NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
झारखंड: हेमंत सोरेन के "आदिवासी हिन्दू नहीं हैं" बयान पर विवाद, भाजपा परेशान!
“जब देश का उच्च न्यायालय कह रहा है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, तो ये कौन लोग हैं? इन पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का केस होना चाहिए।” 
अनिल अंशुमन
27 Feb 2021
हेमंत सोरेन

झारखंड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस में दिया गया वक्तव्य काफी सियासी रंग लेता जा रहा है। इसे लेकर भाजपा व संघ संचालित हिन्दू संगठनों के प्रवक्ताओं की काफी तीखी प्रतिक्रियाएं लगातार आ रही हैं। तो जवाब में आदिवासी पक्ष के लोगों की प्रतिक्रियाओं के आने का सिलसिला भी जारी है। आदिवासियों के सवाल-समस्याओं को अक्सर हाशिये पर जगह देने वाली गोदी मीडिया इसे 'हिन्दू-मुसलमान' मुद्दे की ही तर्ज़ पर 'हिन्दू बनाम आदिवासी' विवाद बनाकर परोसने में कोई कमी नहीं रख रही है।

ज्ञात हो कि दुनिया के चर्चित हार्वर्ड विश्वविद्यालय की ओर से गत 20 फरवरी की देर रात (भारतीय समयानुसार 21 फरवरी) आयोजित हार्वर्ड इंडिया कॉन्फ्रेंस में पहली बार भारत के किसी आदिवासी राजनेता के बतौर हेमंत सोरेन जी को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। लगभग 1 घंटे तक चले इस कार्यक्रम में पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने बिना किसी लाग लपेट के अपने विचार व्यक्त किए। झारखंड प्रदेश और यहां बसने वाले आदिवासी समुदायों की वर्तमान दशा-दिशा की गंभीर चर्चा के साथ साथ केंद्र-राज्य संबंध से लेकर भारत के वर्तमान राजनीतिक स्थितियों जैसे गंभीर मसलों पर भी अपनी बेबाक राय रखी। 

हैरानी की बात है कि दूसरे ही दिन जिस तेजी से यह खबर झारखंड समेत कई राज्यों की मीडिया ने सुर्खियों में विवाद बनाकर प्रसारित किया, यह पहले कभी नहीं हुआ था।

हेमंत सोरेन ने अपने वर्चुअल संबोधन में झारखंड के संदर्भ में बताया कि आज़ादी के पूर्व से ही यह क्षेत्र खान एवं खनिज से भरे इलाके के रूप में ही देखा जाता रहा है। इस कारण यहाँ बसनेवाले आदिवासियों को शुरू से ही अनेकानेक बाह्य संकटों–मुश्किलों का सामना करना पड़ता रहा है। इसकी ही राजनीतिक परिणति के तौर पर अलग झारखंड राज्य गठन की मांग उठी थी, जो लंबे आंदोलनों की बदौलत सन 2000 में पूरा भी हुआ। लेकिन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के बावजूद आज़ादी के 72 साल और राज्य गठन के 20 साल बाद भी आदिवासियों की जीवन दशा और उनके प्रति शासन–समाज के नकारात्मक नज़रिये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।

देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में आदिवासी समुदाय की नगण्य उपस्थिति के सवाल पर कहा कि हमेशा से आदिवासियों का इस्तेमाल नैपकिन के रूप ही किया जाता रहा है। यदि आदिवासी शिक्षित हो जाएंगे तो कॉर्पोरेट–पूंजीपतियों के ड्राइवर, माली, रसोइया और दाई इत्यादि का काम कौन करेगा। इसीलिए आज भी संविधान में  तमाम विशेष संरक्षण प्रावधानों के बावजूद हमारा कहीं भी समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दिखता है। जिसका मूल कारण है कि आज भी आदिवासी समुदायों को लेकर नकारात्मक और दुष्प्रचारमूलक नज़रिये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं होना। शासन–समाज में शक्लें बदलीं हैं मानसिकता नहीं। आज भी यही कहा जाता है कि तुम लोगों के लिए यह काम नहीं है, तुम लोग लायक नहीं हो। इसीलिए तो भारत सरकार अलग आदिवासी मंत्रालय–विभाग–संस्थान और बजट का प्रावधान तो रखती है, लेकिन आज तक हमारी स्वतंत्र धार्मिक पहचान को मान्यता नहीं दी है। 

इन्हीं संदर्भों में आदिवासियों की विशिष्ट जीवन शैली–परंपरा और पहचान से जुड़े सवालों के जवाब में ही पूरी दृढ़ता के साथ कहा कि आदिवासी कभी हिन्दू नहीं थे, न हैं और न होंगे। 1951 की जनगणना में हमारे लिए अलग से कॉलम था, जिसे बाद में संशोधित कर ‘अन्य’ में बदल दिया गया और अभी की मोदी सरकार ने तो उसे भी हटा दिया है। अभी होने वाली जनगणना के फॉर्म में सिर्फ 5-6 धर्मों का ही कॉलम दिया हुआ है। ऐसे में आदिवासी समाज के लोग अपनी स्वतंत्र गणना कैसे करवा सकेंगे। यही वजह है कि आदिवासी धर्मकोड की मांग को लेकर आज पूरा आदिवासी समाज आंदोलित है। हमने भी झारखंड विधान सभा से आदिवासियों के लिए सरना कोड की मांग का प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा है। प्रधान मंत्री के साथ मुख्यमंत्रियों की वर्चुअल बैठक में भी उनसे आदिवासियों के लिए सरना धर्म कोड देने की मांग की है।

हेमंत सोरेन के उक्त सभी पहलुओं पर कोई जवाब-टिप्पणी किए बगैर झारखंड प्रदेश भाजपा प्रवक्ता ने सीधा आरोप लगाते हुए ये फतवा दे डाला कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हेमंत सोरेन ने इस तरह की आंतरिक बातें कहकर विदेशी लोगों को हमारे मामलों में दाखिल देने की अनुमति दे रहें हैं। वे वैटिकन के हाथों खेल रहें हैं।

श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण निधि समर्पण समिति की बैठक में रांची पहुंचे विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय महासचिव ने भी कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा है कि झारखंड सरकार आदिवासियों को हिन्दू न कहकर हिंदुओं का अपमान किया है। जबकि सम्पूर्ण वनवासी जीवन रामभक्ति से जुड़ा हुआ है।

अलग सरना धर्म कोड की मांग पर भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने देश व हिंदुओं के खिलाफ साजिश करार देते हुए इसे आदिवासी संस्कृति पर हमला कहा है।

सनद रहे कि आदिवासियों के अलग धर्म कोड की मांग मामले को भाजपा (संघ परिवार) हमेशा से ईसाई मशीनरी संचालित और आदिवासियों के ईसाई धर्मांतरण मुहिम की साजिश करार देती रही है। जिसे रोकने के नाम पर पूर्व की प्रदेश भाजपा सरकार द्वारा लाए गए धर्मांतरण विरोधी विधेयक को आदिवासियों के प्रचंड विरोध का सामना करना पड़ा था। 

हेमंत सोरेन के बयान का विरोध किए जाने पर आदिवासी समुदाय के युवा काफी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कह रहें हैं कि जब देश का सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं तो ये कौन लोग हैं? इन पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का केस होना चाहिए। 

बिरसा मुंडा के उलगुलान क्षेत्र उलीहातु-अड़की (खूंटी जिला) के सघन आदिवासी इलाकों में लंबे समय से सांस्कृतिक–सामाजिक जागरूकता अभियान चला रहे युवा आदिवासी एक्टिविस्ट गौतम सिंह मुंडा का मानना है कि आदिकाल से आदिवासियों के स्थानीय शोषकों में शामिल रहे जमींदार-सूदखोर–महाजनों की ही वर्तमान पीढ़ी आज भाजपा व संघ परिवार की संचालक है। इनके द्वारा आदिवासियों के बचे-खुचे जल जंगल ज़मीन और प्राकृतिक–खनिज संसाधनों को हड़पने और इनकी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा–विरासत के भगवाकरण के लिए ही आदिवासियों को हिन्दू बताने का प्रपंच चलाया जा रहा है। गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगों में जैसे आदिवासियों का इस्तेमाल किया गया था, उसे झारखंड में नहीं दुहराने देंगे। 

आदिवासी हिन्दू नहीं हैं का विवाद प्रकरण अब जमीनी सामाजिक बहसों में पनप रहा है। वहीं देश में होने वाली जनगणना के मद्देनजर आदिवासियों के अलग धर्म कोड की मांग पर जारी सामाजिक अभियानों–आंदोलनों की रफ्तार भी बढ़ती जा रही है।

हेमंत सोरेन द्वारा कही गईं तमाम बातें कहीं से भी देश के व्यापक आदिवासी सवालों के संदर्भ से अलग नहीं दिखतीं हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि भाजपा व गोदी मीडिया इतने गंभीर मामले को हिन्दू–मुसलमान विवाद की सुनियोजित सांप्रदायिक राजनीति की तर्ज़ पर ‘आदिवासी बनाम हिन्दू’ विवाद का रंग देने में जुटी हुई है। साथ ही किसान आंदोलन के समर्थन में आ रहीं वैश्विक प्रतिक्रियाओं को जैसे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कह कर लोगों को उकसाना चाहा, इस मामले में भी सत्तापक्ष के लोग ठीक ऐसा करने का प्रयास कर रहे हैं। 

Jharkhand
Hemant Soren
Jharkhand aadiwasi
Dalits
BJP
Tribals Religion code
Aadiwasi Religion Code
Harvard india conference
Supreme Court

Related Stories

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

#Stop Killing Us : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

बागपत: भड़ल गांव में दलितों की चमड़ा इकाइयों पर चला बुलडोज़र, मुआवज़ा और कार्रवाई की मांग

मेरे लेखन का उद्देश्य मूलरूप से दलित और स्त्री विमर्श है: सुशीला टाकभौरे


बाकी खबरें

  • अनिल अंशुमन
    झारखंड: हेमंत सरकार की वादाख़िलाफ़ी के विरोध में, भूख हड़ताल पर पोषण सखी
    04 Mar 2022
    विगत 23 फ़रवरी से झारखंड राज्य एकीकृत पोषण सखी संघ के आह्वान पर प्रदेश की पोषण सखी कार्यकर्ताएं विधान सभा के समक्ष अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठी हुई हैं।
  • health sector in up
    राज कुमार
    यूपी चुनाव : माताओं-बच्चों के स्वास्थ्य की हर तरह से अनदेखी
    04 Mar 2022
    देश में डिलीवरी के दौरान मातृ मृत्यु दर 113 है। जबकि उत्तर प्रदेश में यही आंकड़ा देश की औसत दर से कहीं ज़्यादा 197 है। मातृ मृत्यु दर के मामले में उत्तर प्रदेश देश में दूसरे स्थान पर है।
  • Mirzapur
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    यूपी चुनाव : मिर्ज़ापुर के ग़रीबों में है किडनी स्टोन की बड़ी समस्या
    04 Mar 2022
    जिले में किडनी स्टोन यानी गुर्दे की पथरी के मामले बहुत अधिक हैं, और सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के चलते पहले से ही दुखी लोगों की आर्थिक स्थिति ओर ख़राब हो रही है।
  • workers
    अजय कुमार
    सरकार की रणनीति है कि बेरोज़गारी का हल डॉक्टर बनाकर नहीं बल्कि मज़दूर बनाकर निकाला जाए!
    04 Mar 2022
    मंदिर मस्जिद के झगड़े में उलझी जनता की बेरोज़गारी डॉक्टर बनाकर नहीं, बल्कि मनरेगा जैसी योजनाएं बनाकर हल की जाती हैं।
  • manipur election
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर चुनाव: भाजपा के धनबल-भ्रष्ट दावों की काट है जनता का घोषणापत्र
    03 Mar 2022
    ख़ास इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकारा भाषा सिंह ने बातचीत की ह्यूमन राइट्स अलर्ट के बबलू लोइतोंगबन से। आप भी सुनिए मणिपुर के राजनीतिक माहौल में मानवाधिकारों पर छाए ख़ौफ़ के साये के बारे में बेबाक बातचीत।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License