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किसान आंदोलन का सबक़ : लहरें नहीं मानतीं शाही हुक्मनामों को
समुद्र की लहर किसी भी शाही हुक्मनामे से ज्यादा ताक़तवर होती है। इस सहज सी सच्चाई को समझाना उस समय का विवेक था। हमारे समय का विवेक आज कह रहा है कि किसानों का उमड़ा सैलाब संसद द्वारा पास किसी भी कानून से ज्यादा ताक़तवर है।
अमित भादुड़ी
05 Jan 2021
Translated by फ़िलहाल
किसान आंदोलन का सबक़

उसे हर उस चीज का बादशाह माना जाता था जिस पर उसकी नजर जाती थी। सो उस सर्वशक्तिमान बादशाह केन्यूट [994-1035] ने उमड़ती आ रही लहरों को हुक्म दिया कि वे पीछे लौट जाएं और उसके राजसी चरणों और लिबास को गीला न करें। लेकिन बादशाह की दैविक शक्ति के बावजूद समुद्र की लहरों ने उसका हुक्म नहीं माना। मारे शर्मिंदगी के बादशाह के दरबारियों के सर झुके के झुके रहे। यह कथा आज तक चली आ रही है तो इसलिए कि यह जी-हुजूरी से पैदा सत्ता के अहंकार को सच का आईना दिखाती है। उसे उसकी औकात बताती है।

आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता को दैविक शक्ति नहीं प्रदान करतीं। लेकिन यह उसे तानाशाह नहीं तो निरंकुश बनने का मौका जरूर देती हैं। वह संसद द्वारा पास किए गए कानूनों के जरिए लोकतांत्रिक ढंग से राज करता है। और आजकल तो महामारी की आड़ में दुनिया के कई देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में निरंकुश प्रवृत्तियां बड़ी आसानी से और बड़ी तेजी से उभर रही हैं। हो सकता है यह विपक्ष से खाली संसद के रूप में दिखे, या फिर स्वास्थ्य आपातकाल के नाम पर निलंबित संसद के रूप में नजर आए। या फिर यह भी हो सकता है कि यह संसद में हासिल प्रचंड बहुमत की मदहोशी में बनी आदत हो जो अगले चुनावों तक जारी रहे। अगर अगले चुनाव हुए भी तो।

अब यह बात इतिहास में दर्ज हो चुकी है कि भारतीय संसद ने हाल ही में तीन कृषि कानून पास किए जिसके बाद किसानों का प्रतिरोध आंदोलन उमड़ पड़ा है। इनमें ज्यादातर किसान पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं और देश के कई इलाकों से किसान इसमें शामिल हो रहे हैं। वे चाहते हैं कि इन तीन कानूनों को रद्द किया जाए। इसकी जगह वे तमाम प्रमुख फ़सलों की सरकारी खरीद के लिए विवेकसम्मत न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था की लिखित कानूनी गारंटी चाहते हैं न कि महज अलिखित मौखिक आश्वासन। सरकार इसके लिए तैयार नहीं है।

प्रतिरोध की उफनती आ रही लहर लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए महानेता के सिंहासन तक पहुंचने और उसके दिव्य चरणों और चमकते लिबास को भिगोने ही वाली थी कि उसे सत्ता की पूरी ताकत झोंक कर रोक दिया गया। आक्रोशित किसानों ने नहीं खुद सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर खंदकें खोद कर मोर्चाबंदी कर ली और किसानों पर पानी की तोपों से हमला किया। फिर भी प्रतिरोध की लहर थम न सकी। उल्टा वह और जोर पकड़ती गई और किसानों ने राजधानी की सीमा पर कुछ प्रवेश मार्गों पर शांति के साथ डेरा डाल दिया। प्रतिरोध दिन ब दिन और पुरजोर और विशाल होता जा रहा है और भारत के दूरदराज के इलाकों में भी फैलता जा रहा है।

महानेता फरमाते हैं कि लोग उन्हें गलत समझ रहे हैं। वे कहते फिर रहे हैं कि इन कानूनों का मकसद तो किसानों को खुशहाल बनाना और साल दो साल में ही उनकी आमदनी दोगुना करना है। किसानों को बस उनकी बात मान कर इन पर अमल करने की जरूरत है। महानेता के दरबारी और भक्त सलाहकार भी बाजार के चमत्कार में यकीन रखते हैं। उन्हें लगता है कि इस चमत्कार के साकार होने में अगर कोई अड़चन है तो वह है न्यूनतम समर्थन मूल्य। मुक्त बाजार ही किसान को खुशहाल बना सकता है। और यही इन तीन कृषि कानूनों का मकसद है। वे मुक्त बाजार तैयार करेंगे।

लेकिन किसानों को मालूम है कि यह ऐसा मुक्त बाजार होगा जिसमें खरबपति अंबानी की टीम खेतिहर पैदावारों की अपनी खुदरा दुकानें ताबड़तोड़ बढ़ाने में लगी होगी। दूसरी ओर खरबपति अडानी के लोग उन बड़े बड़े गोदामों को भरने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे जो उन्होंने पहले ही से तैयार कर लिए हैं। और वही तय करेंगे कि किसानों को क्या कीमत देनी है। ज्यादातर किसान तो दो तीन एकड़ जमीन के मालिक हैं। सो वे किसी भी हाल में अंबानियों और अडानियों से मोलभाव करने की हालत में नहीं होंगे।

और अगर कोई विवाद होता है तो इसका फैसला अदालत नहीं बल्कि केंद्र सरकार ही करेगी जिसने ही इन कानूनों को बनाया है। खेत जमीन होती है राज्यों की भौगोलिक सीमा के भीतर। लेकिन वहां की सरकारें भी कुछ नहीं कर सकेंगी। इस तरह कानून बनाने वाली केंद्र सरकार ही उसे लागू भी करेगी और विवादों का निपटारा भी करेगी। इस तरह संघीय लोकतांत्रिक ढांचे की संविधानिक व्यवस्था के अनुरूप शक्तियों और अख्तियार के बंटवारे के बजाय सारी शक्ति और सारे अख्तियार केंद्र सरकार की मुट्ठी में होंगे।

किसान यह सब समझ रहे हैं। इसलिए वे कह रहे हैं कि उन्हें ऐसा कानून हरगिज नहीं चाहिए। लेकिन महानेता अपनी दिव्य वाणी में बार बार रोज ब रोज फरमा रहे हैं कि उन्हें गलत समझा जा रहा है। किसानों को गलतफहमी में डाला जा रहा है। महानेता के दरबारी और भाड़े के विद्वान भी बड़े जोशो खरोश से भक्त मीडिया के सहारे प्रचार कर रहे हैं कि महानेता को वास्तव में किसान गलत समझ रहे हैं। और इसकी वजह पाकिस्तान, खालिस्तान, माओवादी और अरबन नक्सल और उनके साथ मिले हुए विपक्षी दल भी हो सकते हैं जिनमें पहले से ही बड़े खतरनाक अलगाववादी तत्व भरे पड़े हैं। वे सब के सब मिलकर भोले भाले किसानों को बहका रहे हैं। उन्हें गुमराह कर रहे हैं।

यह सब पहली बार नहीं हो रहा है। मुसलमान सीएए को लेकर गलतफहमी में रहे। कश्मीरियों ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने की खूबसूरती को नहीं पहचाना। व्यापारियों ने ऐसा जताया मानो वे जीएसटी के फायदों को नहीं समझ रहे हैं। किसी तरह अपने जीने भर लायक कमाई कर रहे गरीब मजलूमों ने नहीं समझ कि नोटबंदी तो उन्हीं के हक में थी। इसी तरह प्रवासी मजदूर अचानक थोपे गए लॉकडाउन की अहमियत नहीं समझ सके। वे समझ ही नहीं सके कि कोरोना को मारने के लिए यह कितना जरूरी था और इसलिए उनकी रोजीरोटी का मारा जाना तो बड़ी मामूली सी कुर्बानी थी इस परम पुनीत राष्ट्रधर्म में। इन तमाम गलतफहमियों के बावजूद महानेता देश को हर लिहाज से महान बनाने के अपने महाअभियान में दिनरात चौबीसों घंटे लगे हैं।

महानेता को तो वही समझ सकते हैं जो सच्चे देशभक्त हैं। देशद्रोही तो उनका विरोध करेंगे ही। 'टुकड़े टुकड़े गैंग' के लोग तो उनकी आलोचना करेंगे ही क्योंकि वे तो चाहते ही हैं फिर से अपने पुरातन गौरव की ओर लौट रहे हिंदू राष्ट्र को टुकड़े टुकड़े करना। ऐसे तत्व तो दरअसल इस देश के हैं ही नहीं। उन्हें तो यहां की महान संस्कृति और इसकी महान वैज्ञानिक परंपरा से कोई वास्ता ही नहीं है जिसमें प्लास्टिक सर्जरी के जरिए भगवान गणेश के कटे सिर की जगह हाथी का सिर जोड़ दिया गया था और जहां ऋषियों और महर्षियों ने प्राचीन जमाने में ही यह जान लिया था कि ताली थाली बजा कर और दिए और मोमबत्ती जला कर किसी भी महामारी का खात्मा चंद रोज में ही किया जा सकता है।

हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि उनके तमाम दरबारी, उनके तमाम मंत्री, उनके विशेषज्ञ सलाहकार और भक्त मीडिया वाकई में ऐसा मानती है। लेकिन उनके असहमत होने का कोई भी लक्षण दिख तो नहीं रहा। जी-हुजूरी न कि समझदारी, वफादारी न कि सवाल करना, समर्पण न कि असहमति ही आज उस खेल का पर्याय बन गए हैं जो आज इस राजनीति में खेला जा रहा है।

वाइकिंग के राजा केन्यूट का स्केंडेनीविया के बड़े हिस्से पर राज था और उसने ताकत के जोर पर ब्रिटेन को भी फतह कर लिया था। ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि वास्तव में वह एक बुद्धिमान राजा था। कम से कम इतना बुद्धिमान तो था ही कि वह समझता था कि वास्तव में राजा के पास कोई दैविक शक्ति नहीं होती। वह समझता था कि लहरों का उफान किसी भी राजसी हुक्मनामे से भी ज्यादा ताकतवर ताकतों से संचालित होता है। और वास्तव में उस रोज उसका सिंहासन समुद्र के किनारे रखा ही इसलिए गया था कि उसकी बुद्धिमानी को सभी लोग देख सकें। वह समझता था कि उसके दरबारियों द्वारा जानबूझ कर की जा रही जी-हुजूरी सहज बोध पर भी पर्दा डाल देती है। समुद्र के किनारे का यह प्रकरण उसका सरल सा लेकिन शक्तिशाली तरीका था अपने 'मन की बात' का इजहार अपने दरबारियों और अपनी प्रजा के सामने करने का। यही वजह है कि यह प्रकरण आज आज हजार साल बाद भी इतिहास में दर्ज है और लोककथा बन चुका है।

समुद्र की लहर किसी भी शाही हुक्मनामे से ज्यादा ताकतवर होती है। इस सहज सी सच्चाई को समझाना उस समय का विवेक था। हमारे समय का विवेक आज कह रहा है कि किसानों का उमड़ा सैलाब संसद द्वारा पास किसी भी कानून से ज्यादा ताकतवर है। लेकिन क्या हमारे समय और हमारे देश में आज इतना विवेक है कि इस सच को गरिमा के साथ स्वीकार किया जा सके?

 (लेखक अमित भादुड़ी एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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