NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
जम्मू और कश्मीर में पीने के पानी में कीटनाशक भरते ज़हर 
दक्षिण कश्मीर के ज़िला मुख्यालय, कुलगाम में वेशव नदी के तट पर नगरपालिका के टनों ठोस कचरे को रोज़-रोज़ डंप किया जाता है और डंप करने वाला कोई और नहीं, बल्कि ख़ुद नगरपालिका समिति है।
राजा मुज़फ़्फ़र भट
30 Apr 2021
अश्तर घाटी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के आसपास शालि गंगा नदी। फ़ोटो: साभार: राजा मुज़फ़्फ़र भट
अश्तर घाटी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के आसपास शालि गंगा नदी। फ़ोटो: साभार: राजा मुज़फ़्फ़र भट

इस ख़ूबसूरत सूबे के बाग़ों और धान के खेतों में कीटनाशकों के इस्तेमाल से ख़तरनाक केमिकल नदियों और नालों में रिसने लगे हैं और पीने के पानी के स्रोतों को प्रभावित कर रहे हैं। हालांकि इस दूषण पर नज़र रखने में जम्मू और कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति की बड़ी भूमिका है और यह जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का उल्लंघन करने वाले किसानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी कर सकती है, लेकिन अधिकारियों की तरफ़ से इस तरह की कार्रवाई बहुत कम ही की गयी है। राजा मुज़फ़्फ़र भट लिखते हैं कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है और इस उल्लंघन की स्थिति में किसी भी नागरिक को अनुच्छेद 32 के तहत इंसाफ़ पाने का अधिकार है।

जम्मू और कश्मीर में पीने और सिंचाई, दोनों के लिए पानी के बड़े-बड़े स्रोत हैं। यहां विशाल ग्लेशियर, नदी, नाले, झीलें और नदियां हैं। इस तरह के प्रचुर जल संसाधनों के होने के बावजूद, यहां क़स्बों, गांवों और शहरों में रहने वाले ज़्यादातर लोगों को पीने के असुरक्षित पानी की आपूर्ति की जाती है।

पेयजल आपूर्ति संयंत्रों को दिया जाने वाले इस अशोधित पानी में न सिर्फ़ ठोस या तरल अपशिष्ट या मानव और पशु मल मिले होते हैं, बल्कि इसमें विभिन्न प्रकार के वे कीटनाशक और कवकनाशी भी मिले होते हैं, जिन्हें सेबों और सब्ज़ियों के खेतों, गोल्फ़ कोर्स, उद्यानों और पार्कों में छिड़के जाते हैं।

दूध गंगा से मिलने वाला पानी

दूध गंगा का अर्थ भले ही "दूध की नदी" है, मगर यह नदी कोई ज़्यादा दूधिया नहीं है। यह छोटी नदी आंतरिक हिमालयी क्षेत्र के पीर पंजाल ग्लेशियरों से निकलती है, जब यह ग्लेशियर से बाहर आती है, तो इसका पानी साबिक और साफ़ होता है। लेकिन, महज़ 30 किमी नीचे की ओर सफ़र करने के बाद यह उन कीटनाशकों से दूषित हो जाती है, जो पास के सेब के बागों से इसमें मिल जाते हैं।

ठोस और तरल कचरे पहले से ही इस दूध गंगा नदी के लिए ख़तरा बने हुए थे। क्रालपोरा स्थित दूध गंगा जल निस्पंदन(filtration)संयंत्र से आपूर्ति किया जाने वाला पानी, ख़ासकर गर्मियों के उन महीनों में पीने के क़ाबिल नहीं रह जाता है, जब बारिश में कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है, जो अक्सर लगातार होती बारिश के साथ इसमें घुल जाते हैं।  

श्रीनगर के बाहरी इलाक़े में स्थित क्रालपोरा में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, रशीद अशरफ़ कहते हैं, ''दूध गंगा के प्रदूषित पानी को क्रालपोरा फिल्ट्रेशन प्लांट से गुज़ारा जाता है और फिर सेडीमेंटेशन(अविशिष्ट पदार्थों को हटाने ) और क्लोरीकरण के बाद श्रीनगर के ऊपर स्थित शहर में रहने वाले पांच लाख से ज़्यादा लोगों को इसकी आपूर्ति की जाती है। मगर, सवाल है कि क्या इस पानी को इतना ज़्यादा साफ़ किया जाता है कि यह पीने के लायक बन पाता हो, क्योंकि इसमें न सिर्फ़ तरल अपशिष्ट होते हैं, बल्कि ज़हरीले कीटनाशक भी होते हैं ? ऐसा लगता है कि प्रदूषण नियंत्रण समिति ने इस पहलू पर ग़ौर ही नहीं किया है।

कचरे की डंपिंग

दक्षिण कश्मीर के एक ज़िला मुख्यालय, कुलगाम में वेशव नदी के तट पर नगरपालिका के टनों ठोस कचरे को रोज़-रोज़ डंप किया जाता है और डंप करने वाला कोई और नहीं, बल्कि ख़ुद नगरपालिका समिति है। यह ख़ुद इस नगरपालिका संस्था की तरफ़ से किया जाने वाला उस नगरपालिका ठोस अपशिष्ट नियमावलि, 2016 का खुला उल्लंघन है, जिसे उसे ही लागू करना है।

कुलगाम शहर के ठोस अपशिष्ट और मैले नाले के अलावा कीटनाशक भी इस नदी को दूषित करते हैं, जो दक्षिण कश्मीर के कुलगाम और अनंतनाग ज़िलों में रह रहे हज़ारों परिवारों के लिए पीने का पानी का स्रोत है।

वसंत ऋतु (मार्च और उसके बाद के महीने) से कुलगाम ज़िले में सेब के पेड़ों पर बड़ी मात्रा में कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है। ये छोटे-छोटे नालों और नदियों में बह जाते हैं और वेशव नदी में मिल जाते हैं। अगर कीटनाशक के इस छिड़काव के बाद बारिश होती है, तो पीने के पानी के ये स्रोत ज़्यादा दूषित हो जाते हैं।

श्रीनगर स्थित पीपुल्स एन्वायरमेंट काउंसिल (PEC) के संयोजक, साक़िब क़ादरी द लीफ़ेलेट से बताते हुए कहते हैं, “पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग (PHE) डिपार्टमेंट, जिसे जल शक्ति विभाग भी कहा जाता है, न सिर्फ़ कुलगाम, बल्कि पड़ोसी अनंतनाग और शोपियां ज़िलों के लोगों को भी सेहत के लिए नुकसानदेह और बिना शोधित पेयजल की आपूर्ति कर रहा है। बाग़वानी और कृषि विभागों के जानकारों ने कीटनाशकों के इस छिड़काव से जल निकायों के प्रबंधन और संरक्षण पर पड़ने वाले असर को लेकर किसानों के बीच किसी तरह की कभी कोई जागरूकता पैदा नहीं की है। सरकार को चाहिए कि वह किसानों को रसायनों का छिड़काव करते समय जल निकायों को होने वाली न्यूनतम क्षति को सुनिश्चित करने की ज़रूरतों पर पीएचई और बाग़वानी और कृषि विभागों जैसी एजेंसियों का एक संयुक्त कार्य बल बनाये। किसानों के लिए जैविक खेती अपनाना बेहतर होगा।”

शाली गंगा

दूध गंगा और वेशव की तरह शाली गंगा नदी भी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला से निकलती है। यह नदी बड़गाम ज़िले में दूध पथरी के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल से होकर गुज़रती है, जो खानसाहिब उप-मंडल के कई गांवों को पार करती हुई वथूरा में दुध गंगा में जा मिलती है।

नवकान घाटी पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला में अपने स्रोत के पास दूध गंगा। फ़ोटो: सौजन्य: राजा मुज़फ़्फ़र भट

शालि गंगा का अर्थ एक ऐसी नदी से है, जो "धान के लिए पानी की आपूर्ति करती" है। 20-30 साल पहले शालि गंगा के किनारे धान के कई खेत थे। इन खेतों को अब या तो सेब के बाग़ों या आवासीय कॉलोनियों में तब्दील कर दिया गया है। पीएचई विभाग कई स्थानों पर शाली गंगा से साबिक पानी ले आता है और उन्हें ख़ानसाहिब उप-मंडल और चादूरा उप-मंडल के कुछ क्षेत्रों के दर्जनों गांवों में आपूर्ति कर देता है।

सरकार की तरफ़ से बड़गाम ज़िले में पानी के टैंकों और फ़िल्ट्रेशन प्लांटों के निर्माण पर लाखों रुपये ख़र्च किये गये हैं, लेकिन इनमें से कई योजनायें या तो पूरी तरह काम नहीं कर रही हैं या फिर ठीक से काम नहीं कर रही हैं।

जब इस लेख के लेखक ने अरिगाम का दौरा किया, तो उन्होंने पानी की एक टंकी को सुस्त चाल से चलती शालि गंगा नदी से मिलने वाले अशोधित (untreated) पानी से भरा हुआ पाया।

यह टैंक 20, 000 की आबादी वाले तक़रीबन आठ गांवों में पीने के पानी की आपूर्ति करता है। अरिगाम और अन्य गांवों में गोबर के ढेर जहां-तहां बिखरे पड़े हैं। बारिश होने पर ये ढेर शालि गंगा में बह जाते हैं।

किचेन, बाथरूम और शौचालय से निकलने वाले घरेलू तरल अपशिष्ट तक़रीबन 30 किमी तक, यानी दल्ली पथरी से बुचरु तक फैले हुए हैं और ये अपशिष्ट भी शालि गंगा में आ मिलते हैं। इन सबसे बढ़कर, खेतों और धान के खेतों के कीटनाशक आगे चलकर शालि गंगा को दूषित कर देते हैं। अधिकारियों ने इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया।

अरिगाम के रहने वाले मोहम्मद इक़बाल कहते हैं, “अरिगाम गांव को एक खुले पाइप के ज़रिये सीधे एक नाले से पीने का पानी मिलता है। यह नाला पानी ठोस और तरल कचरे से दूषित है। गर्मियों में जब सेब के बाग़ों और धान के खेतों में डायमोनियम फ़ॉस्फ़ेट, यूरिया और कॉपर सल्फ़ेट जैसे कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है, तो वे भी इस नाले में प्रवेश कर जाते हैं। अगर सिर्फ़ अरिगाम में रह रहे लोगों के स्वास्थ्य पर इस दूषित पानी के असर को लेकर कोई शोध किया जाये, तो उस शोध के नतीजे चौंकाने वाले होंगे।"

मैली होती डल झील

दुनिया भर में मशहूर श्रीनगर की डल झील भी तक़रीबन 750 हाउसबोट और आवासीय घरों से निकलने वाले अपशिष्टों से बेहद दूषित हो गयी है।

बड़ी मात्रा में वार्षिक बजट के सरकारी स्वामित्व वाली संस्था-झील और जलमार्ग विकास प्राधिकरण ने पिछले तीन दशकों में इस झील के रखरखाव पर अरबों ख़र्च कर दिये हैं, लेकिन इसके बावजूद इस समस्या का हल नहीं खोज पायी है।

डल झील पर तैरते सब्ज़ी बाग़ान। फ़ोटो: साभार: कश्मीर पैट्रियट

सबसे ख़तरनाक स्थिति तो डल झील और आसपास के सेब के बाग़ों के तैरते सब्ज़ी बाग़ानों में कीटनाशकों का इस्तेमाल है।

कीटनाशकों का इस्तेमाल इस शहर के मशहूर मुग़ल और ट्यूलिप गार्डन और गोल्फ़ कोर्स में भी किया जाता है और ये कीटनाशक डल झील में प्रवेश कर जाते हैं।

कश्मीर के इन्वॉयरमेंट साइंस यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर, प्रोफ़ेसर जी.ए.भट बताते हैं, “मार्च से अगस्त तक डल झील कीटनाशकों से नियमित रूप से दूषित होती रहती है। यह न सिर्फ़ इंसानों, बल्कि उन मछलियों के लिए भी नुकसानदेह है, जो कश्मीरियों के खाने का एक अहम हिस्सा है। जैसा कि कई वैज्ञानिक अध्ययनों में भी साबित हो चुका है कि उनमें भी कीटनाशक हैं।"

विडंबना है कि डल झील के पानी को जल शक्ति विभाग ने निगीन इलाक़े के आसपास उठा लिया है और श्रीनगर के पुराने शहर के कुछ इलाक़ों में तक़रीबन दो लाख लोगों को इस पानी की आपूर्ति की जाती है।

प्रोफ़ेसर भट कहते हैं, “इस पीने के पाने में मिले कीटनाशकों को सेडीमेंटेशन या ब्लीचिंग पाउडर के इस्तेमाल जैसी उन पारंपरिक प्रक्रियाओं से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, जो आमतौर पर जल में बैक्टीरिया को मारने के लिए जल शक्ति की तरफ़ से इस्तेमाल किया जाता है। हक़ीक़त तो यही है कि अगर ब्लीचिंग पाउडर का सीधे पानी में इस्तेमाल किया जाता है, तो यह ख़ुद ही नुकसानदेह है, मगर इसका इस्तेमाल इसी रूप में कश्मीर की कई जगहों पर किया जाता है। जल शक्ति विभाग को यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत से शोध करने की ज़रूरत है ताकि पीने का पानी कीटनाशकों से सुरक्षित रहे।”

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ फ़ार्मा साइंसेज एंड रिसर्च (डॉ.मुद्दसिर बैंडी और अन्य, दिसंबर 2012) में ताज़े पानी की मछली, "शिज़ोथोरैक्स नाइजर", (अल्गर स्नो ट्राउट) के प्रदूषित होने पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, (एल्गर स्नॉ ट्राउट) विद क्लोरपाइरीफ़ॉस फ़्रॉम "डल लेक" बेसिनन्स नामक उस रिपोर्ट में इस बात का संकेत मिलता है कि क्लोरपाइरीफ़ॉस नामक एक ऑर्गेनो-फ़ॉस्फेट कीटनाशक इस "शिज़ोथोरैक्स नाइजर" में मौजूद था। 

सीपीसीबी के दखल की ज़रूरत

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिसे अब जम्मू और कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति (J & K PCC) नाम से जाना जाता है, उसकी कीटनाशकों से पीने के पानी के प्रदूषित होने की देखरेख करने में एक बड़ी भूमिका है। जेके पीसीसी उन किसानों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकती है, जो जल ( प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का उल्लंघन करते हुए रासायनिक उर्वरकों को पीने के पानी के स्रोतों में बहा देते हैं।

बड़गाम ज़िले में सेब के पेड़ों पर कीटनाशकों का छिड़काव करते हुए। फ़ोटो: साभार: मोहम्मद मक़बूल

जल प्रदूषण को रोकने और नियंत्रित करने और पानी की पूर्णता को बनाये रखने या बहाल करने के लिए ही इस जल अधिनियम को पेश किया गया था। यह अधिनियम जल प्रदूषण के नियंत्रण के लिए बोर्डों की स्थापना का भी प्रावधान करता है। केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) या प्रदूषण नियंत्रण समितियां (PCCs) इस जल अधिनियम के संरक्षक हैं।

तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JK SPCB) ने पेयजल स्रोतों या अन्य जल निकायों पर कीटनाशकों के प्रवाह के असर का पता लगाने के लिए कोई अध्ययन तक नहीं किया है।

अगर यह सही है, तो सीपीसीबी को इसका संज्ञान लेना चाहिए।इस बात का भी पता लगाने की ज़रूरत है कि कश्मीर की नदियों और झीलों में कीटनाशकों की यह निकासी 2016 के 2019 के बीच इसके सभी चार संशोधनों के साथ-साथ ख़तरनाक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 का उल्लंघन तो नहीं है।

अनुच्छेद 21 का उल्लंघन

संविधान का अनुच्छेद 21 भारत के नागरिकों को स्वस्थ आबोहवा पाने का अधिकार देता है। संविधान सभा से संविधान का मसौदा तैयार किये जाने और अनुमोदित होते समय स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार का यह प्रावधान संविधान में शामिल नहीं था। राज्य सूची के जिन विषयों पर राज्य क़ानून बना सकते हैं, वे हैं-स्वास्थ्य, स्वच्छता, कृषि, मिट्टी, पानी, आदि। संघ सूची में परमाणु ऊर्जा, तेल क्षेत्र और संसाधन, अंतर्राज्यीय नदी आदि जैसे मुद्दे शामिल हैं, जिन पर कानून बनाने की शक्ति सिर्फ़ संसद के पास है।

संविधान की प्रस्तावना इस बात को स्पष्ट करती है कि सामाजिक-आर्थिक न्याय हमारे संविधान का आधार है। शीर्ष अदालत ने सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य के ममले में कहा था कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और इसमें जीवन जीने के लिए पानी और प्रदूषण से मुक्त हवा के अधिकार भी शामिल हैं।

अगर क़ानून की ढिलाई के चलते जिस किसी भी वजह से जीवन की गुणवत्ता ख़तरे में पड़ जाती है या उसे नुकसान पहुंचता है तो कोई भी नागरिक को जब यह महसूस होता है कि उसे जीवन की गुणवत्ता के उसके अधिकार से "वंचित" किया जा रहा है, तो उसे न्याय पाने के लिए अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ करने का अधिकार है।

ऐसा तब भी किया जा सकता है, जब राज्य, नागरिकों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने में नाकाम रहता है।

कीटनाशक और ब्रेन कैंसर

न्यूरोसर्जन, प्रोफ़ेसर अब्दुल रशीद भट और एस.के. इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (SKIMS), श्रीनगर के अन्य जानकारों के एक अध्ययन में पाया गया है कि कीटनाशकों का सम्बन्ध मस्तिष्क कैंसर से है। अक्टूबर 2010 में इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एंड पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित इस रिपोर्ट से पता चलता है कि 2010 (मेटास्टैटिक घावों को छोड़कर) में एक वैज्ञानिक अध्ययन के दौरान एसकेआईएमएस द्वारा किये गये परीक्षणों में प्राथमिक घातक मस्तिष्क ट्यूमर के 432 मामलों में से 389 मामले बाग़ में काम करने वाले कृषि श्रमिकों के थे।

सेब के खेतों में विभिन्न कीटनाशकों के सीधे संपर्क में आने से 61% किसान / खेत मज़दूर प्रभावित हुए थे, जबकि तक़रीबन 39% अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में आने से प्रभावित हुए थे, जिनमें दूषित पेयजल का सेवन भी शामिल है। उस अध्ययन के मुताबिक़, ज़्यादा प्रभावित ज़िले अनंतनाग, बारामूला, बड़गाम और शोपियां थे।

स्वास्थ्य और अन्य विषयों के जानकारों और अध्ययनों से मिली जानकारियों से यही स्पष्ट होता है कि जम्मू-कश्मीर में पीने का पानी सुरक्षित नहीं है। सरकारों और वैज्ञानिक संस्थानों को कीटनाशकों से पीने के पानी के स्रोतों के प्रदूषित होने को लेकर अभी और अध्ययन करने की ज़रूरत है।

मगर, जल शक्ति विभाग इस ख़तरनाक स्थिति से अनजान है। उनके पास पानी में बैक्टीरिया को मारने की तकनीक तो है, लेकिन सवाल है कि कीटनाशक मिले पानी के शोधन को लेकर उनकी क्या योजना है ?

इस विभाग को बाग़वानी और कृषि विभागों के ज़रिये किसानों के साथ संपर्क करने और जेएंडके पीसीसी से मार्गदर्शन की ज़रूरत है। इन किसानों के लिए क्षमता निर्माण से सम्बन्धित कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि खेतों में इस्तेमाल किये जाने वाले कीटनाशकों से पीने के पानी का स्रोत दूषित न हों। सरकार को ऐसा करने के लिए क़ानून और विभिन्न उपायों के साथ सामने आने की ज़रूरत है।

यह एक लंबी लड़ाई है।

यह लेख मूल रूप से द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

(राजा मुज़फ़्फ़र भट श्रीनगर स्थित कार्यकर्ता, स्तंभकार और स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। वह एक्यूमन इंडिया फ़ेलो हैं। इनके व्यक्त विचार निजी हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Jammu and Kashmir’s Drinking Water Poisoned by Pesticides

Environment
Environmental Law
Forest Rights
Governance
India
Policy
Right to Life
Water Rights

Related Stories

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आईपीईएफ़ पर दूसरे देशों को साथ लाना कठिन कार्य होगा

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

वर्ष 2030 तक हार्ट अटैक से सबसे ज़्यादा मौत भारत में होगी

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

वित्त मंत्री जी आप बिल्कुल गलत हैं! महंगाई की मार ग़रीबों पर पड़ती है, अमीरों पर नहीं

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

रूस की नए बाज़ारों की तलाश, भारत और चीन को दे सकती  है सबसे अधिक लाभ


बाकी खबरें

  • prashant kishor
    अनिल सिन्हा
    नज़रिया: प्रशांत किशोर; कांग्रेस और लोकतंत्र के सफ़ाए की रणनीति!
    04 Dec 2021
    ग़ौर से देखेंगे तो किशोर भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने में लगे हैं। वह देश को कारपोरेट लोकतंत्र में बदलना चाहते हैं और संसदीय लोकतंत्र की जगह टेक्नोक्रेट संचालित लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं…
  • All five accused arrested in the murder case
    भाषा
    माकपा के स्थानीय नेता की हत्या के मामले में सभी पांच आरोपी गिरफ्तार
    04 Dec 2021
    घटना पर माकपा प्रदेश सचिवालय ने एक बयान जारी कर आरएसएस को हत्या का जिम्मेदार बताया है और मामले की गहराई से जांच करने की मांग की है.पुलिस के अनुसार, घटना बृहस्पतिवार रात साढ़े आठ बजे हुई थी और संदीप…
  • kisan andolan
    लाल बहादुर सिंह
    MSP की कानूनी गारंटी ही यूपी के किसानों के लिए ठोस उपलब्धि हो सकती है
    04 Dec 2021
    पंजाब-हरियाणा के बाहर के, विशेषकर UP के किसानों और उनके नेताओं की स्थिति वस्तुगत रूप से भिन्न है। MSP की कानूनी गारंटी ही उनके लिए इस आंदोलन की एक ठोस उपलब्धि हो सकती है, जो अभी अधर में है। इसलिए वे…
  • covid
    भाषा
    कोरोना अपडेट: देशभर में 8,603 नए मामले सामने आए, उपचाराधीन मरीजों की संख्या एक लाख से कम हुई
    04 Dec 2021
    देश में कोविड-19 के 8,603 नए मामले सामने आए हैं, जिसके बाद कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 3,46,24,360 हो गई है।  
  • uttarkhand
    सत्यम कुमार
    देहरादून: प्रधानमंत्री के स्वागत में, आमरण अनशन पर बैठे बेरोज़गारों को पुलिस ने जबरन उठाया
    04 Dec 2021
    4 दिसंबर 2021 को उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आ रहे हैं। लेकिन इससे पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत के लिए आमरण अनशन पर बैठे बेरोजगार युवाओं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License