NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आधी आबादी
महिलाएं
तमिलनाडु: महिलाओं के लिए बनाई जा रही नीति पर चर्चा नाकाफ़ी
मसौदा नीति में बढ़ते लिंगानुपात को संबोधित किये जाने की आवश्यकता सहित घरेलू कार्यों में लैंगिक विषमता को अनुमानित करने के लिए एक सर्वेक्षण करने, एकल महिला मुखिया एवं वंचित परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपायों सहित कई अन्य पहलुओं को शामिल किया गया है।
श्रुति एमडी
19 Jan 2022
women

तमिलनाडु में सामाजिक कल्याण एवं महिला सशक्तिकरण विभाग ने 15 दिसंबर को महिलाओं के लिए एक मसौदा नीति जारी की, जिसका उद्देश्य सभी विभागों के बीच में एक कार्य-संबंधी समरूपता संचालन में एकजुटता के जरिये राज्य की 3.2 करोड़ महिला आबादी के सशक्तिकरण के लिए एक सुरक्षित, भरोसेमंद, स्वास्थ्यकर एवं महत्वाकांक्षी वातावरण मुहैया कराना है।

मसौदा नीति में बढ़ते लिंगानुपात को संबोधित किये जाने की आवश्यकता सहित घरेलू कार्यों में लैंगिक विषमता को अनुमानित करने के लिए एक सर्वेक्षण करने, एकल महिला मुखिया परिवार एवं वंचित परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा उपायों, कामकाजी महिलाओं के लिए रजोनिवृति के दौरान अवकाश की व्यवस्था, एवं कई अन्य पहलुओं को शामिल किया गया है।

हालाँकि, मसौदे पर बेहद कम चर्चा हुई है और वह भी आंशिक तौर पर इसलिए हो पाई, क्योंकि दस्तावेज़ सिर्फ अंग्रेजी में उपलब्ध है। हालाँकि कार्यकर्ताओं की ओर से इसका तमिल में अनुवाद किये जाने एवं इसे वेबसाइट पर अपलोड किये जाने की मांग की गई थी, किंतु राज्य की ओर से इस बारे में कोई प्रयास नहीं किये। 

इसके अलावा, राय और सुझाव भेजने की अंतिम तारीख जो कि 31 जनवरी, 2022 है, भी खत्म होने जा रही है।

इससे पहले राज्य सरकार ने नवंबर 2021 में बच्चों के लिए राजकीय नीति जारी की थी। इन नीतियों पर काफी हद तक अच्छी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है, लेकिन मुख्य चिंता इन्हें किस हद तक और कितनी अच्छी तरह से क्रियान्वित किया जायेगा, इस बात को लेकर बनी हुई है। 

इसमें विश्व बैंक क्यों शामिल है?

महिलाओं के लिए तैयार की जा रही नीति की ड्राफ्टिंग में संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं घनिष्ठ रूप से शामिल थीं। विश्व बैंक एवं संयुक्त राष्ट्र महिला प्रतिनिधि भी राज्य योजना आयोग के सदस्यों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, निर्वाचित प्रतिनिधियों एवं अन्य के साथ आयोजित बैठकों का हिस्सा थे। 

ऐडवा (आल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन) नेता, यू वासुगी ने न्यूज़क्लिक को बताया, “उन्होंने उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) के एक सदस्य के तौर पर विश्व बैंक का उल्लेख किया है। हम समझते हैं कि सिर्फ सरकार और हितधारकों को ही इसका हिस्सा होना चाहिए। विश्व बैंक क्यों है और किस हैसियत से इसमें शामिल है, इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं है।”

नीतियों के क्रियान्वयन के काम की निगरानी के लिए एचएलसी का गठन किया गया है।

विश्व बैंक राज्य में अन्य नीतियों को तैयार करने में भी शामिल रहा है, विशेष तौर पर पुनर्वास एवं पुनःस्थापन पर हालिया नीति में, जिसकी शहर से गरीब परिवारों को बेदखल करने की कीमत पर व्यावसायिक विस्तार के लिए पक्षपोषण को लेकर बड़े पैमाने पर आलोचना की गई है। 

महिलाओं के लिए मसौदा नीति पर सीपीआई(एम) की राज्य कमेटी की प्रतिक्रिया में कहा गया है, “महिलाएं इस प्रकार की बेदखली की मुख्य शिकार रही हैं। उनकी सुरक्षा एवं आवास संबंधी जरूरतों को इस नीति का अभिन्न हिस्सा बनाये जाने की जरूरत है।”

कर्ज़ तक अधिक पहुंच की आवश्यकता  

मसौदा नीति में महिला बैंक की स्थापना के माध्यम से जरूरतमंद महिलाओं के लिए बेहतर संस्थागत ऋण तक पहुँच को बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया गया है।  

महिलाओं के द्वारा अपना घर को चलाने के लिए, शिक्षा एवं अन्य रोजमर्रा के उपभोग की जरूरतों को पूरा करने के लिए छोटे-मोटे कर्ज लेने की संस्कृति, विशेषकर सोने को गिरवी रखने का प्रचलन व्यापक रूप से मौजूद है। कोविड-19 महामारी के दौर में यह प्रवृति काफी बढ़ी है।

महिलाएं न सिर्फ बेरोजगारी और कम आय की वजह से बल्कि व्यापक पैमाने पर पियक्कड़पन की आदत के कारण भी कर्ज लेने के लिए बाध्य हैं, जिसके जरिये राज्य निगम टीएएसएमएसी पुरुषों की आय का एक बड़ा हिस्सा खुद हथिया लेता है। 

वासुगी का इस बारे में कहना था, “जब मामूली ब्याज दरों पर संस्थागत ऋण उपलब्ध नहीं होता है, तो महिलाओं को बेहद भारी ब्याज दरों पर माइक्रोफाइनेंस संस्थानों से संपर्क साधने के लिए मजबूर होना पड़ता है क्योंकि वहां से ऋण हासिल करना आसान है। किंतु एमएफआई की वसूली प्रकिया निहायत क्रूर है। यहाँ तक कि कोविड के दौरान भी जब आरबीआई ने लगातार इस बात को दुहराया कि ब्याज पर ब्याज नहीं वसूला जाना चाहिए और उसने वसूली पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा, इसके बावजूद एमएफआई गैर-क़ानूनी तरीकों को अपनाने से बाज नहीं आई...।” 

ऐडवा उन माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के खिलाफ कड़ी कार्यवाई की मांग करती रही है जिन्होंने उन महिलाओं को प्रताड़ित किया जो कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान कोई आय का सहारा न होने की वजह से ऋण चुकाने में असमर्थ थीं।

उन्होंने अपनी बात में आगे कहा, “इस संबंध में तमिलनाडु सरकार केरल के कुदुम्बश्री परियोजना से सीख सकती है।”

इस मसौदा नीति पर सीपीआई(एम) की प्रतिक्रिया में कहा गया है कि राज्य में शराब पीने की लत की समस्या पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। इसने नशे की लत को छुड़ाने के लिए उपचार केन्द्रों की आवश्यकता और शराब की दुकानों में धीरे-धीरे कमी लाने को शामिल करने वाली नीति बनाये जाने की मांग की है। 

बाज़ार के विफल होने की सूरत में राज्य को समर्थन देना चाहिए 

कोविड-19 से उपजी महामारी ने वंचितों के जीवन को बनाये रखने में मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की विफलता की पोल खोलकर रख दी है। लोग कहीं भूख से न मर जायें, इसे सुनिश्चित करने के लिए राज्य और नागरिक समाज संगठन बचाव कार्यों में आगे आये।

यदि सभी वर्गों में देखें तो महिलाएं सबसे अधिक शोषित और सामाजिक तौर पर सबसे अधिक उत्पीडित वर्गों का हिस्सा हैं, और महामारी एवं लॉकडाउन की वजह से सबसे अधिक प्रभावित रही हैं।

वासुगी के अनुसार, “जातिवाद, सांप्रदायिकता और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के संयोजन ने लैंगिकता पर एक घातक मिश्रण के बतौर कार्य किया है। हमें महिलाओं के लिए एक अलग से नीति की जरूरत है जिसमें वास्तविकता के इन सभी पहलुओं को शामिल किया जाये।”

उन्होंने आगे कहा, “हमें लगता है कि महिलाओं के उत्थान में निर्वाचित सरकार के पास एक ठोस भूमिका होती है। हर चीज को बाजार की सनक पर नहीं छोड़ा जा सकता। आज जब केंद्र सरकार अधिकाधिक रूप से कॉर्पोरेट समर्थित राह की दिशा में जा रही है, तो ऐसे में राज्य सरकारों को कम से कम अपनी भूमिका का निर्वहन तो करना ही चाहिए। इसे लिंग-संवदेनशील रुख के साथ-साथ धन के बंटवारे, बजटीय आवंटन, योजना इत्यादि के जरिये संभव किया जा सकता है।”

Women Rights
Tamilnadu
CPIM
AIDWA
World Bank

Related Stories

मायके और ससुराल दोनों घरों में महिलाओं को रहने का पूरा अधिकार

यूपी से लेकर बिहार तक महिलाओं के शोषण-उत्पीड़न की एक सी कहानी

सोनी सोरी और बेला भाटिया: संघर्ष-ग्रस्त बस्तर में आदिवासियों-महिलाओं के लिए मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली योद्धा

निर्भया फंड: प्राथमिकता में चूक या स्मृति में विचलन?

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: महिलाओं के संघर्ष और बेहतर कल की उम्मीद

बढ़ती लैंगिक असमानता के बीच एक और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

ईरान के नए जनसंख्या क़ानून पर क्यों हो रहा है विवाद, कैसे महिला अधिकारों को करेगा प्रभावित?

जेंडर बजट में कटौती, मोदी सरकार के ‘अमृतकाल’ में महिलाओं की नहीं कोई जगह

विशेष: लड़ेगी आधी आबादी, लड़ेंगे हम भारत के लोग!

राष्ट्रीय बालिका दिवस : लड़कियों को अब मिल रहे हैं अधिकार, पर क्या सशक्त हुईं बेटियां?


बाकी खबरें

  • अजय कुमार
    शहरों की बसावट पर सोचेंगे तो बुल्डोज़र सरकार की लोककल्याण विरोधी मंशा पर चलाने का मन करेगा!
    25 Apr 2022
    दिल्ली में 1797 अवैध कॉलोनियां हैं। इसमें सैनिक फार्म, छतरपुर, वसंत कुंज, सैदुलाजब जैसे 69 ऐसे इलाके भी हैं, जो अवैध हैं, जहां अच्छी खासी रसूखदार और अमीर लोगों की आबादी रहती है। क्या सरकार इन पर…
  • रश्मि सहगल
    RTI क़ानून, हिंदू-राष्ट्र और मनरेगा पर क्या कहती हैं अरुणा रॉय? 
    25 Apr 2022
    “मौजूदा सरकार संसद के ज़रिये ज़बरदस्त संशोधन करते हुए RTI क़ानून पर सीधा हमला करने में सफल रही है। इससे यह क़ानून कमज़ोर हुआ है।”
  • मुकुंद झा
    जहांगीरपुरी: दोनों समुदायों ने निकाली तिरंगा यात्रा, दिया शांति और सौहार्द का संदेश!
    25 Apr 2022
    “आज हम यही विश्वास पुनः दिलाने निकले हैं कि हम फिर से ईद और नवरात्रे, दीवाली, होली और मोहर्रम एक साथ मनाएंगे।"
  • रवि शंकर दुबे
    कांग्रेस और प्रशांत किशोर... क्या सोचते हैं राजनीति के जानकार?
    25 Apr 2022
    कांग्रेस को उसकी पुरानी पहचान दिलाने के लिए प्रशांत किशोर को पार्टी में कोई पद दिया जा सकता है। इसको लेकर एक्सपर्ट्स क्या सोचते हैं।
  • विजय विनीत
    ब्लैक राइस की खेती से तबाह चंदौली के किसानों के ज़ख़्म पर बार-बार क्यों नमक छिड़क रहे मोदी?
    25 Apr 2022
    "चंदौली के किसान डबल इंजन की सरकार के "वोकल फॉर लोकल" के नारे में फंसकर बर्बाद हो गए। अब तो यही लगता है कि हमारे पीएम सिर्फ झूठ बोलते हैं। हम बर्बाद हो चुके हैं और वो दुनिया भर में हमारी खुशहाली का…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License