NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
8 जनवरी हड़ताल : 7.3 करोड़ बेरोज़गारों के लिए ज़िंदा रहने की जंग
मज़दूर अधिक नौकरियों की मांग को लेकर हड़ताल कर रहे हैं, जबकि मोदी सरकार आरएसएस के एजेंडे को लागू करने में व्यस्त है और बेरोज़गारों की विशाल संख्या की तरफ़ देखने से भी इनकार कर रही है।
सुबोध वर्मा
04 Jan 2020
Translated by महेश कुमार
jan 8 strike

7.3 करोड़ से अधिक लोग, ज़्यादातर युवा, मौजूदा समय में बेरोज़गार हैं। यह शायद बेरोज़गारों की सबसे बड़ी सेना है जिसे भारत ने शायद ही कभी देखा है, और निश्चित रूप से दुनिया की सबसे बड़ी बेरोज़गारों की सेना है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मासिक अनुमानों के अनुसार, दिसंबर 2019 में बेरोज़गारी की दर 7.7 प्रतिशत थी, जो नौवें महीने में 7 प्रतिशत से ऊपर रही है।

शहरी क्षेत्रों में, बेरोज़गारी 8.9 प्रतिशत से भी अधिक पाई गयी है, व्यापक रूप से इस बात को झुठलाते हुए कि शहरी केंद्र नौकरी के विकास के इंजन हैं। यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्र  जो छिपी हुई बेरोज़गारी को कुछ हद तक अवशोषित करती है, वहाँ भी बेरोज़गारी की दर पिछले वर्ष में  6 प्रतिशत से 8 प्रतिशत के बीच झूलती रही है। यह संकट क़ाबू के बाहर की बात है - और मोदी सरकार के पास इससे निपटने के लिए कोई उपाय भी नहीं हैं।

chart_0.JPG

इस प्रकार, नौकरियों की मांग मज़दूरों और कर्मचारियों की एक प्रमुख मांग बन गई है और इसलिए इसे मांगपत्र में शामिल किया गया है, जिसके लिए देश भर में 8 जनवरी, 2020 को लाखों मज़दूर/कर्मचारी हड़ताल करेंगे।

हड़ताल का आह्वान 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और कई स्वतंत्र महासंघों ने मिलकर किया है। 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद इस संयुक्त मंच द्वारा यह चौथी अखिल भारतीय हड़ताल है। ग़ौरतलब है कि एआईकेएससीसी या अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के तहत 100 से अधिक किसान संगठनों ने इस हड़ताल में शामिल होने का फ़ैसला किया है। इन संगठनों ने 8 जनवरी की हड़ताल का समर्थन और उसी दिन 'ग्रामीण बंद' (ग्रामीण हड़ताल) का आह्वान भी किया है। 

मोदी की अदूरदर्शी नीतियाँ 

इस भयंकर रोज़गार के संकट को पैदा करने में मोदी सरकार की अदूरदर्शी नीतियों का बड़ा हाथ है। लोगों की ख़रीदने की ताक़त को बढ़ाने के बजाय, इसने कॉर्पोरेट क्षेत्र को रियायतें देने के बहुत ही बदनाम नव-उदारवादी फार्मूले के विकल्प को चुना है, इस भोली उम्मीद में कि यह निवेश को प्रोत्साहित करेगा, जो बदले में नई नौकरियों का निर्माण करेगा। इसी हठधर्मिता के चलते मोदी सरकार ने सरकारी ख़र्च को भी घातक रूप से निचोड़ डाला है, यह विश्वास करते हुए कि सरकार जितना कम ख़र्च करेगी, उतना ही निजी क्षेत्र आगे बढ़ाकर काम करेगा।

इन दोनों पूर्ववर्ती रणनीतियों को पहले भी यूरोप और लैटिन अमेरिका के देशों में विनाशकारी परिणामों के साथ आज़माया जा चुका है। इस सबसे जो हो रहा है वह यह कि कॉर्पोरेट मुनाफ़े में वृद्धि जारी है, जबकि मज़दूरों और कर्मचारियों की आय में गिरावट आ रही है, बेरोज़गारी बढ़ रही है, और सामाजिक विरोध भी बढ़ रहा है।

मोदी सरकार ने कॉर्पोरेट कर की दरों में कटौती के माध्यम से, विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों को रियायतें देना, निर्यात को बढ़ावा देने के नाम पर उन्हें धन देना, रियल एस्टेट के असफल हुए शक्तिशाली उद्योगपतियों के लिए ख़ज़ाने का मुँह खोलने की घोषणा करना और सार्वजनिक क्षेत्र की ताबड़तोड़ बिक्री कर कॉर्पोरेटों को मुफ़्त देने का एक संदिग्ध रिकॉर्ड बनाया है - केवल तीन महीनों में, इसने पिछले साल की तुलना में 33 प्रतिशत से अधिक रियायतों की घोषणा की है। 2014 के बाद से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार के साढ़े पांच साल के संयुक्त कार्यकाल में 5.76 लाख करोड़ रुपये के कॉर्पोरेट तोहफ़ों की घोषणा की गई है।

लेकिन इस सब के बावजूद, बेरोज़गारी की दर लगातार बढ़ रही है, जिससे इस बात का सबूत मिलता है कि ऐसी नीतियाँ मदद नहीं कर रही हैं।

आजीविका पर प्रभाव 

बेरोज़गारी लाखों कटों से हुई मौत है। इतना ही नहीं बेरोज़गारी परिवारों को बेताहाशा ग़रीबी में धकेल रही है, इसका स्वास्थ्य और पोषण, बच्चों की शिक्षा पर लंबे समय तक प्रभाव रहता है और परिवारों को क़र्ज़ की तरफ़ धकेलता है। यह लोगों को मौसमी और अस्थायी प्रकृति के रोज़गार करने पर मजबूर करता है जिसमें भुगतान कम मिलता है, जिससे सामूहिक असुरक्षा पैदा होती है। यह आम लोगों में ग़ुस्से की लहर को भी पैदा करता है, ख़ासकर जब लोग यह नहीं भूल पाते हैं कि यह वही मोदी है जिसने हर साल एक करोड़ लोगों को नौकरी देने का वादा किया था। उन्होंने ‘अच्हे दिन’ का भी वादा किया था। वह सब अब राख में बदल गया है।

जो लोग रोज़गार नहीं पा सकते हैं उन लोगों के परिवारों पर प्रभाव के अलावा, भारत में बड़े पैमाने की बेरोज़गारी का एक और बहुत गंभीर असर है, जिसे भारत देख रहा है - मौजूदा नौकरियों में वेतन कम हो रहा है। अगर फ़ैक्ट्री गेट के बाहर सौ बेरोज़गार लोग हैं, और नौकरी पाने के लिए बेताब हैं, यहां तक कि सबसे कम वेतन पर काम करने वाले लोग भी, जो अंदर काम कर रहे हैं, वे मज़दूरी या बेहतर सुविधाओं में वृद्धि के लिए अपनी आवाज़ नहीं उठा सकते हैं। क्योंकि, उन्हें कभी भी बर्खास्त किया जा सकता है और कम वेतन पर काम पर नए श्रमिकों को हमेशा रखा जा सकता है।

वास्तव में, इस मंदी का असर सभी औद्योगिक क्षेत्र में देखा गया है। ठेके पर काम करने वाले मज़दूर, जिनकी कभी भी काम से छुट्टी की जा सकती है, ने बर्खास्तगी की एक लहर को देखा है, फिर इनके बदले कम मज़दूरी पर काम पर रखा जाता है। अपने मुनाफ़े को बचाने के लिए, मालिकों ने श्रम की क़ीमत में ही कटौती कर दी है।

श्रम क़ानूनों में बदलाव 

जैसे कि ये दुख काफ़ी नहीं थे,  मोदी सरकार ने मौजूदा श्रम क़ानूनों में कई बदलाव भी कर दिए हैं, जिसके चलते नौकरी की सुरक्षा, मज़दूरी और विभिन्न लाभों के संदर्भ में सुरक्षा को सीमित कर दिया गया है। वास्तव में, नए लेबर कोड के ज़रिये काम के अधिक घंटे, अधिक कार्यभार, नौकरियों को बनाए रखने के लिए मालिकों पर अधिक निर्भरता और शोषणकारी प्रथाओं को क़ानूनी रूप से चुनौती देने के लिए कम अधिकार या कोई अधिक अधिकार प्रदान नहीं करते हैं।

नए क़ानून, जिन्हें आने वाले महीनों में अधिसूचित किया जाना है, क़ानूनों के उल्लंघन पर  प्रबंधन पर दंड को कम करेंगे, श्रमिकों के लिए इस तरह के उल्लंघन पर क़ाबू पाना मुश्किल होगा, यह श्रम जांच प्रणाली को खोखला कर देगा जो इन क़ानूनों को लागू करने वाली संस्था है, और इससे कहीं अधिक और बेलगाम शोषण का मार्ग प्रशस्त होगा।

8 जनवरी की हड़ताल भी इन शत्रुतापूर्ण श्रम क़ानून को वापस लेने की मांग कर रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रेड यूनियनों/महासंघों ने एक साथ मिलकर मोदी सरकार की   सांप्रदायिक और विभाजनकारी रणनीति के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने का भी आह्वान किया है, जिसमें नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) भी शामिल हैं।

इतना ही नहीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नीतियों से प्रेरित उपाय लोगों को धार्मिक आधार पर विभाजित कर रहे हैं और बुनियादी संवैधानिक मूल्यों को नष्ट कर रहे हैं, बल्कि वे मज़दूरों के संघर्ष को बाधित करने के लिए भी हथियार बन जाते हैं।

हालांकि, मौजूदा शासन के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा इस क़दर है कि हड़ताल के लिए चल रहे अभियान को कथित तौर पर देश भर में अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है। लोगों की एकता पर ख़तरे के ख़िलाफ़ कामकाज़ी लोग, मज़दूर लड़ाई के लिए तैयार हो रहे हैं।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Jan 8 Strike
all india strike
Central Tus
CAA-NRC
RSS Agenda
Modi government
unemployment
Jobs Crisis
Grameen Bandh

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

विशाखापट्टनम इस्पात संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ़ श्रमिकों का संघर्ष जारी, 15 महीने से कर रहे प्रदर्शन

नौजवान आत्मघात नहीं, रोज़गार और लोकतंत्र के लिए संयुक्त संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ें

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन

पूर्वांचल में ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल के बीच सड़कों पर उतरे मज़दूर

देशव्यापी हड़ताल के पहले दिन दिल्ली-एनसीआर में दिखा व्यापक असर


बाकी खबरें

  • अन्न महोत्सव: मुफ़लिसी का मंगलगान, सरकारी खर्च पर हिंदुत्व प्रचार
    असद रिज़वी
    अन्न महोत्सव: मुफ़लिसी का मंगलगान, सरकारी खर्च पर हिंदुत्व प्रचार
    29 Aug 2021
    “उतना ही खाद्यान्न मुफ़्त मिला जितना पहले मिलता आ रहा था। मुफ़्त सिर्फ़ एक थैला मिला है, जो पहले नहीं मिला था। थैला देने के बदले सरकार अगर मुफ़्त खाद्यान्न बढ़ा कर देती तो ज़्यादा अच्छा होता।”
  • डेंगू की चपेट में बनारस, इलाज के लिए नहीं मिल रहे बिस्तर
    विजय विनीत
    डेंगू की चपेट में बनारस, इलाज के लिए नहीं मिल रहे बिस्तर
    29 Aug 2021
    बनारस में डेंगू लोगों की जिंदगियां लील रहा है। जान गंवाने वाले प्रमुख लोगों में पुलिस इंस्पेक्टर राम विलास यादव, भोजपुरी कलाकार बबलू रिमिक्स और बनारसी इश्क संगठन के सदस्य सुमंत कुमार साहनी शामिल हैं।
  • इतिहास-भूगोल से 'खेलती' भाजपा और सेल्फ़-गोल एक्सपर्ट कांग्रेस
    न्यूज़क्लिक टीम
    इतिहास-भूगोल से 'खेलती' भाजपा और सेल्फ़-गोल एक्सपर्ट कांग्रेस
    28 Aug 2021
    केंद्र की मौजूदा भाजपा सरकार और संघ-शिक्षित दर्जनों संगठनों की देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से चिढ़ और नफ़रत किसी से छुपी नहीं है
  • खोज ख़बरः किसान का सिर फोड़कर, ख़ून बहाकर, ख़ुश हुई ‘सरकार’
    न्यूज़क्लिक टीम
    खोज ख़बरः किसान का सिर फोड़कर, ख़ून बहाकर, ख़ुश हुई ‘सरकार’
    28 Aug 2021
    खोज ख़बर में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने हरियाणा के करनाल में पुलिसिया बर्बर लाठीचार्ज से लहूलुहान हुए भारत भाग्यविधाता की बात की। जिस तरह से करनाल के एक अधिकारी का वीडियो सामने आया है, जिसमें वह…
  • कटाक्ष: ये बेच दिया, वो बेच दिया का शोर क्यों है, भाई!
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष: ये बेच दिया, वो बेच दिया का शोर क्यों है, भाई!
    28 Aug 2021
    और कुछ नहीं मिला तो विपक्षी बेचारे मुद्रीकरण के पीछे पड़ गए। कह रहे हैं कि यह कोई मुद्रीकरण-वुद्रीकरण नहीं है। बस मोदी जी ने सेल का नाम बदल दिया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License