NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
राजनीति
झारखंड: बेसराजारा कांड के बहाने मीडिया ने साधा आदिवासी समुदाय के ‘खुंटकट्टी व्यवस्था’ पर निशाना
निस्संदेह यह घटना हर लिहाज से अमानवीय और निंदनीय है, जिसके दोषियों को सज़ा दी जानी चाहिए। लेकिन इस प्रकरण में आदिवासियों के अपने परम्परागत ‘स्वशासन व्यवस्था’ को खलनायक बनाकर घसीटा जाना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता है।
अनिल अंशुमन
05 Jan 2022
mob lynching
प्रतीकात्मक चित्र

हेमंत सोरेन की ‘अबुवा सरकार’ एक बार फिर ‘राजनीति विशेष के दर्शन’ को पूरी कट्टरता से अमल में लानेवाली ‘आदर्श मीडिया’ के निशाने पर उस समय आ गयी है, जब बीते मंगलवार यानि 4 जनवरी को सरेआम एक युवक को पीट-पीट कर जिंदा जलाने का कांड सामने आया। 

देर शाम से ही प्रिंट मीडिया, ऑनलाइन पोर्टलों की ख़बरों और स्थानीय चैनलों में सिमडेगा के आदिवासी गांव बेसराज़रा में ग्रामीणों द्वारा एक युवक को पीट-पीट कर जिंदा जला देने की सनसनीखेज़ खबर तेज़ी वायरल होने लगी। 

सिमडेगा में उत्तेजित ग्रामीणों की भीड़ ने संजू प्रधान नामक युवक की पिटाई करने के बाद उसे जिंदा जला दिया। लकड़ी चोरी के आरोप में भीड़ ने उसकी पिटाई कर उसे आग के हवाले कर दिया। “पूर्व माओवादी की मां व पत्नी के सामने पीट-पीट कर हत्या” .... “उत्तेजित भीड़ ने युवक को घर से खींचकर जिंदा जलाया” ... जैसे शीर्षकों वाली सभी ख़बरों में इसे ‘मॉबलिंचिंग’ बताकर हेमंत सरकार द्वारा हाल ही में लाये गए ‘मॉबलिंचिंग विरोधी कानून’ लागू करने की बात कही गयी। गौरतलब है कि इसी झारखंड में पिछली भाजपा साकार से लेकर अब तक दर्जनों भयावह ‘मॉबलिंचिंग काण्ड’ हो चुके हैं, लेकिन स्थापित मीडिया ने इस बार जैसी तत्परता कभी नहीं दिखाई। 

कांड के दूसरे दिन यानी 5 जनवरी को सभी प्रमुख अख़बारों में यह खबर सुर्ख़ियों के साथ प्रकाशित हुई, जिनमें से अधिकांश में घटना के ब्योरे से अधिक इस पहलू पर जोर दिया गया था कि कैसे उक्त काण्ड को आदिवासियों के ‘खुंटकट्टी कानून’ के तहत अंजाम दिया गया है। एक स्थापित अखबार विशेष ने तो इसे आदिवासियों का ‘तालिबानी फैसला’ ही करार दे डाला।

4 जनवरी की शाम ही राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्वीट कर सिमडेगा डीसी को मामले की जांचकर कानून सम्मत कार्रवाई करने के निर्देश जारी कर दिया।

बताया जा रहा है कि सिमडेगा जिला स्थित बन्दरचुआं पंचायत के बेसराजारा गांव के लोगों ने वहीं के रहनेवाले संजू प्रधान को गांव के जंगल से बार-बार जबरन लकड़ी काटने से गुस्साकर बुरी तरह से पीटा और उसमें से कुछ लोगों ने उसे जिंदा जला दिया। इसके पहले लगभग 2 बजे दिन में गांव वालों ने ग्रामसभा की बैठक बुलाकर उस से पूछा कि गांव के जंगल से लकड़ी काटने पर प्रतिबन्ध होने के बावजूद वह क्यों बार-बार लकड़ी काटता और बेचता है? संजू प्रधान ने गांववालों की कोई बात नहीं मानी, तो वहां मौजूद गांववाले आपे से बाहर हो गए। इसी दौरान कुछ लोगों ने वहीं थोड़ी दूर पर रखे लकड़ियों के गट्ठर लाकर उसे जिंदा आग के हवाले कर दिया। 

लगभग सभी ख़बरों में यही बात आयी कि उक्त काण्ड करने के बाद वहां जुटे ग्रामीण इतने आक्रोशित थे कि घटना की जानकारी सुनकर वहां पहुंची स्थानीय पुलिस को भी खदेड़ दिया जिससे पुलिस को पीछे हटना पड़ा। लेकिन बाद में आस-पास के तीन-चार थानों  से अतिरिक्त पुलिस बल वहां पहुंचा तब पुलिस गांव में घुस पायी।

ख़बरों के अनुसार आक्रोशित ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि गांव सभा द्वारा जंगल से लकड़ी काटने पर  लगाए गए सार्वजनिक प्रतिबन्ध को संजू प्रधान द्वारा नहीं मानने पर बार-बार उसे काफी समझया गया था, लेकिन वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। तब स्थानीय वन विभाग को भी इसकी सूचना देकर रोक लगवाने की कोशिश की गयी थी। जब इसका कोई परिणाम सामने नाहीं आया तो कुपित गांव वालों के गुस्से का वह शिकार हो गया। मीडिया ख़बरों में बताया गया है कि संजू प्रधान पर गांव के ‘खुंटकट्टी कानून’ के उल्लंघन का आरोप है। 

उक्त काण्ड के बाद से पूरा इलाका अशांत है और पुलिस छावनी में तब्दील हो गया है।

निस्संदेह यह घटना हर लिहाज से अमानवीय और निंदनीय है, जिसके दोषियों को सज़ा दी ही जानी चाहिए।  लेकिन इस प्रकरण में आदिवासियों के अपने परम्परागत ‘स्वशासन व्यवस्था’ को खलनायक बनाकर घसीटा जाना, कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता है, क्योंकि अमूमन आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ है कि झारखंड के आदिवासी इलाकों में ‘ग्राम सभा’ लगाकर किसी को जान से मार डालने और फिर जिंदा जला देने का फैसला लेने की परंपरा रही हो।

इस सन्दर्भ में आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ एडवोकेट रश्मि कात्यायान जी के विचार भी मीडिया द्वारा सामने लायी जा रहीं बातों के सर्वथा विपरीत हैं। उनके अनुसार झारखंड राज्य गठन के होने के बावजूद यहां के आदिवासियों को संविधान प्रदत्त ‘खुंटकट्टी स्वशासन परम्परा’ और उसे ज़मीनी स्वरुप देनेवाले पेसा कानून को धरातल पर लागू ही नहीं किया गया है। जिससे यहां के आदिवासी समाज के लोग काफी क्षुब्ध हैं। पिछले दिनों खूंटी में हुआ ‘पत्थलगड़ी’ प्रकरण भी इसी की ही अभिव्यक्ति थी।  

झारखंड ही नहीं देश और दुनिया के आदिवासी समुदाय के लोग अपनी पारंपरिक सामुदायिक-सामाजिक व्यवस्था लागू किये जाने की आवाज़ लगातार उठा रहें हैं। बाहरी दबावों और आघातों से आदिवासी समाज के लोग आज अपने अस्तित्व व पहचान के समाप्त हो जाने के भयावह संकटों से हर दिन जूझ रहें हैं। स्वाभाविक है कि इनके इलाकों में बाहर से आकर बसने वाले लोग इन्हें सहज स्वीकार्य नहीं हो रहें हैं, जो आये दिन की अप्रिय घटनाओं में भी परिलक्षित होती रहती ही है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं होना चाहिए कि ये लोग हिंसक और आमानवीय होते हैं, जैसा कि सिमडेगा के बेसराजारा हत्याकांड मामले में दिखाया जा रहा है।

संजू प्रधान को ज़िंदा जलाए जाने की सन्न कर देने वाली घटना को लेकर पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज़ कर ली है और मामले की गहन जांच भी शुरू कर दी है। पुलिस के आला अफसरों ने भी बयान दिया है कि दोषियों को बक्शा नहीं जाएगा।

फिलहाल पूरे क्षेत्र में उत्पन्न तनाव के कारण उक्त काण्ड के असली कारणों का खुलकर उजागर होना बाकी है, लेकिन फिलहाल यह सवाल तो बनता ही है कि क्या किसी भी समुदाय की अपनी सामाजिक व्यवस्था में ऐसी अमानवीयता को सही माना जाएगा

aadivasi
tribals
Lynching
Jharkhand
Hemant Soren

Related Stories

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 

दक्षिणी गुजरात में सिंचाई परियोजना के लिए आदिवासियों का विस्थापन

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

बाघ अभयारण्य की आड़ में आदिवासियों को उजाड़ने की साज़िश मंजूर नहीं: कैमूर मुक्ति मोर्चा

झारखंड: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन सत्याग्रह जारी, संकल्प दिवस में शामिल हुए राकेश टिकैत

सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा


बाकी खबरें

  • kisan@378
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसान आंदोलन : पूरे 378 दिनों का ब्यौरा
    15 Dec 2021
    ‘378’... ये महज़ एक संख्या नहीं है, बल्कि वो दिन और राते हैं, जो हमारे देश के अन्नदाताओं ने दिल्ली की सड़कों पर गुज़ारी हैं, उसके बाद उन्हें एक ऐतिहासिक जीत मिली है।
  • Asha
    सरोजिनी बिष्ट
    एक बड़े आंदोलन की तैयारी में उत्तर प्रदेश की आशा बहनें, लखनऊ में हुआ हजारों का जुटान
    15 Dec 2021
    13 दिसंबर को "उत्तर प्रदेश आशा वर्कर्स यूनियन" (सम्बद्ध एक्टू) के बैनर तले विभिन्न जिलों से आईं हजारों आशा बहनों ने लखनऊ के इको गार्डेन में हुंकार भरी।
  • Uttrakhand
    सत्यम कुमार
    उत्तराखंड: गढ़वाल मंडल विकास निगम को राज्य सरकार से मदद की आस
    15 Dec 2021
    “गढ़वाल मंडल विकास निगम का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड राज्य में पर्यटन की सम्भावनाएँ तलाशना, रोजगार के अवसर तलाशना और पलायन को रोकना है ना कि मुनाफा कमाना”
  • अमेरिका में नागरिक शिक्षा क़ानूनों से जुड़े सुधार को हम भारतीय कैसे देखें?
    शिरीष खरे
    अमेरिका में नागरिक शिक्षा क़ानूनों से जुड़े सुधार को हम भारतीय कैसे देखें?
    15 Dec 2021
    "यह सुनिश्चित करना अति महत्त्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों को पढ़ाएं कि वे कैसे ज़िम्मेदार नागरिक बन सकें।" अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के गवर्नर रॉन डेसेंटिस ने पिछले दिनों वहां के एक मिडिल स्कूल में यह…
  • modi
    विजय विनीत
    EXCLUSIVE: खांटी बनारसियों को ही नहीं पसंद आया मोदी का ‘इवेंट’, पुजारी और भक्त भी ख़ुश होने की जगह आहत
    15 Dec 2021
    "मोदी ने नई परंपरा यह गढ़ी है कि बाबा के दरबार में अब जूता पहनकर गर्भगृह तक आसानी से जाया जा सकता है। कांवड़ के बजाय लक्जरी वाहन में बैठकर चांदी के लोटे में गंगाजल ढोया जा सकता है और बाबा गर्भगृह के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License