NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
SC ST OBC
भारत
राजनीति
झारखंड : ‘जनजातीय गौरव दिवस’ से सहमत नहीं हुआ आदिवासी समुदाय, संवैधानिक अधिकारों के लिए उठाई आवाज़! 
बिरसा मुंडा जयंती के कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के मंचों से अधिकतर लोगों ने यही सवाल उठाया कि यदि बिरसा मुंडा और आदिवासियों की इतनी ही चिंता है तो आदिवासियों के प्रति अपने नकारात्मक नज़रिए और आचरण में बदलाव क्यों नहीं हो रहा है?
अनिल अंशुमन
22 Nov 2021
birsa

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कैबिनेट के फैसले के तहत महानायक बिरसा मुंडा की जयंती को ‘जन जातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाकर आदिवासी समाज की शौर्य गाथा को सम्मानित करने की घोषणा करवायी थी. जिसे झारखंड के बहुसंख्यक आदिवासी समाज के लोगों ने न सिर्फ अस्वीकार कर दिया बल्कि उनकी सरकार और भाजपा-संघ परिवार द्वारा आदिवासियों की आदिवासियत पहचान को महत्व नहीं दिए जाने का आरोप लगाया। साथ ही गौरव दिवस की आड़ में जंगल ज़मीन व खनिज़ की जारी लूट का विरोध करने पर जारी दमन से लोगों का ध्यान हटाने की साजिश का आरोप भी लगाया।

इस बार बिरसा मुंडा जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ मनाने के प्रतिकात्मक प्रतिकार के रूप मनाया जाना दिखलाता है कि झारखंड प्रदेश का बहुसंख्य आदिवासी समुदाय संघ परिवार और भाजपा की आदिवासी विरोधी मानसिकता को अब चुपचाप रहकर बर्दास्त नहीं करने वाले। यही वजह रही कि बिरसा मुंडा जयंती के कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के मंचों से अधिकतर लोगों ने यही सवाल उठाया कि यदि बिरसा मुंडा और आदिवासियों की इतनी ही चिंता है तो आदिवासियों के प्रति अपने नकारात्मक नज़रिए और आचरण में बदलाव क्यों नहीं हो रहा है? 

शासन-प्रशासन से लेकर सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में निरंतर उपेक्षा, झूठे वादा-जुमलों के साथ साथ उनके जल जंगल ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों की बेलगाम लूट की मार और राज्य दमन का कहर सबसे अधिक भाजपा शासन में ही क्यों होता है?

खबरें बतातीं हैं कि भाजपा के मंत्री, विधायक और नेताओं-कार्यकर्ताओं की जमात द्वारा ही खूंटी से और अन्य कुछेक स्थानों पर ‘जन जातीय गौरव दिवस’ मनाया जा सका। केन्द्रीय आदिवासी मामलों के मंत्री और पर्यटन मंत्री ने बिरसा मुंडा अनुयायी ‘बिरसाइतों’ के पाँव धो कर भी अपनी सरकार की घोषणाओं से लुभाने की कवायद भी बहुत कारगर नहीं हुई। अलबत्ता प्रदेश की हेमंत सोरेन सरकार द्वारा केंद्र सरकार की घोषणा के समानांतर सरकारी और सामाजिक स्तरों पर आयोजित बिरसा मुंडा जयंती कार्यक्रमों की झड़ी भारी पड़ी।

वहीं भोपाल में आयोजित ‘जनजातीय गौरव दिवस’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आदिवासी समुदाय की दुर्दशा का ठीकरा पूर्व की गैर भाजपा सरकारों पर ही फोड़ा। गौरतलब है कि मोदी सरकार में आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा द्वारा ‘जन जातीय गौरव दिवस’ मनाने की घोषणा होते ही आदिवासियत की पहचान को जन जातीय कहे जाने के खिलाफ सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आ गयी।

अखबारों में भी झामुमो और वाम दलों समेत कई आदिवासी सामाजिक संगठनों और एक्टिविस्टों ने इस घोषणा को आदिवासी प्रेम का ढोंग बताते हुए सवालों की बौछार सी कर दी। पूछा गया कि भाजपा राज में आदिवासियों और उनके जल जंगल ज़मीन पर हमले क्यों बढ़े हैं? हजारों बेगुनाह आदिवासी वर्षों से विचाराधीन कैदी के रूप में जेलों में क्यों बंद हैं? आदिवासी अधिकारों की आवाज़ उठाने वाले फादर स्टैन स्वामी की सत्ता नियोजित हत्या क्यों की गयी?

आदिवासियों की सुरक्षा कवच संविधान की पांचवी अनुसूची का सख्ती से पालन और पेसा कानून क्यों नहीं लागू हो रहा है?

इस सन्दर्भ में सबसे अधिक चर्चित रहा जानी मानी आंदोलनकारी दयामनी बारला का सोशल मिडिया में वायरल पोस्ट. जिसमें उन्होंने लिखा कि– समझो गेम प्लान को, आदिवासी समुदाय सचेत और संगठित होकर अपने जल जंगल ज़मीन की रक्षा करो, नहीं तो रेड इंडियन बनकर पिंजरा में रहने के लिए तैयार हो जाओ। 

इतना ही नहीं बिरसा जयंती दिवस के चार दिन पूर्व ही उलीहातू जाकर बिरसा मुंडा के वंशजों और स्थानीय आदिवासियों की दयनीय स्थिति के एकत्र किये गए ज़मीनी सच को भी तथ्यों-सबूतों के साथ जारी किया कि बिरसा मुंडा के गाँव उलीहातू की दिखावे की तस्वीर तो बदली, दुखद है कि उलीहातू और इलाके के लोगों की तकदीर नहीं बदली। कागज़ पर वहां पंचायत भवन, साफ पानी का जल मीनार, अस्पताल इत्यादि बनने की असलियत की तस्वीरें भी जारी कीं। आज भी वहाँ के लोगों को पीने का स्वच्छ पानी, शिक्षा, अस्पताल और सम्मानजनक रोज़गार नहीं उपलब्ध होने से पलायन करने वाले नौजवानों के आंकड़े भी प्रस्तुत किये। 

आगे उन्होंने यह भी लिखा है कि 15 नवम्बर के दिन बाहर से आने वाले राजनीतिक मेहमान राजधानी स्थित बिरसा एयरपोर्ट से सरकार द्वारा बनायी गयी, साफ सुथरी सड़कों से कुछ ही समय में बिरसा मुंडा के गाँव ‘जन जातीय गौराव दिवस’ मनाने तो पहुँच गए। लेकिन इसके पूर्व में यहाँ आकर उन्हीं के मुख्यमंत्री, मंत्री व नेताओं द्वारा किये गए वायदे जो आज तक पूरा नहीं किये गये, पर पूरी तरह से मौन रहे।

केंद्र के साथ-साथ प्रदेश की हेमंत सरकार से भी सवाल किया है कि क्यों आज भी बिरसा मुंडा की परपोती बाज़ार में सब्जी बेचकर अपनी पढ़ाई कर रही है। अखबारों से मालूम पड़ता है कि सभी सरकारों के रहते हुए भी उसकी पढ़ाई का खर्चा सिनेमा कलाकार सोनू सूद उठाएंगे। बिरसा मुंडा के वर्तमान वंशजों को मुख्यधारा में लाने के नाम पर दो लोगों को जिला मुख्यालय में चपरासी की नौकरी दी गयी है। 2017 में गृह मंत्री की घोषणा के बाद बिरसा मुंडा के गाँव में 160 पक्के मकान बनाने की घोषणा के बाद बमुश्किल से कुछ ही घर वो भी आधे अधूरे ही बने हैं। 

बिरसा मुंडा परपोती

इस प्रकरण में यह बात सबसे अधिक चर्चा कि रही कि मोदी जी का आदिवासी प्रेम उस समय कहाँ गायब हो जाता है जब उनकी ही पार्टी की सरकार, बिरसा मुंडा के इलाके के आदिवासियों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही पत्थलगड़ी परम्परा को स्थापित करने वाले गाँव के गाँव पर देशद्रोह का मुकदमा कर देती है. आज भी सभी आदिवासी बाहुल्य इलाकों में माओवादी हिंसा रोकने के नाम पर जगह जगह बिठाये गए सीआरपीएफ़ पिकेट कैम्पों की संख्या घटने की बजाय दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है।

प्रदेश की पिछली भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री रघुवर दास द्वारा ‘लैंडबैंक’ कानून थोपकर रातों रात राज्य के सभी आदिवासी और मूलवासियों की ज़मीनों को छीन लिया गया। यह भी कहा जा रहा है कि मोदी सरकार ज़ल्द ही इन ज़मीनों को ‘राष्ट्रीय भूमि बैंक’ बनाकर अपने कब्ज़े में लेने वाली है। 

कहा तो यह भी जा रहा है कि मोदी जी का अचानक से उमड़ा आदिवासी प्रेम कहीं इसलिए तो नहीं है कि बिरसा मुंडा के इलाके खूंटी क्षेत्र में सोने के खदान शुरू किये जाने हैं।

Jharkhand
birsa munda
Birsa Munda's birthday
Tribal Pride Day
aadiwasi

Related Stories

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण

अमित शाह का शाही दौरा और आदिवासी मुद्दे

झारखंड: पंचायत चुनावों को लेकर आदिवासी संगठनों का विरोध, जानिए क्या है पूरा मामला

झारखंड: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज विरोधी जन सत्याग्रह जारी, संकल्प दिवस में शामिल हुए राकेश टिकैत

स्पेशल रिपोर्ट: पहाड़ी बोंडा; ज़िंदगी और पहचान का द्वंद्व

केंद्रीय बजट में दलित-आदिवासी के लिए प्रत्यक्ष लाभ कम, दिखावा अधिक

झारखंड : ‘भाषाई अतिक्रमण’ के खिलाफ सड़कों पर उतरा जनसैलाब, मगही-भोजपुरी-अंगिका को स्थानीय भाषा का दर्जा देने का किया विरोध


बाकी खबरें

  • air pollution
    भाषा
    वायु प्रदूषण को काबू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को आपात बैठक करने का निर्देश
    15 Nov 2021
    प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण की अगुवाई वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब और दिल्ली के संबंधित सचिवों को अदालत की तरफ से बनाई गई समिति के समक्ष अपने प्रतिवेदन देने के लिए बैठक में भाग लेने का…
  • ALTAF
    शिवम चतुर्वेदी
    कासगंज: क्या अल्ताफ़ पर लड़की भगाने का आरोप झूठा था? 
    15 Nov 2021
    लड़की के पिता पर आरोप है कि उन्होंने अपनी बेटी को कहीं भेजकर, अल्ताफ़ के ऊपर लड़की भगाने का आरोप मढ़ दिया।
  • Annapurna
    विजय विनीत
    स्पेशल रिपोर्टः बनारस में अन्नपूर्णा की खंडित मूर्ति की ब्रांडिंग, काशी विश्वनाथ के भक्त आहत
    15 Nov 2021
    बनारस में अन्नपूर्णा की खंडित मूर्ति स्थापित करने के मंसूबों को देखें तो साफ पता चलता है कि इसे स्थापित करने और कराने वाले लोग हिन्दू समाज के लोगों के सैंटिमेंट को भुनाने का मकसद रखते हैं।
  • salman khurshid book
    अनिल जैन
    हिंदुत्व की तुलना बोको हरम और ISIS से न करें तो फिर किससे करें?
    15 Nov 2021
    सलमान खुर्शीद की किताब 'सनराइज ओवर अयोध्या’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने विवाद खड़ा कर दिया है।
  • The Indian Agricultural Situation Must Not Be Misread
    प्रभात पटनायक
    खेती के संबंध में कुछ बड़ी भ्रांतियां और किसान आंदोलन पर उनका प्रभाव
    15 Nov 2021
    इनमें पहली भ्रांति तो इस धारणा में ही है कि खेती किसानी पर कॉर्पोरेट अतिक्रमण तो ऐसा मामला है जो बस कॉर्पोरेट और किसानों से ही संबंध रखता है। यह ग़लत है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License