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आवाज़ का असर : कानपुर शेल्टर होम मामले में प्रोबेशन अधिकारी सस्पेंड, राष्ट्रीय महिला आयोग ने मांगी डिटेल एक्शन रिपोर्ट
विपक्ष और महिलावादी संगठनों के दबाव के बीच कानपुर शेल्टर होम मामले में ज़िला प्रोबेशन अधिकारी और बाल गृह सुपरिटेंडेंट को सस्पेंड कर दिया गया है। इसके साथ ही पूरे मामले पर राष्ट्रीय महिला आयोग ने संज्ञान लेते हुए अन्य संरक्षण गृहों के संबंध में भी रिपोर्ट तलब की है।
सोनिया यादव
27 Jun 2020
कानपुर शेल्टर होम

“कानपुर बालसंरक्षण गृह के वार्डन और जिला प्रोबेशन अधिकारी को निलंबित कर दिया गया है। एडवा ने 21 जून को इस कार्रवाही की मांग की थी। डिपीओ ने इसके पूर्व अज्ञात के विरुद्ध गलत अफवाह फैलाने आदि की एफआईआर दर्ज करवाई थी। अब यही आरोप इनके खिलाफ कार्रवाई के कारण बने हैं। सभी दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जरूरी है।”

ये बयान अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुभाषिनी अली का है। एडवा की उत्तर प्रदेश ईकाई अध्यक्ष नीलम तिवारी और सुभाषिनी अली ने इस मामले 21 जून को एसएसपी कानपुर ने मुलाकात कर संरक्षण गृह के प्रबंधकों को तत्काल हटाने की मांग की थी।

पूर्व सांसद सुभाषिनी अली ने इस मामले पर न्यूज़क्लिक को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि बाल गृह में जहां 50 लड़कियों के रहने की जगह है वहां लगभग 200 लड़कियों को रखा जा रहा था।

पॉजिटिव मामलों के बाद भी शेल्टर होम सील नहीं हुआ!

सुभाषिनी के अनुसार, “प्रशासन ने 15 जून को पहला मामला सामने आने के बाद कोई कदम नहीं उठाया। 17 जून को कई और लड़कियों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई लेकिन शेल्टर को सील और सैनिटाइज करने की बजाय लड़कियों को वहीं पर रखा गया। जब 57 लड़कियों के एक साथ संक्रमित होने की खबर सामने आई तब ये शेल्टर होम सील हुआ है और लड़कियों को क्वारंटीन सेंटर भेजा गया है। ये लापरवाही नहीं अपराध है।”

बता दें कि कानपुर शेल्टर होम का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। 57 लड़कियों के कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद प्रशासन और प्रबंधन पर घोर लापरवाही के आरोप लग रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लिया है तो वहीं अब प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार भी एक्शन मोड में नज़र आ रही है।

क्या कहना है प्रशासन का?

राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से शुक्रवार, 26 जून को जारी एक आदेश में कहा गया है कि “प्रोबेशन अधिकारी अजीत कुमार ने कानपुर नगर के बालगृह में कोविड-19 संक्रमण के रोकथाम के लिए शासन स्तर पर दिए गए निर्देशों का पालन नहीं कराया है। इसके साथ ही राजकीय बालगृह में रहने वाली लड़कियों के संबध में सोशल मीडिया पर एचआईवी पीड़ित और तथ्यहीन बातों को फैलाते हुए किए जा रहे दुष्प्रचार का भी खंडन नहीं किया। विभाग का पक्ष नहीं रखे जाने तथा विभाग की छवि धूमिल करने आदि आरोपों के संबंध में प्रथम दृष्टया दोषी पाते हुए एतद्द्वारा तत्कालिक प्रभाव से निलंबित किया जाता है।”

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बालिका गृह सुपरिटेंडेंट भी सस्पेंड

जिला प्रोबेशन अधिकारी अजित सिंह के अलावा बाल गृह के सुपरिटेंडेंट को भी अनियमितताओं के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया है। फिलहाल सुपरिटेंडेंट मिथलेश पाल को क्वारंटीन सेंटर मे रखा गया है।

मालूम हो कि कानपुर शेल्टर होम में बड़ी संख्या में कोरोना संक्रमित मामले पाए जाने के बाद विपक्ष और महिलावादी संगठनों के दबाव के बीच सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सदस्य सुचिता चतुर्वेदी को पूरे मामले की जांच के लिए भेजा था। जिसके बाद सुचिता चतुर्वेदी ने मीडिया से कहा था कि दोषी अधिकारी बख्शे नहीं जाएगें।

इसे भी पढ़ें: कानपुर: लड़कियों के सरकारी शेल्टर होम मामले में अब तक क्या-क्या हुआ?

राष्ट्रीय महिला आयोग ने कमिश्नर से मांगी रिपोर्ट

राज्य महिला आयोग के बाद इस मामले पर राष्ट्रय महिला आयोग ने भी संज्ञान लिया है। आयोग की सदस्या कमलेश गौतम ने 23 जून को कानपुर कमिशनर को नोटिस जारी कर पूरे मामले की सात दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट की मांग की है।

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कमलेश गौतम ने न्यूज़क्लिक को बताया, “हमारी नज़र पहले दिन से ही इस पूरे मामले पर बनी हुई है, हम अपडेट्स पर भी संज्ञान ले रहे हैं। शेल्टर होम में कथित अनियमितता की बातें मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से सामने आईं हैं, जिसे लेकर आयोग ने सात दिन के भीतर डिटेल एक्शन रिपोर्ट की मांग भी की है। इस बाल गृह के अलावा हमने बाकि के बालिका संरक्षण गृहों और बाल गृहों के संचालन और देख-रेख संबंधी रिपोर्ट भी प्रशासन से मांगी है। आयोग बच्चियों और महिलाओं के गरिमामय जीवन के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध है और हम इस दिशा में हर संभव प्रयास कर रहे हैं।”

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 3 अप्रैल को बाल सुरक्षा गृहों हेतु कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए दिए थे,  जिसकी सूचना सभी प्रदेश के मुख्य सचिवों को भी दी गई थी। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक कानपुर संवासिनी गृह में कोर्ट के इन आदेशों की अनदेखी पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

कई जगह हुए विरोध प्रदर्शन

25 जून को अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन (एपवा) ने कानपुर शेल्टर होम मामले को प्रदेश स्तर का सवाल बनाते हुए यूपी के विभिन्न केंद्रों पर धरना दिया था।

एपवा की प्रदेश अध्यक्ष कृष्णा अधिकारी ने रोष जाहिर करते हुए था कि इस घटना को योगी सरकार की एक और नाकामी करार दिया था। कृष्णा अधिकारी के अनुसार योगी राज में महिलाओं पर हिंसा तेजी से बढ़ रही है और मुख्यमंत्री के मंत्रिमंडल में अपराधी मंत्री बने हुए हैं और उन्हें सरकार का पूरा संरक्षण मिला हुआ है।

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जनचौक में प्रकाशित खबर के मुताबिक कृष्णा अधिकारी ने कहा कि कानपुर कि कानपुर शेल्टर होम मामले में भी नाबालिग लड़कियों के साथ यौन उत्पीड़न और भाजपा मंत्रियों की संलिप्तता की खबरें आ रही हैं। इसलिए ऐपवा स पूरे मामले की उच्चस्तरीय स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है जिससे सच जनता के सामने आए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रावाई हो सके।

एपवा के अलावा सेंटर फॉर स्टगर्लिंग वूमेन, क्रांतिकारी युवा संगठन समेत कई पार्टियों के कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के लोगों ने भी अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन किए, सोशल मीडिया पर ऑनलाइन कैंपेन चलाया।

समाजिक कार्यकर्ता ऋचा सिंह कहती हैं, “ये आवाज़ का ही असर है जो इस मामले में इतनी जल्दी कार्रवाई हुई है। प्रशासन इस मामले में शुरुआत से ही सफाई दे रहा है, लेकिन हकीकत हम सभी के सामने है और कोई भी इस बात को नहीं नकार सकता की शेल्टर होम संचालन में तमाम गड़बड़ियां हैं। आगे जांच में सस्पेंशन भी देखने को मिल सकते हैं।”

पक्ष-विपक्ष

कानपुर राजकीय बालिका संरक्षण गृह में लड़कियों के कोरोना संक्रमित और गर्भवती पाए जाने पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के ‘जांच के नाम पर सब कुछ दबा देने’ वाले फेसबुक पोस्ट पर विवाद बढ़ गया है। उनके इस पोस्ट के बाद उत्तर प्रदेश कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। प्रियंका ने भी इस पर पलटवार करते हुए योगी सरकार को आड़े हाथों लिया है।

प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर लिखा, "जनता के एक सेवक के रूप में मेरा कर्तव्य यूपी की जनता के प्रति है, और वह कर्तव्य सच्चाई को उनके सामने रखने का है। किसी सरकारी प्रॉपगैंडा को आगे रखना नहीं है। यूपी सरकार अपने अन्य विभागों द्वारा मुझे फिज़ूल की धमकियां देकर अपना समय व्यर्थ कर रही है। जो भी कार्यवाई करना चाहते हैं, बेशक करें। मैं सच्चाई सामने रखती रहूँगी। मैं इंदिरा गांधी की पोती हूँ, कुछ विपक्ष के नेताओं की तरह भाजपा की अघोषित प्रवक्ता नहीं।"

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इस मामले पर बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने भी यूपी सरकार पर आरोप लगाया था कि प्रदेश में महिला सुरक्षा के मामले में सरकार उदासीन, लापरवाह और गैर जिम्मेदार है।

इसे भी पढ़ें: कानपुर: सरकारी शेल्टर होम में 7 गर्भवती बालिकाओं का मामला क्यों तूल पकड़ रहा है?

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