NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
समझिए: क्या है नई श्रम संहिता, जिसे लाने का विचार कर रही है सरकार, क्यों हो रहा है विरोध
श्रम संहिताओं पर हालिया विमर्श यह साफ़ करता है कि केंद्र सरकार अपनी मूल स्थिति से पलायन कर चुकी है। लेकिन इस पलायन का मज़दूर संघों के लिए क्या मतलब है, आइए जानने की कोशिश करते हैं। हालांकि उन्होंने भी 23 और 24 फरवरी की अपनी दो दिन की राष्ट्रव्यापी हड़ताल को कोविड और चुनाव के मद्देनज़र मार्च तक के लिए स्थगित कर दिया है।
रौनक छाबड़ा
31 Jan 2022
strike

पिछले दिनों एक बड़े भारतीय व्यापारिक अख़बार ने खबर दी कि केंद्रीय श्रम मंत्रालय चार विवादित श्रम संहिताओं को पेश करने पर विचार कर रहा है। इसमें से दो को अगले वित्तवर्ष में लाया जा सकता है। 

संहिताओं पर चल रही बातचीत से परिचित एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया है कि यहां कोशिश है कि एक साल से जिन संहिताओं को पेश नहीं किया जा सका है, अब उनपर आगे बढ़ा जाए। बता दें अभी इन संहिताओं पर विरोध के बीच विमर्श जारी है। मतलब अंतिम नतीजा आए बिना इन पर आगे बढ़ने का फ़ैसला किया जा रहा है। 

लेकिन इन संहिताओं पर हुई हालिया बातचीत से साफ़ होता है कि केंद्र सरकार 2020 में लाए गए मूल मसौदे से काफ़ी पलायन कर चुकी है। 2020 में संतोष गंगवार ने चारों संहिताओं को दिसंबर में एक साथ लागू करने की कोशिश की थी। यह संयोग है कि तबसे अब तक मंत्रालय इन्हें लागू करने की तीन अंतिम तारीख़ें- अप्रैल 2021, जुलाई-अगस्त 2021 और अक्टूबर 2021 को पार कर चुका है। 

आखिर इन चार संहिताओं को लागू करने से केंद्र सरकार क्यों रुकी? जबकि सरकार समर्थक इसे अब भी "ज़्यादा नौकरियां" पैदा करने और "व्यापार को आसान करने" के लिए "जरूरी सुधार" मान रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसा कर श्रम कानून में उल्लेखित प्रतिबंधों को ढीला किया जा सकेगा। अगर सरकार की सोच में कुछ बदलाव आया है, तो इसका केंद्रीय मज़दूर संगठनों के लिए क्या मतलब है, जो लगातार केंद्रीय श्रम कानूनों का इन संहिताओं में विलय का विरोध कर रहे हैं।

श्रम संहिताओं पर मौजूदा स्थिति

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा "सुधार" कहे जाने वाली चार में से तीन श्रम संहिताओं- "औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता" को सितंबर 2020 में बिना ऊचित विमर्श के पारित किया गया था। एक अन्य संहिता, भत्ता संहिता को 2019 में पारित किया गया था। कुल मिलाकर यह सभी संहिताएं, 29 केंद्रीय श्रम अधिनियमों का अपने भीतर विलय करेंगी।  एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले महीने तक जब भत्तों पर संहिता को संसद से मान्यता मिलने के 28 महीने से ज़्यादा बीत चुके हैं, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध व व्यावसायिक सुरक्षा संहिता को पारित हुए 15 महीने बीत चुके हैं, तब भी देश में इन संहिताओं को संसूचित करने के लिए राज्यों ने अब तक मसौदे के नियम नहीं बनाए हैं। 

ऐसा इसलिए है क्योंकि श्रम कानून भारतीय संविधान की समवर्ती सूची के अंतर्गत आता है। इसलिए यह अनिवार्यता हो जाती है कि किसी केंद्रीय विधेयक को लागू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें नियम बनाएं।

वहीं केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, 15 दिसंबर तक 24 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश भत्ता संहिता के लिए नियमों का मसौदा तैयार कर चुके थे, लेकिन इनमें से सिर्फ़ 13 ने ही व्यावसायिक सुरक्षा संहिता पर नियम तैयार किए हैं। इसी तरह औद्योगिक संबंध संहिता के लिए 20 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों ने नियमों का मसौदा बनाया है, जबकि सामाजिक सुरक्षा संहिता के लिए 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने नियमों का मसौदा तैयार किया है।

क्यों आगे नहीं बढ़ पा रही है केंद्र सरकार?

प्राथमिक तौर पर ऐसा लगता है कि श्रम संहिताओं को लागू किए जाने में राज्य सरकारों के स्तर पर बाधा आ रही है, जो संहिता पर नियम बनाने में काफ़ी वक्त ले रही हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जानबूझकर इन संहिताओं को लागू करने में देर की गई थी। ताकि पिछले साल के विधानसभा चुनावों में संभावित व्यापक नुकसान से बचा जा सकता। आने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भी यह बात लागू होती है।  

ऐसा क्यों है इसे समझने के लिए हम कामग़ार वर्ग के लिए तैयार की गई चारों संहिताओं पर नज़र डालते हैं। 

औद्योगिक संबंध संहिता, औद्योगिक विवाद, मज़दूर संघों, छंटनी से जुड़े मामलों के संबंध में है। यह प्रस्तावित करती है कि 300 कामग़ारों तक श्रमशक्ति रखने वाली कंपनियों को "स्टेंडिंग ऑर्डर" रखने की बाध्यता खत्म होनी चाहिए। यह एक कानूनी अनिवार्यता वाला दस्तावेज़ है, जिसमें किसी सेवा की शर्तें व नियम होते हैं, फिलहाल 100 या इससे ज़्यादा कामग़ारों को रखने वाली कंपनी के लिए यह बनाना जरूरी होता है। 

इसी तरह व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति संहिता कामग़ारों की सुरक्षा व कल्याण और उनके काम की जगह से जुड़े मुद्दों पर बात करती है। यह संहिता राज्य सरकारों को यह ताकत देती है कि अगर उन्हें स्थितियां "सही लगती" हैं तो वे "जनहित में आर्थिक गतिविधियां और रोज़गार के मौके बढ़ाने के लिए नई फैक्ट्रियों को किसी भी प्रावधान के पालन से छूट दे सकती हैं।"

संगठनों के एक समूह के मुताबिक़, सामाजिक सुरक्षा संहिता सामाजिक सुरक्षा को एक अधिकार के तौर पर पेश करने में नाकाम रहता है, यह योजनाओं को लागू करने के लिए अंतिम तारीख़ का जिक्र नहीं करता। विश्लेषकों का कहना है कि भत्ता संहिता के बारे में भी सबकुछ ठीक नहीं है। 

इसलिए ऐसे मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए पिछले साल एक अर्थशास्त्री ने लिखा था, "अगर इन चार श्रमिक विरोधी संहिताओं को आने वाले विधानसभा चुनावों के पहले लागू किया गया, तो इसके गंभीर राजनीतिक परिणाम होंगे।" एक और मीडिया रिपोर्ट कहती है कि महामारी के चलते आई आर्थिक मुश्किलों ने केंद्र सरकार को आगे ना बढ़ने पर मजबूर किया है। 

मज़दूर संगठनों ने भी किया एकजुट विरोध

इसके अलावा, जहां तक श्रम संहिताओं को लागू करने की बात है, तो यह भी केंद्र सरकार के लिए एक और चुनौती होगी। इसका कारण हाल में किसान आंदोलन को मिली “भारी जीत” है, जिसके बाद मज़दूर संगठनों के आंदोलन को एक तरह से बल मिला है। पिछले साल की शुरुआत में जिन कृषि कानूनों को परित किया गया था, सरकार को उन्हें निरस्त करना पड़ा है।

कई सालों से संघर्ष कर रहे देश कामग़ार वर्ग के प्रतिनिधियों का तर्क है कि श्रम कानूनों के संहिताकरण की प्रक्रिया नियोक्ताओं के पक्ष में जाएगी।

इसी को लेकर 10 केंद्रीय श्रम संगठनों ने 23 और 24 फरवरी को दो दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया था, जिसे अब आगे बढ़ाते हुए 28-29 मार्च, 2022 कर दिया गया है। 28 जनवरी को केंद्रीय श्रम संगठनों के राष्ट्रीय मंच की ऑनलाइन हुई बैठक में कोविड प्रभाव और पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र इस हड़ताल को टालने का सर्वसम्मति से फैसला हुआ।

हालांकि इस महीने की शुरुआत में किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने भी अपना समर्थन इन ट्रेड यूनियनों को दिया है। एक "साझा दुश्मन" के खिलाफ़ "एकजुट" लड़ाई का विचार रखने वाले मज़दूर संघों को श्रम संहिताओं के खिलाफ़ सतत संघर्ष की उम्मीद है। हाल में पहली अखिल भारतीय हड़ताल की 40वीं बरसी मनाई गई। इस तरह के कार्यक्रमों से भी साझा एकता का पता चलता है। 

इसलिए अगर लगातार चुनौतियों का सामना करने के बाद केंद्र सरकार अपनी मूल स्थिति से पलायन कर इन श्रम संहिताओं को स्तरीकृत ढंग से ला रही है, तो इसका मज़दूर संघों के लिए ज़्यादा मायने नहीं है। क्योंकि मज़दूर संगठनों की मांग है कि इन श्रम संहिताओं को पूरी तरह खत्म किया जाए। 

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें:-

Explained: Labour Codes, its Phased Introduction, and Upcoming General Strike

Labour Codes
Industrial Relations Code
Code on Social Security
Occupational Safety Health and Working Conditions Code
Code on Wages
Central Trade Unions
general strike
Union Labour Ministry
Narendra modi

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • kisan andolan
    न्यूज़क्लिक टीम
    ग्राउंड रिपोर्ट: किसानों ने Mr. PM को पढ़ाया संविधान का पाठ
    26 Nov 2021
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने दिल्ली की सरहद टिकरी बॉर्डर पर बैठीं किसान औरतों और मर्दों के साथ-साथ नेताओं से बात करके यह जानने की कोशिश की कि आखिर मोदी की घोषणा पर उन्हें क्यो नहीं…
  • sex ratio
    अजय कुमार
    1000 मर्दों पर 1020 औरतों से जुड़ी ख़ुशी की ख़बरें सच की पूंछ पकड़कर झूठ का प्रसार करने जैसी हैं!
    26 Nov 2021
    औरतों की संख्या मर्दों से ज़्यादा है - यह बात NFHS से नहीं बल्कि जनगणना से पता चलेगी।
  • up police
    विजय विनीत
    जंगलराज: प्रयागराज के गोहरी गांव में दलित परिवार के चार लोगों की नृशंस हत्या
    26 Nov 2021
    दलित उत्पीड़न में यूपी, देश में अव्वल होता जा रहा है और इस सरकार में दलितों व कमजोरों को न्याय मिलना दूर की कौड़ी हो गया है। यदि प्रयागराज पुलिस ने दलित परिवार की शिकायत पर कार्रवाई की होती और सवर्ण…
  • kisan andolan
    मुकुंद झा
    किसान आंदोलन के एक साल बाद भी नहीं थके किसान, वही ऊर्जा और हौसले बरक़रार 
    26 Nov 2021
    26 नवंबर 2020 को दिल्ली की सीमाओं से शुरू हुए किसान आंदोलन के एक साल पूरे होने पर टिकरी, सिंघू और ग़ाज़ीपुर बॉर्डर हज़ारों की संख्या में किसान पहुंचे और आंदोलन को अन्य मांगों के साथ जारी रखने का अहम…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    उत्तर प्रदेश में तेज़ी पर बीजेपी का साम्प्रदायिक खेल
    26 Nov 2021
    बोल' के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा, उत्तर प्रदेश चुनाव के आने पर बीजेपी नेताओं के साम्प्रदायिक भाषणों पर चर्चा कर रहे हैं.
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License