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किसान आंदोलन : 'किसान बातचीत को तैयार, पर सरकार 'प्रेम पत्रों' के बजाय ठोस प्रस्ताव भेजे'
सरकार की वार्ता की पेशकश पर दिए जवाब में किसान नेताओं ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अगर उन्हें कोई ठोस प्रस्ताव मिलता है तो वे खुले दिमाग से बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन यह स्पष्ट किया कि वे तीन कृषि कानूनों को पूरी तरह से निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी से कम पर कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
24 Dec 2020
किसान आंदोलन
Image courtesy: Facebook

दिल्ली:केंद्र सरकार के तीन कृषि अधिनियम के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर किसान पिछले 27 दिनों से प्रदर्शन कर रहे। लेकिन सरकार पांच दौर की बात के बाद मांगे माननी तो दूर उन्होंने बातचीत रोक दी थी। हालंकि पिछले कुछ दिनों से सरकार मिडिया में बोल रही है की वो चर्चा को तैयार है और उन्होंने इसके लिए किसान संगठनों को पत्र भी लिखा है। हालंकि सरकार इन सबके साथ यह बात भी बहुत मज़बूती से कह रही है ये विधेयक तो वापस नहीं होंगे।

इसी पर किसानों ने बुधवार को कहा कि सरकार नए कृषि कानूनों में "निरर्थक" संशोधन करने की बात को नहीं दोहराए, क्योंकि इन्हें पहले ही खारिज किया जा चुका है, बल्कि वार्ता को बहाल करने के लिए लिखित में "ठोस" पेशकश लेकर आए।

सरकार की वार्ता की पेशकश पर दिए जवाब में किसान नेताओं ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अगर उन्हें कोई ठोस प्रस्ताव मिलता है तो वे खुले दिमाग से बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन यह स्पष्ट किया कि वे तीन कृषि कानूनों को पूरी तरह से निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी से कम पर कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे।

किसान नेताओ ने कहा कि अगर सरकार एक कदम उठाएगी, तो किसान दो कदम उठाएंगे। उन्होंने साथ में सरकार से "प्रेम पत्र" लिखना बंद करने को कहा।

ऑल इंडिया किसान सभा के नेता हन्नान मौला ने दावा किया कि सरकार किसानों को थकाना चाहती है ताकि प्रदर्शन खत्म हो जाए। आगे उन्होंने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा हमने कभी बातचीत बंद की ही नहीं हम तो इस ठंड में इतनी दूर दिल्ली सरकार से बात करने ही आए है ,सरकार ने जब जहाँ हमे बुलाया हम गए लेकिन खुद बातचीत से बंद कर सरकार अब नाटक कर रही है।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल को लिखे पत्र में संयुक्त किसान मोर्चा ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों के साथ अपने "राजनीतिक विरोधियों " की तरह सलूक कर रही है।

इस मोर्चे में 40 किसान संघ शामिल हैं जो दिल्ली की सीमाओं पर 28 दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं।

संघ के नेताओं की तीन घंटे तक चली बैठक के बाद किसान नेता शिवकुमार कक्का ने बताया, " हम पहले ही गृह मंत्री अमित शाह को बता चुके हैं कि प्रदर्शनकारी किसान संशोधनों को स्वीकार नहीं करेंगे।"

उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार किसान संघों के साथ समानांतर बातचीत कर रही है, जिसका प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं है और इसे तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को पटरी से उतारने की कोशिश बताया।

केंद्र के 20 दिसंबर के पत्र के जवाब में लिखी चिट्ठी को पढ़ते हुए योगेंद्र यादव ने कहा, " हम आपसे (सरकार से) नए कृषि कानूनों में "निरर्थक" संशोधन करने की बात को नहीं दोहराने का आग्रह करते हैं, जिन्हें हम पहले ही खारिज कर चुके हैं, बल्कि लिखित रूप में एक ठोस प्रस्ताव के साथ आएं, जो नए सिरे से बातचीत का एजेंडा बन सके।"

मोर्चा ने अपने पत्र में कहा, "हमें आश्चर्य है कि सरकार हमारी मूल आपत्तियों को समझ नहीं पा रही है। किसानों के प्रतिनिधियों ने इन कृषि कानूनों को पूरी तरह से निरस्त करने की मांग की है... लेकिन सरकार बड़ी चतुराई से यह दिखाना चाहती है कि हमारी मांगें संशोधन के लिए हैं।"

पत्र में कहा गया है, " अपनी पिछली वार्ता में, हमने सरकार से स्पष्ट रूप से कहा था कि हम संशोधन नहीं चाहते हैं।"

किसान नेताओ ने आरोप लगाया कि सरकार यह दिखाना चाहती है कि किसान बातचीत करने के लिए तैयार नहीं हैं। गेंद सरकार के पाले में है क्योंकि किसान बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन वार्ता ठोस प्रस्ताव मिलने के बाद ही होगी।

कक्का ने कहा कि सरकार को "अपनी ज़िद छोड़नी चाहिए" और किसानों की मांगों को स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने साथ में यह भी कहा कि सरकार को वार्ता के लिए अनुकूल माहौल बनाना चाहिए।

मौला ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार बातचीत दिखावे के लिए कर रही है।

केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानूनों के विरोध में राजधानी दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों को रविवार को पत्र लिखकर वार्ता के लिए आमंत्रित किया था।

अग्रवाल ने पत्र में कहा था, ‘‘विनम्रतापूर्वक अनुरोध है कि पूर्व आमंत्रित आंदोलनरत किसान संगठनों के प्रतिनिधि शेष आशंकाओं के संबंध में विवरण उपलब्ध कराने का कष्ट करें तथा पुन: वार्ता के वास्ते सुविधानुसार तिथि से अवगत कराने का कष्ट करें।’’

नौ दिसंबर को होने वाली छठे दौर की वार्ता को सरकार ने रद्द कर दिया गया था ।

बहरहाल, किसानों ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती ‘किसान दिवस’ पर उनके प्रदर्शन को समर्थन देने के लिए लोगों से एक वक्त का भोजन ना करने की अपील की।

कई किसानों ने बुधवार सुबह ‘किसान घाट’ पहुंच चौधरी चरण सिंह को श्रद्धांजलि भी अर्पित की। सिंह को उनकी किसान हितैषी नीतियों के लिए पहचाना जाता है।

‘किसान दिवस’ के मौके पर प्रदर्शन कर रहे किसानों ने गाजीपुर बॉर्डर पर हवन भी किया।

इससे पहले, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार करना जारी रखेगी। साथ में उम्मीद जताई कि प्रदर्शनकारी किसान कानूनों पर अपनी चिंताओं के समाधान का हल निकालने के लिए केंद्र के साथ वार्ता बहाल करने के वास्ते जल्द आगे आएंगे।

जबकि किसान दिवस के दिन राजनितिक दल भी किसानो के समर्थन में उतरे

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार ने बुधवार को कहा कि किसानों का सम्मान करना सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी है , लेकिन अफसोस की बात है कि किसानों को अपने हक के लिये भी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

पवार ने राष्ट्रीय किसान दिवस पर ट्विटर पर पोस्ट करके किसानों को न्याय मिलने की कामना की।

शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि कुछ उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि बुधवार को मनाया जा रहा राष्ट्रीय किसान दिवस किसानों के लिए एक “काला दिन” है।

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान द्वारा कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के लिये प्रदेश की वामपंथी सरकार द्वारा बुधवार को प्रस्तावित एक दिवसीय विशेष सत्र की इजाजत देने से इनकार करने के बाद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने केंद्र की राजग सरकार की निंदा करते हुए इन कानूनों को वापस लेने की मांग की।

माकपा नेता ने कहा कि किसान देश के अन्नदाता है इसलिये उनकी मांग को राष्ट्र के हित में देखा जाना चाहिए।

उन्होंने हालांकि विशेष सत्र को निलंबित किये जाने के फैसले के बारे में कुछ नहीं कहा।

राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने बुधवार को आरोप लगाया कि भाजपा सरकार दिल्ली को किसानों से दूर कर रही है, किसानों को इसके बारे में सोचना चाहिए। भूतपूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की 118वीं जयंती के अवसर पर जयंत चौधरी ने कहा, 'बागपत की धरती में कुछ तो खास था जो उसने चौधरी चरण सिंह को अपना प्रतिनिधि बनाया। आपने हर मोड़ पर चौधरी चरण सिंह का सहयोग और मार्गदर्शन किया। आपकी वजह से वह सत्ता पक्ष में भी रहे मगर आज हमें अपने अस्तित्व को पहचानने की जरूरत है।'

नये कृषि कानूनों को पूंजीपतियों के हित में बताते हुए जयन्त ने कहा कि रालोद किसानों के साथ है, जहां भी किसान आंदोलन करेंगे वहीं रालोद उनका साथ देगा।

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ )

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