NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
झारखंड: आदिवासी महिलाओं ने उठायी अपनी सामाजिक दावेदारी की आवाज़!
झारखंड में विश्व आदिवासी दिवस पर आयोजित लगभग सभी कार्यक्रमों में आदिवासी समाज के लोगों ने जल–जंगल–ज़मीन व प्राकृतिक-खनिज संसाधनों की संरक्षा के अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का संकल्प दुहराया।
अनिल अंशुमन
10 Aug 2020
झारखंड

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1982 से घोषित 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस मनाये जाने की धूम इस बार झारखंड प्रदेश में कुछ ज़्यादा ही नज़र आई। हालांकि कोविड– 19 आपदा के कारण व्यापक जुटान वाले कार्यक्रम तो नहीं हुए लेकिन गांवों से लेकर शहरों तक स्थानीय स्तर पर काफी कार्यक्रम हुए।
 
राज्य की राजधानी रांची से लेकर संतालपरगना, कोल्हान क्षेत्र ( पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम ) व दक्षिण झारखण्ड के खूंटी, सिमडेगा गुमला के अलावे पलामू प्रमंडल क्षेत्र के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में इस दिवस की धूम रही, जिसमें युवाओं और महिलाओं ने पूरे जोशोखरोश के साथ अपने पारम्परिक आदिवासी परिधानों में आदिवासी नायकों के स्मारकों पर माल्यार्पण करते हुए प्रभात फेरी व ढोल नगाड़ों के साथ स्थानीय स्तर के जुलूस निकाले। कई स्थानों पर बेविनार व संगोष्टी के कार्यक्रम भी हुए।

मार्के की बात रही कि चंद दिनों पहले जिस जोर शोर के साथ भाजपा के जिन बड़े व स्थानीय आदिवासी नेताओं ने अयोध्या मंदिर निर्माण अभियान के लिए सरना को सनातन धर्म का अंग बताते हुए सरना की मिटटी अपने पाहनों से भिजवाये थे, आदिवासी दिवस के किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में सक्रिय नज़र नहीं आये।

adiwasi diwas 1.jpg

ख़बरों के अनुसार तो केन्द्रीय आदिवासी मंत्री अर्जुन मुंडा व विधान सभा में भाजपा के नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल जी समेत किसी भी आदिवासी नेता ने आदिवासियों के इस विशेष दिवस पर कोई कार्यक्रम नहीं आयोजित किये। दुमका में रघुवर सरकार में मंत्री रहीं नेत्री ने आदिवासी दिवस की शुभकामना लिखे होल्डिंग टंगवाकर रस्म निभा दी। वहीं, जमशेदपुर में कार्यक्रम का आयोजन तो आदिवासी दिवस के नाम से हुआ लेकिन उसमें आदिवासियों की कहीं से कोई चर्चा न करके प्रधानमंत्री जी के कार्यों के यशोगान आधारित कविता संग्रह व कई अन्य किताबों का लोकार्पण करते हुए सीएए–एनआरसी विरोधी आन्दोलनों–शाहीन बाग़ आंदोलनों को भारत के खिलाफ घोर षड्यंत्र बताया गया।

जबकि दूसरी ओर, पूरे प्रदेश के सभी आदिवासी समुदायों के लोगों व उनके संगठनों ने कहीं अपने पारंपरिक परिधानों में ढोल–मंदर– नगाड़ा बजाते हुए जोशो–खरोश के साथ यह दिवस मनाया, तो कहीं अधिकारों की आवाज़ उठाते हुए इस दिवस पर संकल्प कार्यक्रम किये गए।

प्रदेश के मुख्यमंत्री व सरकार के अन्य मंत्री- नेताओं के साथ साथ झामुमो– कांग्रेस द्वारा भी कई कार्यक्रम किये। राजधानी रांची स्थित आदिवासी शहीद नायक नीलाम्बर–पिताम्बर पार्क में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासी परिधान पहनकर उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण किया।adiwasi diwas 4.jpg

अपने संबोधन में उन्होंने 9 अगस्त को राजकीय अवकाश की घोषणा करते हुए कहा कि देश के संविधान में आदिवासियों को प्रदत्त शक्तियों के बावजूद अबतक हुए विकास पर चिंतन करना होगा। आदिवासियों को उनका हक दिलाने का संकल्प सभी को लेना होगा। इस अवसर पर अपनी सरकार कि ओर से पूरे राज्य में वृक्षारोपण अभियान की शुरुआत करते हुए कार्यक्रम स्थल पर पौधे भी लगाए।

आदिवासी सामाजिक संगठनों के कार्यक्रमों में प्रवक्ताओं ने केंद्र सरकार व विभिन्न प्रदेशों की भाजपा सरकारों द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आदिवासी दशक मनाने के आह्वान के बावजूद इस दिशा में ठोस क़दम नहीं उठाने की निंदा की। राजधानी के सैनिक मार्केट परिसर में तो चंद दिनों पूर्व ही राम मंदिर मंदिर निर्माण हेतु विभिन्न सरना स्थलों की मिट्टी चुराकर अयोध्या भेजनेवाले भाजपा आदिवासी नेताओं के खिलाफ उनके पुतलों को सामूहिक फांसी देकर राजभवन तक मार्च निकाला गया।

इस अवसर पर सरकार के घटक दलों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में आदिवासी अधिकारों के लिए सक्रिय विशिष्ठ लोगों के साथ साथ यूपीएससी व अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का परचम लहरानेवाले आदिवासी छात्र–छात्रों को सम्मानित किया गया।

साथ ही इस अवसर पर प्रदेश के आदिवासी समाज से सजग रहने कि अपील करते हुए यह भी कहा गया कि यदि सरकार के काम काज में उन्हें कोई गड़बड़ी दिखे तो वे आईना दिखने का काम करें।

आदिवासी दिवस पर आयोजित प्रायः सभी कार्यक्रमों के जरिये आदिवासी समाज के लोगों ने जल– जंगल–ज़मीन व प्राकृतिक-खनिज संसाधनों की संरक्षा के अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का संकल्प दुहराया। सरकार से राज्य में पांचवी अनुसूची, सीएनटी–एसपीटी एक्ट व पेसा जैसे कानूनों को सख्ती से लागू करने की मांग करते हुए भूमि अधिग्रहण कानून व वन अधिकार कानूनों को बेहतर तरीके से लागू करने पर जोर दिया। आदिवासी विधायक बन्धु तिर्की ने कोविड महामारी काल व लॉकडाउन अवधि में दूसरे प्रदेशों में मारे गए सभी प्रवासी मजदूरों के परिजनों को 5 लाख रुपये मुआवज़े की मांग की।

adiwasi diwas 6.jpg

2021 के आगामी जनगणना में आदिवासियों के लिए अलग से विशेष कोड बनाने तथा झारखंड विधान सभा से सरना धर्म कोड लागू करने का प्रस्ताव पारित करने की भी मांग इस बार सभी कार्यक्रमों के मंचों से प्रमुखता के साथ उठायी गयी।

संभवतः ऐसा पहली बार हुआ जब इस विशेष दिवस पर आदिवासी समाज की मुखर युवा महिलाओं ने आदिवासी समाज की महिलाओं के सवालों को मुख्यधारा में लाने हेतु ‘सखुवा डॉट कॉम’ विशेष वेब पोर्टल की शुरुआत की। जिसमें सुदूर कनाडा में पीएचडी कर रहीं प्रियंका संधालिया, जेएनयू शोधार्थी प्रीति मरांडी व टाटा सोशल इंस्टीच्यूट में शोधरत जोबा हंसदा इत्यादि छात्राओं के अलावे विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय आदिवासी युवा महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

आदिवासी महिलाओं की वर्तमान सामाजिक दुरावस्था केन्द्रित विषय ‘मेन स्ट्रीम मीडिया में आदिवासी महिलाओं के मुद्दों पर चुप्पी क्यों’ आधारित बेविनार में सबों ने गहरे दर्द के साथ अपने समाज की महिलाओं की दुरवस्था कि तल्ख़ चर्चा की। वक्ताओं ने यह भी कहा कि मुख्यधारा की मीडिया में जब आदिवासी समाज और उनके सवाल हाशिये पर रहते हैं तो इस समाज की महिलाओं की क्या हैसियत है!

बेविनार में गोड्डा कॉलेज गोड्डा की सामाजिक विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर व आदिवासी महिलाओं के सामाजिक सवालों को लेकर सतत मुखर और सक्रीय रहनेवाली रजनी मुर्मू जी ने ज़मीनी हकीक़त बतायी। जिसमें उन्होंने कहा कि लम्बे समय से एक रोमांटिक छवि स्थापित कर दी गयी है कि आदिवासी समाज की महिलाओं को अन्य समाज की महिलाओं से अधिक स्वतंत्रता व अधिकार हासिल हैं जबकि सच्चाई है कि आज के डेट में न तो इन्हें अपने सामाजिक संस्थाओं से लेकर कहीं भी नीति निर्धारण के स्थानों पर शामिल किया जाता है और न ही संपत्ति का कोई कानूनी अधिकार हासिल है।

जीवनसाथी चुनने की आजादी दिखाकर आदिवासी मर्दों द्वारा कई पत्नियां रखने और बिना कारण उन्हें छोड़ देने जैसे जलते हुए सवालों को कभी सामने नहीं दिया जाता है। बाल विवाह आज भी आम है तो विधवाओं की हालत जानवरों से भी बदतर है। ज़मीन-जायदाद हड़पने के लिए डायन के नाम पर उनकी हत्या–उत्पीड़न, गैंगरेप व बच्चों तक में बढ़ती नशाखोरी आम हो गयी है।

बाहर पढ़ने अथवा काम करने जानेवाली हर लड़की पर समाज के लोग संदेह करते हैं। इन सवालों को उठानेवाली जागरूक आदिवासी महिलाओं पर सार्वजनिक व सोशल मीडिया मंचों से उनपर फेमनिष्ठ व गैर आदिवासियों से ही ताल्लुकात रखने जैसे अनर्गल आरोप लगाकर उनसे शुद्ध आदिवासी होने का सर्टिफिकेट माँगा जाता है। उक्त दुरावस्था पर न तो आदिवासी राजनेता ही कुछ बोलते हैं और न ही आदिवासी बौद्धिक समाज के लोग। ऐसे में नौकरी कर रहीं युवा आदिवासी महिलाओं व शिक्षा प्राप्त कर रही आदिवासी लड़कियों को अपने समाज की व्यापक महिलाओं को शिक्षित व जागरूक बनाने का दायित्व उठाना ही होगा तभी हम आदिवासी दिवस को सार्थक बना पायेंगे। 

Jharkhand
aadiwasi
Tribal women
World tribal day
aadiwasi culture
Aadiwasi's Right
BJP
Congress
Hemant Soren
Coronavirus

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • election
    राज वाल्मीकि
    चुनाव 2022: ‘हमारा वोट सबको चाहिए उन्हें भी जो हमसे भेदभाव करते हैं’
    10 Feb 2022
    ‘हमारा वोट मांगने तो हर पार्टी के लोग हमारे पास आते हैं। कथित उच्च जाति के लिए हम दलित और अछूत होते हैं। हम से छूआछूत और भेदभाव करते हैं। पर चुनाव के समय वे यह भूल जाते हैं। क्योंकि हमारे वोट की तो…
  • up elections
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    गुंडागीरी और लोकतंत्रः समाज को कैसे गुंडे चाहिए
    10 Feb 2022
    अगर अपराधी अपनी जाति का है तो वह साधु संत है और अगर दूसरी जाति और धर्म का है तो वह गुंडा है, माफिया है!!
  • cartoon
    आज का कार्टून
    कार्टून क्लिक: यूपी चुनाव और गोदी मीडिया के सवाल
    10 Feb 2022
    गोदी मीडिया शायद पूरी तरह ज़मीन से कट चुका है, तभी तो महंगाई, बेरोज़गारी और खेती-किसानी के संकट के दौर में भी वह यूपी के मतदाता से हिजाब पर सवाल पूछता है।
  • jammu and kashmir
    अनीस ज़रगर
    राइट्स ग्रुप्स ने की पत्रकार फ़हाद शाह की रिहाई और मीडिया पर हमलों को बंद करने की मांग
    10 Feb 2022
    पत्रकार फ़हाद शाह की गिरफ़्तारी को कई लोग कश्मीर में मीडिया पर हमले के रूप में देख रहे हैं, जहां पुलिस अधिकारियों ने हाल के वर्षों में कई मीडिया कर्मियों पर मुकदमा दर्ज कर और उन्हें परेशान किया गया है।
  • ग्राउंड रिपोर्ट
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    ग्राउंड रिपोर्टः जाट-मुस्लिम गठजोड़ बना चुंबक, बिगड़ रहा भाजपा का खेल, मुखर हुईं मुस्लिम आवाज़ें
    10 Feb 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने बागपत के ढिकौली गांव में सपा-रालोद गठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवार के पक्ष में बनते माहौल और हापुड़, मुरादाबाद व अलीगढ़ में मुस्लिम आवाजों की राजनीतिक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License