायरस से लड़ने के नाम पर राज्य में लॉकडाउन किया गया है। इसलिए अब राज्य में असामान्य स्थितियों का जारी रहना ही वास्तिविक सामान्य हो चला है। इसके तहत सभी फ़ैसले नई दिल्ली लेती है। राज्य के लोगों का इसमें कोई योगदान नहीं होता। इसी आदत के चलते केंद्र सरकार ने कश्मीरियों के लॉकडाउन में होते हुए नई मूलनिवासी नीति की घोषणा कर दी।

नए कानून से जम्मू-कश्मीर में 15 साल तक काम कर चुके व्यक्ति, सात साल तक पढ़े छात्र, जिसने वहां दसवीं और बारहवीं की परीक्षा दी है या फिर राहत और पुनर्वास कमिश्नर के पास नाम दर्ज करवा चुके व्यक्ति, अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारी, केंद्र सरकार के अधिकारियों की संतानें, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में काम करने वाले अधिकारी, केंद्र सरकार के स्वायत्त संस्थानों में काम करने वाले लोग, केंद्रीय विश्वविद्यालय के कर्मचारी या फिर केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त शोध संस्थानों से जुड़े लोग, जिन्होंने राज्य में 10 साल तक काम किया है, वे कश्मीर के मूलनिवासी बन सकते हैं। 

इस कानून के ज़रिए पहले से तीसरे दर्जे की नौकरियों को अखिल भारतीय स्तर पर खोल दिया। केवल चौथे और निचले दर्जे की नौकरियों को ही स्थानीय लोगों के लिए सुरक्षित रखा है। इसके बाद प्रशासन ने 84,000 नौकरियों की रिक्ति जारी कर दी। इस फ़ैसले के दो दिन के भीतर चारों तरफ से आलोचना शुरू हो गई और गृहमंत्रालय ने कानून में सुधार कर सभी सरकारी नौकरियों को स्थानीय मूलनिवासियों के लिए आरक्षित कर दिया।

'नियंत्रित मीडिया' ने गृहमंत्रालय के इस तेजी से भरे कदम का स्वागत किया, लेकिन लोग भूल गए किए मूलनिवासी नीति में जो फेरबदल हुए हैं, उनसे बाहरी लोगों की एक बाढ़ आएगी, जो स्थानीय जनसांख्यकीय बदलाव की ओर पहला कदम होगा। प्रधानमंत्री ने खुद की सरकार द्वारा बनाई गई पार्टी ''अपनी पार्टी'' की इस मामले में मदद की और ऐसा दिखाया कि पार्टी कानून बदलवाने में कामयाब रही है। लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा यह कहना कि राज्य की जनसांख्यकीय में बदलाव लाने की सरकार की कोई नीति नहीं है, इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता। क्योंकि हर साल हजारों गैर निवासी राज्य के मूलनिवासी बनेंगे। केवल 10-15 सालों में ही जम्मू और कश्मीर के इलाकों में बदलाव दिखने शुरू हो जाएंगे।

यह बात सही है कि गृहमंत्रालय का नई भूमि नीति बनाया जाना बाकी है, ताकि 'बाहरी' लोगों से राज्य की ज़मीन को बचाया जा सके। वह भी ऐसे वक़्त में जब जनसंख्या की मार झेल रहे कश्मीर में ज़मीन बहुत कम है। लेकिन केंद्र सरकार ने ज़मीनों की महंगी कीमतों का प्रचार किया है, ताकि स्थानीय निवासी इससे अलग हो सकें। दोमुंही सरकारी नीतियां, जिनमें स्थानीय ज़मीनों को बचाने के लिए कोई साफ़ प्रावधान नहीं हैं, उन्होंने किसी बाहरी के मूलनिवासी दर्जा लेने की प्रक्रिया को आसान बना दिया है। इस नीति से जनसांख्यकीय बदलाव आने वाले हैं।

उस वर्ग को देखिए, जिन्हें नए कानून में साधा गया है। साफ है कि हज़ारों लोग मूलनिवासी दर्जा पाने के रातों-रात काबिल हो गए। जब आपके पास यह दर्जा होगा, तो ज़मीन खरीदी जा सकती है, नौकरियां में जगह ली जा सकती है और 10-15 साल में इस केंद्रशासित प्रदेश का मुस्लिम बहुसंख्यक चरित्र बदलने में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार कामयाब हो जाएगी।

एक तरफ इसका प्रभाव कश्मीर में बहुत ज़्यादा होगा, दूसरी ओर जम्मू भी सुरक्षित नहीं रहेगा। वहां डोगरा, गुज्जर बकरवाल या चिनाब घाटी के कश्मीरी बोलने वाले लोग पहाड़ी मुस्लिम और दूसरे समूहों को भी नुकसान उठाना पड़ेगा। 

यहां यह साफ देखा जा सकता है कि जब लोग लॉकडाउन में बंद हैं, तब सरकार ने फायदा उठाते हुए अपने ख़तरनाक योजना को आगे बढ़ाया। वह भी एक वैश्विक महामारी के दौर में। साफ है कि बीजेपी सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों की फिक्र नहीं करती। ताजा कदमों से तो यही लगता है कि उन्हें जम्मू-कश्मीर के लोग नागरिक नहीं बल्कि अपने अधीन रहने वाले गुलाम समझ में आते हैं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदू डोगराओं के शासनकाल में कश्मीरियों से सारी ज़मीनों के मालिकाना हक़ छीन लिए गए और उनसे गुलाम आबादी की तरह बर्ताव किया गया। आज उन्हीं डोगराओं की तरह नीति अपनाकर कुछ दक्षिणपंथी कट्टरपंथियों को विश्वास दिलाया जा सकता है कि राज्य में पुराना हिंदू शासन आने वाला है। ऐसा शासन जहां त्रासदी के दौर में जनता त्राही-त्राही करती रही, लेकिन शासक अपने आराम में मस्त रहा आया।

लेकिन जम्मू में भी डोगरा बहुसंख्यक खुश नहीं हैं। उन्हें साफ दिख रहा है कि राज्य का केंद्रशासित प्रदेश में बदलना, उनके इतिहास और गर्व के प्रतीकात्मक चिन्हों से ठीक नहीं हो जाएगा। डोगरा भी अपनी ज़मीन और नौकरियां खोने वाले हैं। ध्यान रहे कि 1948-52 के बीच हुए क्रांतिकारी भू सुधारों से न केवल कश्मीरी मुस्लिम, बल्कि निचली जातियों के हिंदू और दलितों को भी लाभ हुआ था। कोई अपनी ज़मीन पर अमीर लोगों द्वारा आंखें गड़ाया जाना पसंद नहीं करता।

ध्यान रहे पूर्वोत्तर में इसी बीजेपी की सरकार इनर लाइन परमिट को बढ़ाए जाने की बात कहती है। इससे एक पर्यटक को राज्य में बिना परमिट घुसने की अनुमति नहीं मिलती। सरकार ने असम में अवैध प्रवासियों के नाम पर 19 लाख लोगों को नर्क की आभासी हिरासत में डाल दिया है, दूसरी तरफ स्थानीय लोगों से कहा है कि वो बाहरी लोगों की चिंता न करें। जबकि बीजेपी सरकार की नज़र में बाहरी सिर्फ़ मुस्लिम हैं। बल्कि पूर्वोत्तर में सरकारों ने स्थानीय जनजातियों को उनके ज़मीनों पर मालिकाना हक़ का भरोसा दिलाया है। लेकिन जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार की नीतियां स्थानीय आबादी का जमीनों पर मालिकाना हक़ और नौकरियों-धंधों पर पकड़ को कमजोर करना चाहती हैं। सरकार बाहरी लोगों को वहां आकर बसने के लिए मदद कर रही है। पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर में एक समानता यही है कि दोनों जगहों पर ग़रीब लोगों को ही सबसे ज़्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

तो नए मूलनिवासी कानून की कीमत सबसे ज़्यादा कश्मीरियों को भुगतनी होगी। ऊपर से सरकार द्वारा नागरिकों को किसी साम्राज्य के गुलामों की तरह बदल देने से लोगों की परेशानी और बढ़ी है, इसके तहत उनके पास किसी तरह के अधिकार नहीं हैं, उन्हें सिर्फ़ हुक्म बजाना है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रशासन का डॉक्टरों और नर्सों को दिया गया ताजा आदेश है, जिसमें उन्हें PPE (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट), मास्क, दस्तानों की कमी की बात को सार्वजनिक ना करने के लिए कहा गया है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन का स्वास्थ्यकर्मियों पर यह हमला नया नहीं है। पूरे तीस सालों के दौरान यही रवैया रहा है, कभी ज़्यादा, तो कभी कम। लेकिन उन्हें आज के दौर में धमकी देना बेहद अंसवेदनशील और सहानुभूति की कमी को दर्शाता है, जबकि वही लोग पहली पंक्ति में कोरोना से मुकाबला कर रहे हैं।

इसे दूसरे तरीके से देखिए। जब स्वास्थ्यकर्मियों ने सामानों की आपूर्ति न होने और 4G सर्विस चालू करने की बात कही, तो सरकार यह समझाने में लग गई कि 2G नेटवर्क कितने अच्छे तरीके से काम कर रहा है। मैं सोचता हूं कि अगर प्रशासन ने इतना बड़ा झूठ दिल्ली में रहकर बोला होता या अगर सैनिक हथियारों की कमी की बात कर रहे होते तो क्या वो बच पाते?

दूसरी चीज देखिए। यह अधिकारी अपने गोलमाल के खुलासे से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने वाले लोगों के ख़िलाफ़़ FIR की बात कह रहे हैं। लेकिन वो उत्तरप्रदेश और दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली जेलों में बंद राजनीतिक और नागरिका कार्यकर्ताओं की बिलकुल चिंता नहीं करते। उन्हें वापस नहीं आने दे रहे हैं। अगर वो वापस आते हैं, तो वे भीड़ से बच सकते हैं। अगर इन लोगों ने वाकई में कोई अपराध किया होता, तो उनपर चार्जशीट दायर की जा चुकी होती। उन्हें हिरासत में लिया जाना राज्य द्वारा महज़ शक के आधार पर की गई मनमानी थी।

डॉक्टरों और नर्सों को डराकर अपने कारनामों पर पर्दा डालने का जम्मू-कश्मीर प्रशासन का पुराना इतिहास रहा है। यह वह वक़्त है जब कोरोना किसी तरह का कानून नहीं मानता और कोई सीमारेखा उसे नहीं रोक सकती। इस दौर में भी आंख बंदकर सब चीजें नियंत्रण में रहने और आलोचना करने वालों को धमकाना अपराध है। क्योंकि मानवीय गलतियों के चलते यह वायरस किसी को भी निशाना बना सकता है या किसी जगह को अपना गढ़ बन सकता है।

विशेष दर्जा हटाए जाने के बाद 'नियंत्रित मीडिया' अपनी दुकानें चलाता रहा। प्रशासन भी पक्षों के नेताओं के साथ बुरा-व्यवहार करते हुए खुश था। उसे लग रहा था कि ऐसा करने से बीजेपी के शासन में आने की राह आसान होगी। अब जब स्थितियां खराब हो रही हैं, तब प्रशासन फिर से उन नेताओं की तरफ देख रहा है, जिन्हें उनके मीडिया के दोस्तों ने बदनाम किया था। इसलिए अब लोगों की सहानुभूति नहीं, बल्कि खुद की असफलता और स्थिति के और बदतर होने के डर से प्रशासन इन नेताओं की शरण में है। क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि उसमें लोगों के भीतर विश्वास जगाने का माद्दा नहीं है।

काबुल में हालिया ISIS हमले (जिसे संगठन ने कश्मीर के नाम पर अंजाम दिया), उत्तरी कश्मीर की कुपवाड़ा मुठभेड़ (जिसमें आर्मी ने दावा किया कि जवानों और मिलिटेंट में हाथों से भी लड़ाई हुई) जैसी घटनाओं से स्थिति के और बदतर होने का अंदेशा जताया जा रहा है। कुपवाड़ा में पांच जवान और पांच मिलिटेंट ने जान गंवाई थी।

भारत ने गुरूद्वारे पर हमले के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया। भारत ने कहा कि ISIS को पाकिस्तान नियंत्रित करता है। लेकिन यह प्रतिक्रिया बताती है कि भारतीय अधिकारियों के दिमाग पर पाकिस्तानी नफ़रत किस तरीके से हावी हो चुकी है और यह नफ़रत उनकी सोच को प्रभावित कर रही है। इससे भारत में नौकरशाही की अक्षमता के बारे में पता चलता है, जो खुद के हित में भी सही नहीं सोच सकती। अगर वे सक्षम होते तो पहले ही ज़्यादा वास्तिविक और व्यवहारिक नज़रिया अपनाते, जिसके तहत दूसरों पर अपनी हठधर्मिता थोपने के बजाए बातचीत की जाती और कुछ राजनीतिक सहूलियत दी जाती।

इसलिए अब जब प्रशासन ने एक कदम पीछे हटाया है, तब उन्हें महसूस होगा कि वे नफ़रत के बीज बो रहे थे। भले ही इस बीच उन्होंने कोरोना के दौर को अपने हितों की पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया हो। बीजेपी नेतृत्व ने इस दौर में भी हठधर्मिता दिखाते हुए जम्मू-कश्मीर के लिए अपने एजेंडे के मुताबिक़ योजना को आगे बढ़ाया है। ''राष्ट्रीय हितों'' की आड़ में खुद के विभाजनकारी एजेंडे को चलाया जा रहा है। इस ''राष्ट्रीय हित'' में सभी नागरिक शामिल नहीं हैं।

इसलिए अब वक़्त है, जब लोकतांत्रिक विचारों वाले लोग भारत द्वारा कश्मीर से गलत व्यवहार पर गौर करें और समझें कि काउंटर-इंसरजेंसी, महज़ ''उप-पारंपरिक युद्ध (Sub Conventional War)'' का ही एक हिस्सा है। अगर कोई युद्ध की बात को नजरंदाज कर रहा है, तो वह उस सच्चाई से भी मुंह मोड़ रहा है, जिसके तहत भारत ने कश्मीर समस्या को लोकतांत्रिक ढंग से हल न करने की भूल की है।

आज यह समस्या एक क्रूर और गैर-प्रतिनिधियों वाले प्रशासन से ज़्यादा बढ़ गई है। प्रशासन किसी के प्रति ज़िम्मेदार नहीं है। सीधे नई दिल्ली से आदेश लेता है और कश्मीर में जनसांख्यिकी बदलने में मदद कर रहा है। यह किसी आपदा के लिए बिलकुल तैयार स्थिति है। क्योंकि जब लोग अपनी ज़मीनें बचाने के लिए संघर्ष करते हैं, तो उनका यह विश्वास प्रबल हो जाता है कि जनसांख्यिकीय बदलावों के चलते एक समुदाय के तौर पर उनका सबकुछ दांव पर लगा चुका है। यह स्थितियां सैन्य टकरावों को बढ़ावा देती हैं।

बीजेपी सरकार पाकिस्तान के ख़िलाफ़़ सैन्य कार्रवाई का दम भर सकती है, लेकिन एक इंसरजेंसी को किसी बड़ी सैन्य कार्रवाई से कैसे रोका जा सकता है, इस पर उनकी कोई समझ नहीं है।

तो आखिर क्यों जनता से विश्वास बढ़ाए जाने वाले कदमों को नहीं उठाया जाता। जैसे सभी हिरासत में लिए गए लोगों को छोड़ा जाए, 4G सर्विस को चालू कर कोरोना के ख़िलाफ़़ मुहिम में पहली पंक्ति में खड़े लोगों की बेहतर संचार से मदद की जाए। विश्वास बढ़ाने के लिए नए मूलनिवासी कानून को भी वापस लिया जाना चाहिए, साथ में नर्स, डॉक्टरों और दूसरे सदस्यों के लिए ज़रूरी मास्क, PPEs और दस्तानों का प्रबंध किया जाना चाहिए। पांच अगस्त, 2019 को कश्मीर लॉकडाउन के बाद, हम अहम वक़्त खो चुके हैं। सभी जगह कश्मीरी गुस्से में हैं। यहां तक कि जम्मू में प्रधानमंत्री के समर्थकों में भी राज्य के साथ हुए व्यवहार से नाराज़गी है।

प्रधानमंत्री ने अलग-अलग मौकों पर बताया है कि वो भारतीय जनता को मनमुताबिक़ ढाल सकते हैं। मैं सोचता हूं कि उन्होंने कश्मीर सवाल को लोकतांत्रिक तरीके से हल करने के लिए इस प्रभाव का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। हमारी समझ कहती है कि अब हमें सैन्य दबाव से अलग हटना होगा। दशकों से जारी जोड़-तोड़ की राजनीति ने भी काफ़ी नुकसान पहुंचाया है। तो आखिर क्यों हम लोकतांत्रिक समाधान की ओर नहीं मुड़ते? प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी है कि वो कश्मीर के मामले में किसी भी तरह की दखलंदाज़ी पसंद नहीं करेंगे। इसलिए अब बेहतर होगा कि वो भारतीय जनता को बताएं कि उन्हें कश्मीर समस्या का लोकतांत्रिक समाधान क्या लगता है। इससे कश्मीर सवाल पर हमारी समझ में आ रहे रोड़े हट सकते हैं।

लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

अंग्रेजी में लिखे गए मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं

J&K: Things Change, Often to Make Situation Worse

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