NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
झारखंड: केंद्रीय उद्योग मंत्री ने एचईसी को बचाने की जवाबदेही से किया इंकार, मज़दूरों ने किया आरपार लड़ाई का ऐलान
एचईसी मजदूरों के समर्थन में उतरीं संयुक्त वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने कहा इसे बेचने की साज़िश नहीं चलेगी।
अनिल अंशुमन
20 Dec 2021
Jharkhand
संयुक्त वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने किया प्रदर्शन

मौजूदा केंद्र सरकार की ‘स्टार्टअप और डिजिटल इंडिया’ क़वायद का शिकार बन रहे इस देश की पहचान माने जाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों की हालत दिन ब दिन ऐसी बदतर बनायी जा रही है, मानो अब इनकी कोई ज़रूरत ही नहीं रह गयी है। इसलिए इनके प्रति कोई जवाबदेही लेने की जहमत उठाने की बजाय सीधे इस हाल में पहुंचाया जा रहा है कि जाए निजी हाथों में सौंपने का रास्ता खुद ब खुद बन जाए। उस पर से विडंबना ये कि गोदी मिडिया से लेकर शिक्षित समझदार कहलाने वाले जागरूक नागरिक समुदाय का अच्छा खासा हिस्सा इसे हर ढंग से सही साबित करने में लगातार सक्रिय दिख रहा है। जो एक चिंताजनक स्थिति है।

झारखंड प्रदेश के हटिया (रांची) स्थित राज्य और देश की शान कहे जाने वाले देश के उद्योगों की ‘मदर इंडस्ट्री’ कहलाने वाले हेवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (एचईसी) को उसकी बदहाली उबारने का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है। विगत 20 दिनों से यहाँ के सारे मजदूर कर्मचारी पिछले सात माह से बकाया वेतन भुगतान व कई अन्य मांगों को लेकर ‘टूलडाउन’ (हड़ताल) किये हुए हैं। इस आन्दोलन को संस्थान के इंजिनियर व अफसर संगठनों ने भी अपन समर्थन दिया हुआ है। क्योंकि उन्हें भी अभी तक वेतन नहीं मिला सका है। सबों की पारिवारिक हालत भूखों मरने जैसी बन गयी है।

कई करोड़ के कार्यादेश मिले रहने के बावजूद आज एचईसीनई मशीनों और आवश्यक कार्यशील पूंजी के अभाव में न सिर्फ घाटे से उबार पा रहा है बल्कि बंद होने की कगार पर पहुँच गया है। स्थिति ऐसी बन गयी है कि घोर आर्थिक संकट के कारण वह अपने यहाँ कार्यरत मजदूर कर्मचारी और अफसरों को समय पर नियमित वेतन भी नहीं दे पा रहा है।

एचईसी की खस्ता हालत ठीक करने की गुहार लेकर इस औद्योगिक संस्थान के शीर्ष प्रशासक गत 16 दिसम्बर को जब मौजूदा केंद्र सरकार के उद्योग मंत्री के पास गए तो उन्होंने दो टूक लहजे में साफ़ कह दिया कि एचईसी को बचाना है तो खुद ही जुटाए संसाधन। यानी उनकी सरकार इसकी कोई जवाबदेही नहीं लेगी। दिल्ली स्थित उद्योग मंत्रालय में 6 घंटे तक चली इस बैठक में कोई समाधान तो नहीं ही निकला, एचईसी को आर्थिक संकटों से तात्कालिक तौर से उबरने के लिए बैंक गारंटी और ज़मीं मॉर्गेज रखने के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया गया।

बैठक में भारी उद्योग मंत्रालय के सचिव से लेकर एचईसी और विभागीय कई उच्च स्तर के अधिकारी शामिल थे। एचईसीप्रबंधन की ओर से देनदारी, मशीनों के जीर्णोद्धार व अच्छे माल की उपलब्धता के लिए 875 करोड़ रुपये की आपात मदद मांगी गयी। जिसे पूरी तरह से अस्वीकार करते हुए मंत्री महोदय ने साफ कह दिया कि ज़रूरी है पहले हड़ताल ख़त्म कराइए। हड़ताली मजदूरों को समझाइये कि हड़ताल उनके हित में नहीं है और वे चुपचाप काम पर लौट आयें। क्योंकि हड़ताल जारी रही तो कंपनी बंदी की कगार पर पहुँच जाएगी। जवाब में एचईसी मज़दूर यूनियनों ने भी आर पार की लड़ाई की चेतावनी दे दी है। जिससे उत्पादन व अन्य सभी ज़रूरी काम रुके पड़े हैं और संस्थान में क़ायम गतिरोध जटिल बनता जा रहा है।

एचईसी में नौकरी करना शान की बात कहने वाले यहाँ के मजदूरों के घरों में दो जून के भोजन के भी लाले पड़ गए हैं। पिछले कई महीनों से वेतन नहीं मिल पाने के कारण उनकी माली हालत ऐसी दयनीय हो गयी है कि बच्चों की पढ़ाई की फीस और परिवार के भरण पोषण का खर्चा जुटाने लिए अनेकों ड्यूटी के बाद बाहर कमाने लगे हैं। किसी ने किराना और सब्जी बेचने का काम शुरू कर दिया है। कोई नाश्ता-चाय व चौमिन की दूकान चलाने लगा है तो कोई ऑटो चलाकर कमाई कर रहा है।

आंदोलनकारी एचईसीकर्मियों को सक्रिय समर्थन दे रहे संयुक्त वामपंथी ट्रेड यूनियनों ने एचईसी जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक औद्योगिक उपक्रम के प्रति केंद्र सरकार व उद्योग मंत्रालय के उपेक्षापूर्ण रवैये के खिलाफ प्रतिवाद मार्च निकाला। अलबर्ट एक्का चौक पर प्रतिवाद सभा के जरिये आरोप लगाया कि यह मोदी सरकार द्वारा एचईसी को बेचने की साज़िश का ही संकेत है। वेतन नहीं मिलने से टूल डाउन करने को मजबूर आंदोलनकारी मजदूरों के साथ गद्दारी है। भूख और तंगहाली झेल रहे इन मजदूरों के साथ कोई हादसा हुआ तो सीधे तौर पर केंद्र की सरकार ही जिम्मेवार होगी। हड़ताली मजदूरों की मांगें अविलम्ब पूरा करने की मांग करते हुए हेमंत सरकार से भी अपील की है कि यदि केंद्र सरकार अपनी जवाबदेही से भागती है तो प्रदेश की हेमंत सरकार इसे टेक ओवर कर ले।

ताज़ा ख़बरों में केन्द्रीय उद्योग मंत्री से टका सा जवाब सुनकर लौटे एचईसी प्रशासन अब हड़ताल में शामिल मजदूरों के विरुद्ध कार्रवाई की तैयारी में जुट गया है। ‘नो वर्क नो पे’ की घोषणा कर हड़ताली कर्मियों की सूचि तैयार करने के निर्देश जारी किया है।

एचईसी में वर्षों काम करके अवकाश प्राप्त होकर सीनियर सिटिजन बन चुके अधिकारी व मजदूरों को संस्थान की वर्तमान दुरावस्था को लेकर गहरी चिंता और केंद्र सरकार के रवैये से गहरी निराशा है। जो आये दिन संस्थान परिसर क्षेत्र स्थित धुर्वा कॉलोनी के चौक चौराहों की चाय दुकानों की चर्चाओं से समझी जा सकती है। लम्बे समय तक संस्थान के कुशल मजदूर और ट्रेड यूनियन नेता रहे सिधेश्वर सिंह जी लम्बी सांस लेकर गहरे दर्द के साथ गुनगुनाते हैं कल चमन था आज इक सहरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ। फिलहाल एचईसी में मजदूरों का टूल डाउन (हड़ताल) जारी है देखना है कि आगे क्या-क्या होता है।

ये भी पढ़ें: झारखंड: बंद होने की कगार पर पेट्रोल पंप! ''कैसे बचेंगी नौकरियां?'’... 21 दिसबंर को नहीं मिलेगा पेट्रोल-डीज़ल

Heavy Engineering Corporation
HEC
Jharkhand government
Jharkhand
AITUC
CITU
AICCTU
AIUTUC

Related Stories

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

मुंडका अग्निकांड के खिलाफ मुख्यमंत्री के समक्ष ऐक्टू का विरोध प्रदर्शन

मुंडका अग्निकांड: सरकारी लापरवाही का आरोप लगाते हुए ट्रेड यूनियनों ने डिप्टी सीएम सिसोदिया के इस्तीफे की मांग उठाई

झारखंड : नफ़रत और कॉर्पोरेट संस्कृति के विरुद्ध लेखक-कलाकारों का सम्मलेन! 

जेएनयू: अर्जित वेतन के लिए कर्मचारियों की हड़ताल जारी, आंदोलन का साथ देने पर छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष की एंट्री बैन!

दिल्ली : नौकरी से निकाले गए कोरोना योद्धाओं ने किया प्रदर्शन, सरकार से कहा अपने बरसाये फूल वापस ले और उनकी नौकरी वापस दे

‘मैं कोई मूक दर्शक नहीं हूँ’, फ़ादर स्टैन स्वामी लिखित पुस्तक का हुआ लोकार्पण


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License