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भारत
राजनीति
केरल भूमि सुधार कानून को चुनौती देने वाले केशवानंद भारती का निधन
47 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने 'केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल' मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था जिसके अनुसार, संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को बदला नहीं जा सकता।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
07 Sep 2020
केशवानंद भारती

दिल्ली: संविधान के 'मूल संरचना सिद्धांत' का निर्धारण करने वाले केस के प्रमुख याचिकाकर्ता रहे केशवानंद भारती का रविवार को केरल में निधन हो गया। पुलिस ने बताया कि केरल निवासी केशवानंद भारती श्रीपदगवरु का इडनीर मठ में उम्र संबंधी बीमारियों की वजह से 79 साल की उम्र में निधन हो गया। पुलिस ने बताया कि मिली सूचना के मुताबिक, रविवार तड़के करीब तीन बजकर 30 मिनट पर उनका निधन हुआ।

केरल के महंत केशवानंद भारती की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट से वर्ष 1973 का चर्चित ‘संविधान के मूल ढांचे’ के सिद्धांत पर फैसला आया, जिसने संविधान में संशोधन को लेकर संसद के अधिकारों को न केवल सीमित किया बल्कि साथ-साथ न्यायपालिका को संशोधन की समीक्षा का अधिकार मिला। भारत के कानूनी इतिहास में आए ऐतिहासिक फैसले में भारती याचिकाकर्ता थे। 

उन्हें आज भी इसी केस के लिए याद किया जाता है, हालांकि उनका मकसद किसी सुधार या बदलाव का नहीं था, बल्कि वे तो एक मठाधीश के तौर पर अपनी ज़मीन बचाने के लिए केरल सरकार के भूमि सुधार कानूनों को चुनौती देने गए थे, लेकिन इस बहाने जो बहस छिड़ी और मुकदमा जिस विस्तार में चला गया उसका सुखद परिणाम आया और By default  यानी जाने-अनजाने इसका श्रेय केशवानंद भारती को दिए जाने लगा, हालांकि तार्किक तौर पर संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत दिलाने का श्रेय इस संविधान पीठ या जस्टिस खन्ना को जाना चाहिए।

केशवानंद भारती वह वर्ष 1970 में केरल के कासरगोड स्थित इदनीर हिंदू मठ के वंशानुगत प्रमुख थे और केरल सरकार के दो भूमि सुधार कानूनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन पर पाबंदी लगाई गई थी। 

दरअसल केरल की तत्कालीन सरकार ने भूमि सुधार मुहिम के तहत जमीदारों और मठों के पास मौजूद हजारों एकड़ की जमीन अधिगृहीत कर ली थी। सरकार का तर्क था कि वो जमीनें लेकर आर्थिक गैर-बराबरी कम करने की कोशिश कर रही है। इसकी चपेट में केशवानंद के इडनीर मठ की संपत्ति भी आ गई। केशवानंद भारती ने केरल सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। 

केशवानंद ने कोर्ट में याचिका दखिल कर अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए दलील दी थी कि मठाशीध होने के नाते उन्हें अपनी धार्मिक संपत्ति को संभालने का हक है। इतना ही नहीं संत ने स्थानीय और केंद्र सरकार के कथित भूमि सुधार तरीकों को भी चुनौती दी थी। हालांकि केरल हाईकोर्ट में उनकी याचिका खारिज हो गई थी तब केशवानंद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कई चीजें पहली बार हुई। इस मामले की सुनवाई अबतक की सबसे बड़ी पीठ (13 न्यायाधीशों की पीठ) में हुई और 68 दिनों तक सुनवाई हुई जो अबतक का रिकॉर्ड है। अदालत ने मामले पर 703 पन्नों का फैसला सुनाया। 

इस मुकदमे में 31 अक्टूबर 1972 को बहस शुरू हुई और 23 मार्च 1973 को समाप्त हुई। इस मामले में भूमि सुधार रोकने गए केशवानंद भारती मुकदमा हार गए। हालांकि, मामले में आया ऐतिहासिक फैसला महत्वपूर्ण है जिसने छह के मुकाबले सात के बहुमत से उस को सिद्धांत को समाप्त कर दिया कि संसद को संविधान के हर हिस्से को संशोधित करने का अधिकार है। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एस एम सीकरी ने की। इस पीठ में उच्चतम न्यायालय के सुप्रसिद्ध न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच आर खन्ना भी थे।

इस विभाजित फैसले को बाद में कई प्रमुख न्यायविदों का समर्थन मिला जिसमें कहा गया था कि संसद को अनुच्छेद-368 के तहत संविधान में संशोधन करने का अधिकार है लेकिन उसे इसके मूल ढांचे को प्रभावहीन बनाने की शक्ति नहीं है। फैसले में कहा गया कि संविधान के हर प्रावधान में संशोधन किया जा सकता है लेकिन वह न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि संविधान का आधार और ढांचा पूर्व की तरह ही रहे।

न्यायमूर्ति खन्ना ने ‘मूल ढांचे’ शब्द का इस्तेमाल अपने फैसले में किया और कहा कि न्यायपालिका को संविधान संशोधन की समीक्षा करने और मूल ढांचे के सिद्धांत के खिलाफ होने पर खारिज करने का अधिकार है। शीर्ष अदालत ने इसका वृहद खाका दिया कि क्या संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा होगा और कहा कि धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र इसका हिस्सा है।

साथ ही भविष्य की पीठों पर छोड़ दिया कि वे तय करें कि मूल ढांचे का क्या हिस्सा है। भारती की ओर से याचिका पर प्रमुख न्यायविद नानी पालकीवाला ने जिरह किया और केरल भूमि सुधार संशोधन कानून 1969 और 1971 की वैधता को चुनौती दी। इन दोनों कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाने के लिए संविधान की नौवीं अनुसूची में रखा गया था।

हालांकि, बाद में यह बृहद मामला बना गया और संसद द्वारा अनुच्छेद-368 के तहत संविधान संशोधन के दायरे पर चर्चा हुई और फैसला आया। पीठ में शामिल 13 न्यायाधीशों में से 11 न्यायाधीशों ने अलग-अलग फैसला दिया। वे कुछ बिंदुओं पर सहमत थे जबकि कुछ पर असहमत, लेकिन संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत पर 13 में से सात न्यायाधीश सहमत थे जो बाद में कई संविधान संशोधनों को रद्द करने का आधार बना।

हाल में अदालत ने उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए आये राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को इसी आधार पर खारिज किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है, इसलिए यह संशोधित करने योग्य नहीं है।

(समाचार एजेंसी भाषा के इनपुट के साथ)

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