NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
झारखंड: सरकार बदली लेकिन व्यवस्था नहीं, 6 महीने में दलित परिवार में भूख से तीन मौतें!
बोकारो जिले के करमा गांव में पिछले छह महीने में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की कथित तौर पर भूख से मौत हो गई है। हैरानी की बात यह है कि भोजन के अधिकार समेत भूख से होने वाली मौतों पर सक्रिय रहने वाले संगठन और एक्टिविस्टों ने इस मसले पर चुप्पी साध रखी है।
अनिल अंशुमन
06 Sep 2020
झारखंड

6 मार्च 2020 को भूखल घासी की भूख से मौत हो गई। फिर 2 महीने बाद ही मई माह में उनके जवान बेटे की मौत हो गई। इसके दो महीने बाद ही 31 अगस्त 2020 को 12 साल की बेटी राखी की भी मौत भूख से हो गयी। ये त्रासदी बोकारो जिला स्थित कसमार प्रखंड के करमा गाँव में एक दलित परिवार के साथ हुई है। इस परिवार में अब बचे हैं तो जीर्ण शीर्ण काया लिए जवान बेटे की विधवा बहू–बच्चे और गिने चुने परिवार के अन्य लोग जिनकी भी बारी न जाने कब आ जाय।

करमा गाँव में बसे भयावह गरीबी– कंगाली जनित भूख–कुपोषण–अशिक्षा में जी रहे दलित टोले के इन बाशिंदे के लिए कोई फर्क नहीं है कि कौन सी सरकार आई और कौन चली गयी। क्योंकि इनकी बदहाली भरी जीवन की दुर्दशा से किसी को भी मतलब नहीं रहा है।

पास पड़ोस के ग्रामीणों व अन्य सगे सम्बन्धियों के अनुसार भूखल घासी और उनके बेटे–बेटी की मौत भीषण गरीबी–कंगाली जनित भूख और कुपोषण से हुई है लेकिन हमेशा की भांति स्थानीय से लेकर ऊपर तक का प्रशासनिक अमला और मेडिकल रिपोर्ट में यही दावा किया जाएगा कि ये मौतें बीमारी से हुईं हैं।

इसलिए सरकारी जांच की चंद रस्में निभाकर पीड़ित परिवार को तात्कालिक तौर पर चंद मुआवजा और अनाज देकर मामला वहीं ठंडा कर दिया जाएगा। झारखण्ड प्रदेश में भूख और कुपोषण से जारी मौत का सिलसिला साबित करता है कि सरकार चाहे जिसकी भी बने हाशिये के लोगों की दुर्दशापूर्ण यथास्थिति नहीं बदलने वाली।

सनद हो कि जब प्रदेश की पिछली भाजपा सरकार के समय 28 सितम्बर 2019 में राज्य के सिमडेगा स्थित करीमाटी गाँव में 10 बरस की संतोषी ‘भात–भात’ कहते हुए भूख से मर गयी थी तो रांची से लेकर दिल्ली तक इस मामले को लेकर काफी शोर हुआ जिससे भाजपा सरकार की काफी किरकिरी भी हुई थी।

अनेकों सामाजिक संगठनों ने ‘फैक्ट–फाइंडिंग’ रिपोर्टें जारी करने की होड़ सी मचा दी थीं। विपक्ष के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन ने भूख से मौत मामले पर भाजपा सरकार को घेरने के साथ साथ इसे अपने चुनावी अभियान का प्रमुख मुद्दा भी बनाया था।

हैरानी की बात है कि अब जबकि वे खुद मुख्यमंत्री हैं और उनकी सरकार है, जो इन दिनों प्रायः हर छोटी–छोटी घटनाओं तक पर फ़ौरन ट्वीट करते हुए संज्ञान लेते रहते हैं, अभी तक इन मौतों पर कुछ भी नहीं कहा है।

प्रदेश भाकपा माले ने इस घटना को राज्य के गरीबों–दलितों के प्रति सरकार व प्रशासन की घोर लापरवाही करार देते हुए तीनों मौतों के लिए जवाबदेह लोगों पर अविलम्ब कठोर कार्रवाई करने की मांग की है। वहीं, हेमंत सरकार को घेरने का कोई मुद्दा नहीं छोड़ने में जुटी विपक्षी भाजपा अपने अनुसूचित जाति मोर्चा के बैनर तले विरोध कार्यक्रम चला रही है।

कई जगहों पर मृतका राखी की याद में कैंडल जलाकर हेमंत सरकार से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांग रही है। चर्चाओं में खटकने वाली यह भी है कि अभी तक राज्य में सक्रिय भोजन के अधिकार इत्यादि मुद्दों और ‘हंगर वॉच’ सर्वे जैसे अभियान चलने वाले सोशल संगठनों और एक्टिविस्टों ने भी इस पर कोई सक्रियता नहीं दिखाई है।

इस बाबत भोजन के अधिकार अभियान से सक्रिय तौर पर जुड़े और संतोषी की मौत के मुद्दे उठाकर तत्कालीन रघुवर दास शासन और प्रशासन के कोपभाजन बनने वाले युवा एक्टिविष्ट धीरज ने बड़े ही अफ़सोस के साथ कहा कि – भाजपा शासन में ऐसे मुद्दों को उठाकर भाजपा सरकार को घेरने वाले सामाजिक संगठनों और एक्टिविस्टों की बड़ी तादाद राज्य की नयी सरकार की कमियों के खिलाफ पूरी तरह से मौन साधे हुए है। यदि कुछ बोल भी रहें हैं तो एक याचक की मुद्रा में जो कि बेहद  दुर्भाग्यपूर्ण है।

धीरज का यह भी कहना है राज्य में भूख–कुपोषण के शिकार होनेवाले सबसे अधिक दलित और आदिम जनजाति समुदाय के लोग हैं लेकिन अभी एक हेमंत सरकार ने इनकी यातनामय जीवन स्थितियों से उबारने के लिए कोई विशेष नीतिगत बदलाव अथवा सुधार नहीं किया है। जिसके बिना भूख–कुपोषण से बढ़ता मौत का सिलसिला कभी भी नहीं रोका जा सकता है।  

जाने माने अर्थशास्त्री प्रो. रमेश शरण राज्य भूख और कुपोषण से हो रही मौतों पर चिंता जताते हुए कहते हैं कि हेमंत सोरेन सरकार केंद्र और राज्य विवाद को सुलझाते रहें लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि प्रदेश कि गरीब जनता को भूख–कुपोषण और बेकारी जैसे संकटों के महाजाल से निकालने को प्राथमिकता दे।

इस सन्दर्भ में सरकार से जुड़े लोगों के दिए गए सुझावों की जानकारी देते हुए बताया कि हमें उनसे साफ कहा है कि अभी सबसे अधिक ज़रूरी है कि राज्य में गवर्नेंस के मुद्दे को सर्वप्राथमिक बनाकर त्वरित ढंग से काम करना। जिसके लिए सरकार महामारी के संक्रमण पर लगाम लगाने के साथ साथ भूख–कुपोषण– बेकारी और पलायन जैसे चुनौतीपूर्ण मसले पर विशेष रूप से गंभीर बने। इसके लिए समयबद्ध विशेष कार्य योजनायें बनाकर पूरे प्रशासनिक अमले को कारगर ढंग से क्रियाशील बनाने पर फोकस करे।

दलितों के सवाल पर लम्बे समय से सक्रिय ऑल इंडिया फोरम से जुड़े वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ता विश्वबंधु ने क्षोभभरे दर्द के साथ कहा कि झरखंड अलग राज्य बनाने के आन्दोलनों में यहाँ के दलित मूलवासियों ने भी बढ़ चढ़कर भूमिका निभाई और दमन सहे लेकिन राज्य गठन के उपरांत से आज तक इस समाज के लोग और उनके सारे सवाल हाशिये पर ही बने हुए हैं जिसका खुला सबूत है कि राज्य गठन के 19 वर्षों बाद भी प्रदेश में भूख-बेकारी और कुपोषण से मौत का शिकार सबसे अधिक दलित समुदाय के ही लोग हो रहे हैं। कोई सोशल संगठन और एक्टिविस्ट भी इन समुदाय के सवालों को नहीं उठाते हैं क्योंकि सारा सोशल फंडिंग केवल आदिवासी मैटर पर ही मिलता है।

भूखल घासी और उनके बेटे–बेटी के मौत प्रकरण को लेकर भाजपा और उसके दलित मोर्चा द्वारा किये जा रहे आन्दोलन को ढकोसला बताते हुए कहते हैं कि जब उनकी सरकार में संतोषी सहित कई दलित भूख से मर रहे थे तब ये कहाँ थे। विश्वबंधु ने वर्तमान सरकार और प्रशासन पर संवेदनहीन होने का आरोप लगाया है।

उनका कहना है कि इन मौतों की वजह बीमारी और खून की कमी बताकर असली मामले पर जितना भी पर्दा डाल दिया जाए। हर मौत के बाद प्रशासन चंद दिनों तक ऐसे हरकत में रहता है मानो फिर कोई घटना होगी नहीं लेकिन फिर वही पुराना रवैया स्थापित हो जाता है। इसीलिए भूखल घासी और उसके बच्चों की हुई अकाल मौतें हेमंत सोरेन की ‘अबुआ राज’ कहलानेवाली सरकार से चीख चीखकर पूछ रहीं हैं कि प्रदेश में सरकार तो बदल गयी, तंत्र का कार्य व्यवहार और हमारी जीवन दशा कब बदलेगी...?        

Jharkhand
Dalits
Hunger Crisis
poverty
Death by malnutrition
deaths due to hunger
Hemant Soren

Related Stories

बिहार: पांच लोगों की हत्या या आत्महत्या? क़र्ज़ में डूबा था परिवार

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

UN में भारत: देश में 30 करोड़ लोग आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर, सरकार उनके अधिकारों की रक्षा को प्रतिबद्ध

बच्चों को कौन बता रहा है दलित और सवर्ण में अंतर?

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

भारत में असमानता की स्थिति लोगों को अधिक संवेदनशील और ग़रीब बनाती है : रिपोर्ट

कार्टून क्लिक: पर उपदेस कुसल बहुतेरे...

मुद्दा: आख़िर कब तक मरते रहेंगे सीवरों में हम सफ़ाई कर्मचारी?


बाकी खबरें

  • प्रियंका शंकर
    रूस के साथ बढ़ते तनाव के बीच, नॉर्वे में नाटो का सैन्य अभ्यास कितना महत्वपूर्ण?
    19 Mar 2022
    हालांकि यूक्रेन में युद्ध जारी है, और नाटो ने नॉर्वे में बड़ा सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है, जो अभ्यास ठंडे इलाके में नाटो सैनिकों के युद्ध कौशल और नॉर्वे के सैन्य सुदृढीकरण के प्रबंधन की जांच करने के…
  • हर्षवर्धन
    क्रांतिदूत अज़ीमुल्ला जिन्होंने 'मादरे वतन भारत की जय' का नारा बुलंद किया था
    19 Mar 2022
    अज़ीमुल्ला ख़ान की 1857 के विद्रोह में भूमिका मात्र सैन्य और राजनीतिक मामलों तक ही सिमित नहीं थी, वो उस विद्रोह के एक महत्वपूर्ण विचारक भी थे।
  • विजय विनीत
    ग्राउंड रिपोर्ट: महंगाई-बेरोजगारी पर भारी पड़ी ‘नमक पॉलिटिक्स’
    19 Mar 2022
    तारा को महंगाई परेशान कर रही है तो बेरोजगारी का दर्द भी सता रहा है। वह कहती हैं, "सिर्फ मुफ्त में मिलने वाले सरकारी नमक का हक अदा करने के लिए हमने भाजपा को वोट दिया है। सरकार हमें मुफ्त में चावल-दाल…
  • इंदिरा जयसिंह
    नारीवादी वकालत: स्वतंत्रता आंदोलन का दूसरा पहलू
    19 Mar 2022
    हो सकता है कि भारत में वकालत का पेशा एक ऐसी पितृसत्तात्मक संस्कृति में डूबा हुआ हो, जिसमें महिलाओं को बाहर रखा जाता है, लेकिन संवैधानिक अदालतें एक ऐसी जगह होने की गुंज़ाइश बनाती हैं, जहां क़ानून को…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    मध्यप्रदेश विधानसभा निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित, उठे सवाल!
    19 Mar 2022
    मध्यप्रदेश विधानसभा में बजट सत्र निर्धारित समय से नौ दिन पहले स्थगित कर दिया गया। माकपा ने इसके लिए शिवराज सरकार के साथ ही नेता प्रतिपक्ष को भी जिम्मेदार ठहराया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License