NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह
भारी संख्या में दिहाड़ी मज़दूरों का पलायन देश भर में श्रम के अवसरों की स्थिति को दर्शाता है।
अजय तोमर
02 Apr 2022
migrant

बेंगलुरु से करीब 25 किलोमीटर दूर एक छोटे शहर मलूर में भारत की कहानी हर रोज होती रहती है।

प्रतिदिन, करीब 4,000 दिहाड़ी मजदूर ट्रेन पर सवार होकर उत्तर-पश्चिम की ओर बेंगलुरु के महंगे अपार्टमेंट्स और औद्योगिक परिसरों में काम करने के लिए सफर करते हैं क्योंकि मलूर में वे पर्याप्त पैसा नहीं कमा सकते हैं।

और हर दिन, इससे भी कहीं अधिक गरीब क्षेत्रों वाले राज्यों जैसे कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार से हजारों की संख्या में लोग मलूर के कई कारखानों में काम करने के लिए अपने घरों से निकलने की जल्दी में होते हैं।

सुबह 7:30 बजे मलूर रेलवे स्टेशन के तीनों प्लेटफॉर्म खचाखच भर जाते हैं। बेंगलुरु जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे हजारों पुरुष और महिलाएं प्लेटफॉर्म पर इंतजार कर रहे होते हैं। ट्रेन के रुकते ही वे दरवाजे की ओर लपकते हैं। अंदर जाने के लिए उनके बीच में तब तक संघर्ष जारी रहता है जब तक कि कोच पूरी तरह से ठसाठस भर नहीं जाते।

ऐसा लगता है मानो एक बार में सिर्फ एक पैर रखने की ही जगह हो और लोग दरवाजे से बाहर लटकने लगते हैं, और जब तक ट्रेन उपनगरीय बेंगलुरु के पहले स्टॉप तक नहीं पहुंच जाती तब तक अपनी उंगलियों के बल पर लटकते रहते हैं। यहां पर कुछ लोग उतर जाते हैं।

मलूर एक छोटा सा शहर है जो कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु और कोलार के लगभग मध्य में स्थित है। विशेष तौर पर सोने की खदानों के मशहूर कोलार में अब निष्क्रिय पड़ी सोने की खदान कंपनी है।

मलूर रेलवे स्टेशन के बुकिंग ऑफिस में कार्यरत एक कमर्शियल क्लर्क, आशा के अनुसार, हर सुबह 7:30 बजे से करीब-करीब 4,000 लोगों का जमघट लग जाता है। यहां अन्य स्टेशनों की तुलना में कम लोग आते हैं।

उदाहरण स्वरूप इलेक्ट्रीशियन श्रीनिवास के मामले को ही देखा जाए। वे कहते हैं कि, “मैं पिछले दस वर्षों से बेंगलुरु जा रहा हूं। मैं दिन भर में 500 रूपये कमा लेता हूं, जो कि महीने के 15,000 रूपये होते हैं। लेकिन यह अपर्याप्त है। लेकिन यदि मैं यहां पर काम करता हूं तो मैं इसका आधा हिस्सा भी नहीं कमा पाऊंगा।”

45 वर्षीय श्रीनिवास ने कहा, “जब तक आप शारीरिक श्रम की मांग करने वाले कारखाने या निर्माण कार्य में काम नहीं करते हैं, तब तक यहां पर आपके लिए नियमित काम की गुंजाइश नहीं है।”

2011 की जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक, मलूर में करीब 30,000 की संख्या में श्रमशक्ति है। इनमें से आधे के पास छह महीने से अधिक समय तक का रोजगार होता है, जबकि बाकी लोग दिहाड़ी मजदूरी करते हैं।

शहर को 82.50% की साक्षरता दर पर गर्व है, जो कि औसत से अधिक है, लेकिन अधिकांश छात्र विश्वविद्यालय-पूर्व कॉलेजों को पूरा करने के बाद ही अपनी पढ़ाई बंद कर देते हैं।

प्री-यूनिवर्सिटी (पीयू) कॉलेज-इन-टाउन स्कूल में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक, वेंकटेश बताते हैं कि, “मलूर में सिर्फ एक सरकारी डिग्री कॉलेज है। चूंकि अधिकांश छात्र निजी विश्वविद्यालयों की महंगी फीस को वहन करने की स्थिति में नहीं होते हैं, ऐसे में वे बेगलुरु में अमेज़न, फ्लिपकार्ट या औद्योगिक क्षेत्र जैसी बड़ी कंपनियों के कार्गो में काम करने को वरीयता देते हैं।

1985 की बात है जब शहर ने पहली बार उद्योगों की स्थापना के पहले चरण को संपन्न होते देखा था। तीन चरणों में पूरा होने वाले इस शहर में मिटटी-टाइल और ईंट, ग्रेनाइट, दवाइयों, रासायनिक, खाद्य प्रसंस्करण और ऑटोमोबाइल के 200 से अधिक उद्योग स्थापित हो चुके हैं।

लेकिन मजदूरों की बदहाली, वो चाहे स्थानीय हों या प्रवासी आज भी जस की तस बनी हुई है।

एक्सीडी क्लच इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में पूर्व कार्यालय सहायक, 50 वर्षीय श्रीराम, के द्वारा अपनी पूर्व कंपनी के प्रबंधन के खिलाफ किसी उचित कारण के बिना उन्हें निलंबित करने के बाद से अब केस लड़ते हुए कोलार लेबर कोर्ट के चक्कर काटते हुए पांच साल हो चुके हैं।

अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए इलेक्ट्रीशियन और प्लंबर दोनों ही प्रकार का काम करने वाले श्रीराम, बताते हैं, “मेरा सुपरवाइजर मेरे साथ तालमेल नहीं बैठा पाया। मुझे बिना पूर्व अनुमति के धूम्रपान करने जैसे छोटे-छोटे मुद्दों के लिए परेशान किया जाता था। मुझे निलंबित करने से पहले, कोई पहली चेतावनी या पूर्व नोटिस नहीं दी गई थी।”

उनका कहना था कि वे चाहते हैं कि या तो कंपनी उन्हें फिर से बहाल करे या उन्हें मुआवजा दे।

श्रीराम के वकील और इंडस्ट्रियल एंड जनरल वर्कर्स यूनियन (आईजीडब्ल्यूयू) के अध्यक्ष, बीवी संपांगी ने कहा, “स्थानीय लोग अपनी ही जमीन पर प्रवासी हैं और दूसरे क्षेत्रों में काम की तलाश के लिए जाते हैं। सरोजिनी महिषी रिपोर्ट, 1984, जो उद्योगों को स्थानीय लोगों को प्राथमिकता के आधार पर नियुक्त करने के लिए निर्देशित करती है, का क्रियान्वयन तत्काल प्रभाव से किया जाना चाहिए।”

कारखानों में प्रवासी श्रमिकों की आमद के बारे में पूछे जाने पर संपांगी ने कहा कि फैक्ट्री प्रबंधक प्रवासी श्रमिकों को सस्ते दरों पर रखकर काम चला लेते हैं क्योंकि स्थानीय लोग बेहतर मजदूरी के साथ पूर्ण अधिकार की मांग करते हैं।

ग्लोबल ग्रेनाइट्स लिमिटेड में सहायक और ग्रेनाइट कटर के तौर पर कार्यरत बालासोर, ओडिशा के दयानेत दास (32) कोविड-19 से पहले के दिनों की तुलना करते हुए कहते हैं कि कैसे चीजें पहले उनके लिए बेहतर थीं।

अपने दायें कंधे से असहाय दास ने परेशानी जाहिर करते हुए कहा, “2020 में लॉकडाउन लगने से पहले, मैं आंध्रप्रदेश में एक कारखाने में काम कर 25,000 रूपये कमा लेता था। बाद में वापस आने पर जब लॉकडाउन में ढील दे दी गई, तो मैंने बंगलोर में एक ग्रेनाइट फैक्ट्री में काम करना शुरू किया, लेकिन उस नियोक्ता ने कभी समय पर पैसे नहीं चुकाए। इसलिए, मैंने यहां पर काम पकड़ लिया, लेकिन ये लोग सिर्फ 12,000 का भुगतान करते हैं और हमें सुबह 9 बजे से लेकर शाम 7 बजे तक काम करना पड़ता है। जबतक कोई बीमार नहीं पड़ जाता तब तक यहां कोई छुट्टी नहीं मिलती है।”

डॉरमेट्री में रहते हुए इन मजदूरों को नल का पानी पीना पड़ता है, जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। जब कभी वे सवाल करते हैं, तो उन्हें कुछ अतिरिक्त काम करने पड़ते हैं।

संपांगी ने बताया, “यदि किसी प्रवासी श्रमिक ने अपने नियोक्ता से सवाल पूछने की हिम्मत की, तो उन्हें नियोक्ताओं के द्वारा निकाल बाहर कर दिया जाता है। वे यूनियनों के पास आने से बचते हैं क्योंकि वे लंबी क़ानूनी कार्यवाही के पचड़े में नहीं फंसना चाहते हैं।”

कर्नाटक में प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए पीपल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज के प्रदेश अध्यक्ष, प्रोफेसर वाईजे राजेन्द्र कहते हैं, “प्रवासी श्रमिक नियोक्ताओं की क्रूरता का शिकार बन रहे हैं। कोविड-19 के बाद से आजीविका के स्रोत काफी कम हो चुके हैं। लेबर ठेकेदार भी उनकी आय के एक बड़े हिस्से को डकार जाते हैं। यदि वे काम के लिए सीधे संपर्क करते हैं तो वे ज्यादा सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं होते। उनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है और इसलिए उनका शोषण किया जाता है।”

सेंट जोसेफ कॉलेज के प्रोफेसर के मुताबिक, सरकार को चाहिए कि वह श्रमिकों के पक्ष वाली नीतियों को तैयार करे।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Karnataka: Two-way Migration Creating Labour Helplessness in Malur

Kolar Gold Fields
Daily Wage Labour
Migrant Labour
Migrant workers
Industrial & General Workers Union
Bengaluru
People's Union of Civil Liberties

Related Stories

हैदराबाद: कबाड़ गोदाम में आग लगने से बिहार के 11 प्रवासी मज़दूरों की दर्दनाक मौत

बेंगलुरु: बर्ख़ास्तगी के विरोध में ITI कर्मचारियों का धरना जारी, 100 दिन पार 

यूपी चुनाव : गांवों के प्रवासी मज़दूरों की आत्महत्या की कहानी

पश्चिम बंगाल में मनरेगा का क्रियान्वयन खराब, केंद्र के रवैये पर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उठाए सवाल

मौत के आंकड़े बताते हैं किसान आंदोलन बड़े किसानों का नहीं है - अर्थशास्त्री लखविंदर सिंह

निमहांस के बर्ख़ास्त किये गए कर्मचारी जुलाई से हैं हड़ताल पर

सीटू ने बंगाल में प्रवासी श्रमिकों की यूनियन बनाने की पहल की 

बसों में जानवरों की तरह ठुस कर जोखिम भरा लंबा सफ़र करने को मजबूर बिहार के मज़दूर?

नया प्रवासी विधेयक : देर से लाया गया कमज़ोर बिल

खाद्य सुरक्षा से कहीं ज़्यादा कुछ पाने के हक़दार हैं भारतीय कामगार


बाकी खबरें

  • nirmla sitaraman
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बजट में अगले 25 साल के लिये अर्थव्यवस्था को गति देने का आधार: सीतारमण
    01 Feb 2022
    आमजन ख़ासकर युवा को नए आम बजट में न अपना वर्तमान दिख रहा है, न भविष्य, लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि केंद्रीय बजट ने समग्र और भविष्य की प्राथमिकताओं के साथ अगले 25 साल के लिये…
  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बजट में मध्यम वर्ग के साथ विश्वासघात और युवाओं की जीविका पर प्रहार: विपक्ष 
    01 Feb 2022
    “सरकार ने देश के वेतनभोगी वर्ग और मध्यम वर्ग को राहत नहीं देकर उनके साथ ‘विश्वासघात’ और युवाओं की जीविका पर ‘आपराधिक प्रहार’ किया है।”
  • kanpur
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव: ' बर्बाद होता कानपुर का चमड़ा उद्योग'
    01 Feb 2022
    अपने चमड़े के कारोबार से कानपुर का नाम पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन आज चमड़ा फैक्ट्री अपने पतन की ओर है। चमड़ा व्यापारियों का कहना है कि इसका एक बड़ा कारण सरकार द्वारा गंगा नदी के प्रदूषण का हवाला…
  • varansi weavers
    दित्सा भट्टाचार्य
    यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 
    01 Feb 2022
    इस नए अध्ययन के अनुसार- केंद्र सरकार की बहुप्रचारित प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) और प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) जैसी योजनाओं तक भी बुनकरों की पहुंच नहीं है।
  • up elections
    असद शेख़
    यूपी चुनाव: क्या हैं जनता के असली मुद्दे, जिन पर राजनीतिक पार्टियां हैं चुप! 
    01 Feb 2022
    सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस की जीत और हार के बीच की इस बहस में कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब नहीं मिल पा रहा है। सवाल ये हैं कि जनता के मुद्दा क्या है? जनता की समस्या क्या है? पश्चिमी यूपी, अवध,…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License