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एलआईसी विनिवेश से प्राइवेट काॅरपोरेट कब्ज़े के लिए रास्ता साफ़ होगा!
काॅरपोरेट मीडिया लगातार निजीकरण के गुण गाते हुए भूल जाता है कि बीमा का निजीकरण निजी उद्योगों पर भी भारी पड़ेगा। एमएसएमईज़ के अलावा मध्यम वर्ग को भी धक्का लगेगा।
बी सिवरामन
27 Feb 2020
LIC

केंद्रीय बजट 2020-21 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा एलआईसी के आंशिक विनिवेश की घोषणा को एक सप्ताह हुए कि उसी समय आर्थिक मामलों के सचिव अतनु चक्रवर्ती ने वामपंथियों को कोसना शुरू किया कि वे ‘‘शैतानी अंदाज़ में इस पहल का गलत अर्थ निकाल रहे थे’’ कि विनिवेश का मतलब निजीकरण है। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसा व्यक्ति जो आर्थिक नीति-निर्माण के सर्वोच्च पद पर बैठा है, मानो जानता ही नहीं कि एक बड़ा काॅर्पोरेट निवेशक, जिसके पास 24 प्रतिशत स्टेक्स होंगे, ऐसी किसी पब्लिक लिमिटेड कंपनी में असीम अधिकार रख सकेगा, जिसमें लाखों छोटे खुदरा शेयरधारक या बहुसंख्यक सरकारी स्टेक होंगे।

यदि सरकार 51 प्रतिशत् बहुसंख्यक स्टेक का मालिक हो, या 75 प्रतिशत तक भी, तो यह सच है कि वित्तीय सेवा विभाग बोर्ड में बहुसंख्यक सदस्य नियुक्त कर सकता है। पर हम जानते हैं कि ये सरकारी नाॅमिनी, जो जनता के पैसों के तथाकथित ट्रस्टी माने जाते हैं, निजी कारपोरेट निवेशकों के दबाव तले घुटने टेक देंगे।

न्यूज़क्लिक के लिए बात करते हुए, श्री एन. सुन्दरमूर्ति, जो ऑल इंडिया एलआईसी एम्प्लाॅईज़ फेडरेशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हैं, ने कहा कि ‘‘जब भारी निजी काॅरपोरेट निवेशक अधिकतर स्टेक पर कब्ज़ा कर लेंगे और उनका दबदबा होगा, तो 31.12 लाख करोड़ की एलआईसी की गाढ़ी कमाई की विशाल धनसंपदा उनके हाथों में आ जाएगी। वे इन्हें कहीं भी निवेश कर सकते हैं (खासकर अपने भक्त-समर्थकों की शेल कम्पनियों में) और किसी भी सट्टा वित्तीय बाज़ार साधन में, जहां वे हेराफेरी कर अरबों रुपये सरका ले जा सकते हैं। नीरव मोदी और मेहुल चौकसी सरीखों ने बैंक फंड्स में हेराफेरी की ही थी, और आईएल ऐण्ड एफएस जैसे गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों ने उधार ली गई बैंक पूंजी को हड़प लिया; फिर मोदी और निर्मला बीमा क्षेत्र को इन काॅरपोरेट लुटेरों के लिए खोल रहे हैं’’।

‘‘दरअसल, एलआईसी एक खास केस है। जब नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे लोग पंजाब नैश्नल बैंक को लूट लेते हैं, एलआईसी भी प्रभावित होता है क्योंकि वह पीएनबी में सबसे बड़ा संसथागत निवेशक है, जिसके 13.93 प्रतिशत स्टेक हैं। यदि पब्लिक सेक्टर बैंक काॅरपोरेट हेराफेरी की वजह से भारी एनपीए के पहाड़ तले दबा हुए हैं, एलआईसी भी प्रभावित होता है, क्योंकि उसने पीएसबीज़ (पब्लिक सेक्टर बैंकों) में भारी पैमाने पर निवेश किया है। सरकार जब पीएसयूज़/पीएसबीज़ को बेल आउट करती है तब भी एलआईसी इसका खर्च उठाता है। जब एलआईसी का आंशिक निजीकरण हो जाएगा, क्या यह तब संभव हो पाएगा?’’ उन्होंने सवाल किया।

स्रोतों से पता चलता है कि एलआईसी के पास बिना दावेदार 36,000 करोड रुपये हैं-यह उन पाॅलिसीधारकों का पैसा है जिन्होंने बीच में प्रीमियम देना बंद कर दिया और पाॅलिसी को छोड़ दिया। जो निजी काॅरपोरेट एलआईसी में स्टेक हथियाएंगे, उनकी नज़र जरूर इस पूंजी पर होगी।

सरकार अपने रेलवे आधुनिकीकरण योजना के लिए भी एलआईसी के 6 लाख करोड़ सरप्लस पर निर्भर है और एलआईसी के जरिये ही अपनी सामाजिक सुरक्षा स्कीमें-आम आदमी बीमा योजना और जनश्री बीमा योजना चला रही है। यही नहीं, जनरल इंश्योरेंस कम्पनियां भी मछुआरों, बुनकरों, दस्तकारों और कोइर श्रमिकों, आदि के तमाम सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को चला रहे हैं। निजीकरण की प्रक्रिया आंशिक विनिवेश तक सीमित नहीं रहेगी, तो इन योजनाओं का भविष्य भी अधर में लटक जाएगा। शायद किसी योजना के तहत ही सरकार ने अपनी फ्लैगशिप स्कीम आयुष्मान भारत को निजी बीमा कंपनियों के हाथ सौंप दिया है और नितिन गड्करी के नेतृत्व वाली अपनी ही समिति के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया जिसका कहना था कि पब्लिक सेक्टर बीमा कंपनियों को वरीयता देनी होगी।

भारत में लाइफ इंश्योरेस प्रीमियम विश्व में सबसे कम है क्योंकि एलआईसी न्यूनतम प्रीमियम लेता है। अब यह बेंचमार्क या मापदंड बन गया है। भारत में 23 निजी बीमा कंपनियां हैं जो जीवन बीमा देते हैं और सभी का विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ सांठगांठ है। उन्हें भारत में एलआईसी दर के अनुसार चलना पड़ता है ताकि वे प्रतिस्पर्धा में रह सकें। यदि एलआईसी में निजी निवेशक प्रीमियम दर को बढ़ा देंगे तो ये 23 कंपनियां भी ऐसा ही करेंगी। इससे आम जनता की सामाजिक सुरक्षा को भारी धक्का लगेगा।

बड़ी निजी बीमा कम्पनियों की तुलना में पब्लिक सेक्टर जनरल इंश्योरेंस कंपनियां एमएसएमईज़ से सामान्य से लेकर निम्न प्रीमियम लेते हैं। पर काॅरपोरेट मीडिया लगातार निजीकरण के गुण गाते हुए भूल जाता है कि बीमा का निजीकरण निजी उद्योगों पर भी भारी पड़ेगा। एमएसएमईज़ के अलावा मध्यम वर्ग को भी धक्का लगेगा।

अर्थव्यवस्था का धीमी रफ्तार से बढ़ना और साथ ही शेयर बाज़ार की धूम प्रथम दृष्टया विडम्बना लग सकती है। पर ऐसा नहीं है। निवेशक वास्तविक अर्थव्यवसथा में निवेश न करके स्टाॅक मार्केट में सट्टेबाज़ी की ओर बढ़ रहे हैं। पर जानकारों को पता है कि स्टाॅक मार्केट ऐसे समय में कितने असुरक्षित होते हैं। एक फरवरी को, बजट के दिन, सेंसेक्स 987 पाॅइंट गिरा। फिर 24 फरवरी को, जब ट्रम्प का आगमन हुआ, सेंसेक्स सबसे अधिक लुढ़का-807 पाॅइंट।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ऐसे कई ‘‘मिनी कै्रश और रिकवरी’’का सिलसिला चलेगा, फिर एक भारी कै्रश होगा। शेयर बाज़ार के ऐसे उतार-चढ़ाव के समय किसी कंपनी के लिए यह उचित नहीं होगा कि वह आइपीओ (इनिशियल पब्लिक आफर) की बात करे, खासकर एलआईसी जैसे बड़ी पीएसयू के मामले में। कई सारे कानूनों, जैसे एलाआईसी एक्ट 1956, कम्पनीज़ एक्ट, सेबी एक्ट, आईआरडीए एक्ट आदि में सुधार की ज़रूरत है और लाखों-लाख पाॅलिसीधारकों के खातों को लेकर ढेर सारी अकाउंटिंग को अंतिम रूप देना होगा। पर अतनु चक्रवर्ती पूरे आत्मविश्वास से कह रहे हैं कि एलआईसी का आईपीओ इसी वित्तीय वर्ष में हो जाएगा। इससे सरकार की हड़बड़ी का पता चलता है।

2019-20 में राजकोषीय घाटा 3.3 प्रतिशत के टार्गेट को पार कर गया था और 3.8 प्रतिशत तक पहुंच गया; अब 2020-20 का टार्गेट 3.5 प्रतिशत है। इसके मायने हैं कि बहुत सख़्त राजकोषीय संकुचन होगा क्योंकि राजस्व खास नहीं बढ़ रहा है। यह इसलिए हुआ कि बड़ी कंपनियों को 1.45 लाख करोड़ की काॅरपोरेट टैक्स छूट दी गई। जबसे मोदी सत्ता में आए हैं, काॅरपोरेट घरानों को 7,77,800 करोड़ के बैंक कर्ज माफ किये गए हैं। आंशिक रूप से इसकी भरपाई के लिए सरकार ने विनिवेश टार्गेट को पिछले वर्ष के 1.05 लाख करोड़ से बढ़ाकर 2.1 लाख करोड़ कर दिया; और इसमें से 90,000 करोड़ एलआईसी विनेवेश से आने हैं; बाकी आईडीबीआई स्टेक बिक्री से आएंगे, जो एलआईसी के द्वारा संचालित हैं। क्या यह वर्तमान संकट के दौर में संभव होगा?

पिछले वर्ष सरकार ने 1.5 करोड़ का जो विनिवेश लक्ष्य रखा, उसमें वह केवल 18,000 रु उगाही कर सकी, और इसमें से 14,000 रु म्यूच्युअल फंड्स जैसे एक्सचेंज ट्रेडेउ फंड्स (ईटीएफ्स) के माध्यम से हुआ, और बाकी का कुछ हिस्सा ही नए आईपीओज़ के जरिये था। काॅन्काॅर जैसे कुछ गौण आईपीओज़ केवल इसलिए सफल हो सके कि एलआईसी और अन्य पीएसबीज़ को उनमें निवेश करने पर बाध्य किया गया था।

कुछ दिन पूर्व, क्रेडिट स्विस नामक स्विस बैंक ने खुलासा किया कि भारतीय पीएसबीज़ के ‘स्ट्रेस्ड ऐसेट’ 16.89 लाख करोड़ तक पहुंच गये। क्योंकि एलआईसी सभी पीएसयूज़ में बड़ा निवेशक रहा है, इसका एलआईसी के अपने फाइनैंस पर भयानक असर पड़ेगा। फिर एलआईसी ने स्वयं काॅरपोरेटों को 40,000 करोड़ का कर्ज दिया है और निजी कंपनियों के इक्विटीज़ में भी 33,000 करोड़ निवेश किया था। मंदी की वजह से इसका अधिक हिस्सा स्ट्रेस्ड ऐसेट्स में बदल जाएगा। सरकार ने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है कि एलआईसी का मूल्य निर्धारण कैसे किया जाएगा, शेयर का कितना हिस्सा डायवेस्ट किया जाएगा और कितने दाम पर।

पीएसयू के धन का दोहन करके अपने राजकोषीय टार्गेट को पूरा करने के फिराक में सरकार ने 2018-19 में तीन जनरल इंश्योरेंस कम्पनियों के विलय की घोषणा भी की- नेशनल इंश्योरेंस, युनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस और ओरिएंटल इंश्योरेंस, जिसे 2019-20 बजट के पहले पूरा होना था, और विलय के बाद जो कम्पनी होती, उसे भी औपचारिक रूप से लिस्ट किया गया था पर विलय की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई और वित मंत्री ने 2020-21 बजट में इसपर चुप्पी साध ली। विलय की प्रक्रिया इसलिए शुरू नहीं हुई कि तीनों जनरल इंश्योरेंस कंपनियों ने कुल मिलाकर 1800 करोड़ का घाटा दिखाया। पर वित्त मंत्री ने अब एलआईसी और संबंधित वित्त क्षेत्र विनिमय (डाइवेस्टमेंट) से 90,000 करोड़ का टार्गेट तय किया है! क्या यह आने वाले संकट के दौर में सफल होगा, इसका अनुमान कोई भी लगा सकता है।


(लेखक आर्थिक और श्रम मामलों के जानकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।)

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