NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
कमाल ख़ान : हमीं सो गए दास्तां कहते कहते
पत्रकार कमाल ख़ान का जाना पत्रकारिता के लिए एक बड़ा नुक़सान है। हालांकि वे जाते जाते भी अपनी आंखें दान कर गए हैं, ताकि कोई और उनकी तरह इस दुनिया को देख सके, समझ सके और हो सके तो सलीके से समझा सके। लखनऊ से ख़ास रपट
असद रिज़वी
16 Jan 2022
Tribute to Kamal Khan
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

लखनऊ की करबला मलका जहाँ में कमाल ख़ान को सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था 

हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते
                (साक़िब लखनवी)

अफ़सोस!! कमाल ख़ान के जाने से “तहज़ीब” के दायरे में रहकर की जानी वाली सहाफ़त (पत्रकारिता) भी आज बेहद उदास है। गंभीर से गंभीर मुद्दों को आसान अल्फ़ाज़ में पेश करने के फ़न में माहिर पत्रकार कमाल ख़ान ने शुक्रवार को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

टीवी के स्क्रीन पर शायद ही अब कोई इतनी शालीनता के साथ बोलता सुनाई देगा। जब साम्प्रदायिकता का काला घना धुआं चारों तरफ़ फ़ैला हुआ है, ऐसे में इसके मुक़ाबले में चमकने वाला सूरज गुरुब (सूर्यास्त) हो गया। 

दुनिया में हज़ारों लोगों को अब वह कमाल की आवाज़ नहीं सुनाई देगी जो सूचनाओं के साथ कानों में शहद घोल देती थी। हिंदी के टीवी चैनल पर उर्दू के शेर और संस्कृत के श्लोक अब शायद ही कोई एक साथ सुनाएगा। 

“शिराज़ ए हिन्द” कहे जाने वाले जौनपुर से ताल्लुक रखने वाले हैदर हुसैन के बेटे कमाल ख़ान ने “अवध” की “तहज़ीब और अदब” में ख़ुद को ढाल लिया था। शायद यही वजह है कि कमाल की हर ख़बर “कमाल” की होती थी।

अदब और शायरी से इतना लगाव रहा कमाल-ख़ान का की उनकी खबरों में भी क़दीम और जदीद शोहरा के शेर हुआ करते थे। जिस से वह चंद अल्फ़ाज़ में बड़ी-से-बड़ी बात समझा दिया करते थे। इतना ही नहीं वह संस्कृत के श्लोक या रामायण की चौपाई पढ़ते तो लगता कमाल ख़ान के अंदर एक पंडित भी मौजूद है।

कमाल ख़ान ने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। हालाँकि इसका मतलब यह नहीं है कि उनके के साथ भेद-भाव नहीं हुआ। यह तो उनके क़रीबी ही जानते उन्होंने कब और कहाँ कहाँ भेदभाव का सामना किया-लेकिन अपने अंदर के हिंदुस्तानी को कभी मरने नहीं दिया।

अभी दुनिया उनकी आवाज़ सुन ही रही थी, और आगे भी उनको बोलता देखना चाहती थी, लेकिन कमाल ख़ामोश हो गये। कमाल को सिर्फ़ मधुरभाषी तक सीमित नहीं किया जा सकता है। दुनिया से एक नेक इंसान भी उठ गया है। 

ऐसा इंसान जो किसी ग़रीब के घर में बिजली कनेक्शन करवाने के लिये कभी दौड़ता हो और कोविड-19 के दौर में राशन बाँटता दिखाई देता था। कमाल ने न सिर्फ़ अपने पेशे से ईमानदारी दिखाई बल्कि समाज के लिये बहुत कुछ किया। चलते-चलते चलते भी उन्होंने “नेत्र-दान” कर दिये ताकि उनकी आँखों से कोई दूसरा इस दुनिया को देख सके।

जब शुक्रवार (14-जनवरी) को कमाल की आँख बन्द हुई तो हज़ारों लाखों आँखें छलक पड़ी। लखनऊ की करबला मलका जहाँ में उनको सुपुर्द-ए-ख़ाक करने न सिर्फ़ उनका परिवार व पत्रकारिता जगत से जुड़े लोग बल्कि समाज के हर वर्ग के लोग आये थे। शायद समाज की एकता का ऐसा ही गुलदस्ता देखने का ख़्वाब कमाल देखते थे।

हिन्दुस्तान ऐरोनॉटिक्स लिमिटेड की नौकरी छोड़कर पत्रकारिता में आये कमाल को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि कमाल की पत्रकारिता की शुरुआत “अमृत प्रभात” अख़बार से हुई। यहाँ वह त्रिपाठी की टीम का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन त्रिपाठी कहते हैं की कमाल अपने स्वभाव के चलते कब टीम से परिवार का हिस्सा बन गये पता ही नहीं चला।

रामदत्त त्रिपाठी बीबीसी हिंदी में चले गये और कमाल “अमृत प्रभात” से निकलकर नव-भारत और  दैनिक जागरण होते हुए एनडीटीवी चले गये। जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी की आख़िरी शाम तक काम किया।

लेखक सुल्तान शाकिर कहते हैं कि पत्रकारिता कि दुनिया का “दिलीप कुमार” चला गया। शाकिर कि नज़र में कमाल अपने सहाफ़त के फ़न में इतने माहिर थे कि जैसे अभिनय में दिलीप कुमार थे। कई किताबों के लेखक शाकिर कहते हैं कि मौजूदा दौर के पत्रकार, कमाल को अपना उस्ताद मानें और उनसे बोलने और मुद्दों को पेश करने का सलीक़ा सीखें।

आँखों में आँसू लिए हुए उनकी बहन  तज़ीन ख़ान कहती हैं कि “मेरा भाई एक ऐसा हीरा था, जिसके समने “कोहिनूर” भी “ख़ाक” है। तज़ीन कहती हैं कि अपनी ज़िंदगी की आख़िरी शाम तक उनको मेरी सेहत की फ़िक्र थी। लेकिन मैंने सोचा भी नहीं था कि शाम को मुझे डॉक्टर की ले जाने की बात करने वाला भाई, सुबह को ख़ुद चला जायेगा। वह (कमाल) सिर्फ़ रिश्तेदारों के नहीं बल्कि हर किसी के सुख-दुःख के साथी थे। घर के माली से लेकर सड़क पर सफ़ाई करने वालों तक वह सब के कामों लिये दौड़धूप करते थे। 

मौलाना यासूब अब्बास कहते हैं कि कमाल मरती हुई तहज़ीब को ज़िंदा रखे हुए थे। उनका कहना न सिर्फ़ ज़बान और अल्फ़ाज़ पर बल्कि मुद्दों पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी। कोई भी ख़बर जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि पूरी तरह समझ कर दिखाते थे।

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर डॉक्टर कौसर उस्मान कहते हैं कि “कमाल एक अच्छे और प्रसिद्ध पत्रकार थे लेकिन मैं सब हटा के देखता हूँ सब घटा के देखता हूँ तो आप एक अच्छे इंसान थे, बेमिसाल खूबियों के मालिक, रोशन चेहरा, रोशन सोच, रोशन ख़याल, अवध की रोशन तहज़ीब के सच्चे रखवाले थे।” डॉक्टर कौसर कहते हैं कि “कई चाँद बुझ गए, एक सूरज के डूब जाने से”।

कमाल के साथ शुरुआती दौर में “लखनऊ यूनिवर्सिटी” बीट कवर करने वाले “द पायनियर” के ब्यूरो चीफ़ बिस्वाजीत बनर्जी, अपने साथी को याद करते हुए कहते हैं कि “वह एक बहुत ही मददगार दोस्त और खबरों की समझ रखने वाला पत्रकार था।” बनर्जी बताते हैं कमाल शुरू से ही अपने साथियों से ख़बर साझा कर लिया करते थे, और स्वयं अपना काम परिपूर्णता (पर्फ़ेक्शन) के साथ करते थे। हर ख़बर पूरी तरह “सत्यापित” करके ही चलाते थे।

कमाल के साथ पिछले 5 साल से काम करने वाले आलोक पांडे कहते हैं कि “कमाल सर मुझसे 18 साल सीनियर थे, लेकिन वह मेरे साथ खबरों पर प्रतिदिन चर्चा करते थे। वह कहते हैं कि “ब्रेकिंग न्यूज़” के दौर में भी बड़ी ज़िम्मेदारी से काम करते थे। विश्वसनीय सूत्र से मिली खबरों को भी कई बार पुष्टि करने के बाद ही प्रसारित करते थे।

आलोक कहते हैं, कमाल सर, सिर्फ़ एक पत्रकार नहीं बल्कि “पत्रकारिता” का स्कूल थे। उनके जाने से कमी पैदा हुई है, उसको कभी पूरा नहीं किया जा सकता है। कई दशकों तक दुनिया में कमाल कि “कमाल की पत्रकारिता” को याद किया जाता रहेगा।

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है 

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

                             (अल्लामा इक़बाल)

Kamal Khan
Tribute to Kamal Khan
NDTV

Related Stories

कमाल ख़ान का निधन : ख़ामोश हो गई पत्रकारिता जगत की बेबाक और मधुर आवाज़

केरल में हथिनी की मौत पर हुई भड़काऊ रिपोर्टिंग, एक बार फिर मुस्लिम रहे निशाने पर

पत्रकार रवीश कुमार मैगसेसे से हुए सम्मानित, कहा— पुरस्कार से खुश हूं लेकिन मीडिया की हालत से उदास

बाबरी विध्वंस : हिन्दू राष्ट्र के ज़हरीले ख़्वाब की कहानी

पत्रकार रवीश कुमार को मैगसेसे पुरस्कार

हिन्दुस्तान के न्यूज़ चैनलों ने डेमोक्रेसी को कुचला है : रवीश कुमार

हाउ इज द जोश, मोदी जी?

रिलायंस द्वारा एनडीटीवी पर मानहानि का मुक़दमा, क्या डराने की है कोशिश ?


बाकी खबरें

  • sudan
    पवन कुलकर्णी
    सूडान के दारफुर क्षेत्र में हिंसा के चलते 83,000 से अधिक विस्थापित: ओसीएचए 
    18 Dec 2021
    सूडान की राजधानी खार्तूम, खार्तूम नार्थ, ओम्डुरमैन सहित देशभर के कई राज्यों के कई अन्य शहरों में गुरूवार 16 दिसंबर को विरोध प्रदर्शनों के दौरान “दारफुर का खून बहाना बंद करो” और “सभी शहर दारफुर हैं”…
  • air india
    भाषा
    पायलटों की सेवाएं समाप्त करने का निर्णय खारिज किये जाने के खिलाफ एअर इंडिया की अर्जी अदालत ने ठुकराई
    18 Dec 2021
    अदालत ने कहा, ‘‘सरकार और उसकी इकाई एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य हैं और इसलिए, उसे पायलटों को ऐसे समय संगठन (एअर इंडिया) की सेवा करने के अधिकार से वंचित करते नहीं देखा जा सकता…
  • Goa Legislative Assembly
    राज कुमार
    गोवा चुनाव 2022: राजनीतिक हलचल पर एक नज़र
    18 Dec 2021
    स्मरण रहे कि भाजपा ने जिन दो पार्टियों के बल पर सरकार बनाई थी वो दोनों ही पार्टियां भाजपा का साथ छोड़ चुकी है। गोवा फॉरवर्ड पार्टी कांग्रेस का समर्थन कर रही है तो महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी तृणमूल…
  • Nuh
    सबरंग इंडिया
    नूंह के रोहिंग्या कैंप में लगी भीषण आग का क्या कारण है?
    18 Dec 2021
    हरियाणा के नूंह में लगी आग में रोहिंग्याओं की 32 झुग्गियां जलकर खाक हो गईं। उत्तर भारत के रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में इस साल इस तरह की यह तीसरी आग है
  • covid
    भाषा
    ओमीक्रॉन को रोकने के लिए जन स्वास्थ्य सुविधाएं, सामाजिक उपाय तत्काल बढ़ाने की ज़रूरत : डब्ल्यूएचओ
    18 Dec 2021
    डब्ल्यूएचओ अधिकारी ने कहा, ‘‘हमें आगामी हफ्तों में और सूचना मिलने की संभावना है। ओमीक्रॉन को हल्का मानकर नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए।’’
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License