NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
लखीमपुर हत्याकांडः भारतीय मीडिया के पतन की वही पुरानी कहानी!
मीडिया की इस दशा को समझना आसान नहीं है। यह सिर्फ व्यावासायिक हितों की बात नहीं है। इसमें सांप्रदायीकरण की भूमिका भी एक सीमा तक ही है। असल में, मुख्यधारा का मीडिया लोकतंत्र विरोधी शक्ति में तब्दील हो चुका है। इसकी बनावट अब इसे किसी प्रगतिशील व्यवहार की इजाज़त नहीं देती है।
अनिल सिन्हा
09 Oct 2021
Lakhimpur Massacre
मीडिया की पथराव की कहानी के विपरीत भाजपा नेताओं की गाड़ी को सुरक्षा के साथ निकलवाते हुए किसान। स्क्रीन शॉट

लखीमपुर खीरी की घटना ने भारत की मुख्यधारा की मीडिया के चेहरे पर एक बार फिर तेज रोशनी डाल दी है। अगर वैकल्पिक मीडिया तथा सोशल मीडिया ने खबरों पर इसका एकाधिकार खत्म नहीं कर दिया होता तो वह जानकारियों को दबाने या  तोड़ने--मरोड़ने में पहले की तरह ही सफल हो जाता। इस कांड के उसके कवरेज ने यही साबित किया है कि मुख्यधारा का मीडिया विश्वसनीयता के संकट से बाहर आने का कोई इरादा नहीं रखता है और अपनी बीमारियों से लड़ने की क्षमता खो चुका है। 

मीडिया की इस दशा को समझना आसान नहीं है। यह सिर्फ व्यावासायिक हितों की बात नहीं है। इसमें सांप्रदायीकरण की भूमिका भी एक सीमा तक ही है। असल में, मुख्यधारा का मीडिया लोकतंत्र विरोधी शक्ति में तब्दील हो चुका है। इसकी बनावट अब इसे किसी प्रगतिशील व्यवहार की इजाजत नहीं देती है।

लखीमपुर हत्याकांड के कवरेज की शुरूआत उसी जाने-पहचाने तरीके से हुई थी जिसका इस्तेमाल हाथरस या  उन्नाव कांड जैसी घटनओं के समय किया गया था। पीड़ित पक्ष को ही अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराने का तरीका। उसकी बात को संदर्भ से काट कर पेश करने का तरीका। इसमें भी ऐसा ही किया गया। मीडिया ने घटना के लिए ‘‘उपद्रवी’’ किसानों को जिम्मेदार ठहराया और यह कहानी ठीक-ठाक आकार भी ले चुकी थी। इस कहानी के अनुसार किसानों के उपद्रव के कारण अफरातफरी मची और कुछ लोग मारे गए। सीधी और सरल दीखने वाली इस कहानी में मंत्री का बेटा ही पीड़ित नजर आता है क्योंकि उसके काफिले पर हमला होता है और लोग अनियंत्रित गाड़ियों की चपेट में आ जाते हैं। आगे भी किसान ही हमलावर हैं और मंत्री के बेटे को ही इसका परिणाम भुगतना होता है। किसान गाडियां जलाते हैं और भाजपा समर्थकों को मार डालते हैं। कहानी को नैतिक आधार देने के लिए खालिस्तानी तत्वों के घुस आने या उपद्रव करने वाले किसान है ही नहीं वाली भाजपा प्रवक्ताओं की नैरेटिव। 

अभी तक लोग तस्वीरों को जोड़ कर किसी घटना की तह में पहुंचते थे। यही रचनात्मकता का तकाजा है। लेकिन मीडिया ने ठीक उलटा किया। उसने तस्वीर के टुकड़े कर दिए और इन टुकड़ों को तय पटकथा के हिसाब से जोड़ दिया। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों ने खबरों को टुकड़े किए। तस्वीर की उतना ही हिस्सा सामने आया जितना किसानों को उपद्रवी बताने के लिए जरूरी था। बाद में, किसी पत्रकार ने ही तस्वीर के लापता टुकड़े को सोशल मीडिया तक पहुंचा दिया और सच्ची कहानी बाहर आ गई। यह शांति से लौट रहे किसानों पर मंत्री के बेटे की गाड़ी से रौंदने की वीडियो क्लिप थी। अभी तक यह सामने नहीं आया है कि खबर को सही रास्ते पर लाने वाली इस वीडियो क्लिप को जारी करने वाला शख्स कौन है। इतना बड़ा साहस किसने दिखाया है?

एक बड़े अखबार के उत्तर प्रदेश संस्करण में छपी खबर से पता चलता है कि कई पत्रकारों ने पूरी घटना को कवर किया था, लेकिन डर के मारे वे उसे प्रसारित नहीं कर पाए। वीडियो के टुकड़े आते रहेंगे तो सच के और भी आयाम सामने आएंगे। लेकिन इनके प्रसारण को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस वीडियो जारी करने वालों पर कार्रवाई करने की खुली चेतावनी दे चुकी है। 

साल 1988 में प्रसिद्ध चिंतक नोम चोम्स्की ने अपनी किताब ‘मैन्युफैक्जरिंग ऑफ कंसेंट’ (कृत्रिम जनमत तैयार करना) में अमेरिकी मीडिया की पोल खोली है। लेकिन उनका विश्लेषण पूरी दुनिया के मीडिया पर लागू होता है। उन्होंने बताया है कि किस तरह वहां का मीडिया कारपोरेट के वैश्विक हितों और अमेरिकी सेना के लक्ष्यों के पक्ष में काम करता है। वह बताते हैं कि इसके काफी पहले भी मीडिया का इस्तेमाल अमीरों तथा ताकतवर लोगों के पक्ष में करने के लिए ब्रिटेन में मजदूरों और सामान्य लोगों की आवाज उठाने वालें अखबारों पर आर्थिक दंड लगा दिया जाता था। उसे नियंत्रण करने की इस कोशिश में सफलता नहीं मिली तो उन्नीसवीं सदी के मध्य में वि़ज्ञापन शुरू किए गए। इसने तस्वीर ही बदल दी। उद्योगपतियों तथा सरकार के पक्ष में काम करने वाले अखबार विज्ञापन की कमाई के कारण सस्ते में बिकने लगे। विज्ञापन नहीं मिलने के कारण जनता के अखबार महंगे थे और वे आर्थिक दौड़ में पूंजीपतियों के अखबारों से पीछे हो गए और अंत में बंद हो गए। 

नोम चोम्स्की बताते हैं कि विज्ञापन के अलावा सरकार तथा सेना की ओर से मुफ्त खबरें आ जाती हैं। इससे अखबारों को बिना पैसा खर्च किए तैयार खबरें मिल जाती हैं। इससे उनका खर्च और भी कम हो जाता है। यह कॉरपोरेट के नियंत्रण को भी आसान बनाता है। चोम्स्की ने लिखा है कि वैसे विशेषज्ञ चर्चा में बुलाए जाते हैं जो सरकार के पक्ष में तर्क रख सकें। भारत के चैनलों ने तो इसमें महारत हासिल कर ली है क्योंकि एंकर सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में इसके प्रवक्ताओं के मुकाबले ज्यादा जोर से बोलता है।

चोम्स्की बताते हैं कि मीडिया ने कम्युनिज्म के विरोध में माहौल तैयार किया। इससे अमीरों तथा ताकतवर लोगों के पक्ष में नीतियां बनाने में मदद मिली। चोम्स्की की नजर में यह वैचारिक नियंत्रण का ही एक तरीका है। अपने देश में भी ठीक इसी तरह ‘‘लुटियंस’’,  ‘‘सिकुलर’’ और ‘‘वामी’’ जैसे विशेषणों के जरिए लोकतंत्र और सेकुलरिज्म के पक्ष में लिखने-बोलने वाले पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के खिलाफ माहौल बनाया गया है। हांलांकि इसमें एक फर्क है कि कम्युनिज्म के मुखालफत करने वालों ने लोकतंत्र की मजबूती से वकालत की। यहां ठीक उलटा चल रहा है कि लोकतंत्र के खिलाफ तानाशाही की वकालत की जा रही है।

अमेरिकी मीडिया वहां के राष्ट्रवाद का पक्ष  लेता है। वह वैश्विक स्तर पर अपने मुल्क के आर्थिक तथा सैन्य हितों की रक्षा के लिए काम करता है। साथ ही साथ वह आम नागरिकों के हित में भी खड़ा रहता है। यही उसकी विश्वसनीयता का राज है। भारत के मीडिया की प्रतिबद्धता सिर्फ सत्ता के साथ है और यह उसकी देश के खिलाफ जाने वाली नीतियों के पक्ष में ही काम करता है।

लखीमपुर खीरी हत्याकांड में मीडिया पर नियंत्रण के वे सारे तरीके अमल में आते दिखाई देते हैं जिसकी चर्चा चोम्स्की ने की है। ये सारे तरीके अपने नग्न रूप में दिखाई देते हैं। लेकिन नियंत्रण का स्वरूप कई मायनों में अलग है। यहां कॉरपोरेट की जगह विज्ञापन सरकार की ओर से आते हैं। यानी जनता के पैसों का इस्तेमाल उसके ही अधिकारों को कुचलने के लिए किया जाता है। लखीमपुर खीरी कांड के समय भी अखबारो में उत्तर प्रदेश सरकार के विज्ञापन, तेजी से आ रहे थे। इसके साथ प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों की खबरें, एयर शो जैसी तैयार खबरें आ रही थी। मीडिया चैनल नारकोट्क्सि ब्यूरो की ओर से आर्यन खान की गिरफ्तारी की खबरों को प्रमुखता दे रहे थे। श्रीनगर में कश्मीरी पंडित दवा विक्रेता की हत्या की खबर आते ही मीडिया भावुक हो गया क्योंकि हिदू-मुस्लिम टकराव को हवा देने का एक बडा मौका उसके हाथ आ गया था। सच्चाई यह है कि कश्मीर में हो रही हत्याओं के शिकार मुसलमान भी हैं। लेकिन मीडिया ने कश्मीर की खबरेां को संपादित कर दिया है और यह तथ्य पीछे चला गया है कि पिछले सप्ताह तीन हिंदुओं के अलावा दो मुसलमान भी आतंकवादियों का निशाना बने हैं। 

भारतीय मीडिया और अमेरिकी मीडिया में बुनियादी फर्क है कि वहां का मीडिया नागरिकों के खिलाफ नहीं खड़ा हो सकता है। यहां ठीक इसका उलटा है। वहां का मीडिया नस्लवाद के विरोध में खड़ा है। वह औरतों की आजादी, अल्पसंख्यकों के अधिकारों, नागरिको के लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में खड़ा होता है। भारतीय मीडिया इनके खिलाफ खड़ा रहता है।

लखीमपुर खीरी हत्याकांड में मुख्यधारा का मीडिया लोकतंत्र के विरोध में पुराने अंदाज में खड़ा हो गया और हत्याकांड को लेकर विप़़क्ष की प्रतिक्रिया को हत्या पर राजनीति  का आरोप मढ़ने लगा। यही आरोप भाजपा भी लगा रही है। मारे गए किसानों को मुआवजा दिलाने तथा प्राथमिकी दर्ज कराने को लेकर सरकार के साथ किसान नेता राकेश टिकैत के समझौते पर भी सवाल उठाने लगा। एक सीमित उद्देश्यों से किए गए समझौते को किसानों और सरकार के बीच समझौता बताने लगा। लेकिन उसकी नजर में यह बात नहीं आई कि संयुक्त किसान मोर्चा का नेतृत्व विस्फोटक स्थिति पर काबू पाने में सफल रहा। दस महीनों से चल रहे इस आंदोलन को हिंसा की ओर जाने से रोक लिया।

मीडिया ने सभी असुविधजनक सवाल नजरअंदाज कर दिए। उसने नहीं पूछा कि अजय मिश्र के केंद्रीय गुह राज्य मंत्री के पद पर बने रहने के बाद निष्पक्ष जांच कैसे हो सकती है?

लखीमपुर खीरी हत्याकांड में भारतीय मीडिया  ने अपने पतन की कहानी फिर से दोहराई।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Lakhimpur Kheri
Lakhimpur massacre
kisan andolan
Mainstream Media
Media
Godi Media

Related Stories

डिजीपब पत्रकार और फ़ैक्ट चेकर ज़ुबैर के साथ आया, यूपी पुलिस की FIR की निंदा

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

आर्यन खान मामले में मीडिया ट्रायल का ज़िम्मेदार कौन?

विशेष: कौन लौटाएगा अब्दुल सुब्हान के आठ साल, कौन लौटाएगा वो पहली सी ज़िंदगी

ज़ोरों से हांफ रहा है भारतीय मीडिया। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पहुंचा 150वें नंबर पर

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

धनकुबेरों के हाथों में अख़बार और टीवी चैनल, वैकल्पिक मीडिया का गला घोंटती सरकार! 

केवल विरोध करना ही काफ़ी नहीं, हमें निर्माण भी करना होगा: कोर्बिन

लखीमपुर खीरी हत्याकांड: आशीष मिश्रा के साथियों की ज़मानत ख़ारिज, मंत्री टेनी के आचरण पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़


बाकी खबरें

  • Sweeping top court judgment endangers Thailand’s pro-democracy protests
    पीपल्स डिस्पैच
    शीर्ष कोर्ट के फ़ैसले से ख़तरे में आए थाईलैंड के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन
    13 Nov 2021
    तीन सामाजिक कार्यकर्ताओं की सुनवाई के दौरान संवैधानिक कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि राजशाही में सुधार की मांग, राजशाही को उखाड़ फेंकने की मांग की तरह है। सामाजिक कार्यकर्ताओं को डर है कि चान-ओ-चा…
  • MNREGA
    अजय कुमार
    मोदी सरकार जब मनरेगा में काम दिलवाने में नाकाम है, तो रोज़गार कैसे देगी?
    13 Nov 2021
    मनरेगा की योजना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खिल्ली उड़ाते हैं। लेकिन उनके काल में भारत की अर्थव्यवस्था की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि मनरेगा का बजट साल खत्म होने से पहले ही खत्म हो जा रहा है।
  • altaf
    अनिल सिन्हा
    उत्तर प्रदेश: क्या योगी आदित्यनाथ अल्ताफ़ को न्याय देंगे?
    13 Nov 2021
    हम अल्ताफ़ की मौत की तुलना पुलिस हिरासत में अक्सर होने वाली मौतों के साथ नहीं कर सकते हैं।
  • cop 26
    बी. सिवरामन
    काॅप 26 और काॅरपोरेट
    13 Nov 2021
    वैश्विक काॅरपोरेट घरानों के लिए कार्बन नियंत्रण के कोई लक्ष्य नहीं तय किये गए हैं, क्योंकि यह मुद्दा काॅप 26 के ऐजेन्डे में आया ही नहीं।
  • poisonous liquor
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार: "ज़हरीली शराब का तांडव जारी, सरकार कर रही केवल बयानबाजी"
    13 Nov 2021
    माले राज्य सचिव कुणाल ने कहा कि मुजफ्फरपुर के कांटी प्रखंड के श्रीसिया व बरियारपुर गांव में जहरीली शराब से कल अबतक 6 लोगों की मौत के साथ यह आंकड़ा 62 पहुंच गया है। हकीकत में मरने वालों की संख्या कहीं…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License